लक्ष्मी से मेरा रिश्ता अचानक बना जो न किसी परिचय का मोहताज है और न ही किसी वादे का। वह चुपचाप आई, मेरे भीतर उतर गई और मुझे पहले से थोड़ा बेहतर इंसान बनाकर चली गई।
बात शुरू होती है, महाशिवरात्रि के पावन अवसर से। महादेव की कृपा से मुझे अपनी बेटियों अदिति और अन्वी के साथ, प्राचीन शिव मंदिर में पूजा का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अर्चन-वंदन कर हम बाहर आए तो मन में असीम शांति और सुकून का अनुभव था।
हमने मंदिर के पास की एक दुकान से घर के लिए कुछ फल खरीदे। इसके बाद कुछ गमले खरीदने की योजना बनाकर हम कार में बैठने ही वाले थे कि मेरी नज़र सड़क के दूसरी ओर, कुछ दूरी पर खेलती हुई छह-सात वर्ष की एक बच्ची पर ठहर गई।
न जाने क्या हुआ, बेटियों से कुछ कहे बिना ही, सड़क पार कर मैं उस बच्ची के पास पहुंच गई। कुछ देर तक मैं उसकी नैसर्गिक मुस्कान में खोई रही। अचानक ही उसने मुझे ‘नमस्ते आंटी’ कहा तो लगा जैसे मैं उसे बहुत पहले से जानती हूं। बातों में पता चला कि उसका नाम लक्ष्मी है। जैसे ही उसने मुझसे कहा कि आंटी आप मेरे घर चलो, पता नहीं कौन से बंधन की डोर मुझे खींच ले गई।
लगभग तीन सौ मीटर की दूरी पर सड़क किनारे चीनी मिट्टी के गमले बेचती अपनी मां से, लक्ष्मी ने मुझे मिलवाया। गमले तो मुझे खरीदने ही थे। अंधे के हाथ बटेर लग गई थी। जिस भी गमले पर लक्ष्मी ने हाथ रखा, मुझे भी वही अच्छा लगा। मोल-भाव करने का मन ही नहीं हुआ। खरीदे हुए गमले कार में रखने थे तो मुझे अपनी बेटियों की याद आई। अदिति को फोन करने लगी तो मेरे पीछे खड़ी दोनों बेटियां हंसकर चिल्लाई, “मम्मा, हम तो कब से आपको, लक्ष्मी को अपनी बेटी बनाते हुए देख रहे हैं।” मैं मुस्कुरा दी।
“बहुत प्यारी बच्ची है तुम्हारी! ईश्वर इसे हमेशा खुश रखे!” सहज भाव से लक्ष्मी की मां से ऐसा कहकर मैं जाने लगी तो उसकी आंखों में आंसू आ गए और मेरे पांव वहीं थम गए। फिर जो कहानी सामने आई, उसने हमारे हृदय को भीतर तक भिगो दिया।
तीन साल पहले एक सड़क दुर्घटना में, छोटी सी लक्ष्मी को इतनी भयंकर चोट लगी कि उसके सिर में अठारह टांके लगाने पड़े। तब से उसके छह ऑपरेशन हो चुके हैं और सातवां अभी होना है। यह सब देख-जानकर हम सब की अविरल अश्रु धारा बह चली। मुंह से शब्द न निकले। लेकिन लक्ष्मी के चेहरे पर वही मुस्कान विराजमान थी। उसने कहा, “जब मैं खुश हूं तो आप सब क्यों रो रहे हो?” बच्ची की जिजीविषा देखकर उसके दर्द का थोड़ा सा भी अंदाजा लगाना मुश्किल था।
लक्ष्मी की मां ने कहा, “लक्ष्मी का सारा इलाज व दवाइयां, सरकारी खर्च से हो रहे हैं। गमले बेचकर, झोंपड़ी में गुजर-बसर भी ठीक से चल रहा है। लेकिन डॉक्टर ने इसे अच्छे से फल खिलाने के लिए कहा है और मैं इसके लिए वो सब नहीं खरीद पाती हूं। आपकी तो दो बेटियां हैं, अगर इनके छोटे हुए कपड़े मिल जाएंगे तो लक्ष्मी खुश हो जाएगी।” इतना सुनते ही अदिति कार में रखे फल ले आई और बोली कि अगर लक्ष्मी ये खाएगी तो हम खुश हो जाएंगे। उनको यथासंभव सहयोग का आश्वासन देकर हम घर आ गए।
उसी दिन से हम तीनों का लक्ष्मी के साथ एक मीठा सा रिश्ता बन गया। घर आते ही, अन्वी ने खुशी-खुशी अपने कुछ कपड़े और अन्य सामान निकाल दिए। अदिति छुट्टी वाले दिन मुझे वहां ले जाने लगी। हम घर के लिए फल खरीदते तो लक्ष्मी के लिए अवश्य लेते। हर बार मैं लक्ष्मी के सुझाए गमले जरूर खरीदती। मैंने अपने पड़ोसियों से भी गमले वहीं से खरीदने का आग्रह किया। लक्ष्मी का जीवन के प्रति उत्साह और अद्भुत हौसला बार-बार उससे मिलने को उकसाने लगा। बेटियां जब अपने काम में व्यस्त होतीं, तब मैं अकेली ही वहां जाने लगी।
पिछले सप्ताह, जब मैं लक्ष्मी से मिलने गई तो उनकी झोंपड़ी बंद थी। फोन उनके पास था नहीं। लक्ष्मी को फोन चलाने की मनाही थी और उसकी मां को चलाना नहीं आता था। आसपास पूछने पर कोई बात नहीं बनी तो उसके हिस्से के फल, मंदिर के बाहर खड़े बच्चों में बांटकर, अधूरापन सा लेकर मैं घर वापस आ गई।
लक्ष्मी से हमारा नाता जुड़े अब लगभग दस महीने हो चुके हैं। आज सुबह अदिति के ऑफिस और अन्वी के स्कूल जाने के बाद, जरूरी काम जल्दी से निपटाकर मैं फिर लक्ष्मी से मिलने चल दी। पर उसे नहीं मिलना था और वह नहीं मिली। पता चला कि वो यह जगह छोड़कर कहीं और चले गए हैं। उत्साह और तेजी से जाते हुए मेरे कदम, वापस आते हुए पूरी तरह निरुत्साहित और निर्बल हो चुके थे।
आज किसी काम में मन नहीं लग रहा है। आज मेरा अपने छात्रों को पढ़ाने का भी मन नहीं है। पर जानती हूं कि यह जीवन है और कुछ दिनों में सब सामान्य हो जाएगा।
दो हाथ, दो पैर और सब कुछ सही-सलामत होते हुए भी, हम ईश्वर के प्रति कृतज्ञ होना तो दूर, अक्सर छोटी-छोटी बातों से परेशान हो जाते हैं। और लक्ष्मी! वह प्यारी सी, छोटी बच्ची इतना सहकर भी मुस्कुराना जानती है! लक्ष्मी से पिछले दस महीनों में मैंने बहुत कुछ सीखा है। उसने मुझे कृतज्ञ होना सिखाया है, जीवन को देखने की नई दृष्टि दी है।
लक्ष्मी से दोबारा मिलना ईश्वर के अधीन है। पर वह बच्ची प्रेरक बनकर हमेशा याद आएगी।
-सीमा गुप्ता (मौलिक व स्वरचित)
साप्ताहिक विषय: #एक रिश्ता ऐसा भी