अभी रमन को दिल्ली आये एक महीना ही हुआ था। पिछले दो साल से रमन लन्दन में रह रहा था और दिल्ली की एक मल्टी नेशन कम्पनी में कुछ दिन पहले ही उसकी जॉइनिंग हुई थी। सब कुछ नए सिरे से शुरू करने की कोशिश थी—नई नौकरी, नया शहर, नया फ्लैट और नई दिनचर्या। उसने अपनी कम्पनी के पास ही एक फ्लैट किराये पर ले लिया था ताकि आने-जाने में समय न लगे और काम पर पूरा ध्यान दे सके।
दिल्ली की भागदौड़ भरी जिंदगी में उसे एक महीना बीत गया, लेकिन मन के भीतर कहीं एक खालीपन था। लंदन की चमक-दमक में भी वह खुद को अकेला महसूस करता था और अब दिल्ली में भी वही सन्नाटा साथ चल रहा था। ऑफिस में लोग थे, मीटिंग्स थीं, ईमेल थे, पर मन… मन जैसे कहीं अटका हुआ था।
एक दिन अचानक ही रुचि को उसी कालोनी में देख कर वह चौंक गया। रमन की सांस जैसे थम गई। उसे अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हुआ। वही चाल, वही सादगी, वही चेहरा—रूचि।
और सबसे बड़ा झटका यह था कि रूचि रमन के बगल वाले फ्लैट में ही रहती थी।
रुचि ने रमन को नहीं देखा था। रमन के पैर जैसे जमीन में गड़ गए। रुचि से उसका सामना इस तरह से होगा, उसने कल्पना भी नहीं की थी। उसका अतीत उसके सामने आकर खड़ा हो गया था। पिछले कई सालों से वह भागता रहा था—खुद से, अपने किए से, अपनी गलती से… मगर आज वही गलती सामने खड़ी थी, एक इंसान के रूप में।
करीब 8 साल पहले रमन की शादी रूचि के साथ हुई थी। रमन को याद था—लखनऊ का घर, शादी की हलचल, रिश्तेदारों की बातें, और उस भीड़ में रूचि का शांत चेहरा। वह बहुत ही शालीन और सरल स्वभाव की लड़की थी। दिखने में तो बहुत साधारण, नैन-नक्श भी ऐसे कि कोई पहली नजर में ठहरकर न देखे, लेकिन जो कोई भी उसके संपर्क में आता, वह उसके व्यवहार से अपना बन जाता।
रूचि ने एम.बी.ए किया था, लेकिन बिना जरूरत के उसे नौकरी करना पसंद नहीं था। उसे लगता था कि अगर घर को संभालने वाला कोई न हो, तो घर बिखर जाता है। शादी के बाद आते ही उसने सारे घर की जिम्मेदारी संभाल ली थी। सास की दवाइयाँ समय पर, ससुर के खाने का ध्यान, घर की व्यवस्था, रिश्तेदारों का लिहाज़—सब कुछ वह बिना शिकायत के निभाती थी।
रमन अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। उन दिनों रमन अपने माता-पिता के साथ लखनऊ में ही रहता था और वहीं किसी कम्पनी में नौकरी करता था। रमन के पापा सरकारी नौकरी से रिटायर हुए थे और उसकी माँ अक्सर बीमार रहने लगी थी। घर की जिम्मेदारी अपने आप बढ़ जाती है जब माता-पिता उम्र के उस पड़ाव पर पहुँचते हैं, जहाँ उन्हें सहारे की जरूरत होती है।
शुरू में तो सब कुछ ठीक ही था। रमन भी ठीक-ठाक नौकरी करता था और रूचि घर को संभाल रही थी। मगर फिर रमन को दिल्ली की किसी कम्पनी में जॉइन करने का मौका मिला। यह उसके करियर के लिए बड़ा कदम था। रमन सभी को वहाँ ले जाना चाहता था। उसे लगता था कि दिल्ली में रहेंगे तो सुविधाएँ ज्यादा होंगी, इलाज अच्छा होगा, और उसकी तरक्की भी।
लेकिन रमन के माता-पिता अपना पुराना घर छोड़कर अभी उसके साथ नहीं जाना चाहते थे। लखनऊ का वह घर, उनकी यादें, उनका मोहल्ला, उनकी पहचान—सब कुछ वहीं था। वे बार-बार कहते, “हम यहीं ठीक हैं। तू बस अपना ध्यान रख।”
लेकिन उन्होंने जिद करके रूचि को उसके साथ भेज दिया था। उन्हें लगता था कि बहू साथ रहेगी तो बेटे का घर भी संभलेगा और बेटे को भी सहारा मिलेगा। रूचि भी बिना सवाल किए तैयार हो गई। उसने सोचा, पति के साथ रहना ही सही है।
अभी कुछ ही दिन हुए थे कि रमन की माँ की तबियत अचानक बहुत खराब हो गयी। ऐसी हालत में रमन को वापस लखनऊ जाना चाहिए था, लेकिन काम और जिम्मेदारियों के बीच उसने यह फैसला किया कि वह रुचि को कुछ दिन के लिए लखनऊ छोड़कर दिल्ली चला जाएगा। उसे लगा, “रूचि है, माँ की देखभाल कर लेगी।”
और रूचि सचमुच लग गई माँ के पास—दिन-रात। कभी अस्पताल, कभी दवाइयाँ, कभी घर का काम, और साथ में सास की पीड़ा। वह थकी थी, लेकिन उसके चेहरे पर सेवा का भाव था।
इसी बीच रमन को अपने ही साथ काम करने वाली अंकिता से प्यार हो गया।
अंकिता को वह पहले दिन से पसंद तो करता था, मगर अब अंकिता भी उसे पसंद करने लगी थी। ऑफिस के साथ-साथ बातें बढ़ने लगीं, नजदीकियाँ बढ़ने लगीं, और रमन ने अपने शादीशुदा होने के बाद भी उससे नजदीकी बढ़ा ली।
रमन का मन उधर खिंचता चला गया, और इधर रुचि के प्रति उसका मन सूना होता चला गया। उसे लगने लगा कि रुचि “सिर्फ घर” है, और अंकिता “जीवन”। वह यह भूल गया कि रुचि ने उसके घर के साथ-साथ उसके माता-पिता की सेवा भी अपने कंधों पर उठाई थी।
एक दिन उसने अपने घर में भी ऐलान कर दिया था कि उसे अंकिता के साथ ही रहना है।
यह खबर जैसे बिजली बनकर घर पर गिरी। उसके माँ-बाप ने विरोध किया, समझाया, रोए भी। उन्होंने कहा, “यह क्या कर रहा है तू? बहू ने क्या बिगाड़ा?”
पर रमन पर जैसे कोई असर नहीं हुआ। वह अपने फैसले पर अड़ गया।
अपने माँ-बाप के विरोध के बाद भी उसने रूचि से तलाक ले लिया था।
तलाक के कागज़ों पर हस्ताक्षर करते समय रूचि के हाथ काँपे थे, लेकिन उसने कोई तमाशा नहीं किया। जो लड़की हमेशा चहकती रहती थी, वह अब पत्थर बन चुकी थी। उसकी आँखों में आँसू नहीं थे—बस एक गहरा सन्नाटा था।
रमन के माता-पिता ने भी इसी कारण, अपने इकलौते लड़के से नाता तोड़ लिया था। उन्हें लगा, बेटा गलत रास्ते पर चला गया है। उन्होंने रमन को समझाया कि वह अपना घर बसा नहीं रहा, घर तोड़ रहा है, लेकिन रमन नहीं माना।
उसके बाद अंकिता और रमन लंदन शिफ्ट हो गये। रमन को लगा कि अब वह “नई जिंदगी” शुरू करेगा। विदेश की चमक, नई नौकरी, नई दुनिया—वह सब कुछ चाहता था। मगर अंकिता को बंधन पसंद नहीं था। वह ज्यादा दिन रमन के साथ नहीं निभा सकी और उसे छोड़कर चली गयी।
यह दूसरा झटका था, जो रमन को भीतर तक तोड़ गया।
उस रात वह लंबे समय तक खिड़की के पास खड़ा रहा। बाहर लंदन की सड़कों पर रोशनी थी, पर उसके भीतर अंधेरा था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसने जो “अपना” तोड़ा था, वह शायद सबसे बड़ा गलत फैसला था।
कुछ वक्त बाद रमन वर्तमान में लौट आता है। और अब दिल्ली में एक नई नौकरी, नए फ्लैट… और उसी कॉलोनी में रुचि।
वह कई दिनों तक अपने फ्लैट से बाहर निकलते समय सतर्क रहने लगा। उसे डर लगता कि कहीं रुचि सामने न आ जाए। पर आज वह उसे देख चुका था। अब भागना संभव नहीं था।
उसका दिल बार-बार कह रहा था—“जाओ… बात करो… माफी मांगो…”
लेकिन अहंकार, शर्म और डर—तीनों उसे रोकते थे।
आखिर उसने हिम्मत की।
एक दिन शाम को वह रुचि के घर चला गया। दरवाजे के सामने खड़ा होकर उसका हाथ कई बार आगे बढ़ा, फिर पीछे हट गया। आखिर उसने कॉल बेल दबाई।
दरवाजा खुला। और जो दृश्य उसने देखा, उसने उसे पत्थर कर दिया।
उसके अपने माता-पिता वहाँ थे।
रमन को देखकर उनकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। वे ही उसे बताते हैं कि तलाक होने के बाद भी रुचि हमें छोड़कर अपने घर नहीं गयी, और हमारे समझाने पर भी दूसरी शादी नहीं की।
उन्होंने बताया—“लखनऊ का घर बेचकर हम यहीं रहने लगे थे। अब रुचि एक कम्पनी में जॉब करती है और हमारी देखभाल भी एक बेटी की तरह करती है।”
रमन के भीतर कोई चीज टूट गई।
जिस स्त्री को उसने “बेकार” समझा था, वही स्त्री आज उसके माता-पिता का सहारा बनी हुई थी। और वह… वह अपनी जिंदगी में अकेला रह गया था।
तभी रुचि आ जाती है।
रमन उसके सामने खुद को कितना तुच्छ महसूस कर रहा था, वह खुद से आँख भी नहीं मिला पा रहा था। उसका सिर झुक गया। उसकी आंखों में आँसू आ जाते हैं। वह रुचि के सामने हाथ जोड़कर कहता है—
“मुझे माफ कर दो रुचि… मैं माफी का हकदार तो नहीं…”
कहकर उसका गला रूंध जाता है।
वह वापस जाने के लिए मुड़ जाता है। उसे लगता है, उसने माफी मांग ली, अब उसे वहाँ रहने का अधिकार नहीं।
लेकिन रुचि कहती है—
“मैं तुम्हे, तुम्हारे ही माता-पिता से अलग नहीं कर सकती। तुम्हारी याद में इन्होंने दिन-रात आंसू बहाये हैं। मैं तुम्हे माफ करती हूँ।”
उस पल रमन की आंखों से आँसू बहने लगे।
तभी उसके माता-पिता कहते हैं—
“तुम महान हो रुचि—सच में, माफ करने वाले का दिल बहुत बड़ा होता है। तुम्हारे जैसे लोग दुनिया में कम ही होते हैं।”
रमन को लगा जैसे जीवन ने उसे उसके कर्मों का आईना दिखा दिया हो।
रुचि ने उसे न सिर्फ माफ किया, बल्कि उसे उसके अपने माता-पिता से जोड़ दिया।
कहानी यहीं एक संदेश दे जाती है—कि माफी केवल शब्द नहीं होती, वह किसी टूटे रिश्ते पर रखा गया सबसे बड़ा मरहम होती है। और माफ करने वाले का दिल सच में बहुत बड़ा होता है।
प्रेषक: पूजा शर्मा
#माफ करने वाले का दिल बहुत बड़ा होता है
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