*दुनिया की हर माँ अपने बेटे की ढाल बनती है, लेकिन वो माँ विरली ही होती है जो अपनी बहू के आत्मसम्मान के लिए अपने ही बेटे के खिलाफ तलवार बन जाए।*
सावित्री जी उठीं और मेघा के पास जाकर खड़ी हो गईं। उन्होंने मेघा का हाथ अपने हाथ में लिया। वह हाथ कांप रहा था।
“सुमित, पिछले तीन सालों से मैं देख रही हूँ। तू इस लड़की को तोड़ रहा है। पहले इसकी नौकरी छुड़वाई, फिर इसकी हँसी छीनी, और अब इसकी बची-खुची पहचान भी मिटाना चाहता है। मुझे लगा था वक्त के साथ तू सुधर जाएगा, जिम्मेदार बनेगा। लेकिन नहीं, तू तो अपने पिता का भी अपमान कर रहा है जिन्होंने हमेशा औरतों की इज़्ज़त करना सिखाया था।”
रसोई में बर्तनों की खनखनाहट के बीच मेघा अपनी सिसकियों को दबाने की पूरी कोशिश कर रही थी। आँखों का काजल बहकर गालों पर आ गया था, जिसे उसने अपने पल्लू से कसकर पोंछ लिया। बाहर हॉल में उसके पति, सुमित की चिल्लाने की आवाज़ अभी भी गूँज रही थी।
“तुम्हें समझ नहीं आता? मेरे दोस्तों के सामने मुझे नीचा दिखाना तुम्हारी आदत बन गई है। बस एक साधारण सी बात पूछी थी उन्होंने कि तुम करती क्या हो? तो ‘हाउसवाइफ’ बोलकर चुप नहीं रह सकती थी? यह बताना ज़रूरी था कि तुम पहले आर्किटेक्ट थीं और गोल्ड मेडलिस्ट रह चुकी हो? क्या साबित करना चाहती हो? कि मैंने तुम्हारी ज़िंदगी बर्बाद कर दी?”
मेघा के हाथ कांप रहे थे। उसने गैस बंद की और दीवार के सहारे खड़ी हो गई। यह कोई नई बात नहीं थी। शादी के पाँच साल हो चुके थे, और पिछले तीन सालों से सुमित का व्यवहार बदल चुका था। शुरुआत में जो प्यार और अपनापन था, वह अब सुमित के अहंकार और हीनता की भावना (Insecurity) के नीचे दब गया था। मेघा, जो कभी शहर की जानी-मानी आर्किटेक्चर फर्म में काम करती थी, अब घर की चारदीवारी में कैद होकर रह गई थी। सुमित को यह बर्दाश्त नहीं था कि उसकी पत्नी उससे ज़्यादा कमाती है या उससे ज़्यादा नाम कमा रही है। धीरे-धीरे, तानों और झगड़ों से तंग आकर मेघा ने अपनी नौकरी छोड़ दी थी, यह सोचकर कि शायद इससे घर में शांति आ जाएगी। लेकिन शांति तो दूर, उसका आत्मसम्मान भी रोज थोड़ा-थोड़ा करके मरने लगा था।
तभी रसोई के दरवाजे पर किसी की परछाई दिखाई दी। मेघा ने जल्दी से अपना चेहरा ठीक किया और पलटी। सामने उसकी सासू माँ, सावित्री देवी खड़ी थीं। सावित्री जी का चेहरा हमेशा की तरह शांत और गंभीर था। उन्होंने अपने सफेद बालों को एक सलीके से जुड़े में बांध रखा था। घर में उनकी छवि एक सख्त अनुशासन वाली महिला की थी। मेघा हमेशा उनसे थोड़ा डरती थी। उसे लगता था कि सावित्री जी भी सुमित की तरह यही सोचती हैं कि औरत का असली धर्म घर संभालना है।
“खाना लग गया?” सावित्री जी ने अपनी भारी आवाज़ में पूछा।
“जी माँजी… बस अभी ला रही हूँ,” मेघा ने नज़रें झुकाकर कहा।
सावित्री जी ने मेघा के सूजे हुए चेहरे को गौर से देखा, लेकिन कुछ बोली नहीं। बस एक गहरी साँस लेकर डाइनिंग टेबल की तरफ बढ़ गईं।
रात को खाने की मेज पर सन्नाटा था। सुमित गुस्से में चम्मच प्लेट पर पटकते हुए खाना खा रहा था। मेघा चुपचाप रोटियाँ परोस रही थी।
अचानक सुमित बोला, “माँ, मैंने फैसला किया है। हम अगले महीने नैनीताल शिफ्ट हो रहे हैं। मेरा ट्रांसफर हो रहा है।”
मेघा के हाथ ठिठक गए। “लेकिन सुमित… यहाँ पापाजी की यादें हैं, माँजी का पूरा सर्कल है, और… मैंने सोचा था कि मैं दोबारा फ्रीलांस काम शुरू करूँगी यहाँ…”
“फिर शुरू हो गई तुम?” सुमित ने मेघा की बात काटते हुए मेज पर हाथ मारा। “मेरा करियर ज़रूरी है या तुम्हारा वो छोटा-मोटा काम? और माँ मेरे साथ रहेंगी, उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। तुम बस अपना सामान पैक करो और फालतू की बहस मत करो।”
मेघा की आँखों में फिर से आँसू तैरने लगे। वह बिना खाए अपने कमरे में जाने लगी। तभी सावित्री जी की आवाज़ गूँजी।
“रुको मेघा।”
मेघा रुक गई। सुमित ने भी माँ की तरफ देखा।
सावित्री जी ने अपनी प्लेट से नज़र हटाकर सुमित की आँखों में देखा। “सुमित, तूने मुझसे पूछा कि मैं नैनीताल जाना चाहती हूँ या नहीं?”
सुमित थोड़ा सकपकाया। “माँ, आप तो मेरे साथ ही रहोगी ना? पापा के जाने के बाद मैं ही तो आपका बेटा हूँ, सहारा हूँ।”
“सहारा?” सावित्री जी ने एक व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा। “बेटा, सहारा वो होता है जो गिरते हुए को थाम ले, न कि वो जो साथ चलने वालों को ही गिरा दे।”
सुमित हैरान रह गया। “आप क्या कह रही हैं माँ?”
सावित्री जी उठीं और मेघा के पास जाकर खड़ी हो गईं। उन्होंने मेघा का हाथ अपने हाथ में लिया। वह हाथ कांप रहा था।
“सुमित, पिछले तीन सालों से मैं देख रही हूँ। तू इस लड़की को तोड़ रहा है। पहले इसकी नौकरी छुड़वाई, फिर इसकी हँसी छीनी, और अब इसकी बची-खुची पहचान भी मिटाना चाहता है। मुझे लगा था वक्त के साथ तू सुधर जाएगा, जिम्मेदार बनेगा। लेकिन नहीं, तू तो अपने पिता का भी अपमान कर रहा है जिन्होंने हमेशा औरतों की इज़्ज़त करना सिखाया था।”
“माँ, यह हमारे पति-पत्नी के बीच की बात है,” सुमित ने गुस्से में कहा। “आप बीच में मत बोलिए।”
“बीच में नहीं बोल रही, फैसला सुना रही हूँ,” सावित्री जी की आवाज़ में अब कड़कपन था। “यह घर मेरे पति ने बनाया था और वसीयत में मेरे नाम कर गए हैं। जब तक मैं ज़िंदा हूँ, इस घर के फैसले मैं लूँगी।”
उन्होंने अपनी अलमारी से एक फाइल निकाली और मेज पर रख दी।
“यह मेघा का पोर्टफोलियो है। पिछले हफ्ते जब तुम सो रहे थे, मैंने इसे देखा। इसने छुप-छुपकर कुछ डिज़ाइन्स बनाए हैं। सुमित, तुझमें इतनी काबिलियत नहीं है कि तू इसकी बराबरी कर सके, इसलिए तू इसे दबा रहा है। और मैं… मैं एक और सावित्री नहीं बनने दूँगी।”
मेघा सन्न रह गई। उसे पता भी नहीं था कि माँजी को उसके स्केचेस के बारे में पता है।
सावित्री जी ने आगे कहा, “सुमित, अगर तुझे नैनीताल जाना है, तो शौक से जा। तेरा ट्रांसफर हुआ है, हमारा नहीं। मेघा कहीं नहीं जाएगी। यह यहीं रहेगी, इसी घर में, और अपनी आर्किटेक्ट की फर्म दोबारा शुरू करेगी।”
सुमित का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। “माँ! आप होश में तो हैं? आप अपने सगे बेटे को छोड़कर इस… इस पराई औरत का साथ दे रही हैं? समाज क्या कहेगा? कि माँ ने बेटे का घर तोड़ दिया?”
“समाज?” सावित्री जी हँसीं, लेकिन उस हँसी में दर्द था। “समाज ने तब कुछ नहीं कहा जब तूने इसकी नौकरी छुड़वाई? समाज तब अंधा था जब यह रात-रात भर बाथरूम में रोती थी? सुमित, खून का रिश्ता सिर्फ शरीर का होता है, लेकिन आत्मा का रिश्ता सम्मान का होता है। तूने मेरा बेटा होने का हक़ तो शायद पा लिया, लेकिन एक अच्छा इंसान होने का हक़ खो दिया है। और रही बात घर तोड़ने की… तो घर ईंटों से नहीं, सुकून से बनता है। जिस घर में बहू की आँखों में हर वक्त डर हो, वो घर नहीं, जेल होता है। और आज मैं अपनी बहू को इस जेल से रिहा करती हूँ।”
सुमित ने गुस्से में कुर्सी गिरा दी। “ठीक है! अगर आपको इस दो कौड़ी की इज़्ज़त इतनी प्यारी है, तो रहिए इसके साथ। लेकिन याद रखना माँ, जब बुढ़ापे में यह आपको पानी भी नहीं पूछेगी, तब मेरे पास रोते हुए मत आना।”
सुमित पैर पटकता हुआ अपने कमरे में गया, अपना बैग पैक किया और उसी रात घर छोड़कर निकल गया।
दरवाजा बंद होने की आवाज़ के साथ ही मेघा के सब्र का बांध टूट गया। वह ज़मीन पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगी।
“माँजी… यह आपने क्या किया? आपकी वजह से आपका बेटा चला गया। लोग आपको ताने देंगे। मैं… मैं ही चली जाती…”
सावित्री जी ने झुककर मेघा को कंधों से पकड़ा और उठाया। उनकी आँखों में भी नमी थी, लेकिन चेहरा दृढ़ था।
“पगली लड़की! बेटा गया है, मेरा स्वाभिमान नहीं। और सुन, तू मेरी बहू नहीं है। जिस दिन तेरे ससुरजी तुझे इस घर में लाए थे, उन्होंने कहा था कि बेटी आई है। तब मैं समझ नहीं पाई थी, लेकिन आज समझ रही हूँ। अगर आज मैं चुप रह जाती, तो शायद मैं एक अच्छी माँ कहला सकती थी, लेकिन एक अच्छी औरत कभी नहीं बन पाती।”
सावित्री जी ने मेघा के आँसू पोंछे। “कल सुबह तैयार हो जाना। मैंने मेरे पुराने वकील साहब से बात की है। हम अपनी नई फर्म का रजिस्ट्रेशन करवाने जा रहे हैं। नाम सोचा है मैंने—’सावित्री एंड मेघा एसोसिएट्स’।”
मेघा ने अविश्वास से अपनी सास को देखा। वह महिला, जिसे वह कल तक रूढ़िवादी और सख्त समझती थी, आज उसके लिए पूरी दुनिया से लड़ गई थी।
“लेकिन माँजी… लोग…”
“लोगों का काम है कहना,” सावित्री जी ने मुस्कुराते हुए कहा। “जब तू आसमान छुएगी, तो यही लोग तालियाँ बजाएंगे। और अगर नहीं भी बजाएं, तो क्या फर्क पड़ता है? हम दोनों एक-दूसरे के लिए काफी हैं। अब चल, खाना ठंडा हो रहा है। कल से नई जंग लड़नी है, ताकत चाहिए होगी।”
अगले दिन सुबह, मोहल्ले में खुसुर-पुसुर शुरू हो गई।
“अरे सुना? सावित्री जी ने अपने ही बेटे को घर से निकाल दिया।”
“बहू ने जादू टोना कर दिया होगा।”
“कलयुग है भाई, कलयुग। अपना खून पराया हो गया।”
लेकिन सावित्री जी और मेघा ने किसी की तरफ नहीं देखा। दोनों सिर उठाए, हाथों में फाइलें लिए, अपनी कार में बैठकर निकल गईं।
वक्त का पहिया घूमा।
दो साल बाद, शहर के सबसे बड़े ‘ग्रीन बिल्डिंग प्रोजेक्ट’ का उद्घाटन था। मंच पर मेघा माइक थामे खड़ी थी। उसे ‘बेस्ट आर्किटेक्ट ऑफ द ईयर’ का अवार्ड मिल रहा था। सामने दर्शकों की भीड़ में सावित्री जी पहली पंक्ति में बैठी थीं। उनके चेहरे पर वही गंभीरता थी, लेकिन आँखों में गर्व के दीप जल रहे थे।
मेघा ने माइक पर कहा, “अक्सर लोग कहते हैं कि एक औरत ही औरत की दुश्मन होती है। सास कभी माँ नहीं बन सकती। लेकिन मेरी कहानी अलग है। जब मेरी खुद की हिम्मत जवाब दे गई थी, तब मेरी सासू माँ ने मेरी रीढ़ बनकर मुझे सीधा खड़ा किया। उन्होंने मुझे सिखाया कि गलत को सहना, गलत करने से भी बड़ा पाप है। यह अवार्ड मेरी मेहनत का नहीं, उस ‘माँ’ के विश्वास का है जिन्होंने समाज की परवाह किए बिना अपनी बहू को ‘इंसान’ समझा।”
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा। सावित्री जी की आँखों से एक आँसू छलक कर गाल पर आ गिरा।
कार्यक्रम के बाद, पार्किंग में एक थका-हारा शख्स खड़ा था। वह सुमित था। पिछले दो सालों में उसकी नौकरी में कई उतार-चढ़ाव आए थे, और अकेलेपन ने उसे तोड़ दिया था। उसने दूर से अपनी माँ और पत्नी को मीडिया से घिरे देखा। वह आगे बढ़ना चाहता था, माफ़ी मांगना चाहता था, लेकिन उसके पैर नहीं उठे। उसे सावित्री जी की वह बात याद आ गई—*”सहारा वो होता है जो गिरते हुए को थाम ले, न कि वो जो साथ चलने वालों को ही गिरा दे।”* उसे एहसास हुआ कि उसने अपना सहारा बहुत पहले खो दिया था।
मेघा और सावित्री जी अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ीं। मेघा ने सुमित को दूर खड़े देख लिया। उसने सावित्री जी का हाथ दबाया और इशारे से दिखाया।
सावित्री जी ने एक पल के लिए बेटे को देखा। उस नज़र में अब गुस्सा नहीं था, बस एक खालीपन था। उन्होंने मेघा से कहा, “चलो बेटा, देर हो रही है। कल नई साइट विजिट पर जाना है।”
गाड़ी आगे बढ़ गई। सुमित पीछे धूल में खड़ा रह गया। उसने समझ लिया था कि रिश्तों की डोर जब एक बार आत्मसम्मान की कैंची से कट जाती है, तो उसे दोबारा जोड़ना नामुमकिन होता है।
उस रात मेघा ने अपनी डायरी में लिखा:
*”दुनिया कहती है कि शादी के बाद लड़की का मायका छूट जाता है। लेकिन किस्मत वाली होती हैं वो लड़कियाँ, जिन्हें ससुराल में एक ऐसी माँ मिलती है, जो उन्हें मायके की याद तो नहीं भुलाती, लेकिन ससुराल को ही जन्नत बना देती है। मेरी सासू माँ ने मुझे सिर्फ पनाह नहीं दी, उन्होंने मुझे पंख दिए।”*
यह कहानी सिर्फ मेघा की जीत की नहीं थी, यह सावित्री देवी के उस साहस की कहानी थी, जिसने सदियों पुरानी इस सोच को तोड़ दिया था कि ‘बेटे चाहे जो करें, माताओं को हमेशा उनके पापों पर पर्दा डालना चाहिए’। उन्होंने साबित कर दिया था कि न्याय का कोई जेंडर नहीं होता, और ममता का मतलब अंधा प्रेम नहीं, बल्कि सही राह दिखाना होता है।
**क्या सावित्री जी ने सुमित को घर से निकालकर सही किया? या उन्हें उसे एक और मौका देना चाहिए था?**
यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन क्या एक औरत का स्वाभिमान, ‘बेटे के मोह’ से बड़ा नहीं होना चाहिए?
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मूल लेखिका : करुणा मलिक