रात के सन्नाटे में सूटकेस की चेन बंद करने की आवाज़ किसी धमाके जैसी गूंजी। 72 वर्षीय रमाकांत बाबू ने एक नज़र उस कमरे पर डाली जहाँ उन्होंने अपनी ज़िंदगी के पिछले चालीस साल गुज़ारे थे। दीवारों पर लगीं पुरानी तस्वीरें, अलमारी में सजी उनकी किताबें और कोने में रखी उनकी पत्नी की तस्वीर, जिन पर बासी फूलों की माला चढ़ी थी।
रमाकांत जी ने अपनी पत्नी की तस्वीर को प्रणाम किया और बुदबुदाए, “सुधा, मुझे माफ़ करना। जिस घर को हमने ईंट-ईंट जोड़कर बनाया था, आज उसी घर में मेरा दम घुट रहा है। मैं बोझ बनकर नहीं जीना चाहता।”
उन्होंने अपना छोटा सा बैग उठाया, जिसमें दो जोड़ी कपड़े, दवाइयां और पासबुक थी, और दबे पांव कमरे से बाहर निकले। बगल वाले कमरे में उनका बेटा समीर और बहू रश्मि सो रहे थे। अभी दो घंटे पहले ही खाने की मेज़ पर जो हुआ था, वह रमाकांत जी के कानों में अब भी पिघले हुए सीसे की तरह गूंज रहा था।
शाम को समीर ऑफिस से आया था और रश्मि ने बताया कि पापाजी के मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए पचास हज़ार रुपये लगेंगे। समीर झुंझला गया था, “रश्मि, अभी तो कार की ईएमआई दी है, और अगले महीने चिंटू की स्कूल फीस जानी है। ये खर्चे भी अभी आने थे? पापा भी न… थोड़ा ध्यान नहीं रख सकते थे? हर महीने डॉक्टर, दवाइयां… आखिर मैं अकेला कितना खींचूँ?”
रश्मि ने उसे चुप कराने की कोशिश की थी, “धीरे बोलिए, बाबूजी सुन लेंगे।”
समीर ने कहा था, “सुनने दो! हकीकत तो यही है न कि हम मिडिल क्लास लोग हैं, कोई कुबेर का खज़ाना नहीं है मेरे पास।”
रमाकांत जी ने अपने कमरे में सब सुन लिया था। उस पल उन्हें लगा कि वे पिता नहीं, बल्कि एक पुराना फर्नीचर हैं जो घर में जगह भी घेर रहा है और जिसकी मरम्मत का खर्चा भी भारी पड़ रहा है। स्वाभिमान, जो बुढ़ापे में इंसान की आखिरी पूंजी होती है, वह चकनाचूर हो गया था।
घर से निकलकर वे लड़खड़ाते कदमों से मुख्य सड़क पर आ गए। दिसंबर की सर्द रात थी। कोहरा इतना घना था कि स्ट्रीट लाइट भी धुंधली नज़र आ रही थी। उन्होंने एक ऑटो रोका और आईएसबीटी (बस अड्डे) का नाम लिया।
बस अड्डे पर भारी भीड़ थी, लेकिन रमाकांत जी को अपने अंदर एक अजीब सा सन्नाटा महसूस हो रहा था। उन्हें नहीं पता था कि उन्हें कहाँ जाना है—शायद हरिद्वार, या शायद किसी वृद्धाश्रम। बस उन्हें इस शहर से, इस घर से दूर जाना था जहाँ उनकी मौजूदगी उनके बेटे के भविष्य पर ‘कर्ज़’ बनकर लदी थी।
हरिद्वार की बस जाने में अभी एक घंटा बाकी था। ठंड से कांपते हुए वे यात्री शेड के लोहे के बेंच पर बैठ गए। उन्होंने अपनी शॉल को कसकर लपेटा। उनकी आँखों से आंसू बहकर उनकी झुर्रियों में समा रहे थे।
“बाबा, बहुत ठंड है न?”
अचानक एक युवा आवाज़ ने उन्हें चौंका दिया। रमाकांत जी ने सिर उठाकर देखा। उनके बगल में एक युवक बैठा था। उम्र करीब पच्चीस-छब्बीस साल, चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान और कपड़े साधारण—जींस और एक हल्की जैकेट। इतनी ठंड में भी उसने स्वेटर नहीं पहना था।
रमाकांत जी ने आँसू पोंछे और रुखी आवाज़ में कहा, “हाँ, ठंड तो है।”
“चाय पियेंगे?” युवक ने पूछा। इससे पहले कि रमाकांत जी मना करते, उसने हवा में हाथ हिलाया जैसे किसी चाय वाले को बुला रहा हो, पर वहां कोई नहीं था। फिर वह हंसा, “माफ़ कीजियेगा, आदत है। वैसे मेरा नाम आर्यन है। आप?”
“रमाकांत,” उन्होंने संक्षेप में उत्तर दिया।
आर्यन ने उन्हें गौर से देखा। “इतनी रात को, इस उम्र में अकेले? कोई तीरथ यात्रा है या… वनवास?”
उसकी बातों में कुछ ऐसा था जिसने रमाकांत जी के दिल के ताले खोल दिए। शायद अजनबियों से दुख साझा करना आसान होता है।
“वनवास ही समझो बेटा,” रमाकांत जी की आवाज़ भर्रा गई। “जब अपने ही घर में इंसान ‘फालतू’ हो जाए, तो सड़क ही ठिकाना लगती है।”
आर्यन के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई। उसने गंभीरता से पूछा, “लड़ाई हुई?”
रमाकांत जी ने सब उगल दिया। बेटे की झुंझलाहट, पैसों की तंगी, अपनी लाचारी… सब कुछ। “मैं नहीं चाहता कि मेरे बेटे को मेरी वजह से अपनी खुशियाँ मारनी पड़ें। मैं चला जाऊंगा तो उसका खर्चा बचेगा, वो सुकून से जी पाएगा।”
आर्यन कुछ देर चुप रहा। फिर उसने एक गहरी सांस ली, जो कोहरे में भाप बनकर नहीं उड़ी।
“बाबा, आपको लगता है आपके जाने से वो ‘सुकून’ से जी पाएगा?” आर्यन ने पूछा। “मैं भी एक बेटा था। मैंने भी अपने पिता के साथ यही गलती की थी। नहीं… उन्होंने मेरे साथ।”
रमाकांत जी ने प्रश्नवाचक नज़रों से उसे देखा।
“मेरे पापा,” आर्यन ने बताना शुरू किया, “वो भी आपकी तरह सोचते थे। रिटायरमेंट के बाद उन्हें लगने लगा कि वो मुझ पर बोझ हैं। मैं नया-नया जॉब में लगा था, काम का प्रेशर था, अक्सर चिढ़ जाता था। एक रात, मेरी किसी बात से नाराज़ होकर वो भी ऐसे ही चुपचाप घर छोड़कर चले गए। बिना बताए।”
“फिर?” रमाकांत जी ने उत्सुकता से पूछा।
“फिर क्या?” आर्यन की आवाज़ में एक असीम दर्द उतर आया। “सुबह जब मैं उनके कमरे में चाय लेकर गया, तो बिस्तर खाली था। मैंने पागलों की तरह उन्हें ढूंढा। पुलिस स्टेशन, रेलवे स्टेशन, अस्पताल… हर जगह। मेरी नौकरी छूट गई, मेरी सगाई टूट गई, क्योंकि मैं दिन-रात बस पापा को ढूंढता रहता था। मेरा वो ‘खर्चा’ तो बच गया जो उनकी दवाइयों पर होता था, लेकिन मेरी पूरी ज़िंदगी ‘पछतावे’ के कर्ज़ में डूब गई।”
रमाकांत जी सन्न रह गए। उन्होंने कभी इस पहलू के बारे में सोचा ही नहीं था।
आर्यन ने उनकी आँखों में झांका। “बाबा, आप सोच रहे हैं कि आप जाकर समीर का भला करेंगे। पर सच यह है कि आप उसे एक ऐसी सज़ा देने जा रहे हैं जिसकी माफ़ी उसे ताउम्र नहीं मिलेगी। जब भी वो खाना खाने बैठेगा, उसे याद आएगा कि उसका बाप न जाने भूखा है या प्यासा। जब ठंड पड़ेगी, उसे याद आएगा कि आप किस हाल में होंगे। आप ‘बोझ’ नहीं हटा रहे, आप उसे ‘आत्मग्लानि’ के नरक में धकेल रहे हैं।”
रमाकांत जी के हाथ कांपने लगे। “लेकिन… उसने कहा कि…”
“गुस्सा था बाबा,” आर्यन ने बीच में कहा। “गुस्से में इंसान वो बोल देता है जो वो महसूस नहीं करता। क्या बचपन में आपने समीर को कभी डांटा नहीं था? क्या कभी थप्पड़ नहीं मारा? तब क्या उसने घर छोड़ दिया था? नहीं न, क्योंकि वो जानता था कि आप उससे प्यार करते हैं। आज समीर को भी उसी भरोसे की ज़रूरत है। उसे एक मौका दीजिये। बुढ़ापा दूसरी बार बचपन ही तो होता है, और बच्चे कभी-कभी नालायक हो सकते हैं, पर माँ-बाप तो माफ़ कर देते हैं न?”
रमाकांत जी की आँखों के सामने समीर का चेहरा घूम गया—बचपन का समीर जो उनकी उंगली पकड़कर चलता था, और आज का समीर जो दफ्तर के बोझ तले दबा हुआ है। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। वे भावुकता में एक आत्मघाती कदम उठाने जा रहे थे।
“तुम ठीक कहते हो बेटा,” रमाकांत जी खड़े हो गए। “मैं बहुत बड़ी गलती करने जा रहा था। मैं अभी घर वापस जाऊंगा। उसे डांटूँगा, समझाऊंगा, पर छोड़कर नहीं जाऊंगा।”
आर्यन के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान लौट आई। “यह हुई न बात। जाइये बाबा, इससे पहले कि सुबह हो जाए और समीर को वो खाली बिस्तर दिखे।”
“तुम भी घर जाओ बेटा, तुम्हारे पापा इंतज़ार कर रहे होंगे,” रमाकांत जी ने कहा।
आर्यन ने एक अजीब सी उदासी के साथ मुस्कुराकर सिर हिलाया। “हाँ बाबा, अब शायद मैं भी घर जा पाऊंगा।”
रमाकांत जी ने अपना बैग उठाया और मुड़कर ऑटो स्टैंड की तरफ बढ़े। तभी उन्हें पीछे से किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।
“पापाजी! पापाजी!”
यह समीर की आवाज़ थी। रमाकांत जी रुके और पीछे मुड़े। समीर, हाफता हुआ, बदहवास हालत में उनकी तरफ दौड़ रहा था। उसने पजामा और टी-शर्ट ही पहन रखी थी, पैरों में अलग-अलग रंग की चप्पलें थीं।
“समीर?”
समीर ने आते ही अपने पिता को कसकर गले लगा लिया। वह फूट-फूटकर रो रहा था। “पापा, आप कहाँ चले गए थे? मैंने आपको कमरे में नहीं देखा तो मेरी जान ही निकल गई। मुझे माफ़ कर दीजिये पापा। मैं… मैं बहुत बुरा बेटा हूँ। मुझे नहीं पता मुझे क्या हो गया था। आप बोझ नहीं हैं, आप तो मेरी छत हैं। छत के बिना घर कैसा?”
रमाकांत जी की आँखों से भी आंसू बह निकले। उन्होंने कांपते हाथों से समीर के सिर पर हाथ फेरा। “नहीं बेटा, गलती मेरी थी। मैं बुड्ढा सठिया गया था। मुझे लगा…”
“नहीं पापा, अब कभी ऐसा मत सोचिएगा,” समीर ने उनकी आँखों में देखा। “आपके बिना मेरा क्या वजूद? रश्मि घर पर रो-रोकर पागल हो गई है। चलिए घर चलिए।”
रमाकांत जी ने राहत की सांस ली। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा ताकि आर्यन का शुक्रिया अदा कर सकें और समीर को उससे मिलवा सकें।
“समीर, उस लड़के ने मेरी आँखें खोल दीं। वो देखो, वो बेंच पर…”
रमाकांत जी ने उंगली उठाई, लेकिन बेंच खाली थी। वहां कोहरे के सिवा कुछ नहीं था।
“कौन लड़का पापा?” समीर ने इधर-उधर देखा। “वहां तो कोई नहीं है।”
“अरे, अभी तो यहीं था। आर्यन नाम था उसका। बता रहा था कि उसके पापा भी घर छोड़कर चले गए थे और वो उन्हें ढूंढते-ढूंढते बर्बाद हो गया। उसने ही मुझे समझाया।”
समीर ने हैरानी से पिता को देखा, फिर उसकी नज़र बस अड्डे की दीवार पर चिपके पुराने, फटे हुए पोस्टरों पर पड़ी। स्ट्रीट लाइट की मद्धम रोशनी एक पोस्टर पर पड़ रही थी।
“पापा… क्या वो लड़का… ऐसा दिखता था?” समीर ने एक पोस्टर की ओर इशारा किया।
रमाकांत जी पास गए और अपनी धुंधली आँखों को सिकोड़कर देखा। पोस्टर पर एक युवक की तस्वीर थी—वही सौम्य मुस्कान, वही चेहरा। ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था—’गुमशुदा की तलाश’। और नीचे लिखा था: “नाम: आर्यन मल्होत्रा। उम्र: 25 वर्ष। तीन साल पहले अपने पिता को ढूंढते हुए घर से निकला था और वापस नहीं लौटा। जिसे भी मिले सूचित करें।”
रमाकांत जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। तारीख तीन साल पुरानी थी।
“समीर,” रमाकांत जी ने थरथराती आवाज़ में कहा, “यह… यह तो वही है। लेकिन यह कैसे हो सकता है?”
समीर ने पोस्टर को ध्यान से पढ़ा। नीचे एक छोटे से नोट में किसी ने पेन से लिख दिया था— “दुर्घटना में मृत्यु की पुष्टि हो चुकी है।”
एक पल के लिए बाप-बेटे के बीच सन्नाटा पसर गया। सर्द हवा का एक झोंका आया, लेकिन इस बार उसमें ठंडक नहीं, एक अजीब सी गर्माहट थी।
रमाकांत जी समझ गए। आर्यन कोई साधारण यात्री नहीं था। वह एक भटकती हुई रूह थी, एक ऐसा बेटा जो जीते-जी अपने पिता को नहीं ढूंढ पाया था, लेकिन आज उसने एक दूसरे पिता को खोने से बचा लिया था। शायद यही उसका ‘प्रायश्चित’ था, शायद इसी मुक्ति के लिए वह इस बस अड्डे पर भटक रहा था।
रमाकांत जी ने हाथ जोड़कर उस खाली बेंच और उस पोस्टर को प्रणाम किया।
“शुक्रिया बेटा,” उन्होंने मन ही मन कहा। “आज तुमने एक बाप को नहीं, एक परिवार को टूटने से बचा लिया। अब अपनी यात्रा पूरी करो।”
समीर ने पिता का बैग अपने कंधे पर टांगा और उनका हाथ कसकर थाम लिया। “चलिए पापा, घर चलते हैं। चाय ठंडी हो रही है।”
वापसी के रास्ते में ऑटो में बैठते हुए रमाकांत जी ने महसूस किया कि घर की चारदीवारी के अंदर की तकरार, बाहर की दुनिया के अकेलेपन से लाख गुना बेहतर होती है। आर्यन ने उन्हें सिखा दिया था कि गुस्सा तो क्षणिक होता है, लेकिन अनुपस्थिति का घाव शाश्वत होता है।
उस रात, रमाकांत जी अपने कमरे में सोए, लेकिन इस बार उन्हें घुटन नहीं, सुरक्षा महसूस हो रही थी। और शहर के उस पुराने बस अड्डे पर, उस लोहे की बेंच पर आज कोहरा नहीं था। वहां एक शांति थी, जैसे किसी का लंबा इंतज़ार आज खत्म हो गया हो।
लेखिका : सीमा ऋषभ