क्या कह रहा था मंटू इस बार तो छुट्टियों में आ रहा है ना मनोहर जी ने पत्नी जानकी से बहुत उत्सुकता से पूछा जो बेटे मंतव्य उर्फ मंटू से मोबाइल पर बात कर रही थी।
आपको तो बस घर कब आ रहा है घर कब आ रहा है का राग छेड़ना आता है।इतनी बड़ी कम्पनी में नौकरी कर रहा है इतनी जिम्मेदारियां है उसके पास ।कहां से छुट्टी मिलेगी उसे।जाने ठीक से खाता पीता भी है या नहीं।इस बार भी छुट्टी नहीं मिल रही उसे कह रहा था जानकी जी ने आंखों में उमड़ आए
आंसुओं को सूती साड़ी के कोने से पोंछ ते हुए कहा और मनोहर जी से कुछ छुपाते हुए बाहर दालान में सूखे कपड़े उठाने चली गईं।
इस बार भी छुट्टी नहीं मिली इस बार भी नहीं आ पाएगा मंटू मनोहर जी ने दुखी स्वर में कहा और अधूरी बनी पतंग को देखने लगे जिसे वह अपने हाथों से पोते टिशू के लिए बना रहे थे।
मंटू उनका इकलौता बेटा था।शहर में नौकरी करता था।साल में एक बार अपने जन्मदिन पर कई दिनों की छुट्टी लेकर गांव में मां पिता के पास रहने आ जाया करता था।
जिसका जानकी और मनोहर जी बड़ी बेसब्री से इंतजार करते थे।जानकी ना जाने कितने प्रकार के व्यंजन बनाती थीं पूरे घर की साफ सफाई यूं होती थी मानो बहुत बड़ा त्योहार हो।मनोहर जी कई कई बार बाजार जाते ढेरो सामान खरीद कर लाते रहते।
इस बार भी सारी तैयारी उन लोगों ने कर ली थी और बेहद उत्सुकता से बेटे के आने की राह तक रहे थे इस बार उन्हें बेटे से ज्यादा छोटे टिशू का इंतजार था।उछाह उनके मन में उमड़ा आ रहा था।
फोन की घंटी सुनते ही वह दौड़े आए थे सुनने कि कब आ रहा है लेकिन छुट्टी नहीं मिली नहीं आ रहा है सुनकर तो उनका कलेजा सूख गया।
क्या सही में छुट्टी नहीं मिल रही या अब हम लोगों के पास गांव आने का उसका मन ही नहीं करता अचानक दिल में संदेह जन्म लेने लगा।
जानकी अब यहां गांव में रखा ही क्या है शहर जैसी सुविधाएं कहां हैं।उसका तो बहुत बड़ा बंगला है नौकर चाकर भी हैं।यहां तो कुछ भी नहीं है।छुट्टी नहीं मिलने का तो बहाना है मनोहर जी की दबी व्यथा आग की तरह सुलग कर बाहर आ गई थी जिसकी तपिश ने जानकी को भी दग्ध कर दिया।
कह रहा था टिशू को अचानक बुखार आ गया है।ठीक ही नहीं हो रहा है।डॉक्टर से इलाज चल रहा है इसलिए नहीं आ पाएंगे जानकी जी छुपा ना सकीं असल बात बता ही दी।
क्या कहा टिशू कि इतनी ज्यादा तबियत खराब है तुमने पहले क्यों नहीं बताया क्यों छुपाया इस बात को मनोहर जी तड़प उठे नन्हे टिशू कि बीमारी की खबर सुनकर।
मंटू ने मना किया था आपको बताने के लिए।कह रहा था पिता जी को मत बताइएगा चिंतित हो जाएंगे अपनी तबियत खराब कर लेंगे जानकी ने सूखे कपड़े लकड़ी के तख्त पर रखते हुए मनोहर जी के पास आकर कहा तो मनोहर जी के मन में बेटे के प्रति उठता संदेह तुरत गायब हो गया अपनी ही सोच पर वह शर्मिंदा हो उठे ।
जानकी फोन लगाओ मुझे बात करनी है मंटू से आतुर स्वर में कह उठे।
नहीं रहने दीजिए क्या बात करनी है आपको।वह मुझ पर नाराज होगा कि मैने आपको क्यों बता दिया जानकी जी मनोहर जी की आतुरता देख पछता उठी ।
हेलो हां मंटू कैसा है टिशू क्या हुआ उसको तब तक मनोहर जी फोन लगा लिया था।
पता नहीं पापा बुखार भी है और चुपचाप सा हो गया है।ज्यादा बात ही नहीं करता टीवी भी नहीं देखता बस गुमसुम सा हो गया है समझ में नहीं आ रहा हम लोगों की …. उधर से मंतव्य की परेशान आवाज सुनाई दे रही थी।
डॉक्टर क्या कहते हैं मनोहर जी ने पूछा।
कहते हैं धीरे धीरे ठीक हो जाएगा दवा दे रहे हैं।
एडमिट तो नहीं करवाए हैं मनोहर जी ने पूछा।
नहीं नहीं घर में ही है पर….
तो फिर यहां क्यों नहीं आ रहे हो ये भी तो घर है मनोहर जी ने कहा तब तक जानकी ने फोन छीन लिया उनके हाथ से
नहीं नहीं बेटा यहां अभी बिल्कुल मत आना वहीं रहकर इलाज करवाओ जब ठीक हो जाए तभी कहीं आने जाने की बात होगी जानकी ने मनोहर जी की बात काटते हुए बेटे को समझाइश दी और फोन काट दिया।
आप भी अजीब बात करते हैं।टिशू का इलाज शहर में अच्छे से हो रहा है यहां आकर क्या करेगा।तबियत और बिगड़ गई तो।नहीं नहीं वहीं रहने दो ईश्वर सब अच्छा करेंगे जानकी जी ने मनोहर जी को समझाते हुए कहा तो मनोहर जी को भी अपनी जल्दबाजी पर पछतावा हुआ अब तो उनका दुख दुगुना हो गया था बेटा नहीं आ रहा और टिशू कि तबियत खराब है।
घर में सन्नाटा पसर गया था।जानकी जी की सारी तैयारियां मुंह चिढ़ा रहीं थीं और मनोहर जी को पूरा घर काट खाने को दौड़ रहा था।रात भर दोनों करवट बदलते रहे नींद तो जैसे टिशू कि बीमारी सुन गायब हो हो गई थी।
भोर में ही उठ गए थे मनोहर जी ।घर से बाहर निकल खेतों की ओर चल पड़े थे ।उगते हुए सूरज में भी उन्हें नन्हें टिशू का चेहरा दिख रहा था।
घर लौटते हुए थोड़ी देर ही हो गई थी उन्हें।घर पहुंचे तो अंदर से कई आवाजें सुनाई देने लगीं।जी धड़क उठा था उनका।अंदर गए तो मंटू को देख चकित रह गए।उसे देखती नजरों ने पीछे कुर्सी पर बैठे टिशू को ढूंढ ही लिया।
अरे बेटा अचानक तुम लोग यहां।टिशू तू कैसा है मनोहर जी ने लपक कर उसे अपनी गोद में उठा लिया।
पापा आपने जब कहा तो मुझे भी लगने लगा कि यहां भी तो घर ही है जब घर पर ही रहना है तो यहीं आकर रहें मंतव्य ने आगे बढ़ उनके पैर छूते हुए कहा तो वह तो एकदम प्रसन्न हो गए।
बहुत अच्छा किया बेटा।अरे जानकी वो लड्डू ले आओ टिशू को खिलाओ खायेगा ना बेटा तुझे तो दादी के हाथ के लड्डू अच्छे लगते हैं ना।
नहीं पापा डॉक्टर ने ये सब खाने से मना किया है वैसे भी इसका कुछ खाने का मन ही नहीं करता आजकल तुरंत मंटू बोल उठा।
दादा जी ये क्या है तब तक टिशू अध्बनी पतंग के पास पहुंच गया था।
ये तुम्हारे ही लिए है ये पतंग है आसमान तक उड़ेगी मनोहर जी जोर से हंसते हुए पतंग की डोर बांधते हुए कहा।
पतंग है ये!! ये कैसे आसमान तक उड़ेगी क्या इसके पंख हैं दादाजी टिशू दोनों आंखे फाड़ उत्साह से बोल उठा।
हां हां बिल्कुल इसके पंख हैं पर छुपे हुए हैं जब टिशू उड़ाएगा तो ये उड़ जाएगी मनोहर जी ने पतंग में छोटी सी कागज की पूंछ बांधते हुए कहा।
मैं कैसे उड़ाऊंगा दादाजी इसे चलिए ना उड़ाते हैं टिशु मचल उठा।
मनोहर जी एक हाथ से पतंग और एक हाथ से टिशु को संभाले बाहर आ गए। थोड़ी ही देर में बाहर पतंग उड़ाते दादा पोते की हँसी की आवाजों से घर गूंज उठा।
जा बेटा जाकर अपने पिता और अपने बेटे दोनों को बुला ला खाना लगा दिया है।आकर खा लें ।आज तो इनकी भूख प्यास सब गायब हो गई है तुम लोगों को देख कर जानकी जी ने मंटू से कहा जो अपने कमरे में पत्नी के साथ टिशू कि दवाइयां और खाने का सामान व्यवस्थित कर रहा था।
नहीं मां टिशू तो इस समय कुछ खाता ही नहीं है।उसकी इच्छा ही नहीं होती।ये उसकी पसंद का पास्ता बना दूंगी थोड़ा सा खा लेगा बहू प्रीति ने कहा तो जानकी जी थाली में परसा खाना देखने लगी।
दादी दादी मुझे बहुत जोरों की भूख लगी है जल्दी से खाना लगा दो हम दोनों का तभी टिशू कि तेज आवाज से वह चौंक गईं और मंटू भी प्रीति के साथ चकित हो उठा।
तुझे भूख लगी है। आजा मेरा राजा बेटा थाली लगी है तुम दोनों की जानकी जी हुलस कर बोल पड़ीं और जल्दी से उसके लिए एक छोटी टेबल पर थाली लाकर रखने लगीं।
अरे नहीं नहीं दादी मै तो दादाजी के साथ नीचे चौकी पर बैठ कर ही खाना खाऊंगा और उन्हीं की थाली में एक साथ टिशू दादाजी के पास सट कर बैठते हुए बोलने लगा।
हां हां आज मैं तुझे अपने हाथों से खिलाऊंगा मनोहर जी की खुशी आसमान छू रही थी।
इतने महीनों का अकेलापन पोते को याद कर के ही कटा था।उसके साथ बिताए यही अनमोल पल उनकी जिंदगी की सांसे थीं जो अभी दोगुनी रफ्तार से चल रहीं थीं।
पहले लड्डू खिलाओ टिशू लडिया रहा था दादाजी से चलो अब आप मुंह खोलो मैं भी आपको खिलाऊंगा दोनों ऐसे मगन थे मानो आस पास कोई और था ही नहीं।
मंतव्य चकित हो देख रहा था उसका बेटा जो बेहद बीमार था बहुत दिनों से जिसने खाने की तरफ देखा तक नहीं था बहुत दिनों से जो खुल कर बोला तक नहीं था हंसने की तो बात दूर थी वह आज एकदम बदल गया था ।इतना खुल कर हंस रहा था खेल रहा था दौड़ भाग कर रहा था पतंग उड़ा रहा था और सबसे बड़ी बात उसे भूख लगी थी खाना खा रहा था..!
दादी आप तो एक नंबर खाना बनाती हैं।मम्मा को भी सिखा देना टिशू ने प्रीति की तरफ शरारत से देखते हुए कहा तो सब जोर से हंसने लगे।
चल बेटा अब तो थक गया होगा अपने कमरे में चल दवाई खा कर सो जाना प्रीति के स्वर में काफी चिंता थी।
अपने कमरे में!! मम्मा मैं तो दादाजी के कमरे में रहूंगा उन्हीं के साथ।दादाजी से मुझे ढेर सारी कहानियां सुननी है राक्षस वाली लाल परी वाली और ड्रैगन वाली तुम दवाई वहीं ले आओ कहता वह दादाजी का हाथ पकड़ बहुत उल्लास से उनके कमरे की तरफ चला गया।
प्रीति टिशू को क्या हो गया है एकदम बदल गया यहां आकर कितनी बातें कर रहा है मंतव्य आश्चर्य चकित था।
बेटा ये घर का असर है।यहां सबके साथ उसे खुला पन मिल रहा है।तुम वहां अपने काम में व्यस्त रहते हो।प्रीति घर और बाहर के कामों में।अड़ोस पड़ोस कोई है ही नहीं।टिशू अकेलापन का शिकार हो गया।खालीपन से ये बीमार हो गया जैसे तेरे पिता।कई दिनों से रोज मुझ पर चिड़चिड़ा रहे थे झुंझला रहे थे और आज तो देख इनसे ज्यादा मधुर व्यक्ति नहीं मिलेगा जानकी जी भाव विभोर हो रही थीं।
अब तू टिशू की तबियत की फिक्र बिल्कुल ना कर ।बहुत जल्दी एकदम चंगा हो जाएगा जानकी जी बोलती जा रहीं थीं और मंतव्य अपने बेटे को अपने पिता के पास लेट कर चाव से कहानी सुनते देख खुश हो रहा था निश्चिंत महसूस कर रहा था ।
सच है सबसे बड़ा धन परिवार ही होता है।शहर में सारी सुविधाएं हैं मेरे पास बड़ा सा शानदार सुविधायुक्त मकान गाड़ी सब है लेकिन यहां परिवार के साथ जो सुकून है जो दिली गहरा अपनापन है सरलता है वो किसी धन से खरीदी नहीं जा सकती सोचता मंतव्य भी मां के पास आकर बर्तन समेटने में मदद करने लगा था।
लतिका श्रीवास्तव
सबसे बड़ा धन :परिवार#साप्ताहिक शब्द कहानी