माँ ने अपने हाथों की लकीरें मिटाकर बेटे की तकदीर लिखी थी, लेकिन बेटे के ‘आधुनिक’ घर में उस माँ के लिए कोई कोना नहीं बचा। क्या एक बेटे की तरक्की उसकी माँ के आत्मसम्मान से बड़ी हो सकती है?
सावित्री देवी की आँखों से आंसू बह निकले। मूर्ति टूटने का दुख नहीं था, बेटे के शब्दों ने उनका दिल तोड़ दिया था। जिस बेटे के लिए उन्होंने अपनी जवानी, अपनी खुशियाँ, अपनी नींद कुर्बान कर दी, आज वो बेटा एक बेजान मूर्ति के लिए अपनी माँ को डांट रहा था?
बनारस के अस्सी घाट के पास एक छोटी सी, पुरानी हवेली थी। हवेली की दीवारें भले ही जर्जर हो चुकी थीं, लेकिन उसकी नींव बहुत मजबूत थी—बिल्कुल सावित्री देवी के हौसलों की तरह। सावित्री देवी, जिन्होंने जवानी में ही विधवा होने का दंश झेला था, उन्होंने सिलाई-कढ़ाई करके अपने इकलौते बेटे, रमन को पाला था। रमन बचपन से ही पढ़ाई में होशियार था। सावित्री देवी अक्सर रात-रात भर जागकर रमन के लिए स्वेटर बुनतीं और सुबह उन्हें बेचकर उसकी स्कूल की फीस भरतीं।
“माँ, देखना एक दिन मैं बहुत बड़ा अफसर बनूंगा और तुम्हें इस टूटे घर से निकालकर एक बड़े बंगले में ले जाऊंगा,” नन्हा रमन अक्सर अपनी माँ की गोद में सिर रखकर कहता था।
सावित्री देवी मुस्कुरा देतीं और उसके माथे को चूम लेतीं। “बस तू खुश रहे बेटा, मेरे लिए वही बंगला है।”
सालों बीत गए। रमन ने अपनी मेहनत और माँ के आशीर्वाद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और उसे दिल्ली की एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई। सावित्री देवी की खुशी का ठिकाना नहीं था। रमन ने वादा किया कि जैसे ही वह सेटल हो जाएगा, माँ को अपने पास बुला लेगा।
दिल्ली में रमन की मुलाकात ‘तनीषा’ से हुई। तनीषा एक मॉडर्न, इंडिपेंडेंट और महत्वाकांक्षी लड़की थी। दोनों की विचारधाराएं अलग थीं, लेकिन कहते हैं न कि विपरीत ध्रुव एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। रमन और तनीषा ने शादी कर ली। रमन ने यह बात सावित्री देवी को फोन पर बताई। सावित्री देवी का दिल तो दुखा कि बेटे के सेहरे को देखने का अरमान अधूरा रह गया, लेकिन उन्होंने बेटे की खुशी में ही अपनी खुशी मान ली।
शादी के दो साल बाद, रमन ने दिल्ली के पॉश इलाके में एक आलीशान फ्लैट खरीदा। अब वक्त आ गया था माँ को बुलाने का। रमन बनारस गया और सावित्री देवी को ले आया। सावित्री देवी अपनी पुरानी संदूक में कुछ आचार के मर्तबान, हाथ से बुने हुए स्वेटर और रमन के बचपन के खिलौने लेकर दिल्ली पहुंचीं।
फ्लैट वाकई बहुत सुंदर था। कांच की दीवारें, विदेशी फर्नीचर और चमकता हुआ फर्श। लेकिन सावित्री देवी को वहां कदम रखते ही एक अजीब सी झिझक हुई। उन्हें लगा जैसे वो किसी काँच के महल में आ गई हैं जहाँ ज़रा सी भी ठेस लगने पर सब बिखर जाएगा।
तनीषा ने उनका स्वागत तो किया, लेकिन उसकी मुस्कान में वो अपनापन नहीं था जिसकी सावित्री देवी को उम्मीद थी।
“नमस्ते आंटी जी,” तनीषा ने कहा। “रमन ने बताया था आपके बारे में। यह गेस्ट रूम है, आप यहाँ रह सकती हैं।”
‘आंटी जी’ सुनकर सावित्री देवी को धक्का लगा, लेकिन उन्होंने सोचा शहर का रिवाज़ होगा। रमन ने बात संभाली, “तनीषा, माँ हैं ये। आंटी नहीं, मम्मी जी कहो।”
तनीषा ने कंधे उचकाए, “ओके, मम्मी जी।”
शुरुआत के कुछ दिन ठीक बीते। सावित्री देवी सुबह जल्दी उठ जातीं और पूजा-पाठ करतीं। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें एहसास होने लगा कि उनकी मौजूदगी तनीषा को खटक रही है। तनीषा को देर तक सोना पसंद था और घर में शांति चाहिए होती थी। सावित्री देवी की पूजा की घंटी या रसोई में बर्तनों की खटपट उसे डिस्टर्ब करती थी।
एक दिन नाश्ते की मेज़ पर तनीषा ने कहा, “मम्मी जी, प्लीज आप सुबह पूजा थोड़ी धीरे किया कीजिये। मेरी नींद खराब होती है। और हाँ, वो आचार के मर्तबान किचन से हटा लीजिये, उससे पूरे घर में अजीब सी स्मेल आती है।”
रमन चुपचाप नाश्ता करता रहा। सावित्री देवी ने रमन की तरफ देखा, शायद वो कुछ बोलेगा। लेकिन रमन ने नज़रें झुका लीं। सावित्री देवी समझ गईं कि बेटे की चुप्पी ही तनीषा की रज़ामंदी है। उन्होंने चुपचाप आचार के मर्तबान अपनी अलमारी में रख लिए।
धीरे-धीरे सावित्री देवी का दायरा उनके कमरे तक सिमट कर रह गया। वो डाइनिंग टेबल पर भी कम ही आती थीं, अपनी थाली कमरे में मंगवा लेती थीं। रमन कभी-कभार शाम को आकर हाल-चाल पूछ लेता, लेकिन वो पुराना रमन कहीं खो गया था जो माँ के बिना खाना नहीं खाता था।
एक शाम तनीषा ने घर पर पार्टी रखी थी। उसके ऑफिस के कलीग्स और हाई-प्रोफाइल दोस्त आने वाले थे। तनीषा ने रमन से कहा, “रमन, मम्मी जी को बोल देना कि वो अपने कमरे में ही रहें। वो पुरानी साड़ी पहनकर बाहर आ जाएंगी तो मेरे दोस्तों के सामने अजीब लगेगा। यू नो, दे आर वेरी क्लासी।”
रमन को बुरा लगा, लेकिन उसने तनीषा से बहस नहीं की। वह माँ के कमरे में गया।
“माँ, आज घर में कुछ मेहमान आ रहे हैं। थोड़ी भीड़-भाड़ रहेगी। तुम कमरे में ही आराम करना, खाना मैं यहीं भिजवा दूंगा।”
सावित्री देवी रमन की आँखों में वो शर्मिंदगी पढ़ गई थीं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “कोई बात नहीं बेटा, वैसे भी मेरे घुटनों में दर्द है। मैं आराम ही करूंगी।”
पार्टी शुरू हुई। तेज़ संगीत, विदेशी शराब और अंग्रेजी में बातचीत। सावित्री देवी अपने कमरे में बैठी थीं, लेकिन उन्हें प्यास लगी थी। पानी का जग खाली था। उन्होंने सोचा कि चुपके से किचन से पानी ले आती हैं, कोई देखेगा नहीं।
वो धीरे-धीरे बाहर निकलीं। हॉल में चकाचौंध थी। गलती से उनका पैर एक तार में उलझ गया और वो लड़खड़ा गईं। पास ही रखी एक महंगी क्रोकरी की मूर्ति गिरकर टूट गई।
“ओह माय गॉड!” तनीषा चिल्लाई। संगीत रुक गया। सबने मुड़कर देखा। सावित्री देवी सहम कर खड़ी थीं।
तनीषा गुस्से में लाल-पीला होकर उनके पास आई। “आपको मना किया था न बाहर आने से? देखिये, आपने मेरी पच्चीस हज़ार की मूर्ति तोड़ दी! आपको पता है यह इटालियन आर्ट पीस था? लेकिन आप क्या जानें आर्ट की कद्र? आप तो बस…” तनीषा ने रमन की तरफ देखा, “रमन, आई कांट हैंडल दिस एनीमोर। या तो ये इस घर में तौर-तरीकों से रहेंगी या फिर…”
रमन दौड़कर आया। उसने माँ को नहीं संभाला, बल्कि टूटी हुई मूर्ति के टुकड़े देखने लगा। “माँ, तुम्हें जब मना किया था तो बाहर क्यों आईं? देख रही हो तनीषा कितनी परेशान हो गई है?”
सावित्री देवी की आँखों से आंसू बह निकले। मूर्ति टूटने का दुख नहीं था, बेटे के शब्दों ने उनका दिल तोड़ दिया था। जिस बेटे के लिए उन्होंने अपनी जवानी, अपनी खुशियाँ, अपनी नींद कुर्बान कर दी, आज वो बेटा एक बेजान मूर्ति के लिए अपनी माँ को डांट रहा था?
सावित्री देवी ने कांपते हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और बिना कुछ बोले अपने कमरे में चली गईं। उस रात उन्होंने खाना नहीं खाया। उन्होंने अपना सामान पैक करना शुरू कर दिया।
अगली सुबह, जब रमन और तनीषा सो रहे थे, सावित्री देवी ने अपना छोटा सा बैग उठाया। वे हॉल में आईं, जहाँ अब भी पार्टी की गंदगी बिखरी थी। उन्होंने टेबल पर एक लिफाफा रखा।
वे चुपचाप घर से निकल गईं और बस स्टैंड की तरफ चल दीं।
जब रमन जागा, तो उसे माँ घर में कहीं नहीं मिलीं। वह उनके कमरे में गया, कमरा खाली था। अलमारी खुली थी, उसमें रखे आचार के मर्तबान गायब थे। रमन घबरा गया। वह हॉल में आया तो उसकी नज़र उस लिफाफे पर पड़ी।
उसने लिफाफा खोला। उसमें कुछ पुराने नोट थे—वही पैसे जो रमन बचपन में अपनी गुल्लक में जमा करता था और माँ ने संभाल कर रखे थे। और साथ में एक चिट्ठी थी। रमन ने पढ़ना शुरू किया:
“मेरे प्यारे रमन,
बेटा, मुझे माफ़ करना कि मैंने तेरी कीमती मूर्ति तोड़ दी। मैं जानती हूँ कि मैं तुम्हारे इस ‘काँच के महल’ में फिट नहीं बैठती। मैं तो माटी की गुड़िया हूँ बेटा, और माटी काँच को गंदा कर देती है। तूने बचपन में कहा था कि तू मुझे बड़े बंगले में रखेगा। तूने अपना वादा पूरा किया। लेकिन शायद मैं ही उस बंगले के लायक नहीं बन पाई।
तू खुश रहना बेटा। तनीषा का ख्याल रखना। और हाँ, ये जो पैसे हैं, इससे शायद वो मूर्ति न आए, लेकिन ये तेरी बचपन की कमाई है। इसे रख लेना। मैं वापस अपने बनारस जा रही हूँ। वहाँ मेरा वो पुराना घर, मेरी वो सिलाई मशीन मेरा इंतज़ार कर रही है। वहां मुझे कोई ‘अनफिट’ नहीं कहेगा। तुझे कभी मेरी याद आए, तो बस एक बार बनारस आ जाना, तेरे लिए स्वेटर बुनकर रखूँगी।
तेरी माँ।”
रमन के हाथों से चिट्ठी छूट गई। वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा था, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह बाहर भागा, पार्किंग में गया, लेकिन उसे नहीं पता था कि माँ कहाँ गई हैं।
तनीषा भी उठी और चिट्ठी पढ़ी। उसके चेहरे पर भी एक अजीब सी खामोशी छा गई। उसे वो पच्चीस हज़ार की मूर्ति अब बहुत सस्ती और वो बूढ़ी औरत बहुत कीमती लग रही थी, जिसे उसने अपने अहंकार में खो दिया था।
रमन ने तुरंत गाड़ी निकाली और रेलवे स्टेशन की तरफ भागा। उसे याद आया कि बनारस की ट्रेन का समय होने वाला है। स्टेशन पर भीड़ थी। रमन पागलों की तरह हर प्लेटफॉर्म पर माँ को ढूंढ रहा था।
तभी उसे एक बेंच पर सावित्री देवी बैठी दिखाई दीं। वे अपनी पुरानी संदूक पर सिर टिकाए बैठी थीं। रमन दौड़कर उनके पास गया और उनके पैरों में गिर पड़ा।
“माँ! मुझे माफ़ कर दो माँ! मैं बहुत बुरा बेटा हूँ। मैं अंधा हो गया था। मुझे वो मूर्ति नहीं, तुम चाहिए माँ। चलो घर चलो। मैं तनीषा को समझा दूंगा, या हम अलग घर ले लेंगे, लेकिन तुम मुझे छोड़कर मत जाओ।”
सावित्री देवी ने धीरे से आँखें खोलीं। उन्होंने बेटे को उठाया और गले लगा लिया। माँ का दिल तो मोम का होता है, पिघल गया।
“पगले, माँ कभी बेटे से नाराज़ होती है क्या? मैं तो बस तेरी खुशी के लिए जा रही थी।”
रमन ने माँ का हाथ कसकर पकड़ लिया। “मेरी खुशी तुम्हारे चरणों में है माँ, उस काँच के महल में नहीं।”
रमन माँ को वापस ले आया। लेकिन उस दिन के बाद घर के नियम बदल गए। अब तनीषा की नींद नहीं, बल्कि सावित्री देवी का मान-सम्मान उस घर की प्राथमिकता थी। तनीषा ने भी अपनी गलती समझी और धीरे-धीरे सावित्री देवी को ‘मम्मी जी’ नहीं, ‘माँ’ कहना और मानना सीख लिया।
उस घर की दीवारें अब भी काँच की थीं, लेकिन उसमें रहने वाले लोग अब माटी के थे—जुड़े हुए और मज़बूत।
कहानी का संदेश:
माँ-बाप हमारे जीवन की वो नींव हैं जिस पर हम अपनी सफलता की इमारत खड़ी करते हैं। अगर नींव ही छोड़ दी, तो इमारत चाहे कितनी भी ऊंची क्यों न हो, एक दिन गिर ही जाएगी। अपनी आधुनिकता के चक्कर में अपने संस्कारों और अपनी जड़ों को मत भूलिये।
अंत में आपसे एक सवाल:
क्या रमन को अपनी गलती का एहसास सही समय पर हुआ? क्या हर बेटे को रमन की तरह अपनी माँ के जाने का इंतज़ार करना पड़ता है अपनी गलती सुधारने के लिए? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।
“अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आपकी आँखों को नम किया, तो कृपया इसे लाइक करें, कमेंट करें और ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं, तो ऐसे ही दिल को छू लेने वाली पारिवारिक और मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो (Follow) करना न भूलें। धन्यवाद!”
मूल लेखिका : अनिता गुप्ता