*”पच्चीस साल तक उसने अपनी कला को रसोई के डिब्बों के पीछे छिपाए रखा, इस डर से कि दुनिया क्या कहेगी। लेकिन जब एक दिन उसके कदम थिरके, तो उसी दुनिया को अपनी हथेलियां लाल करनी पड़ीं। पढ़िए एक ऐसी मां की कहानी जिसने साबित किया कि सपनों की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।”*
रमेश बाबू के हाथ का निवाला रुक गया। सुमित ने भी हैरानी से पत्नी की ओर देखा।
“नेहा, तुम होश में तो हो?” रमेश बाबू ने चश्मा ठीक करते हुए कहा। “इस उम्र में? 65 साल की हो रही हैं ये। लोग क्या कहेंगे? कि रिटायर्ड रमेश शर्मा की पत्नी बुढ़ापे में नाच रही है? समाज में हमारी कोई इज़्ज़त है या नहीं?”
कमरे के कोने में पड़ी उस पुरानी सागौन की अलमारी को खुलते हुए अरसा बीत गया था। उस पर जमी धूल की परत अनुपमा के जीवन की उस परत जैसी थी, जिसके नीचे उसने अपनी असली पहचान को दफन कर दिया था। घर में सुबह की शुरुआत मिक्सर की आवाज़ और कुकर की सीटी से होती थी। पिछले पच्चीस सालों से अनुपमा ‘मिसेज शर्मा’ और ‘मम्मी जी’ के किरदार को इतनी शिद्दत से निभा रही थी कि वह भूल ही गई थी कि कभी वह ‘अनु’ भी हुआ करती थी।
पति, रमेश बाबू, बैंक से रिटायर हो चुके थे और अब घर पर ही रहते थे। बेटा, सुमित, बहुराष्ट्रीय कंपनी में मैनेजर था और बहू, नेहा, एक स्कूल में शिक्षिका। पोती, गुड़िया, घर की रौनक थी। सब कुछ एकदम व्यवस्थित था, बिल्कुल घड़ी की सुइयों की तरह।
एक रविवार की दोपहर, घर की सफाई चल रही थी। नेहा स्टोर रूम की सफाई कर रही थी कि अचानक उसके हाथ एक भारी मखमली पोटली लगी। उसने उत्सुकतावश उसे खोला तो दंग रह गई। उसमें पीतल के भारी घुंघरू रखे थे, जो थोड़े काले पड़ गए थे लेकिन उनकी खनक आज भी ज़िंदा थी। साथ ही कुछ पुराने एल्बम थे, जिनमें एक युवती कत्थक की मुद्रा में खड़ी थी—चेहरे पर गजब का तेज और आंखों में आत्मविश्वास।
नेहा दौड़ती हुई रसोई में आई, जहाँ अनुपमा अचार के लिए आम काट रही थी।
“मम्मी जी! यह देखिए क्या मिला। यह फोटो… यह आप हैं?” नेहा की आवाज़ में आश्चर्य था।
अनुपमा ने पलटकर देखा। घुंघरू और वो पुरानी तस्वीरें देखते ही उसके हाथ से चाकू छूट गया। एक पल के लिए उसका गला सूख गया। उसने जल्दी से नेहा के हाथ से वो सामान लिया और पल्लू में छिपाने की कोशिश की।
“अरे, यह सब कबाड़ कहाँ ले आई? फेंकने वाला सामान है यह तो…” अनुपमा ने नज़रें चुराते हुए कहा।
“कबाड़? मम्मी जी, यह कबाड़ नहीं, कला है। आप कत्थक डांसर थीं? आपने हमें कभी बताया क्यों नहीं?” नेहा ने जिद पकड़ ली।
रमेश बाबू भी अखबार पढ़ते हुए वहां आ गए। “अरे बहु, वो पुरानी बातें हैं। जवानी का शौक था, शादी के बाद गृहस्थी में यह सब कहाँ चलता है? हमारे खानदान में बहुएं मंच पर नाचें, यह शोभा नहीं देता। अनुपमा ने खुद ही छोड़ दिया था सब।” रमेश बाबू ने बात को हल्का करते हुए कहा, लेकिन उनकी आवाज़ में एक कड़क हिदायत थी।
अनुपमा चुप रही। उसे वो दिन याद आ गया जब शादी के ठीक बाद उसने रियाज़ करने के लिए सुबह उठकर घुंघरू बांधे थे। तब सास ने कहा था, “बहू, यह छन-छन घर के आंगन में अच्छी नहीं लगती। यहाँ पूजा-पाठ का माहौल है, तवायफों वाला काम नहीं चलेगा।”
उस दिन अनुपमा ने घुंघरू जो उतारे, तो फिर कभी नहीं पहने।
दिन बीतते गए, लेकिन नेहा के मन में वो तस्वीर बस गई थी। उसने देखा था कि कैसे अनुपमा कभी-कभी टीवी पर क्लासिकल डांस देखते हुए खो जाती थी, कैसे उसकी उंगलियां टेबल पर ताल देने लगती थीं।
एक दिन शाम को नेहा ने देखा कि अनुपमा छत पर कपड़े सुखा रही है और पैर अनजाने में ही ‘तत्कार’ (कत्थक का फुटवर्क) की लय में चल रहे हैं। नेहा ने ठान लिया।
रात को खाने की मेज पर नेहा ने बात छेड़ दी।
“पापा जी, हमारी सोसायटी के कल्चरल फेस्ट (सांस्कृतिक कार्यक्रम) में इस बार ‘क्लासिकल सोलो’ का कॉम्पिटिशन है। मैं सोच रही हूँ मम्मी जी का नाम दे दूँ।”
रमेश बाबू के हाथ का निवाला रुक गया। सुमित ने भी हैरानी से पत्नी की ओर देखा।
“नेहा, तुम होश में तो हो?” रमेश बाबू ने चश्मा ठीक करते हुए कहा। “इस उम्र में? 65 साल की हो रही हैं ये। लोग क्या कहेंगे? कि रिटायर्ड रमेश शर्मा की पत्नी बुढ़ापे में नाच रही है? समाज में हमारी कोई इज़्ज़त है या नहीं?”
अनुपमा ने सिर झुका लिया। “नहीं नेहा, रहने दे। अब शरीर में वो लोच नहीं रही। और वैसे भी… लोग हंसेंगे।”
“मम्मी जी, लोग तो तब भी हंसते हैं जब आप पार्क में योगा करती हैं, लोग तो तब भी बातें बनाते हैं जब आप अपनी पसंद की साड़ी पहनती हैं,” नेहा ने दृढ़ता से कहा। “कला की कोई उम्र नहीं होती। और पापा जी, इज़्ज़त हुनर से बढ़ती है, उसे दबाने से नहीं।”
सुमित, जो अब तक चुप था, अपनी माँ के चेहरे पर आए उस फीकेपन को देख रहा था। उसे याद आया कि कैसे बचपन में माँ उसे लोरी सुनाते हुए ताल देती थीं। उसने पत्नी का साथ दिया। “माँ, अगर नेहा कह रही है तो एक बार कोशिश करने में क्या हर्ज है? हार-जीत की बात नहीं है, अपनी खुशी की बात है।”
बहुत मान-मनौव्वल के बाद, अनुपमा सिर्फ घर में थोड़ा रियाज़ करने के लिए राजी हुई। अगले दिन, नेहा ने वो घुंघरू पॉलिश करवाकर अनुपमा के पैरों में रख दिए।
जब पच्चीस साल बाद अनुपमा ने पैरों में घुंघरू बांधे, तो उसकी रूह कांप उठी। जैसे ही उसने पहला पैर ज़मीन पर पटका, एक ‘छन’ की आवाज़ गूंजी। उस आवाज़ ने घर की खामोशी को तोड़ दिया।
शुरुआत मुश्किल थी। शरीर साथ नहीं दे रहा था, सांस फूल जाती थी, घुटनों में दर्द होता था। रमेश बाबू अक्सर ताना मार देते—”देखना, हड्डी-पसली तुड़वाकर बैठेगी। मोहल्ले वाले पूछेंगे कि बहू ने क्या जादू कर दिया कि सास नचनिया बन गई।”
इन बातों से अनुपमा का मनोबल टूट जाता, लेकिन नेहा ढाल बनकर खड़ी रहती। वह अनुपमा के घुटनों पर तेल लगाती, उन्हें डाइट वाला खाना देती और हौसला बढ़ाती।
धीरे-धीरे, अनुपमा की लय लौटने लगी। उसके चेहरे पर एक अलग चमक आ गई। जो अनुपमा पहले हर वक्त थकी-थकी रहती थी, अब उसमें एक नई ऊर्जा थी। वह खुश रहने लगी थी।
सोसायटी के फंक्शन का दिन आ गया।
नेहा ने अनुपमा का नाम सबमिट कर दिया था, लेकिन यह बात रमेश बाबू को नहीं पता थी। उन्हें लगा था कि यह सब घर की चारदीवारी तक ही सीमित है। शाम को जब पूरा परिवार कार्यक्रम में गया, तो एंकर ने अनाउंस किया—
“और अब मंच पर आ रही हैं, श्रीमती अनुपमा शर्मा!”
रमेश बाबू चौंक गए। “यह क्या मजाक है?” वे उठकर जाने ही वाले थे कि सुमित ने उनका हाथ पकड़ लिया। “पापा, बस पांच मिनट। अपनी अनु के लिए रुक जाइये।”
मंच पर अंधेरा था। फिर एक स्पॉटलाइट जली। अनुपमा एक सुंदर अनारकली सूट में खड़ी थी। उसके माथे पर बड़ी सी बिंदी और पैरों में वही पुराने घुंघरू थे।
संगीत शुरू हुआ। ‘मोहे रंग दो लाल…’
अनुपमा ने जब हाथ उठाया, तो हॉल में सन्नाटा छा गया। उसकी उम्र, उसके झुर्रियां, उसका वजन—सब गायब हो गया। मंच पर सिर्फ एक कलाकार थी। उसकी आँखों के भाव (अभिनय) इतने गहरे थे कि देखने वालों की पलकें नहीं झपकीं। जब उसने ‘चक्कर’ (तेज़ गोल घूमना) लिए, तो रमेश बाबू का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि यह वही औरत है जो रोज़ उनसे पूछती थी—’सब्जी में नमक ठीक है ना?’
अनुपमा नाच नहीं रही थी, वह जी रही थी। वह उन पच्चीस सालों को जी रही थी जो उसने रसोई के धुएं में खो दिए थे। उसके हर स्टेप में एक आज़ादी थी, एक विद्रोह था और एक समर्पण था।
जब परफॉर्मेंस खत्म हुई, तो अनुपमा ने अपनी अंतिम मुद्रा ली और हांफने लगी। एक पल के लिए पूरा हॉल शांत रहा। अनुपमा को लगा, ‘हो गई गलती… लोग हंस रहे होंगे।’
तभी, तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंज उठा। लोग अपनी सीटों से खड़े होकर ताली बजा रहे थे। नेहा की आँखों में आंसू थे और सुमित सीटी बजा रहा था।
अनुपमा की नज़रें भीड़ में रमेश बाबू को तलाश रही थीं। वे अपनी सीट पर बैठे थे, सिर झुकाए हुए। अनुपमा का दिल बैठ गया। उसे लगा पति नाराज़ हैं।
घर लौटते वक्त कार में एकदम सन्नाटा था। रमेश बाबू ने एक शब्द नहीं बोला।
घर पहुंचकर अनुपमा डरे हुए कदमों से अपने कमरे में गई और घुंघरू उतारने लगी। उसे लगा कि अब तूफान आएगा।
तभी रमेश बाबू कमरे में आए। उनके हाथ में आयोडेक्स (दर्द निवारक बाम) की डिब्बी थी।
अनुपमा ने उन्हें देखा। “सुनिए, मुझे माफ कर दीजिये। मुझे मंच पर नहीं जाना चाहिए था। आपको शर्मिंदगी हुई ना?”
रमेश बाबू ने कोई जवाब नहीं दिया। वे अनुपमा के पैरों के पास बैठ गए। अनुपमा हड़बड़ा गई, “अरे, आप यह क्या कर रहे हैं?”
रमेश बाबू ने उसके सूजे हुए पैरों पर बाम लगाना शुरू किया और भारी आवाज़ में बोले, “शर्मिंदगी मुझे तुम्हें नाचते हुए देखकर नहीं हुई अनु… शर्मिंदगी मुझे खुद पर हुई। पच्चीस साल… पच्चीस साल मैंने एक देवी को सिर्फ दासी बनाकर रखा। मुझे लगा था कि तुम घर संभाल रही हो, पर तुम तो अपनी आत्मा को मार रही थी।”
अनुपमा की आँखों से झर-झर आंसू बह निकले।
रमेश बाबू ने उसकी आँखों में देखा, “आज जब लोग तुम्हारे लिए ताली बजा रहे थे, तो मेरे पास बैठे शर्मा जी ने पूछा—’यह कौन है?’ मैंने गर्व से कहा—’यह मेरी पत्नी है, एक कत्थक डांसर।’ लोग क्या कहेंगे, यह सोचकर मैंने तुम्हारी कला को कैद कर दिया था। पर आज समझ आया कि लोग वही कहते हैं जो हम उन्हें अपनी खामोशी से कहने देते हैं।”
अगली सुबह, घर का नज़ारा बदला हुआ था।
ड्राइंग रूम का सोफा किनारे कर दिया गया था और वहां एक बड़ा सा दर्पण (Mirror) लगा दिया गया था। रमेश बाबू बाज़ार से एक बोर्ड बनवाकर लाए थे जिस पर लिखा था—”अनुपमा नृत्य कला केंद्र”।
“यह क्या है?” अनुपमा ने आश्चर्य से पूछा।
“सुमित और नेहा कह रहे थे कि सोसायटी के कई बच्चे तुमसे डांस सीखना चाहते हैं,” रमेश बाबू मुस्कुराए। “अब तुम सिर्फ घर की रोटियां नहीं बनाओगी, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी कला भी सिखाओगी। रसोई की जिम्मेदारी हम सब बांट लेंगे, लेकिन यह जिम्मेदारी सिर्फ तुम्हारी है।”
अनुपमा ने बोर्ड पर हाथ फेरा। उसकी आँखों में पानी था, लेकिन होठों पर मुस्कान। उसने देखा कि पड़ोस वाली मिसेज वर्मा, जो सबसे ज्यादा बातें बनाती थीं, अपनी पोती का हाथ पकड़े गेट पर खड़ी थीं।
“अनुपमा जी, क्या आप मेरी बिटिया को डांस सिखाएंगी? कल आपका डांस देखकर तो हम दीवाने हो गए,” मिसेज वर्मा ने कहा।
अनुपमा ने नेहा की तरफ देखा और मुस्कुरा दी। वह समझ गई कि ‘लोग’ गिरगिट की तरह होते हैं। जब आप डरते हैं, तो वे डराते हैं। जब आप चमकते हैं, तो वे आपकी रोशनी में नहाना चाहते हैं।
अब शाम को उस घर से कुकर की सीटी के साथ-साथ घुंघरुओं की खनक भी आती है। अनुपमा अब सिर्फ एक मां या पत्नी नहीं है, वह एक ‘गुरु’ है। उसने सीख लिया है कि अपनी पहचान को किसी संदूक में बंद करने के लिए जीवन बहुत छोटा है। सही वक्त का इंतज़ार मत करो, क्योंकि वक्त कभी सही नहीं होता, उसे सही बनाना पड़ता है। आखिर में, अपनी खुशी से बढ़कर कोई ‘लोग’ नहीं होते।
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**लेखक का संदेश:**
यह कहानी हर उस महिला को समर्पित है जिसने परिवार की खातिर अपने सपनों की बलि दे दी। याद रखिये, आप खाली बर्तन नहीं हैं जिसे सिर्फ दूसरों की उम्मीदों से भरा जाए। आपके अंदर भी एक लौ है, उसे बुझने मत दीजिये। शुरुआत करने के लिए कभी देर नहीं होती।
**क्या इस कहानी ने आपके दिल को छुआ?**
क्या आपके घर में भी कोई ऐसी ‘अनुपमा’ है जिसका हुनर जिम्मेदारियों के बोझ तले दब गया है? क्या आपने कभी अपनी माँ या पत्नी से पूछा है कि उनका अधूरा सपना क्या था?
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मूल लेखिका : डॉ उर्मिला सिन्हा