माँ ने घर छोड़ दिया… क्योंकि वो सम्मान चाहती थी, सहारा नहीं 💔

शाम के सात बज रहे थे। ड्राइंग रूम में महंगी क्रॉकरी के कपों में चाय की भाप उठ रही थी, लेकिन माहौल में एक बर्फ़ीली ठंडक जमी हुई थी। सोफे पर सुधीर और उसकी पत्नी नमिता बैठे थे। उनके चेहरों पर हवाइयां उड़ रही थीं। सामने आरामकुर्सी पर सुधीर की माँ, कावेरी देवी, बेहद शांत मुद्रा में बैठी थीं। उनके चेहरे पर वह घबराहट या दुख नहीं था जो आमतौर पर ऐसी स्थितियों में माताओं के चेहरे पर होता है। बल्कि, एक अजीब सा ठहराव था, जैसे कोई लंबा तूफ़ान थम गया हो।

“माँ, आप होश में तो हैं?” सुधीर ने झुंझलाते हुए कहा। “लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे? मेरा इतना बड़ा बिज़नेस, शहर में इतनी इज़्ज़त, और मेरी माँ वृद्धाश्रम में रहेगी? आपको किसी चीज़ की कमी है क्या यहाँ? खाना, कपड़ा, एसी कमरा… सब तो है।”

नमिता ने भी सुर में सुर मिलाया। “हाँ माँजी, और अभी तो बच्चों के एग्जाम आने वाले हैं। चिंटू को मैथ कौन पढ़ाएगा? पिंकी की चोटियां कौन बनाएगा? हम दोनों तो ऑफिस में बिजी रहते हैं। आप ऐसे कैसे जा सकती हैं?”

कावेरी देवी ने चाय का घूंट भरा और प्याली को बहुत सलीके से मेज़ पर रखा। उन्होंने नमिता की आँखों में देखा।

“यही तो बात है नमिता,” कावेरी देवी ने धीमे स्वर में कहा। “तुम्हें मेरी ज़रूरत ‘माँ’ के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘सुविधा’ (Utility) के रूप में है। चिंटू का होमवर्क, पिंकी की चोटियां, रसोई का तड़का, और घर की चौकीदारी। मैं माँ कम, और एक ‘अनपेड मैनेजर’ (Unpaid Manager) ज़्यादा बनकर रह गई हूँ।”

“माँ, यह आप क्या कह रही हैं?” सुधीर की आवाज़ ऊंची हो गई। “परिवार में सब एक-दूसरे के काम आते हैं। इसे आप ‘नौकरी’ जैसा क्यों तौल रही हैं?”

“सुधीर,” कावेरी देवी ने उसे बीच में रोका। “परिवार वो होता है जहाँ ‘काम’ के अलावा भी ‘बात’ होती है। पिछले छह महीनों में, क्या तुमने एक बार भी मुझसे पूछा कि मेरे घुटनों का दर्द कैसा है? या मुझे शाम को पार्क जाने का मन है या नहीं? तुम लोग सुबह भागते हो, रात को थककर आते हो, और वीकेंड पर दोस्तों के साथ पार्टी करते हो। मैं इस घर के कोने में पड़े उस पुराने सोफे जैसी हो गई हूँ, जिस पर तुम लोग तभी बैठते हो जब थक जाते हो, वरना उस पर धूल जमती रहती है।”

कहानी की शुरुआत आज शाम को नहीं, बल्कि एक हफ़्ते पहले हुई थी।

कावेरी देवी एक रिटायर्ड प्रिंसिपल थीं। पति के गुज़रने के बाद उन्होंने अपनी पूरी पेंशन और जमा-पूंजी सुधीर के बिज़नेस में लगा दी थी और उसके साथ रहने आ गई थीं। शुरू में सब ठीक था। लेकिन धीरे-धीरे, नमिता और सुधीर ने उनकी उपस्थिति को ‘हक’ मान लिया था।

एक हफ़्ते पहले, कावेरी देवी को अपनी पुरानी स्कूल की सहेली, ‘रमा’ का फोन आया था। रमा शहर के बाहरी इलाके में स्थित ‘आनंद वन’ नामक एक सीनियर सिटीज़न होम में रह रही थी।

“कावेरी, तू यहाँ आ जा एक दिन के लिए,” रमा ने चहकते हुए कहा था।

कावेरी देवी जब वहां गईं, तो उनकी आँखें खुली की खुली रह गईं। वह कोई दुखियारा वृद्धाश्रम नहीं था, जैसा फिल्मों में दिखाया जाता है। वह एक रिसॉर्ट जैसा था। वहां बुजुर्ग गिटार बजा रहे थे, लाइब्रेरी में किताबें पढ़ रहे थे, योगा कर रहे थे। किसी के चेहरे पर वो लाचारी नहीं थी जो कावेरी देवी रोज़ आइने में अपने चेहरे पर देखती थीं। वहां सब अपनी शर्तों पर जी रहे थे।

रमा ने उनसे कहा था, “कावेरी, हमने पूरी ज़िंदगी दूसरों के लिए जिया। पति के लिए, बच्चों के लिए, समाज के लिए। अब जो 10-15 साल बचे हैं, क्या वो भी हम दूसरों की ‘आया’ बनकर गुज़ार दें? यहाँ मैं किसी की दादी या नानी नहीं हूँ, यहाँ मैं ‘रमा’ हूँ।”

उस दिन घर लौटते वक़्त कावेरी देवी के दिमाग में उथल-पुथल मची हुई थी।

घर घुसते ही नमिता चिल्लाई थी, “माँजी, आप कहाँ थीं? फ़ोन क्यों नहीं उठाया? चिंटू को भूख लगी थी और मेड आज नहीं आई। मुझे अपनी मीटिंग छोड़कर घर आना पड़ा।”

नमिता ने यह नहीं पूछा कि कावेरी देवी कहाँ गई थीं या उन्होंने खाना खाया या नहीं। उसे बस इस बात का गुस्सा था कि ‘फ्री की नानी’ अपनी ड्यूटी से गायब क्यों थीं।

उस रात कावेरी देवी ने फैसला कर लिया था।

और आज… आज उन्होंने बम फोड़ दिया था।

“सुधीर,” कावेरी देवी ने अपनी बात जारी रखी। “मैं नाराज़ नहीं हूँ। सच में। मैं बस ‘रिटायर’ होना चाहती हूँ। मैंने 25 साल स्कूल में नौकरी की, फिर 30 साल घर और बच्चों को संभाला। अब मैं थक गई हूँ। मुझे अब सुबह 5 बजे उठकर टिफिन नहीं बनाना। मुझे अब यह चिंता नहीं करनी कि दूधवाला आया या नहीं। मुझे अब बस अपनी किताबें पढ़नी हैं, ध्यान करना है और अपनी हमउम्र सहेलियों के साथ हंसना है।”

“लेकिन माँ, लोग क्या कहेंगे?” सुधीर अभी भी अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को लेकर चिंतित था। “मेरे दोस्त, रिश्तेदार… सब थू-थू करेंगे कि सुधीर ने अपनी माँ को निकाल दिया।”

“तो तुम उन्हें सच बता देना,” कावेरी देवी ने मुस्कुराते हुए कहा। “कह देना कि माँ को निकाला नहीं, माँ ने खुद ‘आज़ादी’ मांगी है। और वैसे भी सुधीर, लोग तो तब भी बातें बनाते हैं जब मैं तुम्हारे घर में रहकर पुराने साड़ियाँ पहनती हूँ। लोगों का काम है कहना।”

नमिता ने अब इमोशनल कार्ड खेला। “माँजी, आप बच्चों से इतना प्यार करती हैं, क्या आप उनके बिना रह पाएंगी?”

कावेरी देवी की आँखों में नमी आ गई, लेकिन उन्होंने खुद को संभाला। “नमिता, प्रेम और मोह में फर्क होता है। मैं बच्चों से प्यार करती हूँ, लेकिन मैं उनकी बैसाखी नहीं बनना चाहती। और न ही मैं यह चाहती हूँ कि मेरे पोता-पोती मुझे एक ऐसी औरत के रूप में याद रखें जो दिन भर किचन में खटती रहती थी और चिड़चिड़ी रहती थी। मैं चाहती हूँ कि वो जब मुझसे मिलने आएं, तो एक खुशमिज़ाज़ दादी से मिलें, जिसके पास उन्हें सुनाने के लिए नई कहानियां हों, न कि घर की शिकायतों का पुलिंदा।”

“आनंद वन का फॉर्म मैंने भर दिया है,” कावेरी देवी ने टेबल पर एक लिफाफा रखा। “मेरी जो थोड़ी बहुत पेंशन आती है, उससे वहां का खर्चा निकल जाएगा। तुम्हें एक पैसा देने की ज़रूरत नहीं है।”

“यह नहीं हो सकता!” सुधीर खड़ा हो गया। “मैं आपको जाने नहीं दूँगा। यह मेरी नाक का सवाल है।”

“सुधीर!” कावेरी देवी की आवाज़ में वो कड़कपन वापस आ गया था जो कभी प्रिंसिपल रूम में गूंजता था। “मैं तुमसे अनुमति (permission) नहीं मांग रही हूँ। मैं तुम्हें सूचित (inform) कर रही हूँ। यह मेरा जीवन है, और इसका अंतिम अध्याय मैं अपनी मर्ज़ी से लिखूँगी।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। सुधीर ने अपनी माँ के चेहरे पर वो दृढ़ता देखी जो उसने पिता की मृत्यु के समय देखी थी। वह समझ गया कि माँ को रोकना अब नामुमकिन है।

अगले दिन सुबह, कावेरी देवी ने अपना सामान पैक किया। सिर्फ दो सूटकेस। उन्होंने अपनी ज़्यादातर साड़ियाँ और जेवर नमिता के लिए छोड़ दिए।

“इनकी अब मुझे ज़रूरत नहीं,” उन्होंने कहा।

सुधीर गाड़ी निकाल रहा था। उसकी आँखों में आंसू थे। उसे ग्लानि (guilt) हो रही थी। उसे महसूस हो रहा था कि उसने क्या खो दिया है। सिर्फ एक माँ नहीं, बल्कि घर की वो नींव खो दी है जिस पर उसकी लापरवाह ज़िंदगी टिकी थी।

जब कावेरी देवी ‘आनंद वन’ के गेट पर उतरीं, तो वहां रमा और कुछ अन्य महिलाएं उनके स्वागत के लिए खड़ी थीं। वहां का माहौल एकदम अलग था। हरियाली, शांति और हंसी की आवाज़ें।

सुधीर ने माँ का सामान उतारा। उसने माँ के पैर छुए।

“माँ, अगर आपको यहाँ अच्छा न लगे, तो एक फ़ोन कर देना। मैं उसी वक़्त ले आऊँगा। और प्लीज… हमें माफ़ कर देना।”

कावेरी देवी ने सुधीर के सिर पर हाथ रखा। “माफ़ी मत मांग बेटा। तूने कुछ गलत नहीं किया। बस, हर पक्षी को एक दिन घोंसला छोड़ना पड़ता है। कभी बच्चे छोड़ते हैं, तो कभी माँ-बाप को छोड़ना पड़ता है—उड़ने के लिए।”

सुधीर वहां से भारी मन से लौटा।

गाड़ी में बैठते ही नमिता का फ़ोन आया।

“सुधीर, माँजी को छोड़ दिया? अच्छा सुनो, आते वक़्त सब्ज़ी लेते आना और चिंटू को ट्यूशन छोड़ना है, जल्दी आना। मुझसे अकेले सब मैनेज नहीं हो रहा।”

सुधीर ने फ़ोन स्पीकर पर रखा था। उसने सामने देखा। सड़क खाली थी। उसे आज पहली बार एहसास हुआ कि घर के कामों का वो पहाड़, जिसे माँ चुपचाप उठाती थीं, अब उन दोनों पर गिरने वाला था।

उधर, कावेरी देवी ने अपने कमरे की खिड़की खोली। ठंडी हवा का झोंका आया। उन्होंने अपनी पसंदीदा किताब ‘राग दरबारी’ उठाई, जिसे वे पिछले 5 साल से पढ़ने की कोशिश कर रही थीं पर वक़्त नहीं मिल रहा था।

उन्होंने चश्मा लगाया, कुर्सी पर टेक लगाई और पहला पन्ना पलटा।

चेहरे पर एक सुकून था। यह ‘वृद्धाश्रम’ नहीं था, यह उनका ‘नया घर’ था। उन्होंने किसी मजबूरी में घर नहीं छोड़ा था, उन्होंने अपने आत्मसम्मान के लिए एक नई दुनिया चुनी थी।

तभी रमा आई। “कावेरी, शाम को अंताक्षरी है। तैयार रहना, तुझे पुराने गाने बहुत याद हैं।”

कावेरी देवी हंस पड़ीं। “बिल्कुल। आज तो मैं गाऊँगी… आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है…

शहर के उस आलीशान फ्लैट में आज अव्यवस्था (chaos) थी, लेकिन शहर के बाहर उस आश्रम में एक औरत अपनी ज़िंदगी को दोबारा जी रही थी।

समाज कहता है कि वृद्धाश्रम दुख का प्रतीक है, लेकिन कावेरी देवी ने साबित कर दिया था कि अगर यह स्वेच्छा से चुना जाए, तो यह मुक्ति का द्वार भी हो सकता है। क्योंकि बोझ बनकर महलों में रहने से बेहतर है, रानी बनकर कुटिया में रहना।

दोस्तों, इस कहानी ने हमें एक सवाल छोड़ दिया है…
👉 क्या माँ-बाप का जीवन सिर्फ बच्चों की सुविधा के लिए होता है?
या उन्हें भी अपनी ज़िंदगी जीने का पूरा हक है?

💬 आप बताइए… अगर आपकी माँ ऐसा फैसला लेतीं तो आप क्या करते?
कमेंट में लिखिए — “माँ बोझ नहीं, सम्मान है ❤️”

मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल

error: Content is protected !!