बाहर झमाझम बारिश हो रही थी और आठ साल का शौर्य अपनी ड्राइंग बुक में कुछ रंग भर रहा था। कमरे में एक अजीब सी खामोशी थी, जिसे सिर्फ खिड़की से टकराती बारिश की बूंदें ही तोड़ रही थीं। पलंग पर बैठी देवकी जी, जो शौर्य की नानी थीं, अपनी चश्मे के पीछे से उस मासूम को लगातार निहार रही थीं।
उनकी बेटी, अंजलि के गुज़र जाने के बाद से इस घर की रौनक जैसे हमेशा के लिए कहीं खो गई थी। शौर्य के पिता, मयंक, एक बड़े बैंक में मैनेजर थे।
पत्नी के जाने के गम को उन्होंने काम के बोझ तले दबा लिया था। वे सुबह जल्दी चले जाते और रात को शौर्य के सो जाने के बाद ही लौटते। मयंक ने घर में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं रखी थी, लेकिन एक बच्चे को जो भावनात्मक गर्माहट चाहिए होती है, वो इस बड़े से घर में कहीं नहीं थी।
देवकी जी साल में कुछ महीने यहाँ आकर रहती थीं ताकि शौर्य को थोड़ा अकेलापन कम महसूस हो। आज शौर्य ने अपनी ड्राइंग में तीन लोगों को बनाया था—एक आदमी, एक बच्चा और एक औरत। देवकी जी ने करीब जाकर देखा।
आदमी के नीचे ‘पापा’ लिखा था, बच्चे के नीचे ‘मैं’ और उस औरत के नीचे लिखा था ‘मीरा आंटी’। देवकी जी का दिल एक पल के लिए धक से रह गया। उन्होंने प्यार से शौर्य के बालों में हाथ फेरते हुए पूछा, “बेटा, ये मीरा आंटी कौन हैं? तुमने अपनी मम्मा की जगह इन्हें क्यों बनाया है?”
शौर्य ने अपने रंग किनारे रखे और अपनी मासूम लेकिन बेहद गहरी आँखों से नानी की तरफ देखा। “हाँ नानी, मीरा आंटी मेरी माँ की तरह ही मेरा ध्यान रखती हैं।
जब पापा मुझे सुबह स्कूल के लिए जल्दी-जल्दी तैयार करते हैं और मेरा लंचबॉक्स खाली रह जाता है, तो मीरा आंटी मुझे अपने हाथों से खाना खिलाती हैं। जब मुझे चोट लगती है तो वो बिल्कुल मम्मा की तरह फूँक मारती हैं और मुझे गले लगाती हैं। पापा को मना लो नानी, मैं मीरा आंटी को अपनी माँ बनाकर हमेशा के लिए अपने साथ इसी घर में रखना चाहता हूँ।”
शौर्य के इन शब्दों ने देवकी जी के भीतर जैसे एक भूचाल ला दिया था। एक तरफ उनकी अपनी बेटी अंजलि की यादें थीं, और दूसरी तरफ इस बिना माँ के बच्चे की तड़प। मीरा, उनके पड़ोस में रहने वाली एक बेहद शांत और सादगी पसंद महिला थी। वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी।
शौर्य भी रोज़ शाम को उसके पास पढ़ने जाता था। देवकी जी जानती थीं कि मीरा का अपना कोई परिवार नहीं था। सालों पहले एक सड़क दुर्घटना में उसने अपने पति और अजन्मे बच्चे को खो दिया था। उस हादसे ने मीरा से उसकी दुनिया छीन ली थी, लेकिन उसके भीतर की ‘माँ’ को नहीं मार पाई थी। वह अपना सारा वात्सल्य मोहल्ले के बच्चों, खासकर शौर्य पर लुटाती थी।
देवकी जी ने महसूस किया था कि जब भी शौर्य मीरा के पास से लौटता, तो उसका उतरा हुआ चेहरा खिला-खिला रहता था। उसकी अस्त-व्यस्त शर्ट के बटन लगे होते, उसके बालों में सलीके से कंघी की गई होती, और उसकी बातों में एक चहक होती। मीरा ने अनजाने में ही अंजलि की छोड़ी हुई उस खाली जगह को अपने निस्वार्थ प्यार से भर दिया था। लेकिन क्या मयंक इस बात को समझ पाएगा? मयंक, जो अंजलि की यादों को एक मंदिर की तरह इस घर में सहेज कर बैठा था, क्या वह किसी और औरत को इस घर में अंजलि की जगह दे पाएगा?
रात के ग्यारह बज रहे थे। मयंक थका-हारा घर लौटा। उसने अपना लैपटॉप बैग सोफे पर रखा और सीधे अंजलि की बड़ी सी तस्वीर के सामने जाकर खड़ा हो गया। देवकी जी रसोई से पानी का गिलास लेकर बाहर आईं। उन्होंने मयंक को उस तस्वीर के सामने मौन खड़े देखा। मयंक की आँखें नम थीं।
“मयंक बेटा, खाना लगा दूँ?” देवकी जी ने खामोशी को तोड़ते हुए कहा।
मयंक ने जल्दी से अपनी आँखें पोंछीं और पलटा। “नहीं माँ जी, मैंने कैंटीन में कुछ खा लिया था। आप क्यों जाग रही हैं इतनी रात तक? शौर्य सो गया?”
“हाँ, वो तो सो गया। लेकिन मुझे नींद नहीं आ रही थी। मुझे तुमसे कुछ बहुत ज़रूरी बात करनी है मयंक,” देवकी जी ने पानी का गिलास मेज़ पर रखते हुए कहा। उनका स्वर बहुत गंभीर था।
मयंक सोफे पर बैठ गया। “कहिए ना माँ जी, क्या बात है? मेरी तरफ से कोई कोताही हो गई क्या?”
“नहीं बेटा, तूने मेरी अंजलि के जाने के बाद भी मेरा एक बेटे की तरह ध्यान रखा है। तूने शौर्य के लिए भी हर खिलौना, हर सुविधा ला कर रख दी है। लेकिन मयंक… शौर्य को अब खिलौनों की नहीं, एक माँ की ज़रूरत है।”
मयंक का चेहरा अचानक कठोर हो गया। “माँ जी, हम इस विषय पर पहले भी बात कर चुके हैं। मैं अंजलि की जगह किसी और को नहीं दे सकता। शौर्य की माँ सिर्फ अंजलि थी और वही रहेगी। मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि उसे माँ और बाप दोनों का प्यार दे सकूँ।”
“पर तू दे नहीं पा रहा है मयंक!” देवकी जी की आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गई, लेकिन उसमें गुस्सा नहीं, दर्द था। “तू एक पिता का फर्ज़ निभा रहा है, लेकिन एक माँ का आँचल तू कहाँ से लाएगा? आज शौर्य ने मुझसे कहा कि वह मीरा को अपनी माँ बनाना चाहता है। क्या तूने कभी ध्यान दिया है कि जब तू रात को थका हुआ आता है और सीधे अपने लैपटॉप में घुस जाता है, तो वो बच्चा दीवार की तरफ मुंह करके चुपचाप रोता है? क्या तूने देखा है कि उसके स्कूल के कपड़ों पर जब दाग लगता है तो उसे साफ करने वाला कोई नहीं होता? मीरा ने उस बच्चे को वो ममता दी है, जिसके लिए वो तरस रहा था।”
मयंक झटके से खड़ा हो गया। “मीरा जी एक अच्छी पड़ोसी हो सकती हैं, एक अच्छी टीचर हो सकती हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं उनसे शादी कर लूँ। मैं अंजलि के साथ बेवफाई नहीं कर सकता।”
देवकी जी भी खड़ी हो गईं। उनकी आँखों से अब आँसू बहने लगे थे। “तू अंजलि के साथ बेवफाई की बात कर रहा है? मैं अंजलि की माँ हूँ मयंक! जिस कोख से अंजलि ने जन्म लिया था, मैं वो माँ हूँ। तू सोच, जब मैं अपनी बेटी की जगह किसी और को इस घर में लाने की बात कह रही हूँ, तो मेरे सीने पर क्या बीत रही होगी? मेरा कलेजा फटता है यह सोचकर कि मेरी बच्ची की रसोई, उसका कमरा कोई और संभालेगा। लेकिन मेरे लिए अंजलि के अतीत से ज़्यादा मेरे नाती का भविष्य मायने रखता है। अंजलि वापस नहीं आएगी मयंक, यह एक कड़वा सच है जिसे हमने स्वीकार कर लिया है। पर जो बच्चा अभी जिंदा है, हम उसे क्यों एक ज़िंदा लाश बना रहे हैं?”
देवकी जी के इन शब्दों ने मयंक को भीतर तक हिला दिया। एक माँ अपनी ही बेटी की सौतन लाने की वकालत कर रही थी, सिर्फ इसलिए ताकि उसके नाती का बचपन न छिन जाए। मयंक निःशब्द रह गया और ज़मीन की तरफ देखता रहा।
“एक बार मीरा और शौर्य को साथ देख ले मयंक। अपनी उन बंद आँखों को खोल, जिन पर तूने अंजलि की यादों की पट्टी बांध रखी है। तू अंजलि से प्यार करता था, लेकिन क्या अंजलि यह चाहती कि उसका बेटा जीवन भर माँ के प्यार के लिए तरसे?” यह कहकर देवकी जी अपने कमरे में चली गईं। मयंक रात भर सो नहीं सका। उसका अंतर्द्वंद्व उसे भीतर ही भीतर काट रहा था।
अगले दिन शनिवार था। मयंक की छुट्टी थी। शाम के वक्त अचानक मौसम खराब हो गया और तेज़ गरज के साथ बारिश होने लगी। शौर्य मीरा के घर ट्यूशन पढ़ने गया हुआ था। मयंक को चिंता हुई, तो वह छाता लेकर शौर्य को लेने मीरा के घर की तरफ चल पड़ा।
मीरा का घर थोड़ी ही दूर था। मयंक जब वहाँ पहुँचा तो बाहर का दरवाज़ा हल्का सा खुला था। मयंक ने दरवाज़ा खटखटाने के लिए हाथ उठाया, लेकिन अंदर का नज़ारा देखकर उसके हाथ वहीं रुक गए। तेज़ बिजली कड़कने से लाइट चली गई थी। कमरे में सिर्फ एक मोमबत्ती जल रही थी। शौर्य को बादलों की गरज से बहुत डर लगता था। वह बुरी तरह कांप रहा था और मीरा ने उसे अपने सीने से लगाया हुआ था।
मीरा शौर्य की पीठ सहलाते हुए बिल्कुल वही लोरी गुनगुना रही थी जो अंजलि कभी शौर्य को सुलाने के लिए गाया करती थी। “डर मत मेरे लाल, मैं हूँ ना… कोई बादल तुझे नहीं डरा सकता।” मीरा की आँखों से भी आँसू बह रहे थे। शायद वह भी अपने उस बच्चे को याद कर रही थी जो कभी इस दुनिया में आ ही नहीं सका। शौर्य ने मीरा को कसकर पकड़ा हुआ था और अपनी आधी नींद में बड़बड़ा रहा था, “मम्मा… आप मुझे छोड़कर मत जाना।” मीरा ने उसके माथे को चूमा और कहा, “कभी नहीं छोड़ूंगी मेरे बच्चे, कभी नहीं।”
मयंक उस चौखट पर खड़ा पत्थर की मूरत बन गया था। उसने आज तक शौर्य को अपने सीने से लगाकर ऐसे कभी शांत नहीं किया था। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। उसे समझ आ गया कि देवकी जी सही थीं। मीरा सिर्फ एक टीचर या पड़ोसी नहीं थी; उसने सच में शौर्य के भीतर के उस डर और उस खालीपन को भर दिया था जिसे मयंक अपने पैसों और महंगे खिलौनों से कभी नहीं भर पाया।
मयंक बिना आवाज़ किए वहाँ से वापस लौट आया। उस रात उसने अंजलि की तस्वीर के सामने खड़े होकर बहुत देर तक कुछ बात की। जैसे वह उससे इज़ाज़त मांग रहा हो। और फिर, उसने एक फैसला कर लिया।
अगले दिन सुबह, मयंक देवकी जी और शौर्य को लेकर मीरा के घर पहुँचा। मीरा उन तीनों को एक साथ देखकर थोड़ी हैरान हुई। “आइए मयंक जी, सब ठीक तो है? शौर्य कुछ भूल गया था क्या कल?” मीरा ने सौम्यता से पूछा।
मयंक ने एक गहरी सांस ली। उसकी नज़रें झुकी हुई थीं, लेकिन आज उसके भीतर कोई दुविधा नहीं थी। “मीरा जी, मैं घुमा-फिरा कर बात करना नहीं जानता। पिछले तीन सालों से मैं सिर्फ एक मशीन बनकर रह गया हूँ। मैंने अपने बेटे को हर सुख दिया, लेकिन वह सुख नहीं दे पाया जिसकी उसे सबसे ज्यादा ज़रूरत थी। कल रात मैंने देखा कि शौर्य आपके पास कितना सुरक्षित महसूस करता है। मैं अंजलि की जगह कभी किसी को नहीं दे सकता था, लेकिन आपने वो जगह मांगी भी नहीं। आपने खुद अपनी एक नई जगह बना ली है… शौर्य के दिल में और इस घर के खालीपन में।”
मीरा अवाक रह गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि मयंक क्या कहना चाह रहा है।
मयंक ने आगे कहा, “मेरी सास, देवकी जी, जिन्होंने अपनी बेटी खोई है, उन्होंने मुझे यह देखने की दृष्टि दी है कि प्यार सिर्फ अतीत को पकड़ कर रोने का नाम नहीं है। प्यार वो है जो आप इस बच्चे से करती हैं। क्या आप… क्या आप मेरे इस बिखरे हुए घर को और शौर्य के इस रूठे हुए बचपन को अपना नाम देंगी? क्या आप शौर्य की पक्की वाली माँ बनेंगी?”
मीरा की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। जिस वात्सल्य को वह अपने सीने में सालों से दफन किए बैठी थी, आज उसे एक आकार मिल रहा था। उसने मुड़कर देवकी जी की तरफ देखा। देवकी जी ने नम आँखों से सिर हिलाते हुए अपनी सहमति दी और आगे बढ़कर मीरा का हाथ मयंक के हाथ में रख दिया।
शौर्य, जो यह सब कुछ बहुत ध्यान से देख रहा था, दौड़कर मीरा के गले लग गया। “अब आप हमेशा के लिए मेरी मम्मा बन गई ना?” उसने अपनी छोटी सी उंगली से मीरा के आंसू पोंछते हुए पूछा।
मीरा ने उसे ज़ोर से अपने सीने से लगा लिया। “हाँ मेरे बच्चे, हमेशा के लिए।”
उस दिन उस घर में सिर्फ दो लोगों की शादी नहीं तय हुई थी, बल्कि एक अनाथ हुए बचपन को उसका खोया हुआ आँचल मिल गया था। देवकी जी की आँखों में आँसू थे, लेकिन आज उन आंसुओं में अपनी बेटी को खोने का दुख नहीं, बल्कि एक नए रिश्ते को पनपते हुए देखने का परम संतोष था। उन्होंने साबित कर दिया था कि एक माँ का दिल इतना बड़ा होता है कि वह अपने बच्चों की खुशी के लिए किसी भी अतीत के मोह को त्याग सकती है।
दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि सौतेलेपन का ठप्पा अक्सर समाज लगाता है, जबकि प्यार और ममता किसी खून के रिश्ते की मोहताज नहीं होती? अगर आप देवकी जी की जगह होते, तो क्या अपनी बेटी की जगह किसी और को देने का इतना बड़ा और निस्वार्थ फैसला ले पाते? अपनी राय ज़रूर बताएं।
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