सुमित्रा देवी हमेशा से एक अनुशासनप्रिय और सख्त मिजाज महिला रही थीं। उनका मानना था कि घर की बहू को घर के हर काम में निपुण होना चाहिए और उसे अपनी सास की हर छोटी-बड़ी बात को पत्थर की लकीर मानना चाहिए। उनकी बहू, काव्या, एक बहुत ही शांत, समझदार और संस्कारी लड़की थी।
काव्या एक स्कूल में पढ़ाती थी और साथ ही घर की सारी जिम्मेदारियां भी बखूबी निभाती थी। सुबह पांच बजे उठकर पूरे परिवार का नाश्ता बनाना,
दोपहर का लंच पैक करना, अपने पति समीर को ऑफिस के लिए विदा करना और फिर खुद स्कूल भागना, यह उसका रोज़ का नियम था। लेकिन सुमित्रा देवी को काव्या का नौकरी करना कभी रास नहीं आया। उन्हें लगता था कि काव्या अपनी नौकरी की आड़ में घर के कामों से जी चुराती है और उन्हें वो सम्मान नहीं देती जिसकी वो हकदार हैं।
आज घर में कुछ खास मेहमान आने वाले थे। सुमित्रा देवी के मायके से उनके बड़े भाई और भाभी शहर आ रहे थे और रात का खाना उन्हें यहीं खाना था। सुमित्रा देवी ने सुबह ही काव्या को ताकीद कर दी थी कि वह स्कूल से जल्दी लौट आए और रात के लिए शाही पनीर, दाल मखनी, पुलाव और उनके भाई की पसंद की खीर बनाए।
काव्या ने भी हामी भर दी थी और कहा था कि वह समय पर आ जाएगी। लेकिन आज स्कूल में वार्षिक उत्सव की तैयारियां चल रही थीं और काव्या को चाहकर भी जल्दी छुट्टी नहीं मिल पाई। जब वह भागती-दौड़ती घर पहुंची, तो शाम के छह बज चुके थे। मेहमानों के आने में बमुश्किल एक घंटा बाकी था।
काव्या ने घर में कदम रखते ही सुमित्रा देवी के तल्ख तेवर भांप लिए थे। उसने बिना एक पल गंवाए अपना बैग सोफे पर रखा और सीधे किचन में घुस गई। वह तेज़ी से सब्ज़ियां काटने और गैस पर बर्तन चढ़ाने लगी।
उसके माथे से पसीना बह रहा था और दिन भर की थकान से उसके पैर कांप रहे थे, लेकिन वह बिना रुके काम कर रही थी। सुमित्रा देवी किचन के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गईं और उन्होंने तानों की झड़ी लगा दी।
“तुम्हें तो इस घर की कोई फिक्र ही नहीं है! मैंने सुबह ही कहा था कि मेरे मायके वाले आ रहे हैं, इज्जत का सवाल है। लेकिन तुम्हारी वह मास्टरनी की नौकरी इस घर की इज्जत से ज्यादा बड़ी हो गई है। अब एक घंटे में क्या घास छीलोगी तुम? क्या खिलाऊंगी मैं अपने भाई-भाभी को? मेरी तो नाक ही कटवा दी तुमने इस घर में आकर!” सुमित्रा देवी का स्वर लगातार ऊंचा होता जा रहा था।
काव्या ने एक बार भी पलटकर जवाब नहीं दिया। वह बस इतना ही कह पाई, “माँ जी, बस थोड़ी देर रुक जाइए, मैं सब तैयार कर दूंगी। स्कूल में बच्चों का रिहर्सल था, इसलिए मुझे रोक लिया गया।”
“चुप रह! जुबान मत लड़ा मुझसे। बहाने बनाने में तो तुम अव्वल हो,” सुमित्रा देवी ने झिड़कते हुए कहा और बाहर ड्राइंग रूम में आकर सोफे पर बैठ गईं। वह बड़बड़ाती जा रही थीं और अपने गुस्से को हवा दे रही थीं।
ठीक उसी समय मुख्य दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजे पर समीर खड़ा था। समीर अपनी ऑफिस की थकान मिटाने के लिए घर में एक सुकून भरा माहौल चाहता था, लेकिन दरवाजे से घुसते ही उसने अपनी माँ की ऊंची और गुस्से से भरी आवाज़ सुनी। समीर के कदम ठिठक गए। उसने अपना लैपटॉप बैग मेज पर रखा और पूछा, “क्या हुआ माँ? आप इतनी जोर-जोर से क्यों चिल्ला रही हैं? बाहर सड़क तक आपकी आवाज़ आ रही है।”
समीर की आवाज़ सुनकर काव्या और समीर के पिता, रामनाथ जी, दोनों ही अपने-अपने कमरों से बाहर हॉल में आ गए। रामनाथ जी एक बेहद सुलझे हुए, शांत और न्यायप्रिय व्यक्ति थे। वो अक्सर घर के मामलों में दखल नहीं देते थे, लेकिन आज का माहौल कुछ अलग था।
समीर को देखते ही सुमित्रा देवी को जैसे अपनी भड़ास निकालने का एक और मौका मिल गया। यही सारी बातें सुमित्रा जी ने काव्या और अपने पति के सामने समीर से कहीं। “देख ले अपने इस पत्नी के कारनामे! इसे इस घर की, मेरी और मेरे रिश्तेदारों की कोई परवाह नहीं है। मैंने सुबह कहा था कि जल्दी आना, लेकिन यह महारानी छह बजे मुंह उठाकर आई हैं। अब मेरे भाई-भाभी के सामने हमें बाज़ार का खाना परोसना पड़ेगा। मैंने तो पहले ही कहा था कि वर्किंग लड़की से शादी मत कर, घर का सत्यानाश कर देगी। लेकिन मेरी सुनता कौन है इस घर में!”
काव्या तो बेचारी चुपचाप अपनी गर्दन नीचे करके खड़ी रही। उसकी आँखों में आंसू तैर रहे थे, जो किसी भी पल छलकने को बेताब थे। दिन भर की थकान, स्कूल का तनाव और ऊपर से घर आते ही ये चुभने वाले ताने, उसके दिल को छलनी कर रहे थे। लेकिन अपने संस्कारों और बड़ों के प्रति सम्मान के कारण वह एक शब्द भी नहीं बोल रही थी। समीर अपनी पत्नी की हालत देखकर दुखी था, लेकिन वह अपनी माँ को भी कुछ नहीं कह पा रहा था। वह असमंजस में खड़ा था।
किंतु तब रामनाथ जी आगे आए। उन्होंने काव्या की तरफ एक नजर देखा और फिर अपनी पत्नी सुमित्रा देवी की ओर मुड़कर एक बहुत ही शांत, लेकिन गंभीर और दृढ़ स्वर में कहा, “सुमित्रा… तुम बेवजह ही बहू के ऊपर गुस्सा हो रही हो।”
ड्राइंग रूम में अचानक एक भारी सन्नाटा छा गया। सुमित्रा देवी को यकीन ही नहीं हुआ कि उनके पति, जो अक्सर उनकी बातों में हामी भरते थे या चुप रहते थे, आज सबके सामने उन्हें गलत ठहरा रहे हैं।
“मैं बेवजह गुस्सा हो रही हूँ? आपको मेरी बात बेवजह लग रही है?” सुमित्रा देवी ने अवाक होकर पूछा।
रामनाथ जी ने एक गहरी सांस ली और सोफे के पास खड़े होकर बोले, “हाँ सुमित्रा, बिल्कुल बेवजह। तुम सिर्फ वो देख रही हो जो तुम देखना चाहती हो। क्या तुमने एक पल के लिए भी यह सोचा कि काव्या सुबह पांच बजे से उठकर मशीन की तरह काम कर रही है? तुम्हारे और मेरे लिए बिना नागा सुबह की चाय से लेकर रात के दूध तक का ध्यान रखती है। स्कूल में 50 बच्चों को संभालना, वहां के प्रिंसिपल की सुनना और फिर घर आकर तुम्हारी ये जली-कटी बातें सुनना… क्या यह सब इतना आसान है?”
सुमित्रा देवी ने प्रतिवाद करना चाहा, “पर मेरे मेहमान…”
“तुम्हारे मेहमानों की फिक्र उसे भी है,” रामनाथ जी ने उनकी बात काटते हुए कहा। “मैंने देखा है उसे अभी किचन में। वो थकी हुई है, उसके चेहरे पर पसीना है, लेकिन फिर भी वो तुम्हारे भाई के लिए खीर और खाना बना रही है। उसने एक बार भी यह नहीं कहा कि वो थक गई है या बाहर से खाना मंगवा लो। वो अपना फर्ज निभा रही है, लेकिन तुम अपना सास होने का फर्ज भूल गई हो।”
काव्या की आँखों से अब आंसू बहने लगे थे। आज पहली बार इस घर में किसी ने उसके उस दर्द और संघर्ष को आवाज़ दी थी, जिसे वह रोज़ अपने भीतर घोंट लेती थी। समीर भी अपने पिता की बातें सुनकर हैरान था और उसे खुद पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी कि वह अपनी पत्नी का साथ नहीं दे पाया।
रामनाथ जी ने अपनी बात जारी रखी, “सुमित्रा, हम इस पीढ़ी के बच्चों को अपनी शर्तों पर नहीं चला सकते। हमें यह समझना होगा कि एक वर्किंग वुमन की ज़िंदगियाँ कितनी चुनौतीपूर्ण होती हैं। वो घर और बाहर, दोनों मोर्चों पर लड़ती हैं। अगर आज वो किसी मजबूरी की वजह से थोड़ा लेट हो गई, तो क्या आसमान टूट पड़ा? क्या तुम किचन में जाकर उसकी मदद नहीं कर सकती थीं? इसके बजाय तुमने यहाँ बैठकर उसे ताने मारना और पूरे घर का माहौल खराब करना बेहतर समझा।”
सुमित्रा देवी का सिर अब धीरे-धीरे नीचे झुकने लगा था। उनके पास अपने पति के इन तीखे लेकिन सत्य वचनों का कोई जवाब नहीं था।
रामनाथ जी काव्या के पास गए और उसके सिर पर बड़े स्नेह से हाथ रखा। “बेटी, तुम रोना बंद करो। तुम्हें किसी के सामने सिर झुकाने की ज़रूरत नहीं है। तुम इस घर की बेटी हो, कोई मशीन या नौकरानी नहीं। अगर खाना बनने में देर हो रही है, तो होने दो। मेहमान हमारे अपने हैं, कोई बाहर वाले नहीं। वो भी समझेंगे। तुम जाओ, जाकर अपने कमरे में मुंह-हाथ धो लो और थोड़ा आराम करो। खाना समीर और मैं मिलकर बाहर से मंगवा लेंगे या हम सब मिलकर किचन में बना लेंगे।”
“नहीं बाबूजी, मैं बना लूंगी। बस थोड़ा सा ही काम बाकी है,” काव्या ने सिसकते हुए कहा। उसे अपने ससुर के इस प्यार और सम्मान ने भीतर तक भावुक कर दिया था।
“नहीं काव्या,” समीर ने आगे बढ़कर अपनी पत्नी का हाथ पकड़ लिया। “पापा सही कह रहे हैं। तुम दिन भर से थकी हुई हो। आज तुम किचन में नहीं जाओगी। आज का खाना मैं और पापा मिलकर मैनेज करेंगे। माँ के भाई आ रहे हैं, तो हम सब मिलकर उनका स्वागत करेंगे। तुम्हें हर बार अकेले खुद को साबित करने की ज़रूरत नहीं है।”
सुमित्रा देवी अपनी जगह पर सुन्न बैठी थीं। उन्हें आज एहसास हो गया था कि उनका अहंकार और उनका रूढ़िवादी रवैया उनके घर की शांति को किस तरह निगल रहा था। जिस बहू को वह हमेशा कमतर आंकती थीं, उसी बहू ने कभी उनके खिलाफ एक शब्द नहीं कहा था। और आज उनके पति ने उन्हें यह आईना दिखा दिया था कि सम्मान मांगा नहीं जाता, कमाया जाता है, और प्यार के बदले ही प्यार मिलता है।
कुछ देर बाद मेहमान आ गए। रामनाथ जी और समीर ने मिलकर बाहर से कुछ अच्छा खाना मंगवा लिया और कुछ काव्या ने जो तैयारी की थी, उसे परोस दिया गया। मेहमानों को कोई शिकायत नहीं हुई, बल्कि वे काव्या की शालीनता और घर के इस खुशनुमा माहौल की तारीफ करते नहीं थक रहे थे।
रात को जब सब मेहमान चले गए और घर में फिर से खामोशी छा गई, तो सुमित्रा देवी धीरे से काव्या के कमरे में गईं। काव्या अपना बिस्तर ठीक कर रही थी। सुमित्रा देवी को देखकर वह रुक गई।
“माँ जी, आपको कुछ चाहिए? पानी ला दूँ?” काव्या ने विनम्रता से पूछा।
सुमित्रा देवी ने आगे बढ़कर काव्या के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उनकी आँखों में भी अब पश्चाताप के आंसू थे। “मुझे माफ कर दे बेटा। आज तेरे ससुर जी ने मेरी आँखें खोल दीं। मैं अपनी झूठी शान और सास होने के अहंकार में यह भूल ही गई थी कि तू भी किसी की बेटी है। तूने हमेशा इस घर को अपना माना और मैंने हमेशा तुझे एक पराया समझा। आज के बाद मैं कभी तुझे किसी बात के लिए ताना नहीं मारूंगी। तेरी नौकरी तेरी पहचान है और मुझे उस पर गर्व होना चाहिए।”
काव्या ने मुस्कुराते हुए अपनी सास को गले लगा लिया। उस रात उस घर की हवाओं में कोई तनाव नहीं था। वहां सिर्फ प्यार, समझ और एक नए रिश्ते की शुरुआत की महक थी। रामनाथ जी ने अपने मौन और फिर अपने सही समय पर लिए गए स्टैंड से न सिर्फ अपनी बहू का सम्मान बचाया था, बल्कि अपने घर को बिखरने से भी रोक लिया था। सच ही है, जब घर के बड़े अपनी समझदारी और न्याय का परिचय देते हैं, तो कोई भी रिश्ता कमजोर नहीं पड़ता।
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लेखिका : रीमा साहू