खुद से मुलाकात – उषा भारद्वाज

कितनी अजीब बात है ना…

तुम जब दूर हो रहे थे, तब हम घबरा रहे थे। सब कुछ खाली-खाली सा लग रहा था। कितनी अजीब बात है ना…

घर में सब थे, मगर हम अकेले हो रहे थे। कितनी अजीब बात है ना…

दिल में डर, चिंता, थोड़ा-थोड़ा गुस्सा भी भर रहा था, मगर तुमसे कुछ कह नहीं सकते थे। कितनी अजीब बात है ना…

तमाम प्रश्न—कैसे रहेंगे, क्या करेंगे—जैसे अनेक सवाल डंक मारकर दर्द दे रहे थे। हर मर्ज की दवा होते हुए भी इसकी कोई दवा नहीं मिल रही थी। कितनी अजीब बात है ना…

इतना लिखने के बाद रमन ने एक गहरी साँस ली और डायरी-पेन एक तरफ रखकर खड़ा हुआ। वह बालकनी में आया और ऊपर आसमान को ऐसे देखने लगा, जैसे कोई माँ अपने बच्चे को जी भरकर देखना चाहती है। फिर उसने चारों तरफ नज़र दौड़ाई—हर एक चीज़ को बहुत अपनेपन से, बहुत प्यार से देखा। उसके होठों पर प्यारी-सी मुस्कान आ गई। उस मुस्कान का परिचय देने में समय लग सकता है, बस यूँ समझना कि जैसे एक प्यारी-सी थपकी मिली हो, प्रकृति का कंधा मिला हो और सुकून महसूस हुआ हो।

“ये एहसास भी कितनी अजीब बात है…” रमन के होंठ बुदबुदा उठे।

वो डर, वो चिंता, वो अकेलापन—सब प्रकृति के साथ जैसे खत्म न होते हुए भी खत्म हो गया। अब वे तभी जागते हैं, जब उनसे संबंधित बातें या लोग सामने होते हैं। यादें तो सब हैं, मगर इस खूबसूरत प्रकृति के साथ उनकी भी यकीनन दोस्ती हो गई है, इसलिए वे रुलाती नहीं, परेशान नहीं करतीं। कितनी अजीब बात है ना…

इतना सोचते-सोचते रमन फिर मुस्कुरा दिया। रमन महसूस करने लगा कि पूरे सात साल बाद जैसे वह इन सब से मिला हो। रहता तो इन्हीं सबके बीच था, मगर इन सात सालों में रिया के सिवा किसी और को महसूस ही नहीं कर पाया। पूरी दुनिया उसी से शुरू होकर उसी पर खत्म हो गई थी। वह उसके साथ बहुत खुश था, मगर अचानक सब बिगड़ गया।

रिया बाहर पढ़ने गई तो वहीं की होकर रह गई। कभी-कभी कॉल पर बात, कुछ मैसेज—बस वहीं तक साथ सिमट गया। और फिर एक दिन एक कॉल आई और सब खत्म…

जब रिया ने कहा—

“रमन, तुम उसी जगह रुक गए हो, लेकिन मैं आगे बढ़ना चाहती हूँ… और बढ़ भी गई हूँ। प्लीज़ मुझे माफ करना। मुझे लगता है कि हमारा साथ यहीं तक था। तुम अपनी ज़िंदगी अपनी तरह से जियो, मेरी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं।”

यह सुनकर रमन के होंठ मानो आपस में चिपक गए थे। कोई शब्द नहीं, कोई आवाज़ नहीं। रिया के व्यवहार ने उसे यह बात पहले ही समझा दी थी, मगर वह अपना भ्रम समझकर चुप था। लेकिन आज सब साफ हो गया। क्या कहता वह? अपने बूढ़े माँ-बाप को छोड़कर कहीं दूर नहीं जा सकता था। उसने बहुत ही संयम से अपने प्यार की हार स्वीकार कर ली। कुछ नहीं बोला और बिना कुछ सुने कॉल काट दी।

लेकिन रमन रिया को भूल नहीं पा रहा था।

एक दिन वह माँ की गोद में सिर रखकर लेट गया। माँ अपने बच्चे के दिल का हाल बिना कहे समझ जाती है। उन्होंने कहा—

“बेटा, कितना समय हो गया, तुम्हारी हँसी की आवाज़ नहीं सुनी। कुछ परेशान हो क्या?”

रमन ने अपना मुँह उनकी तरफ करते हुए कहा—

“नहीं माँ, ऐसा कुछ नहीं…”

“अच्छा? तो फिर कब से तुमने खुला आसमान नहीं देखा? जाओ, बालकनी में देखो—कितने फूल खिले हैं। एक चिड़िया भी सुबह से चहचहा रही है। कहीं उसे भी कोई परेशानी तो नहीं…”

माँ की बात सुनकर रमन बेमन से मुस्कुराते हुए उठकर बालकनी में गया। उसने माँ की बातों को ध्यान में रखकर सब देखा—चिड़िया को सुना, समझा… और तभी उसने एक अजीब-सा एहसास महसूस किया।

उसे लगा जैसे वह पहली बार सब से मिल रहा है। अभी तक जैसे किसी अंधेरे में फँसा हुआ था, जहाँ कुछ दिखाई नहीं देता था।

“ओह… ये सब मैं क्यों भूल गया? कितना सुंदर है सब…”

और उसके हाथ अपने आप नमस्कार के लिए जुड़ गए—जो भगवान के लिए था।

वह दौड़कर अंदर आया और माँ से लिपटकर हँस पड़ा। माँ भी बिना कुछ पूछे खुश हो गई।

स्वरचित- उषा भारद्वाज

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