“बेटा तेरा गला नंगा क्यों हैं?”
संजना की माँ ने रसोई से निकलते ही जैसे ही उसकी ओर देखा, उनके चेहरे पर चिंता उतर आई। सुबह का वक्त था। किचन में दूध उबल रहा था, चूल्हे की आँच पर पतीला हौले-हौले थिरक रहा था, और घर में रोज़ की तरह हलचल थी। पर माँ की नजर संजना के गले पर टिकते ही सारा माहौल ठहर-सा गया।
“पहना तो है मंगलसूत्र माँ।”
संजना ने आदतन गले में हाथ फेरा… और अगले ही पल उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
“अरे! मेरा मंगलसूत्र… कहाँ गया…” वह घबराई आवाज में बोल उठी।
उसके हाथ काँपने लगे। उंगलियाँ जैसे किसी खालीपन को पकड़ना चाहती हों, पर गले में तो सचमुच… कुछ था ही नहीं।
माँ ने एकदम से पानी का गिलास उठाकर उसकी ओर बढ़ाया।
“शांत हो बेटा… घबराओ मत। देख बेटा कहीं उतर जार रखा होगा तुमने।”
“नहीं माँ! मैंने कहीं नहीं रखा… जब से तुमने बताया कि.. किसी भी माँ को अपना गला ख़ाली नहीं रखना चाहिए… तब से मैं रात में सोते समय भी नहीं उतारती।”
संजना की आवाज में डर के साथ-साथ अपराधबोध भी था, मानो वह अपने ही वचन से गिर गई हो।
उसने आँखें बंद कीं और याद करने लगी—कल रात खाना, फिर टीवी, फिर थोड़ी देर फोन पर बात, फिर बिस्तर…
पर कहीं भी उसे यह याद नहीं आया कि उसने मंगलसूत्र उतारा हो।
माँ ने उसे सहारा देकर कुर्सी पर बैठाया।
“घर में देख.. कहीं गिर गया होगा। पहले अच्छे से ढूँढते हैं।”
संजना उठी और लगभग दौड़ते हुए कमरे में गई। अलमारी की दराजें खुलीं, बेडशीट हटाई गई, तकिए उलटे, पलंग के नीचे झाँका, ड्रेसिंग टेबल की हर चीज़ देखी…
उसने बाथरूम में जाकर बाल्टी तक देख डाली, वॉशबेसिन के आसपास टटोल लिया, कपड़े धोने की टोकरी उलट दी…
माँ ने भी अपनी तरफ से सारे कोने खोजे।
दोपहर होते-होते घर में जैसे “तलाशी अभियान” चल रहा था। हर जगह… हर चीज़… पर मंगलसूत्र कहीं नहीं।
संजना का चेहरा अब रोने के करीब था।
“माँ… ये कैसे हो सकता है? मैं तो… मैं तो कभी उतारती ही नहीं…”
पूरे घर का कोना-कोना छानने के बाद संजना के भीतर का डर धीरे-धीरे गुस्से में बदलने लगा। और गुस्से को अक्सर सबसे आसान रास्ता चाहिए होता है—किसी पर आरोप।
उसने जैसे अचानक फैसला कर लिया हो, वह दबी आवाज में फुफकार पड़ी—
“ज़रूर विमला (उसकी कामवाली) ने चुराया है।”
माँ का चेहरा सख्त हो गया। उनकी आँखों में डर नहीं था, नाराज़गी थी—पर संजना पर नहीं… उस सोच पर, जो इतनी जल्दी किसी गरीब को अपराधी बना देती है।
“नहीं बेटा, कभी किसी ग़रीब को या किसी को भी निर्दोष पर दोष नहीं लगाना चाहिए।”
माँ की आवाज धीमी थी, पर उसमें वजन था।
“बिना सबूत, बिना वजह… किसी को चोर कहना… बहुत बड़ा पाप है।”
संजना तिलमिला गई।
“नहीं माँ ये छोटे लोग… कभी किसी के सगे नहीं होते… मौक़ा देखते ही अपनी औक़ात दिखा ही देते हैं… हम चाहे जितना भी अपना मानकर इन्हें कर कर दें।”
उसका वाक्य खत्म होते ही कमरे में एक अजीब-सी चुप्पी छा गई, जैसे दीवारों ने भी सांस रोक ली हो।
माँ ने धीरे से संजना की ओर देखा।
उनकी आँखों में एक पुरानी याद उतर आई—सालों पुरानी, धूल में दबी, पर सच की तरह चमकती हुई।
“ऐसा नहीं है बेटा! कभी मैं भी ऐसा ही सोचती थी… लेकिन एक घटना ने मेरी आँखें खोल दी…”
संजना ने पलटकर माँ को देखा।
“कौन-सी घटना?”
माँ ने एक लंबी सांस ली, मानो वक्त के पन्ने पलट रही हों।
बात १९९८ की है…
“जब हमारा नया घर बन रहा था…”
माँ की आवाज में पुराने दिनों की छाया घुल गई।
“तुम बहुत छोटी थी… और तुम्हारी दादी के अनुसार… अपने नये घर की छत की शुरुआत अपने पैसों से नहीं करनी।”
माँ ने हल्की मुस्कान के साथ आगे कहा—
“उनका मानना था कि जब-जब हमारे परिवार मे किसी ने अपने पैसों से घर की छत का निर्माण करवाया, उसके साथ कुछ न कुछ अनहोनी हुई।”
संजना ने हैरानी से पूछा, “तो फिर… आपने क्या किया?”
माँ बोलीं,
“मैं और तेरे पापा इसी उधेड़बुन में थे कि क्या करें… तभी रामप्रसाद या राम मूरत… नाम नहीं याद आ रहा… शायद राममूरत नाम ही था उसका।”
माँ की आँखें एक जगह ठहर गईं।
“वह तुम्हारे पापा जिस बैंक शाखा में शाखा प्रमुख थे… वह उन्हीं की शाखा में चपरासी था… वह भी दैनिक वेतन भोगी। उसे भी हमारी परेशानी का पता चला।”
संजना ने पहली बार दिलचस्पी से पूछा, “उसे कैसे पता चला?”
माँ ने कहा, “बैंक में बातें फैलने में देर नहीं लगती बेटा… और कई बार बातें फैलती नहीं—किसी के भीतर उतर जाती हैं।”
अगले दिन रविवार की सुबह…
“अगले दिन रविवार को सुबह-सुबह कालबेल बजी… हमें थोड़ा गुस्सा भी आया कि कौन सुबह-सुबह नींद में खलल डालने आ गया।”
माँ के चेहरे पर वही पुराना भाव उभर आया—हल्की झुंझलाहट, फिर विस्मय।
“हमने अनमने मन से दरवाजा खोला तो देखा… राममूरत हैं।
हमारे पूछने पर बोला कि—‘मनैजर साहब से कुछ काम है।’”
माँ ने बताया,
“मैंने उसे बैठक में बैठने को कहकर तेरे पापा को बताने चली गयी। पापा ने चाय बनाने को कहा।”
माँ ने जैसे दृश्य को फिर से जीते हुए कहा—
“थोड़ी देर बाद जब मैं चाय लेकर बैठक में जा रही थी कि मेरे कानों में राममूरत की आवाज़ सुनाई दी…”
माँ ने आवाज को हूबहू दोहराया—
“साहब यह हमारी पासबुक देखैं… इसमें करीब ७-८ हजार रूपये है, आप अपने घर की छत का निर्माण शुरू करें।”
यह कहते ही माँ की आँखें भर आईं।
संजना ने चौंककर देखा—माँ आज भी उस पल को याद करके रो रही थीं।
“उस पल ऐसा लगा कि किसी ने कहा— ‘मैं हूँ ना।’”
माँ ने धीमे से कहा।
“मेरी आँखों में आंसू आ गए… मेरे पति ने उससे कहा— ‘तुमने इतना कहा राममूरत… यहीं बहुत है।’”
संजना कुछ बोल नहीं पाई। उसे लगा किसी ने उसकी सोच पर थप्पड़ मारा हो।
माँ ने आगे कहा—
“राममूरत का असमय आना हमें अच्छा नहीं लगता था… सबसे बुरा लगता था उसका पति के बराबर सोफे पर बैठना।”
माँ ने ईमानदारी से स्वीकार किया—
“हम भी उसी समाज से थे बेटा… जो लोगों को उनके कपड़ों, उनकी कुर्सी, उनके पद और उनकी हैसियत से तौलता है।”
संजना का सिर झुक गया।
“हमारे पारिवारिक मित्र की मदद से हमारे घर की छत का निर्माण कार्य सम्पन्न हुआ…”
माँ ने ठहरकर कहा,
“लेकिन राममूरत के मदद का आग्रह हम दोनों को ताउम्र याद रहेगा।”
और फिर माँ ने वही बात कही, जो आज भी उनके भीतर धड़कती थी—
“उसने ‘मैं हूँ ना’ के साथ-साथ हमें एहसास दिलाया कि कोई भी व्यक्ति छोटा या बड़ा नहीं होता… वरन् उसकी सोच उसे छोटा या बड़ा बनाती है।”
कहानी सुनते-सुनते संजना की आँखों में नमी उतर आई थी।
उसने धीमे से कहा, “माँ… शायद मैं…”
माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“बेटा, गलती मन में आए तो इंसान दोषी नहीं होता… गलती पर अड़ जाना इंसान को गलत बना देता है।”
उसी समय दरवाजे की घंटी बजी।
संजना का दिल धक-धक करने लगा—“विमला आ गई…”
विमला अंदर आई, उसके चेहरे पर हल्की घबराहट थी। उसने हाथ जोड़कर कहा—
“मैडम… ये… ये आपके बेडरूम की चादर झाड़ रही थी… तो ये नीचे गिरा मिला… शायद तकिये के अंदर फँस गया होगा।”
विमला ने अपनी हथेली खोली।
उसमें… संजना का मंगलसूत्र था।
संजना की आँखें फैल गईं।
उसके होंठ काँपने लगे।
वह एक पल में समझ गई—उसने बिना सबूत के कितना बड़ा आरोप लगा दिया था।
विमला ने धीरे से कहा, “मैडम, मैंने आपकी आवाज सुनी थी… मैं डर गई थी…”
उसने सिर झुका लिया, जैसे खुद को बचा रही हो।
संजना ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया।
“विमला… माफ कर देना… मैंने… मैंने बहुत गलत सोचा।”
विमला ने सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था, पर आवाज में सादगी—
“मैडम… हम गरीब हैं, पर चोर नहीं…”
यह वाक्य संजना के दिल में जैसे कील बनकर धँस गया।
उसे माँ का “राममूरत” याद आया।
उसे लगा… इंसानियत का असली मंगलसूत्र तो सोच में होता है—और वही कहीं खो गया था, जिसे आज उसने फिर पा लिया।
माँ ने संजना के कंधे पर हाथ रखा।
“देख लिया बेटा? जो लोग हमें ‘छोटे’ लगते हैं… कई बार हमारी सोच से बहुत बड़े निकलते हैं।”
संजना ने मंगलसूत्र हाथ में लेकर माथे से लगाया।
उसने धीरे से कहा—“माँ… आज से मैं किसी पर बिना सच जाने उंगली नहीं उठाऊँगी। और… मैं तुम्हारी वो बात भी समझ गई—‘गला खाली न रखना’… सिर्फ सोने के लिए नहीं… अच्छी सोच के लिए भी।”
माँ मुस्कुरा दीं।
“बस यही सीख है बेटा…”
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