कमरे में सन्नाटा था, लेकिन सावित्री के मन में शोर गूंज रहा था। आज उसके जीवन का सबसे बड़ा दिन था, और विडंबना देखिए, यही दिन उसके जीवन का सबसे भारी दिन भी साबित हो रहा था। सामने टीवी पर समाचार चल रहा था, जिसमें एक युवा पुलिस अधिकारी को राष्ट्रपति द्वारा वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा था। वह युवा और कोई नहीं, सावित्री का अपना बेटा, विजय था।
विजय की वर्दी पर चमकते मेडल और उसके चेहरे का आत्मविश्वास देख सावित्री की आँखों से आँसू बह निकले। ये खुशी के आँसू थे, या उस गहरे अपराधबोध के जो पिछले पच्चीस वर्षों से उसके सीने में दफ्न था? वह तय नहीं कर पा रही थी।
सावित्री ने टीवी बंद कर दिया और अपनी पुरानी आरामकुर्सी पर सिर टिकाकर बैठ गई। अतीत के काले साये, जिनसे वह जीवन भर भागती रही, आज विजय की इस कामयाबी के साथ फिर से उसके सामने आकर खड़े हो गए थे।
कथा पूरी तरह बदल चुकी थी। न तो वह सुगंधा थी, न उसका पति महेश जैसा कोई साधारण शराबी कारखाने का मजदूर। यह कहानी थी बनारस के घाटों के पीछे छिपी एक पुरानी हवेली की, जहाँ सावित्री ब्याह कर आई थी।
सावित्री का पति, जगन सिंह, शहर का जाना-माना रसूखदार ठेकेदार था। दिन में वह सफेद कुर्ता-पाजामा पहनकर समाज सेवा का ढोंग करता, लेकिन रात के अंधेरे में वह अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह बन जाता था। शराब और जुआ तो उसके लिए बहुत छोटी बातें थीं; उसका असली धंधा था प्राचीन मूर्तियों की तस्करी और सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा।
शुरुआती कुछ साल सावित्री को कुछ समझ नहीं आया। उसे लगा कि उसके पति का गुस्सा और देर रात तक घर से बाहर रहना काम के तनाव का हिस्सा है। लेकिन धीरे-धीरे हवेली की दीवारों ने उसे सच बताना शुरू कर दिया। जगन सिंह उसे मारता नहीं था, कम से कम शारीरिक रूप से तो नहीं। उसका अत्याचार मानसिक था। वह सावित्री को एक सजावटी गुड़िया की तरह रखता था, जिसे न तो बोलने का हक था और न ही सवाल करने का।
जब विजय का जन्म हुआ, तो सावित्री को लगा कि शायद जगन बदल जाएगा। एक पिता का दिल शायद पत्थर के उस इंसान को पिघला दे। लेकिन हुआ इसके बिल्कुल विपरीत। विजय के जन्म ने जगन की महत्त्वाकांक्षाओं को और हवा दे दी।
सावित्री को आज भी वह काली रात याद थी। सावन का महीना था और बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। विजय तब बमुश्किल पाँच साल का था। जगन अपने कुछ साथियों के साथ हवेली के निचले हिस्से में बैठा शराब पी रहा था। उनकी आवाज़ें ऊपर कमरे तक आ रही थीं। सावित्री पानी लेने के लिए सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी कि तभी उसने जो सुना, उससे उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
“ठाकुर साहब, माल बहुत कीमती है। अगर यह डील हो गई तो हम विदेश सेटल हो जाएंगे,” जगन का एक साथी कह रहा था।
जगन ने हँसते हुए जवाब दिया था, “अरे, चिंता मत करो। पुलिस को खबर भी नहीं लगेगी। हम मूर्ति को बच्चे के स्कूल बैग में छिपाकर बॉर्डर पार करवाएंगे। विजय पर किसी को शक नहीं होगा। हम पिकनिक के बहाने निकलेंगे। अगर चेकिंग हुई भी, तो बच्चा ढाल बनेगा।”
सावित्री सीढ़ियों के अंधेरे कोने में जम गई थी। उसका पति न केवल एक तस्कर था, बल्कि अब वह अपने ही मासूम बेटे को अपने गुनाहों का मोहरा बनाने जा रहा था। वह जानती थी कि जगन कितना क्रूर है। अगर पुलिस पकड़ती, तो वह विजय को आगे कर खुद भाग निकलता, या फिर विजय हमेशा के लिए बाल सुधार गृह और बदनामी के दलदल में धंस जाता।
सावित्री उल्टे पाँव कमरे में लौटी। उसने सोए हुए विजय के माथे को चूमा। उसका मासूम चेहरा देख सावित्री के भीतर की ममता एक शेरनी के क्रोध में बदल गई। वह जानती थी कि अगर उसने आज कुछ नहीं किया, तो कल उसका बेटा एक अपराधी का बेटा नहीं, बल्कि एक अपराधी बनकर रह जाएगा। जगन उसे अपने जैसा बना देगा।
उस रात सावित्री ने वह किया जिसकी कल्पना उसने सपने में भी नहीं की थी। उसने जगन के पास जाने का फैसला किया। उसने अपनी साड़ी के पल्लू में रसोई से उठाई हुई एक भारी लोहे की मूसली छिपा ली थी। वह कांप रही थी, लेकिन उसका संकल्प हिमालय की तरह अटल था।
जब वह नीचे पहुंची, तो जगन के साथी जा चुके थे। जगन नशे में धुत्त सोफे पर लेटा हुआ था। सावित्री को देखते ही वह बड़बड़ाया, “तू यहाँ क्या कर रही है? जा ऊपर।”
सावित्री ने उसे पानी का गिलास थमाया, जिसमें उसने नींद की गोलियाँ मिला दी थीं—वही गोलियाँ जो जगन उसे अक्सर जबरदस्ती खिला देता था ताकि वह उसके रात के कारनामों को न देख सके। जगन ने पानी पिया और कुछ ही देर में बेहोश हो गया।
अब सावित्री के सामने दो रास्ते थे। या तो वह विजय को लेकर भाग जाए, लेकिन जगन के आदमी उसे पाताल से भी ढूँढ निकालते। दूसरा रास्ता था—जगन का अंत। लेकिन सावित्री हत्यारा नहीं बनना चाहती थी। तभी उसकी नज़र मेज पर रखे उस पुराने, अवैध पिस्टल पर पड़ी जो जगन हमेशा अपने पास रखता था।
सावित्री ने एक खेल खेला। उसने पुलिस को फोन किया।
“हेलो, पुलिस स्टेशन? शहर के बाहर वाली पुरानी हवेली में जगन सिंह अपने साथियों के साथ छिपा है। उसके पास स्मगलिंग का सामान है। जल्दी आइए, वह भागने की फिराक में है।”
फोन रखकर उसने जगन की पिस्टल उठाई और खिड़की के पास जाकर हवा में दो फायर किए। गोली की आवाज़ गूंज उठी। फिर उसने वह पिस्टल बेहोश जगन के हाथ में थमा दी और उसकी उंगलियों से निशान बना दिए। उसने घर का पिछला दरवाजा खुला छोड़ दिया और खुद विजय को लेकर ऊपरी कमरे में जाकर छिप गई, और जोर-जोर से रोने का नाटक करने लगी।
कुछ ही देर में पुलिस की सायरन सुनाई दी। पुलिस को देखते ही जगन, जो नशे और नींद की हालत में था, हड़बड़ा कर उठा। बाहर पुलिस ने सरेंडर करने को कहा। जगन को कुछ समझ नहीं आया। उसे लगा कि उसके साथियों ने गद्दारी की है। नशे की हालत में, हाथ में पिस्टल लिए वह लड़खड़ाता हुआ बाहर बालकनी में आया। पुलिस को उसके हाथ में हथियार दिखा और उन्होंने गोली चला दी।
जगन सिंह मारा गया।
पुलिस और दुनिया की नज़रों में यह एक एनकाउंटर था। एक अपराधी अपने अंजाम तक पहुँचा था। लेकिन सावित्री जानती थी कि असली ट्रिगर उसने दबाया था। उसने अपने पति की मौत की बिसात बिछाई थी।
उस दिन के बाद, सावित्री ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसने जगन की सारी काली कमाई, जो उसने तहखाने में छिपाई थी, अनाथालयों में दान कर दी। उसने अपनी मेहनत की कमाई से, ट्यूशन पढ़ाकर और सिलाई करके विजय को पाला। उसने विजय को हमेशा बताया कि उसके पिता एक व्यापारी थे जिनकी हत्या डकैतों ने कर दी थी। उसने विजय के मन में अपराध के प्रति घृणा भरी।
आज, पच्चीस साल बाद, विजय उसी पुलिस महकमे का एक जांबाज अफसर था, जिसने उसके पिता को मारा था। विजय ने अपने पिता की “फर्जी शहादत” या “हत्या” का बदला लेने के लिए पुलिस की वर्दी नहीं पहनी थी, बल्कि उसने यह वर्दी इसलिए पहनी थी क्योंकि सावित्री ने उसे सिखाया था कि “अपराध कभी फलता-फूलता नहीं है।”
दरवाजे की घंटी बजी। सावित्री वर्तमान में लौटी। उसने जल्दी से अपने आँसू पोंछे और चेहरे पर मुस्कान सजा ली।
दरवाजा खोला तो विजय खड़ा था, हाथ में मिठाई का डिब्बा और वर्दी पर मेडल।
“माँ!” विजय ने झुककर सावित्री के पैर छुए। “देखो, आज डीजीपी सर ने खुद कहा कि उन्हें मुझ पर गर्व है।”
सावित्री ने बेटे को गले लगा लिया। “मुझे भी तुझ पर गर्व है बेटा। बहुत गर्व है।”
विजय सोफे पर बैठा और पानी पीते हुए बोला, “माँ, आज एक अजीब बात हुई। हमारे रिकॉर्ड रूम में पुराने फाइलों का डिजिटलीकरण हो रहा था। वहाँ मुझे पापा के नाम की एक फाइल मिली।”
सावित्री का दिल धड़कना बंद हो गया। उसका चेहरा सफेद पड़ गया। “क्या? कैसी फाइल?” उसने कांपती आवाज़ में पूछा।
विजय ने मिठाई का टुकड़ा मुँह में डालते हुए कहा, “अरे वही, उनकी मौत वाली फाइल। उसमें लिखा था कि पुलिस को एक गुप्त सूचना मिली थी। किसी महिला ने फोन किया था। पुलिस आज तक नहीं जान पाई कि वह महिला कौन थी। अगर वह फोन न करती, तो शायद पापा उस दिन उस हमले में नहीं, बल्कि तस्करी के झूठे इल्जाम में पकड़े जाते। पुलिस का मानना था कि पापा गलत संगत में थे, लेकिन उस रात वह शायद सरेंडर करना चाहते थे।”
विजय ने हँसते हुए कहा, “अच्छा हुआ न माँ कि मुझे वह सब नहीं देखना पड़ा। जो भी हुआ, कम से कम पापा की छवि मेरी नज़रों में एक पीड़ित की रही, अपराधी की नहीं। उस अज्ञात महिला ने, जिसने भी फोन किया था, अनजाने में ही सही, मेरा भविष्य बचा लिया।”
सावित्री ने कसकर अपनी साड़ी का पल्लू मुट्ठी में भींच लिया। विजय को सच नहीं पता था। उसे लग रहा था कि उसके पिता निर्दोष थे या हालात के मारे थे। वह नहीं जानता था कि उसके सामने बैठी उसकी माँ ही वह ‘मुखबिर’ थी।
“हाँ बेटा,” सावित्री ने भारी आवाज़ में कहा, “ईश्वर जो करता है, अच्छे के लिए करता है।”
विजय ने माँ का हाथ अपने हाथ में लिया। “माँ, तुम क्यों रो रही हो? अब तो सब ठीक है। मैंने कसम खाई है कि अपने इलाके में किसी भी बच्चे का भविष्य अपराध की वजह से खराब नहीं होने दूंगा। किसी भी औरत को वह नहीं सहना पड़ेगा जो तुमने पापा के जाने के बाद सहा।”
सावित्री ने बेटे के सिर पर हाथ फेरा। उसका द्वंद अब शांत हो रहा था। उसने एक ‘पति’ को धोखा दिया था, लेकिन एक ‘बेटे’ को बचा लिया था। उसने एक अपराधी को मरने दिया था, ताकि एक रक्षक का जन्म हो सके।
क्या यह पाप था? शायद।
क्या यह पुण्य था? शायद।
लेकिन जब उसने विजय की आँखों में वह चमक और समाज के प्रति उसकी निष्ठा देखी, तो उसे अपने सवाल का जवाब मिल गया। एक माँ का धर्म, एक पत्नी के धर्म से कहीं बड़ा होता है। उसने उस रात विष पिया था ताकि उसका बेटा अमृत चख सके।
“चल, अब वर्दी उतार और हाथ-मुँह धो ले,” सावित्री ने सामान्य होने का नाटक करते हुए कहा, “मैंने तेरी पसंद की खीर बनाई है।”
विजय खुशी-खुशी अपने कमरे की ओर बढ़ गया। सावित्री वापस अपनी कुर्सी पर बैठ गई। बाहर आसमान साफ हो चुका था। पच्चीस साल पुराना तूफान अब पूरी तरह शांत था। उसने मन ही मन उस अतीत के पन्ने को हमेशा के लिए बंद कर दिया। अब उसे कोई डर नहीं था। उसका बेटा सही रास्ते पर था, और यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।
उसने दीवार पर लगी जगन की धुंधली तस्वीर की ओर देखा और पहली बार, बिना किसी डर के, उसकी आँखों में आँखें डालकर बुदबुदाई, “मैंने जो किया, सही किया।”
लेखिका : आरती शुक्ला