किस्मत वाली – दीपा माथुर

वो रिक्शे में बैठी बार बार पीछे मूड मूड कर देख रही थी।

ये वही है ना?

दिमाग उसी में चक्करघिनी सा बन गया।

लगा तो वो ही….

कितना हसमुख  चेहरा था ।

कॉलेज में कितनी ही लड़कियां इसपर मरती थी और मैं भी तो उनमें से एक थी।

रिक्शे वाले भैया से पीछे मोड़ने के लिए कहू ,?

बात तो करूं?

नहीं अब मैं बहुत आगे बढ़ गई पीछे मुड़ना सही नहीं है।

जब उम्र थी तो लड़कियों को खेल समझते थे अब खिलौना बन कर घूम रहे है मन ही मन हंसी भी आई।

ओर फिर मन गुजरे जमाने की सीढ़ियां चढ़ ही गया।

नैन तुम मुझे कॉलेज के गार्डन में मिलना वाट्सअप पर मैसेज छोड़ा था।

पढ़ते ही तो मन की कली कली खिल गई अलमारी से सारे नए नए सूट निकाल लिए।

कौनसा पहनूं?

उसे येलो कलर पसंद है और येलो सूट पहना मैचिंग के इयर रिंग ,गले की माला।

बालों में रबड़।

ओर चेहरे पर सोलह श्रृंगार कर गार्डन पहुंची थी।

अतुल वहां पहले से ही इंतजार कर रहा था।

देखते ही हाथ पकड़ कर बोला , ;”आई एम सारी “

वो मेरे पापा ने मेरी सगाई करने की तिथि तय कर दी।

फिर गर्दन झुका कर बोला ;” मै मम्मी,पापा को बहुत चाहता हु इसीलिए इंकार नहीं कर सका “

नैन का मेकअप तो वही हवा हो गया ।

बिना कुछ बोले वहां से घर आ गई।

मन की स्थिति संभाले नहीं संभल रही थी।

क्या करूं?

क्या ना करूं?

चक्कर से आने लगे तो पापा हॉस्पिटल ले गए।

वहीं मुलाकात हुई थी आस्था से।

ना जाने क्यों सभी पेशेंट को संभालती हंसती मुस्कुराती भोली सी लड़की थी।

कैसी हो?

नैन ने निराशा की लहरों में झोंका खा रही थी।

उसने कहां;” आपके मम्मी ,पापा आपका बहुत ध्यान रखते है

इनका दिल मत दुखाना”

ना जाने आस्था में ऐसा क्या था ;” उसकी हर बात अमृत धारा लग रही थी।”

दो चार दिन में ही आस्था और नैन। की पक्की दोस्ती हो गई।

आस्था ने नैन की तकलीफ पकड़ ली थी।

नैन एक बात कहूं 

अब तुम्हे सिर्फ ओर सिर्फ अपने लिए जीना होगा।

नैन ;” पर….

मै उसे नहीं भूला पाऊंगी ।”

आस्था उसे माफ करके भुला दो अगर उसने अपने मम्मी,पापा की बात मान ली तो बुरा तो नहीं है।

उसकी अपनी मजबूरी थी।”

पर मैं…नैन ने धीरे से बोला।

आस्था ;” तुम ……

मेरी फ्रेंड हो ओर अब मैं जो कहूंगी वहीं करोगी ।

रोज योगा करवाती।

हम डांस करते।।

गाना गाते।

दौड़ लगाते।

महीने भर में मै बदल गई।

ओर फिर से पढ़ाई शुरू की पर अबकी बार मन लगाकर ओर अपने पैरों पर खड़ी हु।

मै किस्मत वाली हु जो मुझे इतनी प्यारी सहेली मिली।कहानी

वही से शुरू होती है जहां दिल टूटता है।

पर मुझे आस्था ने हारने नहीं दिया बल्कि मेरी कमजोरी को ही हथियार बना कर मुझे लड़ना सिखाया।

मैडम आपका घर आ गया।

रिक्शे वाले की आवाज सुन नैन चौक गई और वर्तमान में लौट आई।

रिक्शे वाले को रुपए दे ही रही थी की सुधीर नन्ही परी को गोद में लेकर आ गए।

परी मेरे चिपक गई।

मै सब भूल गई।

पर आस्था की तरह आज भी उन लड़कियों को राह दिखाती हु।

जो जिंदगी से हारने की कगार पर होती है।

दीपा माथुर

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