मातृत्व – करुणा मलिक 

नीलम अपनी बालकनी में खड़ी थी, हाथ में चाय का कप था जो अब ठंडा हो चुका था। उसकी नज़रें दूर कहीं शून्य में टिकी थीं, लेकिन मन स्मृतियों के बवंडर में फंसा हुआ था। वह सोच रही थी कि कैसे एक ‘सही’ फैसला लेने के चक्कर में जिंदगी उसे उस मोड़ पर ले आई थी, जहाँ सही और गलत के मायने ही धुंधले पड़ गए थे।

नीलम के पति, राकेश, एक शांत और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। उनकी एक छोटी सी स्टेशनरी की दुकान थी। नीलम एक स्कूल टीचर थी। दोनों की गृहस्थी में प्यार था, पर पैसों की तंगी हमेशा बनी रहती थी। उनका इकलौता बेटा, अंशुल, पढ़ाई में होशियार था, लेकिन उसे आगे पढ़ाने के लिए जो साधन चाहिए थे, वे उनके पास नहीं थे।

तभी उनकी ज़िंदगी में राकेश के बड़े भाई, सुरेश, और उनकी पत्नी, वंदना, का दोबारा प्रवेश हुआ। सुरेश शहर के एक नामी बिल्डर थे। पैसों की कोई कमी नहीं थी, पर नियति ने उन्हें संतान सुख से वंचित रखा था। वंदना भाभी अक्सर नीलम के घर आतीं और अंशुल को लाड़-प्यार करतीं। नीलम को इसमें कभी कुछ अजीब नहीं लगा; आखिरकार, वे उसकी चाची थीं।

एक दिन, वंदना भाभी ने नीलम के सामने एक प्रस्ताव रखा।

“नीलम, तू जानती है कि हमारा अपना कोई वारिस नहीं है। इतना बड़ा कारोबार, इतनी जायदाद, सब किसके लिए? हम चाहते हैं कि हम अंशुल को गोद ले लें।”

नीलम के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “भाभी, आप क्या कह रही हैं? अंशुल मेरा बेटा है, मैं उसे कैसे दे सकती हूँ?”

वंदना ने नीलम का हाथ थाम लिया। “नीलम, मेरी बात को ठंडे दिमाग से सोच। तू एक माँ है। तू अपने बेटे के लिए बेहतर भविष्य नहीं चाहती? हम उसे वो सब देंगे जो शायद तुम और राकेश कभी नहीं दे पाओगे। बड़े स्कूल में दाखिला, विदेश में पढ़ाई, और आखिर में हमारा पूरा कारोबार उसी का होगा। और ऐसा थोड़ी है कि वो तुमसे दूर हो जाएगा। हम सब एक ही शहर में तो रहते हैं। जब चाहे आना, मिलना। बस कानूनी तौर पर वो हमारा बेटा हो जाएगा।”

नीलम ने राकेश से बात की। शुरुआत में राकेश ने साफ मना कर दिया। “गरीब हूँ, पर अपनी औलाद नहीं बेचूँगा,” उन्होंने कहा था। लेकिन वंदना और सुरेश ने हार नहीं मानी। उन्होंने बार-बार यह अहसास दिलाया कि अगर अंशुल उनके पास नहीं गया, तो उसकी प्रतिभा एक छोटी सी दुकान के गल्ले पर दम तोड़ देगी।

धीरे-धीरे, नीलम का मातृत्व उसके बेटे के ‘भविष्य’ के आगे कमजोर पड़ने लगा। उसे लगा कि वह अपने बेटे की भलाई के लिए एक ‘त्याग’ कर रही है। उसने राकेश को भी मना लिया।

अंशुल तब सात साल का था। उसे समझाया गया कि वह अब बड़े पापा और बड़ी मम्मी के साथ रहेगा, ताकि वह ‘बड़ा आदमी’ बन सके। अंशुल ने रोते हुए अपनी माँ का पल्लू पकड़ा था, “माँ, मुझे नहीं जाना। मैं यहीं रहूँगा।”

नीलम ने अपने आंसुओं को पीते हुए कहा था, “बेटा, तू जा। वहाँ तुझे बहुत खिलौने मिलेंगे। हम आते रहेंगे तुझसे मिलने।”

कागजी कार्रवाई पूरी हुई, और अंशुल ‘शर्मा विला’ का वारिस बन गया।

शुरुआती कुछ महीने सामान्य रहे। नीलम और राकेश हर रविवार अंशुल से मिलने जाते। सुरेश और वंदना उनका स्वागत करते, लेकिन नीलम ने महसूस किया कि धीरे-धीरे मुलाकातों का समय कम होता जा रहा था। कभी वंदना कहती कि अंशुल की ट्यूशन क्लास है, तो कभी कहती कि वे बाहर जा रहे हैं।

एक साल बीतते-बीतते, नियम और सख्त हो गए।

“नीलम,” एक दिन वंदना ने फोन पर कहा, “देखो, अंशुल अब यहाँ के माहौल में ढल रहा है। तुम्हारे बार-बार आने से वो कन्फ्यूज हो जाता है। वो एडजस्ट नहीं कर पा रहा। साइकोलॉजिस्ट ने कहा है कि उसे अपने बायोलॉजिकल पेरेंट्स (जन्म देने वाले माता-पिता) से थोड़ा दूर रखना चाहिए ताकि वो हमें पूरी तरह अपना सके।”

नीलम तड़प उठी। “भाभी, वो मेरा बेटा है। मैं उसे देखे बिना कैसे रहूँगी?”

“अरे, तो कौन मना कर रहा है? बस महीने में एक बार आना। उसके भले के लिए ही तो कह रही हूँ,” वंदना ने मीठा ज़हर उगलते हुए कहा।

और फिर वह दौर शुरू हुआ जब नीलम अपने ही बेटे से मिलने के लिए अपॉइंटमेंट लेने पर मजबूर हो गई। महीने में एक बार, वो भी सिर्फ एक घंटे के लिए। अंशुल बदल गया था। महंगे कपड़े, महंगे खिलौने, लेकिन आँखों में एक खालीपन। वह अब नीलम को ‘मम्मी’ नहीं, ‘आंटी’ कहने लगा था, जैसा कि उसे सिखाया गया था।

“आंटी, आप आए हो?” सात साल के बच्चे के मुँह से यह सुनकर नीलम का कलेजा फट गया था। उसने वंदना की ओर देखा, जिसने नज़रें चुरा ली थीं।

पाँच साल बीत गए। अंशुल अब बारह साल का हो चुका था और एक बोर्डिंग स्कूल में पढ़ रहा था। नीलम और राकेश की मुलाकातें अब साल में एक-दो बार तक सिमट गई थीं। उनका बेटा अब पूरी तरह अजनबी हो चुका था।

तभी एक दिन, नीलम को एक अनजान नंबर से फोन आया।

“नमस्ते, क्या मैं मिसेज नीलम शर्मा से बात कर रहा हूँ?”

“जी, कौन?”

“मैं इंस्पेक्टर विनीत बोल रहा हूँ। हमें एक लड़का मिला है, जिसने आपका नंबर दिया है। वो कह रहा है कि उसका नाम अंशुल है और वो आपका बेटा है।”

नीलम के हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। “अंशुल? वो तो मसूरी के बोर्डिंग स्कूल में है।”

“मैडम, वो यहाँ रेलवे स्टेशन पर मिला है। कृपया आप आ जाइए।”

नीलम और राकेश बदहवास होकर थाने पहुँचे। वहाँ एक बेंच पर अंशुल बैठा था। उसके कपड़े मैले थे, चेहरा उतरा हुआ था, और आँखों में डर था। जैसे ही उसने नीलम को देखा, वह दौड़कर आया और उससे लिपट गया। “माँ… मुझे घर ले चलो। मुझे वहाँ नहीं जाना।”

नीलम रो पड़ी। उसने अंशुल को सीने से लगा लिया। “बेटा, तू यहाँ कैसे? तू तो स्कूल में था?”

इंस्पेक्टर ने बताया कि अंशुल स्कूल से भाग गया था और किसी तरह ट्रेन पकड़कर यहाँ पहुँचा था।

नीलम ने तुरंत सुरेश और वंदना को फोन किया। वे आधे घंटे में थाने पहुँच गए। आते ही वंदना ने अंशुल का हाथ पकड़कर खींचना चाहा। “चल घर, बदतमीज़ लड़के! नाक कटवा दी हमारी।”

अंशुल नीलम के पीछे छिप गया। “मुझे नहीं जाना इनके साथ। ये लोग बुरे हैं।”

सुरेश ने पुलिसवाले से कहा, “इंस्पेक्टर साहब, यह हमारा बेटा है। कानूनी तौर पर हमने इसे गोद लिया है। यह थोड़ा जिद्दी हो गया है, हम इसे ले जा रहे हैं।”

“रुको!” नीलम चीखी। उसकी शेरनी जैसी आवाज़ ने थाने में सन्नाटा कर दिया। “मेरा बेटा जिद्दी नहीं है। और वो तुम्हारे साथ कहीं नहीं जाएगा जब तक वो खुद न चाहे।”

वंदना ने नीलम को घूरा, “नीलम, भूल गई? तुमने साइन किए थे। अब तुम्हारा इस पर कोई हक नहीं है।”

“हक कागज़ों से नहीं, खून से होता है भाभी,” नीलम ने कहा। “अंशुल, बेटा डरो मत। सच बताओ, क्या हुआ है?”

अंशुल ने सिसकते हुए जो बताया, उसने नीलम और राकेश के रोंगटे खड़े कर दिए।

सुरेश और वंदना का असली चेहरा वह नहीं था जो दुनिया देखती थी। वे अंशुल को सिर्फ एक ‘शोपीस’ और ‘वारिस’ की तरह रखते थे। घर के अंदर उसे प्यार नहीं, अनुशासन के नाम पर यातना मिलती थी। अगर उसके नंबर कम आते, तो उसे रात भर अंधेरे कमरे में बंद रखा जाता। अगर वह नीलम या राकेश का नाम लेता, तो उसे खाना नहीं दिया जाता। बोर्डिंग स्कूल में भी उसे किसी से बात करने की इजाजत नहीं थी। वह अकेला था, बहुत अकेला।

“माँ, वो मुझे कहते थे कि तुम लोगों ने मुझे पैसों के लिए बेच दिया है,” अंशुल ने रोते हुए कहा। “क्या सच में आपने मुझे बेच दिया था?”

नीलम घुटनों के बल बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी। “नहीं मेरे लाल, नहीं! मैंने तो तेरे सुनहरे भविष्य का सपना देखा था। मुझे नहीं पता था कि मैं तुझे सोने के पिंजरे में कैद कर रही हूँ।”

नीलम उठी और इंस्पेक्टर की मेज पर हाथ रखा। “सर, मैं अपने बेटे की कस्टडी वापस चाहती हूँ।”

सुरेश हंसा, “पागल हो गई हो? कोर्ट के ऑर्डर्स हैं हमारे पास। तुम कुछ नहीं कर सकती।”

नीलम ने अपनी आँखों के आंसू पोंछे। “सुरेश भैया, कोर्ट सबूत मांगता है न? तो सुनिए। पिछले पाँच सालों में मैंने आपकी हर कॉल रिकॉर्ड की है जहाँ आपने मुझे धमकाया था कि मैं अपने बेटे से न मिलूँ। और अंशुल का बयान काफी होगा यह साबित करने के लिए कि आप उसके साथ मानसिक क्रूरता (mental cruelty) कर रहे हैं।”

नीलम ने राकेश की ओर देखा, “राकेश, अब चुप रहने का वक़्त नहीं है। हमने एक बार गलती की, अब उसे सुधारना होगा। चाहे इसके लिए हमें अपनी जान ही क्यों न लगानी पड़े।”

राकेश ने नीलम का हाथ थामा। “मैं तुम्हारे साथ हूँ नीलम। भाड़ में गया ऐसा भविष्य जो मेरे बेटे की मुस्कान छीन ले।”

कानूनी लड़ाई लंबी और कठिन थी। सुरेश और वंदना ने अपने पैसे और रसूख का पूरा इस्तेमाल किया। उन्होंने नीलम और राकेश पर तरह-तरह के इल्जाम लगाए—कि वे लालची हैं, कि वे ब्लैकमेल कर रहे हैं। समाज ने भी नीलम को ताने दिए। “अरे, पहले बच्चा दे दिया, अब वापस मांग रही है। बच्चे का खेल बना रखा है।”

लेकिन नीलम अडिग थी। उसने अपनी नौकरी के साथ-साथ वकीलों के चक्कर काटे। उसने अपना छोटा सा घर गिरवी रख दिया ताकि केस लड़ सके। अंशुल को उसने बाल सुधार गृह में नहीं जाने दिया, बल्कि कोर्ट से विशेष अनुमति लेकर अपने पास रखा।

अंशुल धीरे-धीरे अपने पुराने रूप में लौटने लगा। राकेश की छोटी सी दुकान पर बैठकर वह फिर से हंसने लगा था। उसे अब महंगे गैजेट्स नहीं चाहिए थे, उसे बस अपने माँ-बाप का साथ चाहिए था।

केस के दौरान एक दिन कोर्ट में वंदना ने जज के सामने कहा, “माय लॉर्ड, ये लोग इसे क्या भविष्य देंगे? एक मामूली स्कूल टीचर और एक दुकानदार? हमारे पास इसे देने के लिए साम्राज्य है।”

नीलम कटघरे में खड़ी हुई। उसकी आवाज़ में एक माँ का दर्द और आत्मविश्वास दोनों था।

“माय लॉर्ड, भविष्य सिर्फ बैंक बैलेंस और बड़ी इमारतों से नहीं बनता। भविष्य बनता है सुरक्षा के अहसास से, प्यार से, और संस्कार से। इन्होंने मेरे बेटे को ‘वारिस’ बनाया, मैंने उसे ‘इंसान’ बनाया था। इन्होंने उसे बताया कि उसके माँ-बाप ने उसे बेच दिया, मैंने उसे बताया था कि हम उसे बेहतर ज़िंदगी देना चाहते थे। एक बच्चा सोने की थाली में खाकर भी अगर आंसू पी रहा है, तो वह कुपोषित है। और मेरा बेटा… मेरा बेटा मेरे हाथ की सूखी रोटी खाकर भी आज रात को चैन से सोता है। फैसला आपको करना है कि उसे ‘साम्राज्य’ चाहिए या ‘सुकून’।”

जज ने अंशुल को अपने चैंबर में बुलाया। अंशुल ने बिना डरे जज से कहा, “मुझे अपनी माँ के पास रहना है। वहाँ एसी नहीं है, पर माँ की गोदी है। वहाँ पिज्जा नहीं मिलता, पर माँ के हाथ का हलवा मिलता है। मुझे बड़ा आदमी नहीं बनना, मुझे अच्छा आदमी बनना है, अपने पापा जैसा।”

फैसला नीलम के पक्ष में आया। कोर्ट ने सुरेश और वंदना को फटकार लगाई और ‘एडॉप्शन डीड’ (गोदनामा) को रद्द कर दिया, यह कहते हुए कि बच्चे का सर्वोत्तम हित (Best Interest of Child) उसकी मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा में है, न कि भौतिक सुखों में।

जिस दिन अंशुल कानूनी तौर पर वापस नीलम और राकेश का हुआ, उस दिन उनके छोटे से घर में दीवाली जैसा माहौल था। नीलम ने अंशुल को गले लगाया और कसम खाई कि अब चाहे कितनी भी तंगी हो, वह अपने परिवार को बिखरने नहीं देगी।

वंदना और सुरेश अपने आलीशान विला में अकेले रह गए। उनके पास सब कुछ था, सिवाय उस खिलखिलाहट के जो कभी अंशुल लाया करता था। उन्होंने एक जीता-जागता रिश्ता खो दिया था, सिर्फ अपने अहंकार और मालिकाना हक जताने की चाहत में।

नीलम अपनी बालकनी में खड़ी थी, चाय ठंडी हो चुकी थी, लेकिन उसका दिल गरम था। उसने अंदर देखा जहाँ राकेश और अंशुल लूडो खेल रहे थे और ज़ोर-ज़ोर से हंस रहे थे।

नीलम ने आसमान की ओर देखा और शुक्रिया अदा किया। उसने सीख लिया था कि ‘त्याग’ का मतलब अपनी ज़िम्मेदारियों से भागना या किसी और पर निर्भर होना नहीं होता। माँ का असली त्याग वह है जब वह अपने बच्चे की खुशी के लिए दुनिया से लड़ जाए, न कि दुनिया के डर से बच्चे को छोड़ दे।

उसने चाय का कप रखा और अंदर चली गई, अपनी उस छोटी सी, पर मुकम्मल दुनिया में, जिसे उसने अपनी हिम्मत से वापस पाया था।

मूल लेखिका : करुणा मलिक 

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