मखमल की कैद – गीता वाधवानी

यह अपमान सीधा काव्या के दिल पर लगा। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने देखा कि राजेश्वरी देवी भी दूर से यह दृश्य देख रही हैं और गुस्से में उनकी तरफ आ रही हैं। इससे पहले कि सास उसे डांटकर वहां से हटातीं, काव्या ने टेबल से एक पेंसिल उठाई।

बाथरूम का नल पूरी तेज़ी से खुला हुआ था। गिरते हुए पानी का शोर इतना तेज़ था कि बाहर खड़े किसी भी इंसान को अंदर की सिसकियां सुनाई नहीं दे सकती थीं। वॉशबेसिन के सफेद चीनी मिट्टी के बेसिन पर काव्या के आंसू टपक रहे थे और पानी की धार में मिल रहे थे। उसने कांपते हाथों से अपना फोन उठाया और अपनी माँ का नंबर मिलाया।

घंटी बजी… एक बार, दो बार। तीसरी घंटी पर उधर से आवाज़ आई, “हल्लो, कैसी है मेरी गुड़िया?”

माँ की वो चिर-परिचित, ममता से भरी आवाज़ सुनते ही काव्या का सब्र का बांध टूट गया। उसने मुंह पर हाथ रखा ताकि चीख न निकल जाए, लेकिन रूह की तड़प को रोक पाना नामुमकिन था।

“माँ! मुझे नहीं रहना यहाँ ससुराल में… मुझे ले जाओ यहाँ से। प्लीज माँ, पापा को भेजो या खुद आ जाओ… मैं यहाँ एक पल भी और नहीं रह सकती,” काव्या एक ही सांस में बोल गई।

उधर, सुमित्रा जी के हाथ से चाय का कप लगभग छूटते-छूटते बचा। उनकी बेटी की शादी को अभी छह महीने ही हुए थे। और ससुराल? शहर का सबसे प्रतिष्ठित ‘सिंघानिया सदन’। जहाँ दौलत की कोई कमी नहीं थी, नौकर-चाकर आगे-पीछे घूमते थे।

“क्या हुआ बेटा? क्या किसी ने कुछ कहा? क्या दामाद जी ने…?” सुमित्रा जी की आवाज़ में घबराहट थी।

“नहीं माँ,” काव्या ने सिसकते हुए कहा। “किसी ने कुछ नहीं कहा। काश… काश कोई कुछ कहता। काश कोई मुझे डांटता, मुझसे काम करवाता। लेकिन यहाँ तो… यहाँ तो मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं कोई इंसान नहीं, बल्कि कांच की अलमारी में सजाई हुई कोई महंगी गुड़िया हूँ। माँ, मेरा दम घुट रहा है इस सोने के पिंजरे में।”

सुमित्रा जी समझ नहीं पा रही थीं। “बेटा, साफ़-साफ़ बता, हुआ क्या है?”

काव्या ने आंसुओं को पोंछा और अपनी सांसों को संयत करने की कोशिश की। “माँ, मैंने आर्किटेक्चर में गोल्ड मेडल लिया था। मैंने सपने देखे थे कि मैं बड़ी-बड़ी इमारतें डिज़ाइन करूँगी। लेकिन यहाँ… यहाँ मेरी सासू माँ, राजेश्वरी देवी, मुझे रसोई में पैर तक नहीं रखने देतीं। मैं सुबह उठकर चाय बनाना चाहती हूँ, तो नौकरानी कहती है- ‘बहू जी, आप क्यों तकलीफ करती हैं, मालकिन नाराज़ हो जाएंगी’। मैं अपनी अलमारी साफ़ करना चाहती हूँ, तो सास कहती हैं- ‘काव्या, हमारे घर की बहुएं काम नहीं करतीं, हुकुम चलाती हैं’। माँ, यह कैसा प्यार है जो मुझे अपाहिज बना रहा है? मेरी डिग्री, मेरा हुनर, मेरी पहचान… सब इस आलीशान घर के मखमली पर्दों के पीछे दफ़न हो रहा है।”

सुमित्रा जी ने एक गहरी सांस ली। वे समझ गईं। यह मामला ‘जुल्म’ का नहीं, बल्कि ‘जरूरत से ज़्यादा संरक्षण’ का था, जो कभी-कभी जुल्म से भी बदतर हो जाता है।

“काव्या,” माँ ने शांत स्वर में कहा। “भागना बहुत आसान है बेटा। मैं अभी गाड़ी भेज सकती हूँ। लेकिन सोच, क्या तू हार मानकर वापस आएगी? तूने हमेशा अपनी जगह खुद बनाई है। यह लड़ाई झगड़े की नहीं, अपने वजूद की है। क्या तूने उनसे बात करने की कोशिश की?”

“कोशिश?” काव्या हंसी, एक खोखली हंसी। “माँ, कल मैंने सासू माँ से कहा था कि मैं एक फर्म में जॉब के लिए अप्लाई करना चाहती हूँ। जानते हैं उन्होंने क्या कहा? उन्होंने हंसते हुए मेरे गाल पर हाथ फेरा और कहा—’पगली, सिंघानिया खानदान की बहुएं चंद रुपयों के लिए बाहर धक्के नहीं खातीं। तुम्हें जो चाहिए, तिजोरी की चाबी तुम्हारे पास है, ले लो। तुम्हें पैसों की क्या कमी?’ माँ, उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि मुझे पैसा नहीं, ‘काम’ चाहिए। मुझे थकान चाहिए, मुझे पसीना बहाना है।”

सुमित्रा जी ने कुछ पल सोचा। “बेटा, सुन। पिंजरा तोड़ने के लिए शोर मचाने की ज़रूरत नहीं होती, बस चाबी ढूंढनी पड़ती है। और वो चाबी तेरे हुनर में ही है। तुझे साबित करना होगा कि तू सिर्फ एक ‘बहू’ नहीं, एक ‘दिमाग’ भी है। थोड़ा सब्र रख, कोई मौका ज़रूर मिलेगा।”

काव्या ने फोन रख दिया। माँ की बातों ने उसे थोड़ी हिम्मत तो दी, लेकिन दिल का बोझ हल्का नहीं हुआ था। उसने अपना चेहरा धोया, आँखों में काजल लगाया ताकि रोने के निशान छिप जाएं, और कमरे से बाहर निकली।

सिंघानिया सदन आज हमेशा से ज़्यादा व्यस्त था। काव्या के ससुर, श्रीमान दीनानाथ सिंघानिया, शहर के एक बड़े बिल्डर थे। आज घर में एक बहुत बड़ी पार्टी थी क्योंकि उन्हें एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मिलने की उम्मीद थी—’रिवरफ्रंट मॉल’ का प्रोजेक्ट। शहर के कई बड़े आर्किटेक्ट और मंत्री शाम को डिनर पर आने वाले थे।

सासू माँ, राजेश्वरी देवी, पूरे घर को निर्देश दे रही थीं। “अरे, वो फूलों की सजावट ठीक से करो। और काव्या… बेटा, तुम तैयार हो जाओ। मैंने तुम्हारे लिए वो हीरों वाला हार निकाला है, आज वही पहनना। सबको पता चलना चाहिए कि सिंघानिया जी की बहू किसी राजकुमारी से कम नहीं है।”

काव्या ने फीकी मुस्कान के साथ सिर हिलाया। फिर से वही… ‘दिखावा’। उसे एक सजावट की वस्तु बनकर महफ़िल में खड़ा रहना था, मुस्कुराना था और बस सुंदर दिखना था।

शाम को पार्टी शुरू हुई। घर रोशनी से नहाया हुआ था। काव्या अपने पति, अनिरुद्ध, के साथ खड़ी मेहमानों का स्वागत कर रही थी। अनिरुद्ध एक अच्छा इंसान था, लेकिन उसे कभी लगा ही नहीं कि काव्या घर में नाखुश है। उसे लगता था कि दुनिया की हर औरत यही तो चाहती है—आराम और विलासिता।

पार्टी के एक कोने में, दीनानाथ जी कुछ परेशान दिख रहे थे। वे अपने मुख्य आर्किटेक्ट, मिस्टर खन्ना, और मंत्री जी के साथ एक ब्लूप्रिंट (नक्शे) पर चर्चा कर रहे थे।

“सिंघानिया जी,” मंत्री जी ने नक्शे को देखते हुए नाक सिकोड़ी। “ईमानदारी से कहूं तो यह डिज़ाइन बहुत पुराना लग रहा है। मॉल कम और सरकारी दफ्तर ज्यादा लग रहा है। रिवरफ्रंट पर हमें कुछ ऐसा चाहिए जो युवाओं को खींचे, जो ‘आधुनिक’ हो। मुझे डर है कि यह टेंडर शायद आपको न मिल पाए।”

दीनानाथ जी के माथे पर पसीना आ गया। “मंत्री जी, हम इसमें बदलाव कर देंगे। थोड़ा समय दीजिये।”

“समय ही तो नहीं है, कल सुबह फाइनल सबमिशन है,” मंत्री जी ने रूखेपन से कहा।

मिस्टर खन्ना सफाई दे रहे थे, “सर, जगह की कमी है, पिलर ऐसे ही आएंगे…”

काव्या, जो जूस की ट्रे पास से गुज़र रहे वेटर से ले रही थी, ने यह सब सुन लिया। उसकी आर्किटेक्ट वाली नज़र ने दूर से ही टेबल पर फैले उस नक्शे को देखा। एक ही नज़र में उसे समझ आ गया कि गलती कहाँ है। डिज़ाइन में वेंटिलेशन और नेचुरल लाइट का इस्तेमाल ही नहीं किया गया था, जिससे वह जगह घिची-पिची लग रही थी।

काव्या का मन हुआ कि वह आगे बढ़कर कुछ बोले। लेकिन तभी उसे सासू माँ के शब्द याद आए— *’बहुएं हुकुम नहीं चलातीं, बस मुस्कुराती हैं’।*

वह मुड़ गई। लेकिन उसके कदम रुक गए। यह उसके ससुर की प्रतिष्ठा का सवाल था। और शायद… यही वो मौका था जिसकी बात माँ कर रही थीं। पिंजरे की चाबी!

काव्या ने एक गहरी सांस ली। उसने अपनी भारी साड़ी का पल्लू संभाला और धीरे-धीरे उस टेबल की तरफ बढ़ी।

“पापा जी,” काव्या ने मृदु स्वर में कहा।

दीनानाथ जी ने तनाव में ऊपर देखा। “हाँ बेटा? कुछ चाहिए?”

“नहीं पापा जी। वो… मैंने गलती से आपकी बातें सुन ली थीं। अगर आप बुरा न मानें, तो क्या मैं इस नक्शे को एक बार देख सकती हूँ?”

वहाँ खड़े मिस्टर खन्ना ने व्यंग्य से हंसे। “अरे भाभी जी, यह घर का इंटीरियर डेकोरेशन नहीं है कि फूलदान कहाँ रखना है। यह स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग है। आप जाकर मेहमानों को देखिये।”

यह अपमान सीधा काव्या के दिल पर लगा। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने देखा कि राजेश्वरी देवी भी दूर से यह दृश्य देख रही हैं और गुस्से में उनकी तरफ आ रही हैं। इससे पहले कि सास उसे डांटकर वहां से हटातीं, काव्या ने टेबल से एक पेंसिल उठाई।

“मिस्टर खन्ना,” काव्या की आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी, आत्मविश्वास की। “मैं जानती हूँ यह स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग है। मैंने इसमें गोल्ड मेडल लिया है।”

उसने नक्शे पर तेज़ी से पेंसिल चलाना शुरू किया।

“अगर हम इस सेंट्रल पिलर को यहाँ से हटाकर, कैंटीलीवर बीम का इस्तेमाल करें, तो यह पूरा एरिया ओपन हो जाएगा। और रिवरफ्रंट की तरफ कंक्रीट की दीवार की जगह अगर हम ‘टफन्ड ग्लास’ का फसाड (Façade) दें, तो मॉल के अंदर से नदी का पूरा व्यू मिलेगा। इससे जगह भी बड़ी दिखेगी और बिजली की बचत भी होगी।”

काव्या ने दो मिनट में उस नक्शे के ऊपर एक रफ स्केच बना दिया।

मंत्री जी, जो जाने की तैयारी में थे, रुक गए। उन्होंने झुककर स्केच देखा। उनकी आँखें फैल गईं। “अरे वाह! यह तो शानदार आईडिया है। कैंटीलीवर बीम… हाँ, इससे तो पूरा लुक ही बदल जाएगा। एकदम मॉडर्न!”

दीनानाथ जी हैरान होकर कभी नक्शे को देख रहे थे, तो कभी अपनी बहू को।

“यह… यह तुमने सोचा?” दीनानाथ जी ने अविश्वास से पूछा।

“जी पापा जी। और पार्किंग को अगर हम बेसमेंट की जगह वर्टिकल ऑटोमेटेड कर दें, तो ग्रीन बेल्ट के लिए जगह निकल आएगी, जो पर्यावरण के नियमों के हिसाब से ज़रूरी भी है,” काव्या ने तकनीकी विवरण देते हुए कहा।

मंत्री जी ने दीनानाथ जी का हाथ पकड़ लिया। “सिंघानिया जी, अगर यह डिज़ाइन कल सुबह सबमिट हुआ, तो टेंडर आपका पक्का। आपकी बहू तो छुपी रुस्तम निकली!”

मिस्टर खन्ना का चेहरा शर्म से लाल हो गया था।

तभी राजेश्वरी देवी वहां पहुँच गईं। “काव्या! यह क्या तमाशा है? बड़ों के बीच में तुम क्या कर रही हो? और यह पेंसिल… हाथ गंदे हो जाएंगे। चलो अंदर।”

“रुकिए राजेश्वरी!” दीनानाथ जी की आवाज़ गूंजी। आज उनकी आवाज़ में हमेशा वाला स्नेह नहीं, बल्कि एक भारीपन था।

वे काव्या की तरफ मुड़े। “बेटा, क्या तुम आज रात जागकर इस डिज़ाइन को फेयर (साफ़) कर सकती हो? कंप्यूटर पर?”

काव्या का दिल ज़ोर से धड़का। “जी पापा जी! मैं अभी कर सकती हूँ।”

“तो जाओ, स्टडी रूम में। जो भी चाहिए, मंगा लो।”

राजेश्वरी देवी हक्की-बक्की रह गईं। “लेकिन जी, मेहमान… पार्टी… बहू का ऐसे काम करना…”

“मेहमान खाना खाकर चले जाएंगे राजेश्वरी,” दीनानाथ जी ने पत्नी को समझाया। “लेकिन आज अगर काव्या ने यह नहीं बताया होता, तो मेरी साख मिट्टी में मिल जाती। आज मुझे अपनी ‘बहू’ नहीं, अपनी ‘बेटी’ का हुनर दिखा है।”

काव्या स्टडी रूम की तरफ भागी। उसने अपनी भारी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा, हीरों का हार उतारकर मेज पर रखा और कंप्यूटर ऑन किया। उंगलियां की-बोर्ड पर ऐसे थिरकने लगीं जैसे कोई प्यासा बरसों बाद पानी पी रहा हो। आज थकान नहीं थी, आज नशा था—काम का नशा।

सुबह के चार बजे, काव्या ने फाइनल प्रेजेंटेशन तैयार कर ली। जब वह प्रिंटआउट लेकर बाहर आई, तो देखा कि डाइनिंग टेबल पर अनिरुद्ध और दीनानाथ जी सोए नहीं थे, उसका इंतज़ार कर रहे थे।

“हो गया?” अनिरुद्ध ने पूछा, उसकी आँखों में पत्नी के लिए एक नया सम्मान था।

“हाँ,” काव्या ने फाइल बढ़ाई।

अगले दिन शाम को खबर आई—सिंघानिया ग्रुप को टेंडर मिल गया था। घर में जश्न का माहौल था।

लेकिन असली ड्रामा अभी बाकी था।

रात के खाने के बाद, दीनानाथ जी ने काव्या को बुलाया। “बेटा, आज से तुम ऑफिस आओगी। इस प्रोजेक्ट की हेड तुम रहोगी।”

काव्या की खुशी का ठिकाना नहीं था। लेकिन तभी राजेश्वरी देवी की आवाज़ आई, “नहीं!”

सब चौंक गए। राजेश्वरी देवी की आँखों में आंसू थे।

“अगर यह ऑफिस जाएगी, तो घर का क्या होगा? हमारा क्या होगा? मैंने इसे बड़े नाज़ों से रखा है,” राजेश्वरी देवी ने रुंधे गले से कहा।

काव्या धीरे से सास के पास गई और उनके घुटनों के पास बैठ गई। “माँ जी, आप डरती हैं न कि मैं बदल जाऊंगी? कि मैं काम के चक्कर में घर भूल जाऊंगी? या आपकी इज़्ज़त कम हो जाएगी?”

राजेश्वरी देवी ने मुँह फेर लिया।

“माँ जी,” काव्या ने उनका हाथ अपने हाथ में लिया। “आप मुझे मखमल में लपेटकर रखती हैं क्योंकि आपको लगता है कि बाहर की धूप मुझे जला देगी। लेकिन माँ जी, मैं वो मिट्टी हूँ जो धूप में तपकर ही मज़बूत ईंट बनती है। अगर मैं घर में बैठी रही, तो मैं ‘मैं’ नहीं रहूँगी। और एक खुश बहू ही घर को खुश रख सकती है, एक घुटी हुई कैदी नहीं।”

राजेश्वरी देवी ने काव्या की तरफ देखा। उन्हें अपने जवानी के दिन याद आ गए। उन्हें याद आया कि कैसे उन्हें गाने का शौक था, लेकिन शादी के बाद ससुर जी ने कहा था—’घराने की बहुएं गाती नहीं हैं’। उन्होंने अपना शौक मार दिया था और सारी ज़िंदगी घर को सजाने में लगा दी थी। आज वही इतिहास वे अपनी बहू के साथ दोहरा रही थीं, यह सोचकर कि यही ‘सुख’ है।

“काव्या,” राजेश्वरी देवी ने काव्या का चेहरा थाम लिया। एक आंसू उनकी आँख से टपका। “मुझे माफ़ कर दे बेटा। मैं अपनी अधूरी ख्वाहिशों का डर तुझ पर थोप रही थी। मुझे लगा मैंने ‘त्याग’ किया तो तुझे ‘सुख’ दे दूँ। पर मैं भूल गई कि बिना उड़ान के पंख भी बोझ बन जाते हैं।”

उन्होंने अपनी कमर से तिजोरी की चाबी निकाली और काव्या के हाथ में नहीं, बल्कि मेज पर रख दी।

“तुझे इस चाबी की ज़रूरत नहीं है,” राजेश्वरी देवी मुस्कुराईं। “तेरे पास अपने हुनर की चाबी है। जा बेटा, जी ले अपनी ज़िंदगी। लेकिन एक शर्त है…”

काव्या का दिल थम गया। “क्या माँ जी?”

“संडे को… संडे को कोई काम नहीं। उस दिन तू सिर्फ मेरी बेटी बनकर रहेगी और हम साथ में बैठकर गप्पे लड़ाएंगे। और हाँ, उस दिन चाय मैं बनाऊंगी,” राजेश्वरी देवी ने हंसते हुए कहा।

काव्या ने सास को गले लगा लिया। आज पिंजरा खुल चुका था। वह घर वही था, लोग वही थे, लेकिन अब वह ‘कैद’ नहीं, ‘आशियाना’ था।

काव्या ने अपने कमरे में जाकर फिर से माँ को फोन लगाया।

“माँ! मुझे नहीं जाना यहाँ से,” काव्या ने चहकते हुए कहा।

“क्यों? अभी तो रो रही थी?” सुमित्रा जी ने छेड़ते हुए पूछा।

“क्योंकि माँ, मैंने पिंजरा तोड़ दिया है… अपनी शर्तों पर। अब मैं यहाँ की गुड़िया नहीं, यहाँ की गौरव हूँ।”

**कहानी का सार:**

अक्सर हम प्यार और परवाह की आड़ में दूसरों की आज़ादी और सपनों को अनजाने में कुचल देते हैं। एक औरत के लिए सबसे बड़ी खुशी गहने या आराम नहीं, बल्कि उसका ‘आत्मसम्मान’ और ‘पहचान’ होती है। जब सास अपनी बहू को अपनी परछाई नहीं, बल्कि एक नई रोशनी मानती है, तभी घर सच में स्वर्ग बनता है।

**प्रिय पाठकों,**

क्या आपको भी लगता है कि बहुओं को सिर्फ ‘घर की लक्ष्मी’ बनकर नहीं, बल्कि अपनी प्रतिभा से ‘दुनिया की शक्ति’ बनकर जीने का हक है? क्या आपके या आपके किसी परिचित के जीवन में कभी ऐसा पल आया है जब उसे ‘सोने के पिंजरे’ में घुटन महसूस हुई हो?

अगर काव्या की इस जीत ने आपके चेहरे पर मुस्कान ला दी हो और दिल को सुकून दिया हो, तो:

❤️ **लाइक करें** – काव्या के जज़्बे के लिए।

💬 **कमेंट करें** – अपनी राय या अनुभव साझा करें। क्या राजेश्वरी देवी का डर जायज़ था?

🔄 **शेयर करें** – ताकि हर उस घर तक यह संदेश पहुँचे जहाँ कोई ‘प्रतिभा’ मखमल के पर्दों के पीछे छिपी बैठी है।

**अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं, तो ऐसी ही दिल को छू लेने वाली, प्रेरणादायक और मार्मिक पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को अभी फ़ॉलो करें। हम हर रोज़ रिश्तों की नई परिभाषा लेकर आते हैं। धन्यवाद!** 🙏

मूल लेखिका : गीता वाधवानी

error: Content is protected !!