किस्मत वाली – अर्चना झा

जब से दिल्ली से मुंबई शिफ्ट हुई हूं दोस्तों ,रिश्तेदारों का फोन हमेशा आता है कि कैसा लग रहा है मुंबई ,वहां का क्लाइमेट कैसा है , दोस्त बने कि नहीं,अच्छा तो लग रहा है ना , इसी सिलसिले में मेरी मौसी की बेटी अल्का का फोन आया बोली कैसी हो बताओ और बताओ कैसा लग रहा है मुंबई में आकर, उसने भी वही सारी बातें दोहराई, मैंने कहा,कैसा लगेगा

अभी तो आई ही हूं देखते हैं अब 25 साल बाद वापस  वहीं  जहां शादी करके आई थी,देखते हैं आगे क्या होगा , पतिदेव का फैसला सर आंखों पर, कहकर दोनों हंसने लगे,अल्का ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि मुंबई में तू कहां रहती है मैंने उसे बताया कि मैं अंधेरी में रहती हूं

तो उसने बोला अरे अंधेरी में तो आरती भी रहती है,  मैंने दिमाग पर ज़ोर डालते हुए पूछा,कौन आरती? वह चहक कर बोली अरे मेरी फ्रेंड आरती, भूल गई तुम उसे ,हम लोग साथ में खेला करते थे मुझे कुछ याद नहीं आ रहा था तो उसने मुझे याद दिलाने के लिए दबी आवाज़ में कहा,अरे उसके एक पैर में पोलियो था ना ,

वो इस तरह से कहना नहीं चाहती थी पर उसे कहना पड़ा, मुझे भी पच्चीस साल पहले वाली बात झट से कहां याद आती, पर जैसे ही अल्का ने वो बात कही , पूरी कहानी ऩज़र के आगे आ गई जैसे ।

उसने कहा अब पहचाना, मैंने कहा हां सॉरी मुझे याद नहीं था,अच्छा तो वह अभी अंधेरी में है ,उसने कहा हां वह वहीं पर है ,मैं तुझे उसका नंबर दूंगी तो उससे बात करना मैंने कहा ठीक है चल अभी थोड़े से काम निपटा लूं , पतिदेव ऑफिस चले जाएं तो बात करती हूं, और आरती का फोन नंबर भी देती हूं फ्री होकर ,कह कर उसने फोन काट दिया , 

 अल्का और मैं एक ही उम्र के हैं लगभग, हम दोनों की खूब जमती थी,  दोनों की पढ़ाई लिखाई एक ही शहर में हुई,एक दूजे के घर आना जाना रहना, खूब होता था, मौसी अपनी बेटी जैसा ही प्यार करती थी मुझे, फिर दोनों की शादी हो गई और दोनों अलग-अलग शहरों में आ गए, पर अक्सर बातें होती रहती थी।

बात आज से पच्चीस साल पहले की है , मैं अपनी मौसी के घर गयी हुई थी छुट्टियां अक्सर कभी मैं अल्का के घर या वो मेरे घर बिताती थी , सुबह नाश्ता करने के बाद अल्का बोली चल तुझे मैं अपनी दोस्त आरती और मालती से मिलवाती हूं, उसके पापा बिजनेस मैन हैं, और उनका एक छोटा सा स्कूल भी है

छोटे बच्चों के लिए, आरती और मालती के साथ अक्सर मैं वहीं खेलती हूं शाम को, अभी तो छुट्टियां चल रही हैं चल हम उनके साथ वहीं खेलेंगे, उनसे मिलकर बहुत अच्छा लगा, आंटी ने बहुत सारी चीज़ें खाने की मेज़ पर सजा दी और बोली अल्का तो हमारी बेटी जैसी है तुम भी इसे अपना ही घर समझो, बेझिझक आया जाया करो,

मैंने भी मुस्कुराते हुए हामी भर दी, आरती ने मेज़ से खाने का कुछ सामान उठा कर डब्बों में भर लिया और बोली,चलो स्कूल पर ही खेलेंगे भी और खाएंगे भी, बस फिर क्या, अक्सर हम यही करते तीन चार घंटे छुट्टियों के दिनों में वही गुजारते, इतने दिनों में मैंने जाना आरती का एक पैर सिर्फ कहने के लिए पोलियो ग्रस्त है,

पर वो किसी पर आश्रित नहीं है, अपने सारे काम खुद करती है, और घर में भी कोई उसे उस नज़रिए से नहीं देखता था,बस आंटी की एक ही चिंता थी कि जीवन साथी भी उतना ही समझदार मिल जाए।

अक्सर लोग उन्हें सलाह देते कि किसी गरीब घर के लड़के से शादी करा देना और उसके नाम कुछ सम्पत्ति कर देना तो खुश रखेगा आरती को, पर अंकल आंटी को लगता कि उनकी बेटी सुंदर, सुशिक्षित,संस्कारी है, तो क्यों वो अपनी बेटी के लिए इस तरह का रिश्ता देखें, वो अपनी बराबरी का रिश्ता देख रहे थे।

 और बेटी के मोह में आकर उन्होंने एक ऐसा कदम उठा लिया कि शायद उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए, उन्होंने एक सरकारी नौकरी वाले ऊंचे ओहदे पर कार्यरत एक खूबसूरत और रईस खानदान के लड़के से शादी पक्की कर दी, और बेटी के बारे में वो जानकारी नहीं दी जो सबसे ज़रूरी थी, शादी में फेरे भी नहीं करवाए कि कहीं लड़के वालों को पता ना चल जाए, बारातियों के ईर्द-गिर्द उनके लोग घूम रहे थे कि कोई उनको ना बता दे कि लड़की विकलांग है, शादी भी धूमधाम से हो गई। 

शादी के बाद बिदाई से पहले दोनों को एक कमरे में आराम करने के लिए कहा गया उसके बाद विदाई होती, आरती पहले ही पलंग पर आ कर बैठी थी,पति ने बाद में आकर दरवाज़ा बंद किया और अपनी खूबसूरत बीवी के पास आकर बैठ गया और दोनों में प्यार भरी बातें होने लगी, इतने में लड़के के छोटे भाई ने दरवाजा खटकाते हुए शरारती अंदाज में बोला,

विदाई का वक्त हो गया भैया,अब निकलो भी, सुहागरात यहीं मना लोगे क्या, हंसते हुए आरती के पति ने कहा बाहर मेरा भाई है, मजाक कर रहा है,जाओ दरवाज़ा खोल दो, पर आरती को तो जैसे सांप सूंघ गया हो, वो जड़वत बैठी रही, आरती के पति मुकेश को ये बात थोड़ी अजीब लगी,

उसने कहा क्या हुआ आरती तुम उठ क्यों नहीं रही, आरती रोने लगी, मुकेश घबरा गया, बोला अच्छा मैं दरवाजा खोल देता हूं तुम इतनी सी बात पर रो रही हो, कहकर मुकेश बैड से उतरने लगा तो आरती ने उसका हाथ पकड़ कर रोक लिया और कहा, आप बैठिए,

दरवाज़ा मैं खोलती हूं, उसकी तेज़ होती धड़कन शायद उस वक्त मुकेश को भी साफ सुनाई दे रही थी, पलंग से दरवाज़े तक का सफर जिस तरह आरती ने तय किया, मुकेश स्तब्ध रह गया, उसने अपना सर पकड़ लिया।

दरवाज़ा खुलते ही मुकेश का भाई बड़ी चंचलता से अंदर आकर बोला क्या बात है भाभी इतनी देर क्यों हुई दरवाज़ा खोलने में ,और ठहाके लगाने लगा, पर भैया, भाभी को चुपचाप देख कर वो डर गया बोला अरे क्या हुआ सब ठीक तो है ना, क्या हुआ भैया वो अपने भाई को ज़ोर ज़ोर से हिला रहा था पर मुकेश तो जैसे जड़ हो गया,

आरती ने मयंक की तरफ देखते हुए कहा कि मुझे बचपन में एक बार तेज़ बुखार आ गया और तभी पता चला कि मेरे एक पैर में पोलियो मार गया, मां बाप ने बहुत इलाज कराया पर कुछ असर नहीं हुआ, पर मैं अपने सारे काम खुद करती हूं, उसकी बात काटते हुए मयंक बीच में ही चिल्ला उठा,

क्या इतना बड़ा धोखा, अरे क्या बिगाड़ा था हमारे परिवार ने आपका जो आप लोगों ने हमारे साथ ऐसा किया, चलिए भैया उठिए, इस धोखे की शादी को हम नहीं मानते, अपनी अपाहिज बेटी हमारे पल्ले मड दिया, मुकेश ने ऊंचे स्वर में कहा,चुप हो जाओ मयंक ,क्या अनाप शनाप बक रहे हो,अपनी भाभी से कोई ऐसे बात करता है भला?

ये बात सुनकर मयंक और आरती दोनो ही चौंक गए, रोती हुई आरती विस्मित हो देख रही थी , मयंक ने कहा, आपको क्या हो गया है भैया,इस धोखे बाज को आप मेरी भाभी क्यों बुला रहे हैं, इनपर तो केस करना चाहिए धोखाधड़ी का, मुकेश ने अपने भाई को शांत कराते हुए कहा, अब ये सब हंगामा करके कुछ नहीं होगा भाई, बस जग हंसाई होगी,

जोड़ियां शायद ऊपर से ही बनकर आती हैं, वैसे भी इसका एक पैर ख़राब है, और तो कोई खराबी नहीं, और उसमें भी तुम्हारी भाभी का कोई दोष नहीं,इसको कोसना बंद करो, और बाहर जाकर बोलो विदाई की तैयारी करें, मुकेश ने उठ कर आरती के आंसू पोंछे और कहा माफ़ करना आरती अपने भाई की तरफ से तुमसे मैं माफी मांगता हूं,

तैश में आकर वो ये सबकुछ बोल गया, मैं तुमसे वादा करता हूं, मैं और मेरे घरवाले कभी तुमसे इस विषय को लेकर कुछ नहीं कहेंगे,अब रोना बंद करो,आरती के आंसू रुक ही नहीं रहे थे, आज तक वो अपने भाग्य को कोसती रही, अपनी बहन को देखकर सोचती रही कि वो कितनी किस्मत वाली है, इसमें कोई कमी नहीं है, पर उसे आज पता चला

कि सबसे ज्यादा किस्मत वाली तो वो खुद है,जो उसे इतना अच्छा जीवन साथी मिला, आरती के माता-पिता ने हाथ जोड़कर अपने दामाद से कहा, हमारी बेटी भी दूसरे बच्चों जैसी ही है दामाद जी, ये भी हर तरह से सक्षम है, हमने आपसे ये बात छुपाई इसके लिए अगर हो सके तो हमें माफ़ कर देना, मुकेश ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा मैं आपकी बात समझ रहा हूं,आप चिंता न करें, मैं भी आरती को वैसे ही नाजों से रखूंगा,आपकी तरह।

आज आरती मुंबई के पॉश इलाके अंधेरी में रहती है,दो बेटे हैं उसके, दोनों ही उसका बहुत आदर करते हैं, और पति ने भी अपने वादे के अनुसार कभी उसकी विकलांगता पर प्रश्न नहीं किया, मद्रास में पोलियो के इलाज के लिए ले गया, कुछ और सुधार आया पैर मोड़कर बैठ पा रही थी अब थोड़ी राहत महसूस हुई, आरती एक समझदार कुशल गृहिणी के अलावा एक स्कूल की टीचर भी थी, जहां वो बच्चों को पढ़ाने के साथ साथ उनमें आत्मविश्वास बढ़ाने का भी काम सफलतापूर्वक करती थी,  

कुछ महीनों बाद आरती से मिलना हुआ,वही खूबसूरती वही चमक, कुछ बदला ही नहीं था उसमें, और उनके पति मुकेश से मिलवाते हुए उसने कहा कि ये मेरे चेहरे पर जो चमक तुम्हें दिख रही है ना वो सब इनकी बदौलत है, उसकी आंखों में उस वक्त मुकेश के लिए ढ़ेर सारा प्यार ऩजर आ रहा था। वो मुकेश की तरफ देखते हुए ही बोली, मैं बहुत किस्मत वाली हूं कि मुझे इनका साथ मिला।

सुंदर, सुशील, सुशिक्षित तो थी ही आरती पर आज उसके मुंह से ये सुनना कि मैं बहुत किस्मतवाली  हूं, अच्छा लगा , और अब मुझे भी मुम्बई जैसे शहर में एक प्यारी दोस्त मिल चुकी थी, इस बात की मुझे बहुत खुशी हुई।।

अर्चना झा✍️

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