किस्मत वाली – गरिमा चौधरी 

“दीदी… मैं बिटिया की शादी के बाद ही लौटूंगी।”

मीरा ने चूल्हे पर रखी दाल की आंच धीमी की और रसोई के दरवाज़े पर खड़ी लक्ष्मी की तरफ देखा। लक्ष्मी के शब्द सीधे उसके दिल में उतर गए थे। चेहरे पर थकान थी, मगर आंखों में कुछ ऐसा था—जैसे कोई खुशी और चिंता एक ही साथ पल रही हो।

“ठीक है लक्ष्मी… पहले बैठो। पानी पी लो,” मीरा ने नरमी से कहा।

लक्ष्मी इस घर में पिछले चार सालों से काम कर रही थी। सुबह झाड़ू-पोंछा, बरतन, कपड़े… फिर शाम को दो घंटे फिर से। मीरा के घर की हर चीज़ उसके हाथों से गुजरती थी—फिर भी लक्ष्मी की जिंदगी मीरा के लिए अब तक बस “काम वाली” तक ही सीमित रही थी। मीरा को यह बात आज अचानक खलने लगी थी, जैसे किसी ने आईना रख दिया हो।

मीरा ने धीरे से पूछा, “बिटिया की शादी कब है?”

लक्ष्मी ने अपना पल्लू ठीक किया। “अगले महीने की बारह तारीख… घर में सब लगे हैं, दीदी। पर… पैसा…” कहते-कहते उसकी आवाज़ टूट गई।

मीरा ने देखा—लक्ष्मी की हथेलियों पर पुराने कट के निशान थे। उंगलियों की त्वचा कठोर, नाखून टूटे-फूटे। एक पल में उसे लगा जैसे ये हाथ उसके घर को चमकाते हुए अपनी जिंदगी की चमक खो बैठे हों।

“तुमने बताया क्यों नहीं पहले?” मीरा के मुंह से निकल गया।

लक्ष्मी ने नज़रें झुका लीं। “दीदी… कौन किसको क्या बताता है? आप लोगों को काम चाहिए, हमें रोज़ी। बस… इसी से घर चलता है।”

मीरा कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “तुम्हारी बेटी का नाम क्या है?”

“रानी,” लक्ष्मी के होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान आई, जैसे बेटी का नाम लेते ही मन को थोड़ी राहत मिल गई हो। “बहुत समझदार है दीदी… स्कूल छोड़कर सिलाई सीख रही है। कहती है—‘अम्मा, मैं भी हाथ बंटाऊंगी।’”

मीरा का गला भर आया। वह अपने कमरे में चली गई। अलमारी खोलकर उसने एक लाल बॉक्स निकाला। कुछ महीने पहले उसने एक डिनर सेट ऑनलाइन ऑर्डर किया था—सोचा था घर की नई सेटिंग में रखेगी। बॉक्स अब तक बंद पड़ा था। फिर उसे याद आया—लक्ष्मी की हर महीने की तनख्वाह से वह खुद ही “एडवांस” के नाम पर कुछ पैसे काट लेती थी, ताकि साल के अंत में बोनस जैसा दे सके। मगर सच तो यह था कि लक्ष्मी कभी उस “बोनस” के लिए पूछती ही नहीं थी, और मीरा भी अपनी व्यस्तता में याद नहीं रखती थी।

उसने एक कागज़ पर हिसाब लगाया। काटे गए पैसे, कुछ बचत… और ऊपर से अपना हिस्सा।

मीरा ने एक लिफाफा निकाला, उसमें रकम रखी। फिर अपनी साड़ियों वाली अलमारी से एक गहरी लाल साड़ी निकाली, जो उसने बहुत पसंद से खरीदी थी पर पहनी कभी नहीं। साथ में कुछ जरूरी घरेलू सामान—स्टील के गिलास, एक प्रेशर कुकर की छोटी सीटी, मसाले का एक डिब्बा, और रानी के लिए चांदी की छोटी-सी बिछिया—जो शायद बहुत मामूली थी, मगर प्रतीक की तरह चमकती।

वह सब लेकर मीरा रसोई में लौटी।

“लक्ष्मी… ये पकड़ो।” मीरा ने बॉक्स और लिफाफा उसके हाथ में रख दिया।

लक्ष्मी जैसे पत्थर की हो गई। “दीदी… ये… ये क्या है?”

मीरा ने बहुत साधारण आवाज़ में कहा, “ये रानी की शादी का थोड़ा-सा सामान मेरी तरफ से। और लिफाफे में… कुछ मदद। तुम्हें मना करने का हक है, लेकिन मेरे पास देने का भी हक है। आज से नहीं—चार साल से।”

लक्ष्मी की उंगलियां बॉक्स पर फिसल गईं। वह सिर्फ डिनर सेट नहीं छू रही थी, वह शायद सम्मान छू रही थी—वह भावना, जो उसे सालों से किसी ने दी ही नहीं थी।

“दीदी… ये डिनर सेट…?” उसने गले में अटका शब्द जैसे बाहर निकाला।

मीरा ने मुस्कुरा दिया। “हाँ। तुम्हारी बिटिया के घर में जब मेहमान आएं, तो उसे लगे कि ये भी उसका घर है… कोई उधार की जिंदगी नहीं।”

लक्ष्मी की आंखों में आंसू झिलमिला आए। “दीदी… मैं… मैं क्या कहूं…”

मीरा ने हाथ जोड़कर नहीं, बल्कि हाथ पकड़कर कहा, “बस खुश रहो। और रानी को कहना—अपना आत्मसम्मान कभी मत खोना।”

लक्ष्मी उठी तो उसका शरीर झुक रहा था, मगर चेहरा जैसे पहली बार सीधा हो गया हो। जाते-जाते उसने कहा, “दीदी… मैं ये सब लौटाऊंगी। धीरे-धीरे… मेरी बेटी…”

मीरा ने बात काट दी। “लौटाना नहीं है लक्ष्मी। ये कर्ज़ नहीं, शगुन है।”

लक्ष्मी चली गई। दरवाज़ा बंद हुआ तो मीरा को एक अजीब खालीपन लगा। उसने सोचा—“इतने साल… और मुझे कभी पता ही नहीं चला कि लक्ष्मी के घर में क्या चल रहा है।”

अगली सुबह मीरा ने अपने पति नितिन से बात की। नितिन ऑफिस जाने की जल्दी में था, मगर मीरा ने उसे रोक लिया।

“नितिन… हमें एक बात बदलनी होगी।”

“क्या?” नितिन ने घड़ी देखते हुए पूछा।

“हम जिस घर में रहते हैं, वो सिर्फ हमारा नहीं है। यहां रोज़ जिन लोगों के हाथ लगते हैं, उनकी जिंदगी भी हमारी वजह से चलती है। हम उन्हें सिर्फ ‘काम’ न समझें… इंसान समझें।”

नितिन ने कुछ पल मीरा की आंखों में देखा। शायद उसने पहली बार मीरा के भीतर की बेचैनी महसूस की।

“तुमने लक्ष्मी को कुछ दिया?” उसने पूछा।

“हाँ… रानी की शादी के लिए।”

नितिन ने सांस छोड़ी। “अच्छा किया। और क्या करना चाहती हो?”

मीरा ने कहा, “मैं चाहती हूँ कि हर महीने लक्ष्मी की तनख्वाह के साथ हम उसे एक छोटा-सा ‘शिक्षा फंड’ दें—रानी या उसके छोटे भाई की पढ़ाई के लिए। और उसे ये एहसास न हो कि वो मांग रही है। यह उसका अधिकार लगे।”

नितिन ने सिर हिलाया। “ठीक है। तुम जैसा तय करो।”

मीरा को राहत मिली। मगर कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

कुछ हफ्ते बाद मीरा को एक फोन आया। अनजान नंबर। उधर से एक घबराई हुई आवाज़—“दीदी… मैं रानी बोल रही हूँ… लक्ष्मी की बेटी।”

मीरा चौंकी। “हाँ बेटा, बोलो… सब ठीक है?”

“दीदी… शादी… टूट गई।” रानी का गला भर आया। “लड़के वालों ने कहा—‘दहेज कम है।’ अम्मा चुपचाप बैठी है… कुछ बोल नहीं रही। मैं बस… आपको बताना चाहती थी… क्योंकि जो डिनर सेट आपने दिया… वो… वो मेरे लिए पहली बार था कि किसी ने बिना मांगे कुछ दिया…”

मीरा के हाथ से फोन कसकर पकड़ लिया गया। भीतर से गुस्सा उठा—दहेज के नाम पर आज भी किसी लड़की का जीवन तोड़ देना?

“रानी… सुनो। तुम रो मत,” मीरा ने खुद को संभालते हुए कहा। “मैं अभी आती हूँ। अपने घर का पता भेजो।”

मीरा ने नितिन को सब बताया। नितिन ने बिना एक सवाल किए कार निकाली। दोनों सीधे लक्ष्मी के घर पहुंचे—एक छोटे से कमरे में भीड़, रिश्तेदारों की फुसफुसाहट, और लक्ष्मी का चेहरा जैसे बुझा हुआ दीपक।

मीरा अंदर गई तो लक्ष्मी उठकर खड़ी हो गई। “दीदी… आप क्यों आईं? मेरा तो भाग्य ही खराब है…”

मीरा ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “भाग्य नहीं, लक्ष्मी। समाज की सोच खराब है। और रानी… तुम मेरी तरफ देखो।”

रानी लाल जोड़े में नहीं थी—वह साधारण कपड़ों में थी, पर आंखों में आग और आंसू दोनों थे।

मीरा ने कहा, “ये शादी अगर दहेज के कारण टूट रही है, तो टूट जाने दो। तुम्हारा जीवन किसी कीमत पर नहीं बिकेगा।”

लक्ष्मी के रिश्तेदारों में से एक बोला, “बहन जी, बात आसान है… लड़की बैठ जाएगी…”

मीरा ने शांत मगर ठोस आवाज़ में कहा, “लड़की बैठती नहीं, बैठाई जाती है। आज अगर ये लोग ‘कम’ कहकर छोड़ रहे हैं, कल को और मांगेंगे। और फिर रानी की जिंदगी नर्क होगी।”

नितिन भी आगे आया। “हम मदद करेंगे, लेकिन दहेज के लिए नहीं। रानी की पढ़ाई और उसके पैरों पर खड़े होने के लिए।”

लक्ष्मी रोने लगी। “दीदी… मैं क्या करूं… लोग क्या कहेंगे…”

मीरा ने धीरे से कहा, “लोगों की बातों से घर नहीं चलता, लक्ष्मी। बेटी की सांसों से चलता है।”

उस दिन मीरा ने रानी को अपने साथ बैठाकर बात की। पता चला रानी सिलाई में बहुत अच्छी थी, और डिजाइन भी समझती थी। मीरा ने वहीं तय किया—रानी को एक अच्छे ट्रेनिंग सेंटर में एडमिशन दिलवाएगी। और लक्ष्मी के घर का किराया भी अगले छह महीने मीरा और नितिन संभालेंगे, ताकि लक्ष्मी बिना डर के बेटी के साथ खड़ी रह सके।

रानी ने कांपती आवाज़ में कहा, “दीदी… मैं आपको कभी लौटा नहीं पाऊंगी…”

मीरा ने मुस्कुरा कर कहा, “लौटाना मत। बस जब तुम सक्षम हो जाओ, तब किसी और रानी के लिए यही कर देना।”

समय बीता। रानी का चेहरा बदलने लगा—आंखों में डर कम और आत्मविश्वास ज्यादा। उसने ऑनलाइन ऑर्डर लेना शुरू किया—ब्लाउज, कुर्ती, बच्चों के कपड़े। मीरा ने अपनी सोसाइटी में उसके काम की तारीफ की, धीरे-धीरे ऑर्डर बढ़े। लक्ष्मी के घर में पहली बार महीनों बाद हंसी लौटी।

एक दिन रानी ने मीरा को बुलाया। छोटे से कमरे के कोने में उसने अपने हाथों से सिला हुआ एक लाल दुपट्टा रखा था। “दीदी… ये आपके लिए… पहला दुपट्टा जो मैंने पूरा खुद डिज़ाइन किया है।”

मीरा ने दुपट्टा हाथ में लिया। कपड़ा साधारण था, मगर उसमें मेहनत की खुशबू थी।

लक्ष्मी ने धीमे से कहा, “दीदी… उस दिन आपने जो डिनर सेट दिया था न… वो बस सामान नहीं था। वो… इज्जत थी। उस दिन रानी ने पहली बार कहा था—‘अम्मा, मैं भी किसी से कम नहीं।’”

मीरा की आंखें भीग गईं। उसने महसूस किया—कभी-कभी किसी की जिंदगी में बदलाव लाने के लिए बहुत बड़ा धन नहीं चाहिए होता। बस किसी के कंधे पर रखा एक भरोसे का हाथ चाहिए होता है।

रानी ने मुस्कुराकर कहा, “दीदी… अब मेरी शादी का डर नहीं है। शादी होगी तो ऐसे घर में होगी, जहां मुझे चीजों से नहीं… मेरे हुनर और मेरे मन से पहचाना जाएगा।”

मीरा ने उसके सिर पर हाथ रखा। “बस यही चाहिए था।”

उस शाम घर लौटते हुए मीरा ने नितिन से कहा, “आज समझ आया… खुशियां किसी बड़े फंक्शन से नहीं, किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने से मिलती हैं।”

नितिन ने गाड़ी चलाते हुए कहा, “और कभी-कभी किसी के जीवन का असली दहेज… उसका आत्मसम्मान होता है।”

मीरा खिड़की से बाहर देखती रही। शहर की रोशनी भाग रही थी, मगर उसके अंदर एक ठहराव था—एक नई शुरुआत का।

उसने मन ही मन तय किया—अब वह आसपास के लोगों को “काम” नहीं, “कहानी” समझेगी। क्योंकि हर इंसान के पास एक कहानी होती है, और कभी-कभी हमारी छोटी-सी मदद किसी की कहानी को टूटने से बचा लेती है।

लेखिका : गरिमा चौधरी 

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