विनय और तनवी एक दूसरे के पूरक थे। घर में अगर किसी बात पर अंतिम मुहर लगती तो वह विनय की होती—और तनवी वह मुहर बिना शिकायत, बिना बहस, बिना “क्यों” पूछे स्वीकार कर लेती। क्या मजाल कि बिन अपने पापा की मर्जी के खिलाफ तनवी कोई तिनका भी उठा ले। वह कभी अपनी पसंद का कपड़ा खरीदना चाहती तो भी पहले पापा की राय लेती, कॉलेज की किसी सहेली के साथ बाहर जाना होता तो भी पापा से अनुमति, यहाँ तक कि अपनी किताबों के समय-तालिका तक में पापा की सहमति शामिल रहती।
यह बात बाहर से देखने वालों को कभी-कभी अजीब लगती। कुछ लोग कहते, “इतनी बड़ी हो गई है, थोड़ा तो आज़ाद छोड़ो,” पर विनय बस मुस्कुरा देते। उन्हें अपने तरीके सही लगते थे। और तनवी? तनवी को भी यही दुनिया सहज लगती थी। उसे पापा की डाँट में भी सुरक्षा दिखती, और उनकी हिदायतों में भी एक छुपा हुआ प्यार।
पर… वही तनवी आजकल कुछ कुछ बदलने लगी थी। नहीं, यह सोलह बरस वाली उम्र का तकाज़ा नहीं था। न उसने अचानक विद्रोह शुरू किया था, न ही वह किसी गलत संगति में पड़ी थी। बात बस इतनी थी कि 15 साल पहले उसकी माँ रुपाली, जो उसके पिता से तलाक़ लेकर विदेश बस गई थी और जिसे दूसरी शादी से कोई औलाद नहीं थी, वो यदाकदा तनवी को फोन कर लिया करती थी।
रुपाली की आवाज़ फोन पर हमेशा सधी हुई रहती—न बहुत ज्यादा भावुक, न बहुत ज्यादा औपचारिक। वह हर बार तनवी की पढ़ाई, उसकी पसंद-नापसंद, उसके स्वास्थ्य, उसके दोस्त—सब पूछती। तनवी को भी अपनी माँ से बात करना अच्छा लगता था। शायद… दिल के कोने में माँ की कमी रह गई थी, जो उसके फोन से पूरी होने लगी थी।
तनवी को याद नहीं था कि माँ का हाथ सिर पर कैसा लगता है। उसे यह भी ठीक से याद नहीं था कि माँ की गोद की गर्माहट क्या होती है। बचपन के धुंधले-से चित्रों में बस इतना था—किसी महिला की खुशबू, किसी आवाज़ की लोरी, और फिर अचानक एक खालीपन। वह खालीपन उसके जीवन में धीरे-धीरे “सामान्य” बन गया था। उसे यह भी लगने लगा था कि उसकी दुनिया में माँ की जरूरत है ही नहीं, क्योंकि पापा ने दोनों का फर्ज़ निभा दिया। पर जब रुपाली के फोन आने लगे, तब उस खाली जगह में एक हल्की-सी हलचल होने लगी। जैसे किसी बंद कमरे की खिड़की अचानक थोड़ी-सी खुल जाए।
कुछ दिन पहले ही रुपाली ने भारत आने का प्रोग्राम बनाया था। यह बात तनवी ने विनय को बताई तो विनय ने ऊपर से शांत रहकर “ठीक है” कह दिया। मगर भीतर कुछ टूट-सा गया। वह यह स्वीकार कर पाना चाहता था कि रुपाली तनवी की माँ है—पर वह यह सहन नहीं कर पाता था कि रुपाली अब भी तनवी की जिंदगी में जगह बना सकती है।
विनय के लिए यह सिर्फ एक मुलाकात नहीं थी। यह एक पुरानी कहानी का दरवाज़ा था जिसे उसने वर्षों पहले बंद करके अपने भीतर कहीं छुपा दिया था। उसने अपना घर बसाया, अपनी बेटी को पाला, रिश्तेदारों की बातें सुनीं, समाज का सामना किया—और खुद को मजबूत किया। पर अब… अब वही कहानी फिर से सामने आ रही थी।
आज विनय जैसे ही ऑफिस जाने को तैयार हुआ, तनवी बोली, “पापा, याद है न कि आज माँ से मिलने होटल जाना है?”
तनवी के चेहरे पर उत्सुकता थी—पर वह उत्सुकता एक बच्चे जैसी नहीं थी। उसमें एक समझ भी थी। वह जानती थी कि पापा के लिए यह आसान नहीं है। फिर भी उसने बात हल्के से की, जैसे किसी नाजुक चीज़ को छूते हैं—डरते हुए कि कहीं टूट न जाए।
कहने को तो विनय ने “हाँ” बोल दिया, पर अब कहीं न कहीं उसके दिल में तनवी को खोने का डर सताने लगा था। “क्या होगा, अगर रुपाली तनवी को अपने साथ ले गई?” नहीं नहीं….अपने ख्यालों से भी वो डरने लगा था।
उसने टाई बांधते हुए आईने में खुद को देखा। चेहरे पर उम्र की रेखाएँ थीं, आँखों में एक पिता का अनुभव था, और दिल में एक अनकहा डर। उसने खुद से कहा—“मैंने तनवी को अकेले पाला है। मैं उसे खो नहीं सकता।”
पर फिर दूसरा विचार आया—“वो उसकी माँ है… माँ से मिलने का हक़ भी तो है।”
यही द्वंद्व उसे अंदर ही अंदर तोड़ रहा था।
खैर, शाम को दोनों होटल पहुंच गए थे। होटल की लॉबी में चमकती रोशनी, धीमी संगीत की धुन, और सुगंधित एयर फ्रेशनर की खुशबू थी। तनवी का हाथ विनय की हथेली में था—पहले की तरह। मगर आज वह पकड़ थोड़ी अलग थी। जैसे दोनों एक-दूसरे को आश्वासन दे रहे हों—“हम साथ हैं।”
हमेशा की तरह रुपाली बेहद खूबसूरत लग रही थी। समय ने उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं छोड़ी थी, या शायद उसने उन्हें अपने तरीके से छुपाना सीख लिया था। उसकी साड़ी/ड्रेस, उसके बालों का सलीका, उसकी मुस्कान—सब वैसा ही था जैसा विनय को याद था। पर अब बीच में पंद्रह साल की दूरी थी।
आगे बढ़ कर उसने तनवी को गले लगा लिया। तनवी एक पल को ठिठकी, फिर माँ के गले में खुद को समेट लिया। वह आलिंगन छोटा था, पर बहुत भारी। उसमें पंद्रह वर्षों की कमी, पंद्रह वर्षों की शिकायत, और पंद्रह वर्षों की अधूरी बातें—सब शामिल थीं।
थोड़ी देर बातचीत के बाद वो बोली, “विनय! अगर आपको एतराज न हो तो क्या मैं तनवी को आज रात अपने साथ रख सकती हूं?”
विनय का शरीर जैसे अकड़ गया। उसे लगा जैसे किसी ने उसकी छाती में हाथ डालकर उसका डर बाहर निकाल लिया हो। उसका मन चिल्लाया—“यही तो!”
वह कुछ बोलता, उससे पहले उसके होंठ सूख गए।
वह तनवी की तरफ देखने ही वाला था कि तनवी ने विनय का हाथ थाम लिया। यह पकड़ वही थी जो बचपन में डर लगने पर तनवी पापा का हाथ पकड़ती थी। बस आज डर अलग था—आज डर था रिश्ते के टूटने का।
तनवी ने शांत, सधे और बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में कहा—
“माँ! मुझे भी आपसे मिलने की चाह थी इसलिए जब आपने मुझसे मिलने की इच्छा दिखलाई, मैंने भी बहती गंगा में हाथ धो लिए। आपसे मिलने की मुझे बहुत खुशी है। पर क्या करूं, मुझे माँ की गोदी की आदत नहीं है, हमेशा से पापा के हाथों का झूला ही झूला है। आप से मिलना था, मिल लिया, पर.. अब हम लोग चलते हैं।”
लॉबी की रोशनी में एक पल को जैसे सब रुक गया। रुपाली की आँखों में हैरानी चमकी, फिर कहीं पछतावा उतर आया। विनय की आँखें भीगने को थीं, पर उसने खुद को संभाल लिया। तनवी के शब्दों में न कटुता थी, न अपमान। उसमें सिर्फ सच्चाई थी—और वह सच्चाई किसी तलवार की तरह नहीं, किसी आईने की तरह थी।
विनय के चेहरे की मंद मुस्कान बता रही थी कि माना कि आज बिटिया उसकी बाजुओं के झूले में नहीं झूल सकती थी, पर झूला झुलाने वाले हाथों को थामना उसे बेशक आ गया था।
विनय ने धीरे से तनवी के सिर पर हाथ रखा। रुपाली ने कुछ कहना चाहा, पर शब्द उसके गले में अटक गए। वह बस इतना ही कर पाई कि तनवी की तरफ एक बार और देखा—शायद उस बच्ची को ढूंढते हुए जिसे उसने कभी गोद में खिलाया था, और उस किशोरी को देखते हुए जो अब अपने फैसले खुद ले सकती थी।
तनवी ने विनय का हाथ और कसकर पकड़ लिया। वह जानती थी कि माँ से मिलने का मतलब पापा को छोड़ना नहीं होता, पर आज उसने वही चुना जो उसके जीवन का आधार था। और विनय… वह समझ गया कि बेटी को बांधकर नहीं, विश्वास देकर साथ रखा जाता है।
वे दोनों धीरे-धीरे होटल से बाहर आ गए। बाहर रात की हवा में हल्की ठंडक थी। कार में बैठते समय तनवी ने एक बार पीछे मुड़कर लॉबी की तरफ देखा—फिर आगे देखकर शांत हो गई।
विनय ने कार स्टार्ट की। कुछ क्षण दोनों चुप रहे। फिर विनय ने धीमे स्वर में पूछा—“ठीक हो?”
तनवी ने हल्का सा सिर हिलाया—“हाँ पापा।”
और उस एक “हाँ” में वह सब था जो शब्द नहीं कह पाए—प्यार, भरोसा, और साथ।
अंजु गुप्ता ‘अक्षरा’