मखमल के पर्दे  – रश्मि प्रकाश 

“हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि बाजार से हम ‘सुविधा’ खरीद सकते हैं, लेकिन ‘परवाह’ नहीं। जब करियर की दौड़ में एक माँ हारी, तो उस ‘घरेलू’ भाभी ने ही जीत दिलाई जिसे वो हमेशा कमतर समझती थी।”

“अरे वाह नताशा! ये नई गाड़ी? और ये बैग तो पक्का इटैलियन ब्रांड का है?” पड़ोस की मिसेज खन्ना ने नताशा की नई कार से उतरते ही तारीफों के पुल बांध दिए।

नताशा ने अपने महंगे सनग्लासेस माथे पर चढ़ाते हुए गर्व से कहा, “हाँ आंटी, अभी पिछले हफ्ते ही प्रमोशन मिला है। कंपनी ने बोनस दिया तो सोचा खुद को थोड़ा पैम्पर कर लूं। आखिर दिन-रात मेहनत करती हूँ, घर पर बैठकर रोटियां तो नहीं सेकती ना!”

नताशा का यह तंज सीधा और सपाट था, जो बगल में खड़ी उसकी जेठानी, सुधा के लिए था। सुधा, जो हाथ में सब्जी का थैला लिए खड़ी थी, बस फीका सा मुस्कुरा दी और चुपचाप गेट खोलकर अंदर चली गई। नताशा के लिए सुधा का मतलब सिर्फ एक ‘घरेलू औरत’ था, जिसकी दुनिया रसोई के मसालों और टीवी सीरियलों तक सीमित थी। नताशा एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट थी और उसे लगता था कि दुनिया उसी की उंगलियों पर नाचती है।

रात को खाने की मेज पर नताशा ने अपनी सास, सावित्री जी से कहा, “मम्मी जी, अगले हफ्ते मुझे प्रोजेक्ट के लिए लंदन जाना है। मैंने आरव के लिए एक प्रोफेशनल नैनी हायर की है। ‘मिसेज डिसूजा’। बहुत हाई प्रोफाइल हैं, सेलिब्रिटीज के बच्चों को संभाल चुकी हैं। उनकी फीस थोड़ी ज्यादा है, पर आरव की केयर में मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहती।”

सावित्री जी ने रोटी पर घी लगाते हुए कहा, “बेटा, नैनी की क्या ज़रूरत है? सुधा तो घर पर ही है। आरव अपनी बड़ी मम्मी के साथ बहुत खुश रहता है। वो संभाल लेगी।”

नताशा ने अपनी प्लेट में कांटा जोर से चुभोया। “मम्मी जी, प्लीज! सुधा भाभी बहुत अच्छी हैं, मानती हूँ। पर आरव को संभालने के लिए मुझे कोई ऐसा चाहिए जो उसकी डाइट, उसकी पढ़ाई और उसके ग्रूमिंग का ध्यान रख सके। भाभी तो उसे दिन भर वही पराठे खिलाएंगी और अपनी तरह हिंदी मीडियम वाली कहानियां सुनाएंगी। मुझे मेरा बेटा स्मार्ट चाहिए, देसी नहीं।”

सुधा रसोई से दाल लेकर आ रही थी। उसके कदम एक पल के लिए ठिठके, लेकिन उसने खुद को संभाल लिया। उसने चुपचाप दाल का कटोरा मेज पर रखा।

नताशा के पति, कबीर ने टोकना चाहा, “नताशा, तुम ज्यादा बोल रही हो। भाभी ने हमेशा आरव को अपने बेटे जैसा प्यार दिया है।”

“प्यार से पेट नहीं भरता कबीर, और न ही करियर बनता है,” नताशा ने तुनक कर जवाब दिया। “भाभी की दुनिया इस घर की चारदीवारी है। मेरी दुनिया बाहर है। मुझे पता है मेरे बेटे के लिए क्या बेस्ट है।”

सुधा ने शांत स्वर में कहा, “नताशा सही कह रही हैं कबीर। नैनी ट्रेंड होती हैं। मैं तो बस एक साधारण गृहिणी हूँ। आप लोग चिंता मत कीजिए।” सुधा की आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी, बस एक गहरा दर्द था जिसे उसने अपनी मुस्कान के पीछे छिपा लिया था।

नताशा लंदन चली गई। घर में मिसेज डिसूजा आ गईं। वे हमेशा सफेद यूनिफॉर्म में रहती थीं, बात-बात पर अंग्रेजी झाड़ती थीं और आरव को छूने से पहले सैनिटाइजर का इस्तेमाल करती थीं। नताशा वीडियो कॉल पर मिसेज डिसूजा से बात करती, आरव को दूर से देखती और खुश होती कि उसका बेटा ‘प्रोफेशनल हाथों’ में है।

तीन दिन बीते। सावित्री जी को घुटनों के दर्द के कारण फिजियोथेरेपी के लिए जाना पड़ता था। कबीर ऑफिस में व्यस्त था। घर पर सिर्फ सुधा, मिसेज डिसूजा और पांच साल का आरव थे।

दोपहर का समय था। सुधा अपने कमरे में सिलाई कर रही थी। अचानक उसे आरव के रोने की तेज़ आवाज़ सुनाई दी, जो तुरंत ही एक अजीब सी घुटी हुई खांसी में बदल गई। सुधा सिलाई मशीन छोड़कर भागी।

हॉल में पहुँचकर उसने देखा कि मिसेज डिसूजा सोफे पर बैठी कान में हेडफोन लगाए अपनी किसी दोस्त से वीडियो कॉल पर बतिया रही थीं। आरव ज़मीन पर पड़ा तड़प रहा था, उसका चेहरा नीला पड़ रहा था और वह सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहा था।

“आरव!” सुधा चीखी।

मिसेज डिसूजा ने हेडफोन हटाया और लापरवाही से बोलीं, “ओह, ही इज़ जस्ट थ्रोइंग ए टैन्ट्रम (यह बस नखरे कर रहा है)। मैंने उसे टैबलेट खेलने को नहीं दिया।”

सुधा ने आरव को गोद में उठाया। उसका शरीर तप रहा था और गले से घरघराहट की आवाज़ आ रही थी। सुधा को याद आया कि आरव को मूंगफली से एलर्जी है। उसने पास पड़ी प्लेट देखी—उसमें पीनट बटर कुकीज के टुकड़े थे।

“आपने इसे क्या खिलाया?” सुधा ने शेरनी की तरह दहाड़ कर पूछा।

मिसेज डिसूजा हकलाने लगीं, “वो… वो कुकीज। मैडम नताशा ने ही मंगवाए थे… इम्पोर्टेड हैं।”

“इसमें पीनट है बेवकूफ औरत!” सुधा ने चिल्लाकर कहा। “आरव को एलर्जी है।”

सुधा जानती थी कि अस्पताल पहुँचने में कम से कम बीस मिनट लगेंगे और आरव के पास इतना समय नहीं था। उसका गला सूज रहा था। नताशा ने शायद नैनी को बताया होगा, लेकिन नैनी ने अपनी लापरवाही में ध्यान नहीं दिया।

सुधा भागी। वह न तो डॉक्टर थी, न ही हाई प्रोफाइल नैनी। लेकिन वह एक माँ थी—भले ही आरव उसका अपना बेटा नहीं था। उसे याद था कि कबीर को भी बचपन में यह एलर्जी थी और सावित्री जी एक खास देसी काढ़ा और एपिपेन (EpiPen) हमेशा घर में रखती थीं।

सुधा ने तुरंत इमरजेंसी इंजेक्शन ढूंढा जो फ्रिज के ऊपरी शेल्फ में रखा होता था। उसके हाथ कांप रहे थे, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने आरव की जांघ पर इंजेक्शन लगाया। फिर उसे अपनी गोद में उल्टा लिटाकर उसकी पीठ थपथपाई ताकि उसकी सांस की नली खुले। साथ ही उसने कबीर को फोन कर दिया और एम्बुलेंस बुला ली।

मिसेज डिसूजा डर के मारे कोने में खड़ी थीं। “आई डिडन्ट नो… आई एम सॉरी…”

“चुप रहिए आप!” सुधा ने इतनी सख्ती से कहा कि मिसेज डिसूजा की बोलती बंद हो गई।

जब तक एम्बुलेंस आई, आरव की सांसें थोड़ी स्थिर हो चुकी थीं। सुधा उसके साथ अस्पताल गई। डॉक्टर ने चेकअप के बाद कहा, “मिसेज सुधा, आप अगर पांच मिनट की भी देरी करतीं, तो एनाफिलेक्टिक शॉक (anaphylactic shock) से बच्चे की जान जा सकती थी। आपने बहुत सूझबूझ से काम लिया।”

नताशा को खबर मिली तो वह लंदन से पहली फ्लाइट पकड़कर वापस आई। उसका पूरा अहंकार, उसका कॉन्फिडेंस हवाई जहाज के उस सफर में कहीं खो गया था। उसकी आंखों के सामने बस आरव का चेहरा था।

जब वह अस्पताल के प्राइवेट वार्ड में पहुंची, तो वहां का नज़ारा देखकर उसके कदम ठिठक गए।

आरव बिस्तर पर बैठा था, थोड़ा कमजोर लग रहा था, लेकिन मुस्कुरा रहा था। सुधा अपने हाथों से उसे खिचड़ी खिला रही थी।

“बड़ी मम्मा, वो आंटी (नैनी) गंदी थीं। वो फोन पर बात करती रहती थीं। आप मुझे छोड़कर मत जाना,” आरव ने सुधा के गले लगते हुए कहा।

सुधा ने उसके माथे को चूमा, “नहीं जाऊंगी बेटा। मैं यहीं हूँ, हमेशा।”

नताशा दरवाजे पर खड़ी यह सब देख रही थी। उसके लाखों रुपये, उसकी हाई प्रोफाइल नैनी, उसका ‘स्मार्ट पेरेंटिंग’ का घमंड—सब धरा का धरा रह गया था। जिसे उसने ‘अनपढ़’ और ‘गंवार’ समझा था, उसी ने उसके बेटे की जान बचाई थी। उसे याद आया कि कैसे उसने कहा था—”भाभी की दुनिया चारदीवारी तक सीमित है।” हाँ, सीमित थी, इसीलिए उस चारदीवारी के अंदर उसका बेटा सुरक्षित था।

कबीर ने नताशा के कंधे पर हाथ रखा। “डॉक्टर ने कहा है कि भाभी ने समय रहते इंजेक्शन न दिया होता तो…” कबीर की आवाज़ भर्रा गई।

नताशा धीरे-धीरे अंदर गई। सुधा ने उसे देखा और जगह बनाने के लिए उठने लगी। “नताशा, तुम आ गई? आरव अब ठीक है। डरो मत।”

नताशा ने आरव को गले लगाया और फूट-फूट कर रोने लगी। आरव ने कहा, “मम्मा, बड़ी मम्मा सुपरवुमन हैं। उन्होंने मुझे बचाया।”

नताशा ने सुधा की तरफ देखा। वह कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन शब्द गले में अटक रहे थे। उसने अचानक झुककर सुधा के पैर पकड़ लिए।

सुधा ने झटके से पीछे हटते हुए उसे उठाया, “अरे पगली! यह क्या कर रही है? मैं तेरी जेठानी हूँ, बड़ी बहन जैसी।”

“नहीं भाभी,” नताशा ने सिसकते हुए कहा, “मैं बहुत बड़ी बेवकूफ हूँ। मैंने अपनी झूठी शान और पैसों के घमंड में यह नहीं देखा कि असली दौलत मेरे घर में ही थी। मैं जिसे ‘पिछड़ापन’ कहती थी, दरअसल वो ‘ममता’ थी। मैंने एक अनजान औरत पर भरोसा किया सिर्फ इसलिए क्योंकि वो अंग्रेजी बोलती थी, और आपको ठुकरा दिया क्योंकि आप सादा जीवन जीती हैं। अगर आज आरव को कुछ हो जाता, तो मैं ज़िंदा नहीं रह पाती।”

नताशा का महंगा इटैलियन बैग फर्श पर पड़ा था, और वह खुद सुधा के साधारण सूती पल्लू में मुंह छिपाकर रो रही थी।

सुधा ने उसके आंसू पोंछे। “नताशा, हर किसी की अपनी जगह होती है। तुम बाहर की दुनिया जीत सकती हो, यह तुम्हारा हुनर है। पर घर को संभालने के लिए सिर्फ दिमाग नहीं, दिल चाहिए होता है। और वो दिल किसी डिग्री या प्रमोशन से नहीं मिलता। हम एक परिवार हैं। आरव जितना तुम्हारा है, उतना ही मेरा भी है। माँ कभी बच्चे पर एहसान नहीं करती।”

“भाभी, क्या आप मुझे माफ़ कर देंगी?” नताशा ने पूछा।

“माफ़ी कैसी? बस अगली बार जब बोनस मिले, तो मेरे लिए इटैलियन बैग नहीं, बस अपनी पसंद की एक साड़ी ले आना। साथ बैठकर पहनेंगे,” सुधा ने हंसते हुए माहौल को हल्का कर दिया।

मिसेज डिसूजा को नौकरी से निकाल दिया गया। नताशा ने अपनी नौकरी नहीं छोड़ी, लेकिन अब उसका नजरिया बदल चुका था। अब जब वह ऑफिस जाती, तो आरव को किसी ‘प्रोफेशनल’ के भरोसे नहीं, बल्कि अपनी ‘बड़ी मम्मा’ के भरोसे छोड़कर जाती।

एक रविवार की सुबह, मिसेज खन्ना (पड़ोसन) फिर आईं। उन्होंने देखा कि नताशा और सुधा बगीचे में बैठी हैं। नताशा, सुधा से स्वेटर बुनना सीख रही थी।

“अरे नताशा, आज शॉपिंग पर नहीं गई?” मिसेज खन्ना ने पूछा।

नताशा ने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं आंटी, आज मैं भाभी से वो सीख रही हूँ जो किसी मॉल में नहीं मिलता—रिश्तों को गर्माहट देने का हुनर।”

सुधा और नताशा ने एक-दूसरे को देखा और मुस्कुरा दीं। मखमल के पर्दों के पीछे की चमक भले ही आँखों को लुभाती हो, लेकिन धूप और तूफ़ान में सिर छिपाने के लिए सूती आँचल ही काम आता है—यह सबक नताशा ने अच्छी तरह सीख लिया था।

मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश 

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