नहीं मैने नहीं फेंका यह कचरा मुझे क्या पता किसने फेका है क्या मैं किसी खोजी विभाग में नौकरी करता हूं.. आप लोग भी ज्यादा करमचंद जासूस बनने की कोशिश मत कीजिए वरना मुझसे बुरा कोई ना होगा कहे देता हूं… हमेशा की तरह बांह चढ़ाता शिवदयाल सबको परास्त किए दे रहा था।
मॉर्निंग वॉक के बाद रोज की तरह आज भी जब दीनानाथ जी पार्क की ताजी हवा में सुस्ताने और योग ध्यान करने के लिए आए तो हरियाली वाली ताजगी की जगह जूठन और सड़न की बदबू से तिलमिला उठे।
शिवदयाल …व्यर्थ में बांह चढ़ा कर सबको चुप नहीं करवाओ तुम्हीं ने कचरा फेंका है यहां पर ।पार्क को प्रदूषित कर दिया शिवदयाल को बहस करते देख दीनानाथ जी चिल्ला उठे।
अमा दीनानाथ तुम्हे क्या लेना देना है कचरा किसने फेका ये पार्क है तुम्हारा घर नहीं है समझे और हां बिना प्रमाण के मुझ पर आरोप मत लगाया करो शिवदयाल ने फिर बांह चढ़ा ली।
तुम्हे तो हर बात पर बांह चढ़ाना लड़ाई करना ही आता है मै जानता हूं कि ये कचरा तुम्हारे ही घर का है अरे इतना बड़ा डस्ट बिन पार्क के हर कोने में रखा हुआ है इसमें डाल देते ….. दीनानाथ जी पार्क में फैली गंदगी और वहां खेलते बच्चों और बैठे बुजुर्गों को देख दुखी हो गए थे।
बस बस बहुत हो गया दीनानाथ ज्यादा ना बोलो मेरा घर पार्क के पास है तो क्या कचरे पर भी मेरे ही घर का नाम लिखा है । इतना बड़ा पार्क साफ सुथरा पड़ा है पर तुम्हे बस ये कचरा वाली जगह ही दिखाई पड़ रही है अमा जाओ अगर फेंक भी दिया तो तुम क्या कर लोगे बताओ..!शिवदयाल आवेश में आ गया।
दीनानाथ जी जानते थे कचरा आज भी इसीने चुपचाप फेंक दिया है इसीलिए बहस करता जा रहा है।पर भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा..!!
अचानक दीनानाथ जी भी बांहे चढ़ा कर शिवदयाल की ओर बढ़ने लगे….. शिवदयाल सहित सभी हैरत में थे कि आज तो गुत्थमगुत्था होना ही है।
अरे अरे दीनानाथ अपनी उमर देखो इन अशक्त बाहों से मुझसे पंगा ना लो चारों खाने चित्त हो जाओगे शिवदयाल अपनी बांह चढ़ाता उनके एकदम सामने आ गया।
दीनानाथ जी ने उसे देखा उसके पास रुके लेकिन फिर आगे बढ़ गए… कचरे के पास रुके… झुके और अपने दोनों हाथों से कचरा उठाने लगे…!
दृश्य ऐसा था कि हर कोई सकते में आ गया।सड़ांध भरा कचरा सहजता से उठाते दीनानाथ मानो आज शिवदयाल को सबक सिखाने की ठान चुके थे।
देखते ही देखते प्रत्येक उपस्थित बाल वृद्ध अपनी बांहे फैलाए दीनानाथ जी के पास घिर आए और सबके समवेत हाथों ने चंद मिनटों में पूरा कचरा उठाकर डस्ट बिन में डाल दिया ।
ग्लानि से शिवदयाल की बोलती बंद हो चुकी थी और बांह शिथिल।
लतिका श्रीवास्तव
बांह चढ़ाना#लघुकथा