65 वर्षीय वृद्ध विधवा मां से बेटा बहू वृद्धाश्रम में मिलने और धोखे से उनकी सारी प्रॉपर्टी अपने नाम कराने पहुंचे तो वहां पर वृद्धाश्रम के मैनेजर ने उनको दिया एक ऐसा तोहफा कि उनके पैरों तले जमीन खिसक गई
दोपहर की चिलचिलाती धूप में ‘आनंदम वृद्धाश्रम’ का लोहे का गेट खुला और एक चमचमाती हुई लाल रंग की एसयूवी अंदर दाखिल हुई। धूल का एक गुबार उड़ा और गाड़ी पोर्च में जाकर रुकी।
गाड़ी से उतरे 35 वर्षीय विहान और उसकी पत्नी राधिका। विहान ने अपना महंगा चश्मा उतारा और अपने कुर्ते की सिलवटें ठीक कीं। राधिका ने अपनी शिफॉन की साड़ी का पल्लू संभाला और चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान ओढ़ ली जो किसी मंझे हुए अभिनेता को भी मात दे दे।
वे दोनों यहाँ अपनी 65 वर्षीय माँ, सुलोचना देवी से मिलने आए थे।
सुलोचना देवी पिछले छह महीनों से इस वृद्धाश्रम में रह रही थीं। विहान और राधिका ने उन्हें यह कहकर यहाँ छोड़ा था कि “माँ, हम दोनों को जॉब के सिलसिले में लंदन शिफ्ट होना पड़ रहा है। वहां का मौसम आपको रास नहीं आएगा। यहाँ आप अपनी हमउम्र महिलाओं के साथ खुश रहेंगी। हम आते-जाते रहेंगे।”
लेकिन हक़ीक़त यह थी कि विहान और राधिका कहीं लंदन नहीं गए थे। वे शहर के ही दूसरे कोने में एक पॉश अपार्टमेंट में रह रहे थे और सुलोचना देवी के पुराने पुश्तैनी मकान को बेचने की फिराक में थे।
समस्या यह थी कि मकान सुलोचना देवी के नाम पर था। और उस ज़मीन की कीमत अब करोड़ों में थी। बिल्डर ने साफ़ कह दिया था कि जब तक सुलोचना देवी के दस्तखत ‘पावर ऑफ अटॉर्नी’ या ‘गिफ्ट डीड’ पर नहीं होंगे, तब तक सौदा नहीं हो सकता। इसीलिए आज यह ‘अचानक प्यार’ उमड़ आया था।
विहान ने हाथ में फलों की टोकरी ले रखी थी और राधिका के हाथ में मिठाई का डिब्बा था। वे रिसेप्शन पर पहुंचे।
“हमें अपनी माँ, सुलोचना देवी से मिलना है,” विहान ने रौबदार आवाज़ में कहा।
रिसेप्शनिस्ट ने रजिस्टर चेक किया और मैनेजर के केबिन की तरफ इशारा किया। “आप लोग विज़िटर रूम में बैठिए, मैं मिस्टर मैथ्यूज (मैनेजर) को इन्फॉर्म कर देती हूँ।”
कुछ देर बाद, एक शांत और सौम्य व्यक्तित्व वाले मिस्टर मैथ्यूज विज़िटर रूम में आए। उनके साथ सुलोचना देवी भी थीं। सुलोचना देवी ने सादी सफ़ेद साड़ी पहन रखी थी। बेटे और बहू को देखकर उनकी आँखों में एक चमक आई, लेकिन वह चमक वैसी नहीं थी जैसी अक्सर माओं की आँखों में होती है। इस चमक में एक ठहराव था, एक अजीब सी समझदारी थी।
“माँ!” विहान दौड़कर उनके पैरों में गिर पड़ा। “कैसी हैं आप? हमें माफ़ कर दीजिये, वीज़ा के चक्कर में इतना उलझ गए कि मिलने ही नहीं आ पाए।”
राधिका ने भी मगरमच्छ के आंसू बहाते हुए सुलोचना देवी को गले लगा लिया। “माँजी, घर आपके बिना कितना सूना लगता है। लंदन में तो मन ही नहीं लगता हमारा।”
सुलोचना देवी ने दोनों को देखा। उन्होंने न तो उन्हें उठाया, न ही गले लगाया। बस शांत स्वर में बोलीं, “बैठो।”
विहान और राधिका सोफे पर बैठ गए। थोड़ी इधर-उधर की बातों के बाद, विहान ने असली मुद्दा छेड़ा।
“माँ, दरअसल एक छोटी सी परेशानी हो गई है,” विहान ने झिझकते हुए कहा। “वो पुराना वाला घर है न, उसकी हालत बहुत ख़राब हो रही है। नगर निगम का नोटिस आया है कि उसे रिपेयर करवाओ वरना वो उसे गिरा देंगे। अब मैं तो लंदन में हूँ, बार-बार आ नहीं सकता।”
राधिका ने अपनी पर्स से एक फ़ाइल निकाली। “तो हमने सोचा कि अगर आप इस ‘देखरेख’ वाले पेपर पर साइन कर दें, तो हम वहां किसी केयरटेकर को बिठाकर रिपेयरिंग करवा देंगे। बस एक छोटी सी औपचारिकता है।”
कागज़ ‘देखरेख’ के नहीं, बल्कि संपत्ति को विहान के नाम ‘दान’ करने के थे। सुलोचना देवी ने वो फ़ाइल हाथ में ली। उन्होंने चश्मा लगाया और पन्नों को पलटा। विहान और राधिका की सांसें अटकी हुई थीं। वे एक-दूसरे को देख रहे थे, आँखों ही आँखों में जीत का जश्न मना रहे थे।
“पेन है?” सुलोचना देवी ने पूछा।
विहान ने झट से अपनी जेब से एक महंगा पेन निकालकर दिया। “ये लीजिये माँ।”
सुलोचना देवी ने पेन कागज पर रखा ही था कि मिस्टर मैथ्यूज, जो अब तक चुपचाप कोने में खड़े थे, आगे आए।
“सुलोचना जी, एक मिनट,” मिस्टर मैथ्यूज ने शालीनता से रोका। “साइन करने से पहले, मुझे इन बच्चों को वो ‘रिटर्न गिफ्ट’ देना है जो आपने इनके लिए तैयार करवाया था।”
विहान और राधिका चौंक गए। “गिफ्ट?”
“हाँ,” मिस्टर मैथ्यूज ने मुस्कुराते हुए अपनी मेज़ की दराज से एक मोटा सा खाकी लिफाफा निकाला। “आप लोग अपनी माँ से मिलने इतनी दूर आए, उनके लिए फल लाए, मिठाई लाए। तो माँ का भी फ़र्ज़ बनता है कि बच्चों को खाली हाथ न जाने दे।”
विहान के चेहरे पर लालच की लकीरें उभर आईं। उसे लगा शायद माँ ने अपनी छिपी हुई ज्वैलरी या फिक्स डिपॉजिट के कागज़ दिए होंगे। उसने जल्दी से वह लिफाफा मिस्टर मैथ्यूज के हाथ से ले लिया।
“अरे इसकी क्या ज़रूरत थी माँ,” राधिका ने बनावटी हंसी हंसते हुए कहा।
विहान ने लिफाफा खोला। अंदर से कुछ कानूनी दस्तावेज़ और तस्वीरें निकलीं।
जैसे-जैसे विहान उन कागज़ों को पढ़ता गया, उसके चेहरे का रंग उड़ता गया। उसके हाथ कांपने लगे और माथे पर पसीना आ गया। राधिका ने झुककर देखा तो उसकी भी चीख निकल गई।
वह कोई वसीयत या ज्वैलरी के पेपर्स नहीं थे। वह एक ‘जांच रिपोर्ट’ और एक ‘ट्रस्ट डीड’ की कॉपी थी।
उसमें सबसे ऊपर विहान और राधिका की तस्वीरें थीं—लेकिन लंदन की नहीं, बल्कि इसी शहर के उस क्लब की जहाँ वे पिछले हफ़्ते पार्टी कर रहे थे। साथ ही उनके मौजूदा अपार्टमेंट के रेंट एग्रीमेंट की कॉपी थी, जिससे साबित होता था कि वे कभी विदेश गए ही नहीं थे।
“ये… ये क्या है?” विहान हकलाने लगा।
सुलोचना देवी ने अब अपना मौन तोड़ा। उनकी आवाज़ में अब बुढ़ापे की कम्पन नहीं, बल्कि एक जज जैसी कड़क थी।
“यह तुम्हारा झूठ है विहान,” सुलोचना देवी ने कहा। “तुम्हें लगा तुम्हारी माँ बूढ़ी है तो बेवकूफ भी है? जिस दिन तुम मुझे यहाँ छोड़कर गए थे और कहा था कि लंदन जा रहे हो, उसी दिन मुझे शक हो गया था। क्योंकि बेटा, मेरा पासपोर्ट और वीज़ा के कागज़ात तो अलमारी में ही रखे थे, तुमने तो सिर्फ़ अपना पासपोर्ट बनवाया था। अगर तुम मुझे साथ ले जाने वाले होते, तो मेरी भी तैयारी करवाते।”
विहान की बोलती बंद हो गई।
मिस्टर मैथ्यूज ने आगे समझाया, “मिस्टर विहान, शायद आप भूल गए कि आपकी माँ सिर्फ़ एक हाउसवाइफ नहीं थीं, वो अपने ज़माने में गणित की गोल्ड मेडलिस्ट रही हैं। उन्होंने मुझे पहले ही कह दिया था कि मेरे बेटे पर नज़र रखो। हमारे प्राइवेट डिटेक्टिव ने पिछले छह महीने में तुम्हारी हर हरकत का रिकॉर्ड रखा है।”
“और दूसरा कागज़ पढ़ो,” सुलोचना देवी ने ठंडे स्वर में कहा।
विहान ने कांपते हाथों से दूसरा दस्तावेज़ देखा। वह उस पुश्तैनी मकान के बिकने के कागज़ात थे।
“क्या? आपने घर बेच दिया?” राधिका चिल्लाई। “लेकिन वो तो करोड़ों का था! बिना हमसे पूछे?”
“घर मेरा था राधिका, पूछने की ज़रूरत मुझे नहीं थी,” सुलोचना देवी ने कहा। “हाँ, मैंने वो घर बेच दिया। पिछले महीने ही। और तुम्हें जानकर खुशी होगी कि उससे मिले 12 करोड़ रुपये मैंने इस वृद्धाश्रम के नाम कर दिए हैं।”
“क्या???” विहान और राधिका के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। 12 करोड़ रुपये! हाथ से निकल गए?
मिस्टर मैथ्यूज ने मुस्कुराते हुए कहा, “जी हाँ। सुलोचना जी ने ‘आनंदम ट्रस्ट’ को वह राशि दान कर दी है। अब हम यहाँ एक नया विंग बना रहे हैं जहाँ बेसहारा बुजुर्गों का मुफ्त इलाज होगा। और उस नए विंग का नाम होगा—’स्वर्गीय करुणाकर विला’ (सुलोचना जी के पति के नाम पर)।”
“आप ऐसा कैसे कर सकती हैं माँ?” विहान गुस्से और रुलाई के मिले-जुले भाव से चिल्लाया। “मैं आपका बेटा हूँ! मेरा हक़ था उस पर!”
“हक़?” सुलोचना देवी ने कड़वाहट से हंसा। “हक़ तो बेटा प्यार और सेवा से मिलता है, धोखे से नहीं। तुमने मुझे यहाँ क्यों छोड़ा था? ताकि मैं घुट-घुट कर मर जाऊं और तुम प्रॉपर्टी हथिया लो? तुमने मुझे ज़िंदा ही मार दिया था विहान। यह तो भला हो मिस्टर मैथ्यूज और यहाँ के लोगों का जिन्होंने मुझे एहसास दिलाया कि मैं अब भी जी सकती हूँ।”
सुलोचना देवी उठीं। उन्होंने विहान के हाथ से वो ‘देखरेख’ वाली फाइल छीनी और उसे फाड़कर डस्टबिन में डाल दिया।
“मेरे पास अब देने के लिए कुछ नहीं है विहान। जो था, वो मैंने अपने ‘असली परिवार’ यानी इस आश्रम को दे दिया। अब तुम जा सकते हो। और हाँ, लंदन जाने का नाटक अब बंद कर देना, क्योंकि पूरा शहर जान चुका है कि तुम यहीं हो।”
राधिका रोने लगी। “माँजी, हमसे गलती हो गई। हम लालच में आ गए थे। प्लीज वो डोनेशन कैंसिल कर दीजिये। हम आपको घर ले जाएंगे। हम आपकी सेवा करेंगे।”
“अब बहुत देर हो चुकी है राधिका,” सुलोचना देवी ने कहा। “मैंने एक और दस्तावेज़ उस लिफाफे में रखा है। ज़रा उसे भी देख लो।”
विहान ने आखिरी पन्ना पलटा। वह एक कानूनी नोटिस था।
मिस्टर मैथ्यूज ने कहा, “यह नोटिस है कि अब आप दोनों सुलोचना देवी से उनकी मर्जी के बिना नहीं मिल सकते। अगर आपने उन्हें तंग करने की कोशिश की, या भावनात्मक दबाव डाला, तो पुलिस कार्रवाई की जाएगी। आपके सारे कारनामे, झूठ और मानसिक प्रताड़ना के सबूत हमारे पास हैं।”
विहान सोफे पर धम्म से गिर पड़ा। वह जिस प्रॉपर्टी के कागज़ लेने आया था, उसके बदले में उसे अपनी कंगाली का परवाना मिल गया था। वह जिस माँ को ‘बेचारी’ समझकर ठगने आया था, उस माँ ने उसे अपनी बुद्धिमानी से ऐसा तमाचा मारा था जिसकी गूंज उसे ताउम्र सुनाई देती रहेगी।
“जाओ अब,” सुलोचना देवी ने दरवाज़े की तरफ इशारा किया। “यहाँ दोपहर के खाने का समय हो गया है, और मुझे अपने दोस्तों के साथ लूडो खेलना है। मेरे पास तुम जैसे धोखेबाज़ों के लिए वक़्त नहीं है।”
विहान और राधिका के पास कहने के लिए कुछ नहीं बचा था। वे जिस ऐंठन और रूतबे के साथ आए थे, वह सब धूल में मिल चुका था। वे भारी कदमों से, सिर झुकाए बाहर निकले। उनकी एसयूवी अब भी चमक रही थी, लेकिन उसके अंदर बैठे लोग अब खाक हो चुके थे।
जैसे ही वे गए, सुलोचना देवी की आँखों में हल्का सा पानी आया।
मिस्टर मैथ्यूज ने पानी का गिलास बढ़ाया। “आप ठीक हैं सुलोचना जी?”
सुलोचना देवी ने आंसू पोंछे और मुस्कुराईं। “हाँ मैथ्यूज साहब, मैं ठीक हूँ। थोड़ा दर्द तो होता है, आख़िर अपनी कोख से जन्मा था। लेकिन आज मैंने उस नासूर को काट दिया जो मेरी बची हुई ज़िंदगी को ज़हर बना रहा था। आज मैं सच में आज़ाद हो गई।”
उन्होंने खिड़की से बाहर देखा जहाँ कुछ बुजुर्ग बाग़ में हंस रहे थे। सुलोचना देवी ने एक गहरी सांस ली और अपने नए परिवार की ओर बढ़ गईं, जहाँ कोई लालच नहीं था, सिर्फ़ सुकून था।
उस दिन विहान और राधिका को समझ आया कि बुजुर्गों की खामोशी उनकी कमज़ोरी नहीं होती। उन्होंने यह सबक बहुत महंगी कीमत चुकाकर सीखा था। उन्होंने सिर्फ दौलत नहीं खोई थी, उन्होंने एक माँ का आशीर्वाद खो दिया था, जो दुनिया की सबसे बड़ी वसीयत होती है।
मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश