ये तू जूते पहनकर कैसे अंदर आ गया,बाहर उतार गधा कहीं का, रत्ती भर भी तमीज नहीं है ।तू एक नौकर है हम मालिक पता है कि नहीं कुछ तुझे , कैसे मालिक के घर आते हैं,बस दनदनाता हुआ अंदर चला आता है।बस वही गेट पर खड़ा रह रेखा जी जोर जोर से चिल्लाए जा रही थी।
शिवराम जो उनकी फैक्ट्री में काम करता था चौकीदार का। रेखा जी का ऐसा ही रवैया था अपने यहां काम करने वालों के साथ। अपने मालिक होने का बहुत ही अभिमान था उनको। छोटे व गरीब लोगों से बहुत नफरत करती थी रेखा जी। वहीं शिवराम आज अस्पताल में बिस्तर पर पड़ी रेखा जी को चम्मच से पानी पिला रहा था।
रेखा और प्रमोद जी के परिवार में दो बेटे ,एक छोटा भाई और मां रहती थी साथ में।प्रमोद जी की सीमेंट ब्लॉक्स की फैक्ट्री थी।छोटा भाई विनोद कहीं कोई काम धंधा नहीं करता था तो मां ने की बार कहा प्रमोद से की अपने काम में छोटे को भी लगा लो या तो पार्टनरशिप में कोई काम खुलवा दो ।
काम धंधे पर लग जाए तो मैं भी निश्चित हो जाऊं ।उसकी भी शादी हो जाए और घर गृहस्थी बस जाएं तो चैन से मर सकूंगी। लेकिन रेखा जी ऐसा नहीं होने देना चाहती थी ।
प्रमोद जी तो थोड़ा सोचते भी थे भाई के लिए लेकिन जहां घर में इसकी चर्चा होती रेखा जी तांडव मचा देती। कहती ये काम सिर्फ मेरा है और किसी को मैं इसमें शामिल नहीं होने दूंगी ।और यदि काम करना ही है तो जैसे और वर्कर काम करते हैं वैसे ही करें तनख्वाह पर बस।
भाई को अपने यहां काम पर नहीं रखने दिया रेखा जी ने ।अब विनोद कहीं और काम करने लगा था और अब उसकी शादी भी हो गई थी ।तो देवर को पत्नी और मां के साथ अलग मकान में रहने के लिए भेज दिया था रेखा ने। रेखा जी थोड़ा देखने सुनने में अच्छी थी
इस बात का बहुत ज्यादा अभिमान था । देवरानी मधु से हर वक्त कांपटीशन करती रहती थी। हालांकि देवरानी मधु भी अच्छी शक्ल सूरत की स्वामिनी थी बस रंग थोड़ा सांवला था । लेकिन सब मिलाकर वो भी अच्छी लगती थी।
रेखा जी के दो दो बेटे थे और मधु के एक बेटी और एक बेटा थे। रेखा जी को इस बात का बड़ा अभियान था कि उनकी दो दो बेटे हैं , वह हर समय कहती रहती थी कि भाई मेरे तो बेटे दो दो हीरे जैसे बेटे हैं ,मैं क्यों किसी से दब के रहूं। रेखा जी खूब पैसे उड़ाती थी और खूब खरीददारी करती थी
और नौकर जाकर लगाकर खूब ऐश की जिंदगी जीती थी।इधर मधु कोई साड़ी या कोई सामान सामान खरीद ले तो रेखा जी उनसे कहने लगती अरे तुम्हारे तो बेटी है इस पैसे बचा के रखो शादी ब्याह में काम आएंगे नहीं तो कल को मुझसे मांगने आ जाओगी कि पैसे दे दो।
मधु जेठानी के बातों से बहुत आहत होती थी लेकिन चुप रह जाती थी। रेखा जी मधु से कहती तुम लोग तो बिना नौकरों के रहती हो देखो मेरे घर तो काम करने को नौकर लगे हुए हैं खाना भी नहीं बनाती मैं, अगर एक दिन खाना बनाने नहीं आती तो मैं तो बाहर से जाकर खाती हूं और मैं खुद खाना नहीं बनाती हूं।
इसी तरह अभियान से भरी हुई रहती थी रेखा जी अपने आगे किसी को कुछ ना समझती थी। ऐसे ही दिवाली में घर में मिठाई के डब्बे आते थे,फैक्ट्री के वर्कर को देने के लिए और उसी में से एक डिब्बा मिठाई मधु को भी दिया जाता था। तो इस बार गलती से मिठाई का डिब्बा जो मधु को देना था वह बदल गया मधु के पास काजू कतली का डिब्बा आ गया।
दूसरे दिन रेखा जी ने मधु के घर में नौकर भेज कर वह डिब्बा मंगवा लिया वापस कि तुम लोग तो इतनी महंगी मिठाई खाते नहीं हो ,और मेरे यहां तो भाई काजू कतली या देसी घी की ही मिठाई खाई जाती है। यह बात मधु को इतनी बुरी लगी कि उसने सोच लिया कि अब अगले साल से भाभी से मिठाई का डिब्बा नहीं लेना इतना अपमान सहकार ऐसी मिठाई नहीं खानी है।
बस इसी तरह अभियान में डूबी रेखा जी लग्जरी लाइफ जीते जी भयंकर बीमारियों के शिकार हो गई । बेतहाशा मोटापा बढ़ गया ।शुगर बीपी ने घेर लिया हर महीने अस्पताल में भर्ती हो जाती थी हर रोज़ डॉक्टर के यहां चक्कर लगाना पढ़ता था ।मिठाई आइसक्रीम और कोल्डड्रिंक फ्रिज में भरा पड़ा रहता था ।फिर क्या था उ उठना बैठना मुश्किल हो गया । चार कदम चल भी नहीं पाती थी ।
डॉक्टर कहता था पैदल चलो मॉर्निंग वॉक करो लेकिन वह गाड़ी से नीचे पैर ही नहीं रखतीं ।बस फिर क्या था कभी हार्ट अटैक तो कभी ब्रेन हेमरेज हो जाता था। लेकिन अभिमान जब का तस था ।डॉक्टर की भी नहीं सुनती थी। अब इस बार ऐसा ब्रेन हेमरेज हुआ कि किसी लायक ना रह गई।
दोनों बटों शादी हो गई थी और वह अपनी अपनी पत्नियों के साथ मस्त थे। एक बेटा बेंगलुरु में था और दूसरा अमेरिका में था।अब रेखाजी बीमार हो तो उनकी देखभाल कौन करें फिर मधु की याद आती थी। इंसानियत के नाते मधु कर भी देती थी लेकिन इस बार स्थिति कुछ ज्यादा ही नाजुक हो गई थी ।
फैक्ट्री के चौकीदार शिवराम की मदद ली गई ,जिसको दुत्कारती करती रहती थी अपमानित करती रहती थी ,नफरत की निगाह से देखती थी। वह अस्पताल में रात को ड्यूटी देता था और उनकी देखभाल करता। बेटे बहू तो आए लेकिन 1 घंटे को ही अस्पताल आते थे वह घर में पड़े रहते थे।
बहू से कुछ करने को कहो तो बोलती मुझसे नहीं होगा ,मुझे इनफैक्शन हो जाएगा मैं तो छूती भी नहीं ।और बेटा और बेटा भी रात में ना रूकता था
वह कहता था कि मुझे अस्पताल में बदबू आती है,और घर में आकर दोनों आराम से सो जाते थे।प्रमोद जी भी रात भर अस्पताल में नहीं रह सकते थे ।दिन में तो दिन मधु संभल लेती थी।पर रात मैं कौन रहे। उसको भी तो आराम की जरूरत थी।इसलिए फैक्ट्री के चौकीदार की मदद ली गई और रात में वो रेखा जी की देखभाल करता।
अब डॉक्टर ने हल्का खाने-पीने के लिए बोल दिया था। आज मधु जब घर से कुछ खाना बनाकर ले गई थी और रेखा जी को खाने को दिया तो वह रोने लगी आंखों में आंसू भरकर बोली और तुम कितनी अच्छी हो मधु वही मधु जिसको वह हर वक्त अपमानित करती रहती थी। और रोने लगी काश मेरे भी एक बेटी होती लड़कों का इतना घमंड करतीथी देखो घड़ी भर मेरे पास नहीं बैठते बेटा बहू आए पता नहीं किस लिए है।
रेखाजी का सारा अभियान आंसू बनकर बह रहा था। धीरे-धीरे ठीक होकर रेखा घर आ गई तो समझ में आया कि जिस जिस चीज पर अभिमान कर रही थी वह सब कुछ बेकार है।
यह रूप जिसका मुझे बड़ा घमंड था आईने में देखकर खुद को रो पड़ी अपनी शक्ल सूरत को। अब चल फिर भी नहीं सकती होटल बाजी नहीं कर सकती डॉक्टर ने उबला खाना खाने को कहा है ।अब चटोरी जवान को रोकना पड़ेगा ।बस सब कुछ होते हुए भी एक सिंपल सी जिंदगी जीनी है यदि जिंदा रहना है तो।
दोस्तों पता नहीं क्यों इंसान इतना अभिमान पालता है , जबकि पता है कि स्थाई कुछ भी नहीं है।जिस चीज की अति कर दो वहीं आपका नुकसान कर देगी।एक सिंपल सी जिंदगी जीने में ही भलाई है। ज्यादा दिखावे के चक्कर में न पड़ें।और शरीर भी तो एक मशीन की तरह ही है उसका उपयोग नहीं करेंगे
तो जैसे मशीन को जग लग जाती है वैसे शरीर को भी लग जाएगी। इसलिए इतना अभिमान न करें क्योंकि जब ये टूटता है न तो कहीं का नहीं छोड़ता है इंसान को। फिर सब ताने देते हैं देखो बड़ा अभियान था इसको अपने रंग रूप का, पैसे का,बेटों का क्या मिला इन सबसे। इसलिए दोस्तों ज्यादा अभिमान ठीक नहीं है।
मंजू ओमर
झांसी उत्तर प्रदेश
3 जनवरी