मम्मी पापा आप दोनों वापस घर चले जाओ , यहां पर वंदिता के मम्मी पापा आ गए हैं।वे लोग वंदिता और उसके बच्चे की देखभाल कर लेंगे। लेकिन बेटा हम लोग भी तो पहली बार दादा दादी बने हैं। मुझे भी खुशी है और मैं भी चाहती हूं कि मैं भी बहू और उसके बच्चे की देखभाल करूं।
लेकिन मां वंदिता नहीं चाहती कि आप लोग उसकी देखभाल करो।वो अपनी मम्मी से ही करवाना चाहती है।कैसा हो गया है बेटा तू । इतना बीबी का गुलाम हो गया है कि जरा सी भी अपनी मम्मी पापा की इज्जत का ख्याल नहीं है।आज ही आए हैं और आज ही कह रहा है कि वापस चले जाओ। वहां घर पर तुम्हारी ताई जी है और चाचा चाची है । उनसे कहकर आए थे कि बहू की डिलीवरी हुई है तो बेटे के घर जा रहे हैं।
कुछ दिन वहां रहकर बहू और बच्चे की देखभाल करूंगी।और बेटा तुम कह रहे हो कि वापस चले जाओ। हमारी नाक नहीं कटेगी । क्या कहेंगे ताऊ जी और चाचा चाची। बड़े हुलास से बहू बेटे के पास गई थी और एक ही दिन में वापस आ गई।मैं कुछ नहीं जानता पापा हर्षित बोला।
अब वंदिता को नहीं पसंद है आप लोग तो मैं क्या करूं।अब आपके चक्कर में मैं अपनी शादी तो नहीं खराब कर सकता। आखिर में मुझे रहना तो उसी के साथ है न।एक अच्छा बेटा बनने के चक्कर में अपना घर बार नहीं खराब कर सकता।
निशीकांत और रजनी के दो बेटे थे । दोनों बेटों की शादी हो चुकी थी।बेटा अर्पित अपनी पत्नी के साथ अमेरिका में सैटल था।और दूसरा बेटा हर्षित कानपुर में रहता था। हर्षित ने अपनी पसंद की शादी की थी। जब से हर्षित की शादी हुई थी वह अपनी पत्नी का दीवाना बना उसके आगे पीछे घूमता था।
दीवानगी सी हो गई थी । पत्नी के चक्कर में हर्षित अपने मम्मी-पापा से भी भला बुरा कह देता था। निशीकांत जी अक्सर अपने बेटे को समझाते रहते थे कि पत्नी से इतनी भी दीवानगी ठीक नहीं है ।बीबी के आगे तू हम लोगों से भी बदतमीजी कर जाता है बेटा ये ठीक नहीं है। लेकिन हर्षित पर कोई असर नहीं होता था।
वो तो बस वंदिता के पीछे दीवानो की तरह फिरता रहता था। वंदिता भी इसका फायदा उठाती थी । खुद तो सास ससुर से दूर रहती थी,साथ ही हर्षित को भी अपने मम्मी-पापा से दूर रखती थी। हर्षित के घर में वंदिता के मम्मी पापा का हस्तक्षेप ज्यादा रहता है।
शादी के दो साल बीत गए थे लेकिन हर्षित कभी भी मम्मी पापा को अपने घर आने को नहीं कहता था। लेकिन वंदिता के मम्मी पापा अक्सर ही वंदिता के घर आए रहते थे।इस वजह से हर्षित के मम्मी पापा बेटे के घर नहीं जाते थे। शादी के दो साल बाद वंदिता प्रेग्नेंट थीं ।घर में सभी लोग बहुत खुश थे रजनी ने सोचा की खुशी का मौका है बहू बेटे बुलाए चाहे न बुलाए वो तो जाएगी। आखिर बहू की डिलीवरी है उस समय बहू और बच्चे की देखभाल करना तो मेरा फर्ज है न। जबकि रजनी घर के काम धाम करने में असमर्थ थी ।रजनी ज्यादा काम वगैरह नहीं कर पाती थी।वो अपने घर के काम भी नौकरों के सहारे कर पाती थी। सभी काम के लिए घर में नौकर लगा रखे थे।और फिर यहां बहू के यहां भी क्या काम कर पाती नौकरों के भरोसे ही करवाती। फिर भी अधिकार से बेटे के पास जाने को तैयार थी।
वहीं वंदिता की मां बहुत फुर्तीली और हर काम करने में होशियार थी। वंदिता की मां सुषमा जी घर और बाहर दोनों काम अच्छे से निपटा देती थी।रजनी जी जहां हर काम के लिए नौकरों पर आश्रित थी वहीं सुषमा जी हर काम को चुटकियों में निपटा देती थी। वंदिता को अपनी मम्मी को बुलाने का एक यह भी कारण था। लेकिन बेटे का घर है सोचते हैं कि यह तो निशीकांत और रजनी जी कि यहां मेरा अधिकार है।और ऐसा ही होता आया है कि बहू बेटे के घर बेटे के मां-बाप का ज्यादा अधिकार होता है।
रजनी और निशीकांत के आने से पहले ही वंदिता की डिलीवरी हो गई थी।तब-तक वहां वंदिता की मम्मी थी। वंदिता जब अस्पताल से घर आ गई तो हर्षित के मम्मी पापा वहां पहुंचे।घर से रजनी ने बच्चे के कुछ जरूरी सामान जैसे कपड़े वगैरह और वंदिता के खाने पीने के लिए मेवे के लड्डू वगैरह लेकर आए ।जब रजनी वहां पहुंची तो वहां वंदिता की मम्मी पहले से मौजूद थी । रजनी जी वहां पहुंच कर घर के जो रीति रिवाज होते हैं और जो कुछ भी खाने पीने को दिया जाता है वो बताने लगी । हमारे घर में ऐसा होता है वैसा होता है। लेकिन वंदिता की मम्मी ने कहा नहीं ऐसा नहीं होगा जैसा हमारे घर में होता है वैसा ही होगा । चाहे तो वंदिता से पूछ लो ।और थोड़ा बहुत लड्डू वगैरह तो खा रहे लेगी लेकिन ज्यादा नहीं ।उसको पसंद नहीं है । रजनी जी बोली पसंद नापसंद क्या होती है ये सब तो होता आया है और यही होगा । लेकिन सुषमा जी उनकी कोई बात न मानकर सब अपने हिसाब से करती रही। सुषमा जी ही बेटी के कमरे में होती और बेटी और बच्चे की देखभाल करती ।और बड़े सबेरे उठकर नाश्ता पानी सब क्या देती। रजनी जी बस मुंह ही देखती ही रह जाती थी। रजनी जी में इतना फुर्तीला पन नहीं था कि वो इतनी जल्दी जल्दी काम कर सकें। लेकिन रजनी जी बेटे की मां हैं इसका रौब झाड़ती रहती थी।
रीति रिवाजों को लेकर घर में एक दिन रजनी जी और सुषमा जी में थोड़ी कहा सुनी हो गई। रजनी जी मुंह फुलाकर बैठ गई। निशीकांत जी ने बेटे हर्षित से शिकायत की कि तुम्हारी सास तुम्हारी मम्मी का अपमान कर रही है । उन्हें पता नहीं है क्या कि हम लोग तुम्हारे पापा मम्मी है। मेरे बेटे का घर है और इस घर में मेरा हक ज्यादा है।उधर वंदिता भी हर्षित से शिकायत करने लगी कि यार हर्षित तुमने अपने मम्मी-पापा को क्यों बुला लिया है। तुम्हारी मम्मी मेरी मम्मी के हर काम में टोका टोकी करती रहती हैं। खुद तो मम्मी जी कुछ कर नहीं पाती है और मेरी मम्मी कर रही है तो उनको परेशान कर रही है। प्लीज हर्षित अपने मम्मी-पापा से कहो कि वापस चले जाएं मेरी मम्मी सब संभाल लेंगी।
अब हर्षित मम्मी-पापा और वंदिता के बीच में लुढ़कने लगा इधर उधर। उसके समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। निशीकांत और रजनी जी जिद पकड़कर बैठ गए कि अपनी सास को वापस भेजों वंदिता से कहो मेरी मम्मी आई है वो सब संभाल लेंगी। क्योंकि ये उनके बहू बेटे का घर है और ये उनका पोता।उधर वंदिता हर्षित से गुस्सा हो रही थी कि अपने मम्मी-पापा को वापस भेजों।
आखिर में हर्षित ने तय किया कि वो अपने मम्मी-पापा को घर वापस भेजैगा। क्योंकि हर्षित दोनों के बीच अंतर साफ देख रहा था। वंदिता अपने मम्मी के साथ ज्यादा सहज थी।और सुषमा जी सब अच्छे से संभाल भी रही थी। हर्षित ने आकर मम्मी पापा से बोला पापा आप लोग घर वापस चले जाएं आप लोग साथ साथ नहीं रह सकते।और दोनों की लंडाई में मैं पीसा जा रहा हूं। आखिर में मुझे अपनी शादी बचानी है , अपनी पत्नी का ख्याल रखना।आप लोगों की तरफ बोलता हूं तो वंदिता नाराज हो जाती है। इसलिए आप लोग घर चले जाएं।जब बच्चा थोड़ा बड़ा हो जाएगा तब आप लोग आ जाना।
अब निशीकांत और रजनी को बहुत बुरा लगा।बेटा कैसे बीबी का गुलाम हो गया है।बीबी तो बीबी सास के खिलाफ भी कुछ नहीं सुनना चाहता।चलो रजनी घर चलो निशिकांत बोले। बहुत कर ली बहू की सेवा।जब बेटा ही अपना न रहा तो बहू कैसे अपनी होगी।और दोनों अपना सामान बटोर कर घर वापस आ गए।जब यहां निशिकांत के बड़े भाई और छोटे भाई ने पूछा कि अरे इतनी जल्दी कैसे वापस आ गए ,बहू की देखभाल करने गए थे।तो दोनों लोग कुछ बोल न पाए। निशिकांत ने कहा अब बहू की मम्मी आ गई है वो सब संभाल लेंगी।और हर्षित का फ्लैट भी छोटा है तो इतने लोगों को साथ में रहने में दिक्कत आ रही है।अब सब लोग इतने बेवकूफ तो नहीं होते सब समझते हैं और समझ कर चुप रह गए। क्या बोले।
दोस्तों आजकल का चलन हो गया है।जब बेटियां बहू बन जाती है तो हर काम अपनी मां से करवाना चाहती है सास से नहीं।ये घर घर की कहानी हो गई है।और फिर जो अच्छे से काम निपटा लेगा उसकी ही पूछ होगी न।और जो काम नहीं कर पाएगा उसकी पूंछ कम होगी। इसलिए मेरी तो यही राय है कि बेटे की शादी और डिलीवरी होने तक अपने आपको चुस्त दुरूस्त रखें । यदि आप काम के नहीं हैं तो कोई नहीं पूछेगा । फिर स्वास्थ्य का ध्यान तो रखना भी चाहिए।और एक जगह बैठे रहने के बजाय काम में लगाए रखना एक अच्छी बात होती है ।आपकी क्या राय है दोस्तों।
मंजू ओमर
झांसी उत्तर प्रदेश
18 फरवरी