मैं भी संपूर्ण हूँ – संगीता अग्रवाल

कहते हैं एक औरत तब सम्पूर्ण कहलाती है जब वो मां बनती है ….तो क्या जो औरत किसी वजह से मां नहीं बन पाती वो अपूर्ण होती है ? क्या केवल एक मां ना बन पाना इतना बड़ा गुनाह हो जाता है कि वो दुनिया की नजर में गुनहगार बन जाती है ….

क्यों ये दुनिया बच्चे ना होने के लिए सिर्फ औरत को जिम्मेदार ठहराती है क्यों केवल एक औरत को ताने सुनने पड़ते हैं क्यों केवल एक औरत को अशुभ , अपशकुनी नामों से नवाजा जाता है जबकि पुरुष भी तो पिता नहीं बना तो वो क्यों  कभी अशुभ नहीं होता??

ऐसे असंख्य सवाल अक्सर आरोही के मन में उमड़ते जिनके जवाब उसके पास नहीं थे ….पिछले आठ सालों से वो कभी लोगों के ताने सुन रही थी कभी अपनी जांच , दवाइयों , इंजेक्शनों के ख़तम ना होने वाले सितम झेल रही थी। अब तो उसकी हिम्मत जवाब देने लगी थी। हर बार डॉक्टर एक नई उम्मीद जगाती

और हर बार वो उम्मीद आरोही को निराशा के दलदल में ले जाती उस पर घर परिवार और पड़ोसियों के ताने। हालाकि उसको अपने पति माधव का बहुत सहारा था पर एक तो मां ना बन पाने का गम उस पर लोगों के ताने इनके आगे माधव का प्यार और सहारा बहुत कम था माधव भी ये बात समझता था।

” मां पापा मेरा ट्रांसफर मुंबई हो गया है मुझे अगले हफ्ते वहां शिफ्ट होना होगा …आरोही तुम पैकिंग शुरू कर दो !” एक दिन माधव ऑफिस से आकर बोला! असल में उसने आरोही को लोगों के तानों से बचाने का ये तरीका निकाला था और अपना ट्रांसफर करवा लिया था।

” पर बेटा ऐसे अचानक …!!” माधव के माता पिता हैरान थे ।

” मां साल दो साल की बात है फिर मैं वापिस यही अपना ट्रांसफर करवा लूंगा पर अभी जाना जरूरी है !” माधव ने उन्हें समझाया और एक हफ्ते बाद आरोही को ले निकल गया मुंबई जहां लोगों के ताने आरोही का कलेजा छलनी ना करें।

मुंबई पहुंच कर भी आरोही खुश नहीं थी भले उसे तानों से छुटकारा मिल गया था पर मां ना बन पाने की कसक तो थी ही।

” हैलो आप शायद यहां नए आए हैं ?” एक दिन आरोही के दरवाजे की घंटी बजने पर गेट खोलते ही एक भद्र सी महिला ने पूछा।

” जी हां हमे एक हफ्ता हुआ यहां आए पर आप ..?” आरोही ने कहा।

” मैं भी यही रहती हूं मेरा नाम शालिनी है कल मेरे घर कीर्तन है अगर आप आ सके तो मुझे अच्छा लगेगा !” उस महिला ने कहा।

” जी जरूर आऊंगी !” आरोही ने कहा और कुछ औपचारिक बातों के बाद शालिनी चली गई।

अगले दिन आरोही शालिनी के घर कीर्तन में आई। शालिनी एक 40-45 साल की भद्र महिला हैं जो पिछले दस साल से अपने पति सुधाकर के साथ इस सोसायटी में रहती हैं । सोसायटी की महिलाएं शालिनी की बहुत इज्जत करते हैं।

आरोही को कीर्तन में आ और सोसायटी की औरतों से मिलकर अच्छा लगा वरना सारा दिन घर में अकेली बोर होती थी वो। सबसे ज्यादा उसे शालिनी जी का स्वभाव पसंद आया सच कितनी जिंदादिल इंसान है ये ….हो भी क्यों ना ईश्वर का दिया सब कुछ है इनके पास एक मैं हूं जिसे ईश्वर ने औरत तो बनाया पर अपूर्ण। आरोही सोचने लगी। कीर्तन के बाद प्रसाद ले आरोही घर आ गई। अब अक्सर उसका शालिनी से सामना होता रहता था और हर बार शालिनी की मनमोहक मुस्कान आरोही को उनके करीब ले आती थी। शालिनी के बात करने का तरीका भी इतना अच्छा था कि कोई भी उनका कायल हो जाए। धीरे धीरे आरोही उनसे खुलने लगी थी।

” शालिनी जी आप उम्र और तजुर्बे दोनों में मुझसे बड़ी हैं तो क्या मैं आपको दीदी बोल सकती हूं ?” एक दिन आरोही ने बातों बातों में शालिनी से कहा।

” हां हां क्यों नहीं मेरी वैसे भी कोई छोटी बहन नहीं है और तुम इतनी प्यारी हो कि तुममें मैं एक छोटी बहन ही देखती हूं !” शालिनी मुस्कुरा कर बोली। शालिनी के साथ आरोही अपना गम भूल जाती थी और खुल कर जिंदगी जीती थी। वरना तो सारा दिन अपने मां ना बनने की वजह से दुखी रहती थी।

” दीदी आपके बच्चे किस जगह पढ़ते हैं … आपने उन्हें हॉस्टल में क्यों डाला है ?” एक दिन पार्क में बैठे बैठे आरोही शालिनी से बोली।

” मेरे बच्चे किसी हॉस्टल में नहीं है आरोही !” शालिनी मुस्कुरा कर बोली।

” मतलब …?” आरोही हैरानी से बोली।

” मतलब मेरे बच्चे हैं ही नहीं तो हॉस्टल में कैसे होंगे ….” शालिनी ने कहा।

” क्या….!!” आरोही का मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया।

” हां आरोही मैं मां बन ही नहीं सकती थी इसलिए मेरे बच्चे नहीं हैं !” शालिनी का सौम्य चेहरे पर अभी भी मुस्कान थी।

” दीदी आप मां नहीं बन पाई फिर भी इतनी खुश कैसे हैं….मेरा मतलब है मेरी शादी को भी आठ साल हो गए मैं मां नहीं बन पाई तो ऐसे लगता है मुझे तो जैसे में संपूर्ण नहीं हूं इसके लिए खूब ताने भी सुने रोई भी कितनी मन्नते मांगी , व्रत पूजा पाठ सब किए फिर भी दुखी की दुखी हूं आपको खुश देख ऐसा लगता ही नही आप सम्पूर्ण नहीं हो मैं तो यही सोचती थी आपके बच्चे कहीं बाहर पढ़ते होंगे!” आरोही बोली।

” आरोही तुमसे किसने कहा एक औरत मां नहीं बनती तो वो सम्पूर्ण नहीं होती। सम्पूर्ण वहीं है जिसके हाथ,पैर ,आंख ,नाक सब सलामत है। कितनो के तो वो भी नहीं होते तब भी खुशी खुशी जिंदगी बिताते हैं वो।  मां बनना ना बनना वैसे भी औरत के हाथ में ही तो नहीं अगर वो किसी वजह से मां नहीं बन पा रही तो ये कमी भी ईश्वर की दी हुई है उसके लिए खुद को दोष दे दुखी होने से क्या फायदा !” शालिनी मुस्कुरा कर बोली।

” पर दीदी आपको आपके ससुराल वालो ने मोहल्ले पड़ोस वालो ने कभी ताने नहीं दिए इसको लेकर …मुझे तो दिन रात ये सब झेलना पड़ा है कितना इलाज भी करवाया पर कुछ नहीं हुआ। घर वाले बच्चे को गोद लेने के पक्ष में भी नहीं हैं। तब माधव ने अपना ट्रांसफर यहां करवाया जिससे कम से कम लोगों के तानों से तो बचुं मैं!” आरोही मायूस होकर बोली।

” एक औरत होने के नाते ये सब मुझे भी सुनना पड़ा था सामने से मैं खुद अपने लिए खड़ी होती थी पर पीठ पीछे लोग मुझे बांझ बोलते थे शुरू में परेशान होती थी , रोती भी थी किन्तु फिर खुद को समझाया इस तरह तिल तिल कर कैसे जी पाऊंगी बस तबसे लोगों की बातों का असर होना बन्द हो गया या यूं कहो मैने एक सीमा खींच दी थी जिसके पार उन बातों को आने ही नहीं देती थी जो मुझे दुखी करे  …रही बच्चे की बात तो मैने भी बहुत इलाज करवाया पर फिर जब हर बार निराशा हाथ लगी तो इसे ईश्वर की रजामंदी मान स्वीकार कर लिया तबसे मैं दुखी नहीं होती !” शालिनी अपनी उसी सौम्य मुस्कान के साथ बोली। 

” पर दीदी बुढ़ापे में तो बच्चों की जरूरत महसूस होती है ना तब … आपने बच्चा गोद लेने के बारे में नहीं सोचा?” आरोही ने फिर पूछा।

” आरोही कल किसने देखा है … क्या पता हम बुढ़ापा देखें ही ना अपना ….फिर जिनके बच्चे होते हैं वो सब क्या बुढ़ापे में सुखी होते हैं ….सामने वाले शर्मा अंकल को देख लो अस्सी साल की उम्र है और तीन बच्चों के होते हुए यहां अकेले रह रहे जबसे आंटी गई हैं … आरोही जो है आज है मैं आज में जीती हूं कल की फिक्र में घुलने से अच्छा जैसे हो जो हो उसे स्वीकार करो और खुश रहो! रही बच्चा गोद लेने की बात वो इतना आसान नहीं होता क्योंकि एक तो घर वाले तैयार नहीं होते और हो भी जाए तो बच्चा गोद लेने में अड़चन इतनी हैं।” शालिनी बोली।

” सच में दीदी आपने तो जीवन के प्रति मेरा नजरिया ही बदल दिया मैं बेमतलब आठ साल से दुखी थी कि मैं सम्पूर्ण नहीं जबकि मैं सम्पूर्ण हूं। इतने साल लोगों के ताने सुनकर परेशान होती रही रोती रही पर अब नहीं क्योंकि मुझमें कोई कमी नहीं जो कमी है वो ईश्वर की बनाई है जिस पर मेरा बस नहीं और जिसपर मेरा बस नहीं उसके लिए दुखी होने का फायदा ही क्या !” आरोही बोली।

” बिल्कुल आरोही !” शालिनी बोली।

उस दिन के बाद आरोही ने ना तो कभी माधव के सामने बच्चे ना होने का रोना रोया ना भगवान से शिकायत की। बल्कि ससुराल से फोन आने पर भी उसने यही कहा ये मेरे नहीं ईश्वर के हाथ में है वो चाहेंगे तो बच्चा हो जाएगा वरना मैं ऐसे भी खुश हूं। माधव और उसके घर वाले हैरान थे आरोही में आई तब्दीली देख कर क्योंकि आरोही ने भी  अब जीना सीख लिया था और एक सीमा खींच दी थी अपने और ताना देने वालों के बीच । वो उनसे ज्यादा बात ही नहीं करती थी बस हाल चाल पूछने तक सीमित रहती थी । ससुराल वाले भी समझ गए थे इस बात को । अब वो खुश थी क्योंकि शालिनी ने उसका नजरिया जो बदल दिया था।

दोस्तों बहुत सी बहने मां बनने की खुशी से वंचित हैं और घर बाहर सब जगह के ताने झेल दुखी होती है जबकि मां बनना उनके हाथ में नहीं है। हर वक़्त इसके लिए दुखी रहने से अच्छा है जो जैसा है वैसे ही खुश रहे इससे जिंदगी आसान हो जाती है। वैसे भी मां ना बन पाने वाली औरतें अपूर्ण नहीं होती बल्कि वो भी अपने आप में संपूर्ण हैं।

क्या आप मेरी सोच से इत्तेफाक रखते हैं ….?

आपकी दोस्त 

संगीता अग्रवाल

#बहू ने सीमा खींच दी

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