“अरे ओ महारानी! अभी तक बिस्तर में ही है? सूरज सिर पर आ गया है और इसे देखो, कुंभकरण की औलाद अभी तक सो रही है।”
बगल के कमरे से मामीजी की तीखी आवाज़ ने मीरा की नींद को एक झटके में तोड़ दिया। मीरा हड़बड़ा कर उठी। उसने जल्दी से अपनी पुरानी शॉल लपेटी और कमरे से बाहर निकली। फर्श इतना ठंडा था कि पैर रखते ही शरीर में सिहरन दौड़ गई।
यह घर बनारस की एक पुरानी गली में स्थित था। बाहर से देखने में यह मकान जितना भव्य लगता था, मीरा के लिए अंदर की दुनिया उतनी ही घुटन भरी थी।
उसके माता-पिता का देहांत तीन साल पहले एक कार दुर्घटना में हो गया था। तब से वह अपने मामा ‘सतीश’ और मामी ‘रंजना’ के साथ रह रही थी। मामाजी शहर के एक प्रतिष्ठित कपड़ा व्यापारी थे, लेकिन घर की सत्ता पूरी तरह से रंजना मामी के हाथ में थी।
मीरा रसोई में गई और चाय का पानी चढ़ाया। उसकी कलाई में कल रात की थकान अब भी महसूस हो रही थी। रात के दो बजे तक उसने मामी की बुटीक के लिए साड़ियों पर ‘पिको’ और ‘फॉल’ लगाने का काम किया था। रंजना मामी घर के निचले हिस्से में एक छोटा सा बुटीक चलाती थीं,
जिसका नाम था ‘रंजना क्रिएशन्स’। नाम मामी का था, लेकिन उस बुटीक की रीढ़ मीरा थी। डिजाइनिंग से लेकर सिलाई तक, सारा बारीक काम मीरा करती थी, और गल्ले पर बैठकर पैसे गिनने का काम मामी का था।
कुकर की सीटी बजी और साथ ही मामीजी रसोई में आ धमकीं। उनके चेहरे पर हमेशा की तरह एक असंतोष का भाव था।
“देख क्या रही है? आलू के पराठे बना। और सुन, आज पिंकी के लिए लंच में पास्ता भी बना देना, उसे कॉलेज जाना है,” मामी ने आदेश दिया।
पिंकी, मीरा की ममेरी बहन, उम्र में मीरा से बस एक साल छोटी थी, लेकिन दोनों की किस्मत में ज़मीन-आसमान का फर्क था। पिंकी शहर के सबसे महंगे कॉलेज में फैशन डिजाइनिंग कर रही थी, और मीरा, जिसके हाथों में हुनर का जादू था, वह घर की चारदीवारी में कैद एक बिन पैसे की नौकरानी बनकर रह गई थी। मीरा ने भी बारहवीं पास की थी और उसके नंबर पिंकी से कहीं ज़्यादा थे, लेकिन मामी ने यह कहकर उसकी पढ़ाई छुड़वा दी थी कि “लड़की को ज़्यादा पढ़ाकर क्या करना, पराया धन है, घर का काम सीखेगी तो ससुराल में नाक नहीं कटाएगी।”
मीरा चुपचाप आटा गूंथने लगी। उसे आदत हो गई थी। वह जानती थी कि बहस करने का मतलब है मामाजी की बेबसी और अपनी जलालत को बढ़ाना। सतीश मामा बुरे आदमी नहीं थे, लेकिन वे अपनी पत्नी के सामने भीगी बिल्ली बन जाते थे। कभी-कभी दबे छिपे मीरा को सौ-दो सौ रुपये दे देते थे, जिसे मीरा अपनी किताबों के बीच छिपाकर रखती थी।
दोपहर का समय था। मीरा बुटीक में बैठी एक भारी लहंगे पर जरदोजी का काम कर रही थी। यह लहंगा शहर की मेयर की बेटी की शादी के लिए तैयार हो रहा था। यह आर्डर मामी के लिए बहुत बड़ा था। अगर यह काम पसंद आ गया, तो उन्हें और भी बड़े कॉन्ट्रैक्ट मिल सकते थे।
तभी पिंकी कॉलेज से लौटी, हाथ में अपना डिज़ाइन फाइल लिए। वह गुस्से में थी। उसने बैग सोफे पर पटका और चिल्लाई, “मम्मी! मुझे यह कॉलेज छोड़ना है। मुझसे नहीं बनते ये स्केच। आज फिर प्रोफेसर ने पूरी क्लास के सामने मेरी बेइज्जती की। उन्होंने कहा कि मेरे डिज़ाइन में कोई ‘सोल’ (आत्मा) नहीं है।”
रंजना मामी ने बेटी को पानी दिया और पुचकारते हुए बोली, “अरे छोड़ न बेटा, वो प्रोफेसर ही सठिया गया होगा। तू चिंता मत कर, मैं बात करूँगी।”
“बात करने से क्या होगा मम्मी? फाइनल प्रोजेक्ट जमा करना है अगले हफ्ते। थीम है ‘बनारसी विरासत’। अगर मैं फेल हो गई तो पापा क्या कहेंगे? और मेरी फ्रेंड्स क्या सोचेंगी?” पिंकी रोने लगी।
मीरा कोने में बैठी सब सुन रही थी। उसका मन हुआ कि कहे कि वह मदद कर सकती है, लेकिन वह चुप रही।
शाम को जब मामी बाज़ार गई हुई थीं, पिंकी अपने कमरे में सिर पकड़कर बैठी थी। मीरा उसके लिए कॉफी लेकर गई।
“पिंकी,” मीरा ने झिझकते हुए कहा, “अगर तुम बुरा न मानो तो क्या मैं तुम्हारी फाइल देख सकती हूँ?”
पिंकी ने चिढ़कर मीरा को देखा। “तू क्या देखेगी? तू तो बस सिलाई जानती है, ये फैशन डिज़ाइनिंग है, कोई पोंछा लगाना नहीं।”
मीरा को बुरा लगा, पर उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने टेबल पर पड़ी एक रद्दी पेंसिल उठाई और पास पड़े अख़बार के टुकड़े पर कुछ लकीरें खींचने लगी। दो मिनट के अंदर, उसने एक साड़ी का ऐसा डिज़ाइन बनाया जो पारंपरिक होते हुए भी आधुनिक था। उसने बनारसी घाटों की आकृतियों को पल्लू में उकेरा था।
पिंकी की नज़र उस अख़बार के टुकड़े पर पड़ी। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
“ये… ये तूने बनाया?” पिंकी ने अविश्वास से पूछा।
“हाँ,” मीरा ने धीरे से कहा। “मुझे लगता है अगर तुम ‘घाट’ और ‘गंगा’ की थीम को कपड़ों पर उतारो, तो प्रोफेसर को पसंद आएगा।”
पिंकी का अहंकार उसकी ज़रूरत के आगे छोटा पड़ गया। उसने मीरा का हाथ पकड़ लिया। “मीरा दीदी… प्लीज, मेरा प्रोजेक्ट बना दो ना। मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी। प्लीज, मेरी इज़्ज़त का सवाल है।”
मीरा के लिए ‘दीदी’ शब्द सुनना किसी चमत्कार से कम नहीं था। पिंकी ने पहली बार उसे इज़्ज़त से बुलाया था। मीरा का कलाकार मन पिघल गया। उसने हामी भर दी।
अगले पांच रातें मीरा के लिए बहुत भारी थीं। दिन में घर का काम, बुटीक का काम और रात में पिंकी का प्रोजेक्ट। मीरा अपनी नींद और भूख भूल गई। उसने पुराने बनारसी कपड़ों के कतरनों को जोड़कर एक अद्भुत ड्रेस तैयार की। उसने फाइल में स्केच बनाए और साथ में एक ‘डमी’ मॉडल भी तैयार किया।
प्रोजेक्ट जमा करने के दिन पिंकी बहुत खुश थी। वह प्रोजेक्ट लेकर चली गई।
शाम को घर में जश्न का माहौल था। पिंकी दौड़ती हुई आई और बोली, “मम्मी! पापा! मुझे ‘बेस्ट डिज़ाइन’ का अवार्ड मिला है। प्रोफेसर ने कहा कि ऐसा काम उन्होंने सालों में नहीं देखा। कॉलेज की डीन ने कहा है कि वो इस डिज़ाइन को नेशनल एग्जीबिशन में भेजेंगे।”
रंजना मामी फूलकर कुप्पा हो गई थीं। “देखा! आखिर बेटी किसकी है। खून में ही कला है,” उन्होंने गर्व से कहा।
सतीश मामा भी खुश थे। उन्होंने पिंकी को गले लगा लिया। मीरा रसोई के दरवाज़े पर खड़ी यह सब देख रही थी। उसे उम्मीद थी कि शायद पिंकी उसका नाम लेगी, शायद कहेगी कि यह मेहनत मीरा की है। लेकिन पिंकी ने सारी तारीफें खुद बटोर लीं। मीरा की आँखों में आंसू आ गए, पर उसने पल्लू से पोंछ लिए और सबके लिए मिठाई लेने चली गई।
कहानी में मोड़ तब आया जब तीन दिन बाद कॉलेज की डीन, मिसेज सुहासिनी, अचानक रंजना मामी के घर आ पहुँचीं। उनके साथ एक और महिला थी, जो देश की नामी फैशन डिज़ाइनर थीं।
घर में हड़कंप मच गया। रंजना मामी ने मीरा को आवाज़ दी, “अरी मीरा! जल्दी से नाश्ता ला, और ड्राइंग रूम साफ़ कर। देख कौन आया है।”
मिसेज सुहासिनी ने सोफे पर बैठते हुए कहा, “मिसेज रंजना, आपकी बेटी पिंकी ने कमाल कर दिया है। हम चाहते हैं कि पिंकी हमारे सामने एक लाइव स्केच बनाकर दिखाए। दरअसल, यह मैडम (डिज़ाइनर) पिंकी को अपनी मेंटरशिप में लेना चाहती हैं, लेकिन इनका नियम है कि ये पहले कलाकार को काम करते हुए देखती हैं।”
पिंकी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। रंजना मामी के हाथ से पानी का गिलास छलक गया।
“अ… अभी?” मामी हकलायीं। “वो… पिंकी की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है आज।”
“अरे बस दस मिनट का काम है। एक छोटा सा मोटिफ ही बना दे,” डिज़ाइनर मैडम ने आग्रह किया।
पिंकी के हाथ-पांव ठंडे पड़ गए थे। उसे पेंसिल पकड़ना तक नहीं आता था ठीक से, स्केचिंग तो दूर की बात थी। वह कांपने लगी और अचानक रो पड़ी।
“मम्मी… मुझसे नहीं होगा…”
माहौल तनावपूर्ण हो गया। मिसेज सुहासिनी को शक होने लगा। “क्या मतलब नहीं होगा? पिंकी, वो प्रोजेक्ट तुमने ही बनाया है न?”
रंजना मामी स्थिति संभालने के लिए झूठ बोलने ही वाली थीं कि मीरा ट्रे लेकर कमरे में दाखिल हुई। उसने मेहमानों को पानी दिया।
डिज़ाइनर मैडम की नज़र मीरा के हाथ पर पड़ी। मीरा के अंगूठे और तर्जनी पर सुई के गहरे निशान थे और उसकी कलाई पर नीले रंग का धब्बा लगा था—वही नीला रंग जो पिंकी के प्रोजेक्ट की ड्रेस में इस्तेमाल हुआ था।
डिज़ाइनर मैडम ने मीरा का हाथ पकड़ लिया। “रुको बेटा।”
उन्होंने मीरा की उंगलियों को ध्यान से देखा। फिर उन्होंने रंजना मामी की ओर मुड़कर कड़े स्वर में पूछा, “सच-सच बताइये, वो प्रोजेक्ट किसने बनाया था?”
कमरे में सन्नाटा छा गया। पिंकी सुबक रही थी। मामी चुप थीं।
सतीश मामा, जो अब तक खामोश दर्शक थे, अचानक बोल पड़े। शायद पाप का घड़ा भर चुका था।
“मीरा ने। वो प्रोजेक्ट मेरी भांजी मीरा ने बनाया था।”
“क्या कह रहे हैं आप?” मामी ने पति को घूरा।
“चुप रहो रंजना!” सतीश मामा पहली बार चिल्लाए। “बहुत हो गया। हम इस अनाथ बच्ची का और कितना शोषण करेंगे? मेरी बहन की रूह मुझे माफ़ नहीं करेगी। ये बच्ची रातों-रात जागकर मेहनत करती है और श्रेय हम अपनी नालायक बेटी को देते हैं?”
सतीश मामा ने मीरा को आगे किया। “मैडम, ये मेरी भांजी है। घर का सारा काम भी यही करती है और मेरी पत्नी की बुटीक भी असल में यही चलाती है। पिंकी का प्रोजेक्ट इसी ने बनाया था।”
मिसेज सुहासिनी ने पिंकी की ओर देखा। पिंकी ने शर्म से सिर झुका लिया। “सॉरी मैम… वो मीरा दीदी ने ही बनाया था।”
डिज़ाइनर मैडम ने मीरा को एक स्केच पैड और पेंसिल दी। “बेटा, क्या तुम मुझे वही ‘गंगा घाट’ का एक और पैटर्न बनाकर दिखा सकती हो?”
मीरा ने एक पल के लिए मामा की ओर देखा। मामा ने आँखों से हिम्मत दी। मीरा ने पेंसिल उठाई। जैसे ही पेंसिल कागज़ पर चली, उसका डर गायब हो गया। अगले पंद्रह मिनट में उसने कागज़ पर बनारस की सुबह उतार दी। उसकी लकीरों में वो दर्द, वो अनुभव और वो गहराई थी जो किसी कॉपी-कैट में नहीं हो सकती थी।
डिज़ाइनर मैडम ने स्केच देखा और मुस्कुराईं। “अद्भुत! तुम्हें किसी कॉलेज की डिग्री की ज़रूरत नहीं है, हुनर तुम्हारी उंगलियों में है।”
उन्होंने रंजना मामी की ओर मुड़कर कहा, “मिसेज रंजना, हम पिंकी का एडमिशन रद्द कर रहे हैं। नक़ल और झूठ की बुनियाद पर करियर नहीं बनते।”
फिर वे मीरा की ओर मुड़ीं। “मीरा, मेरा स्टूडियो मुंबई में है। मैं तुम्हें वहां जूनियर डिज़ाइनर की नौकरी और साथ में पढ़ाई का मौका देना चाहती हूँ। क्या तुम चलोगी?”
मीरा को यकीन नहीं हुआ। यह उसके सपनों की उड़ान थी।
रंजना मामी ने विरोध करने की कोशिश की, “लेकिन घर का काम? और ये अकेली लड़की मुंबई कैसे जाएगी?”
“उसकी चिंता आप मत कीजिये,” सतीश मामा ने दृढ़ता से कहा। “मीरा जाएगी। और आज ही जाएगी। मीरा, जा बेटा, अपना सामान पैक कर।”
मीरा जब अपना छोटा सा बैग लेकर बाहर निकली, तो रंजना मामी कोने में मुंह फुलाए खड़ी थीं। लेकिन पिंकी मीरा के पास आई।
“सॉरी दीदी… और थैंक यू,” पिंकी ने धीरे से कहा। “शायद अब मुझे समझ आ गया है कि मेहनत का कोई शॉर्टकट नहीं होता।”
मीरा ने घर की दहलीज पार की। बाहर सतीश मामा खड़े थे। उन्होंने मीरा के सिर पर हाथ रखा और एक लिफाफा दिया।
“रख ले बेटा। ये वो पैसे हैं जो मैंने तेरी माँ के गहने बेचकर फिक्स डिपाजिट किए थे। रंजना को नहीं पता। आज ये तेरे काम आएंगे।”
मीरा की आँखों से आंसू बह निकले। उसने मामा के पैर छुए।
“जा सिमरन… जी ले अपनी ज़िंदगी,” मामा ने भारी आवाज़ में कहा और हंस दिए।
मीरा ने टैक्सी में बैठते हुए पीछे मुड़कर उस आलीशान लेकिन खोखले घर को देखा। उसने वहां बहुत कुछ खोया था—अपना बचपन, अपनी आज़ादी। लेकिन उसने वहां कुछ पाया भी था—तपकर सोना बनने की ताकत।
जैसे ही टैक्सी आगे बढ़ी, मीरा ने खिड़की का कांच नीचे किया। ठंडी हवा उसके चेहरे से टकराई। यह वही ठंड थी जो सुबह उसे चुभ रही थी, लेकिन अब यह ठंड उसे आज़ादी का अहसास दिला रही थी। उसने अपने बैग से अपनी स्केचबुक निकाली और पहले पन्ने पर लिखा— ‘नई शुरुआत’।
उस दिन बनारस की गलियों से एक डरी हुई अनाथ बच्ची नहीं, बल्कि एक उभरती हुई कलाकार निकली थी। उसे पता था कि रास्ता मुश्किल होगा, मुंबई अनजान होगी, लेकिन अब उसके पास उसका हुनर था, और वो हुनर, जिसे कोई चाची, कोई गरीबी या कोई मजबूरी उससे छीन नहीं सकती थी।
मीरा ने आसमान की ओर देखा। उसे लगा जैसे बादलों के बीच से उसके माँ-पापा उसे देख कर मुस्कुरा रहे हैं। उसने अपने आंसुओं को पोंछा और एक नई दुनिया की ओर कदम बढ़ा दिए, जहाँ उसे किसी की ‘महरबानी’ की ज़रूरत नहीं थी, जहाँ उसकी पहचान उसके काम से होने वाली थी।
कहानी का सार:
परिस्थितियाँ इंसान को तोड़ सकती हैं, लेकिन अगर इंसान के पास हुनर और हौसला हो, तो वही परिस्थितियाँ उसे तराश कर हीरा बना देती हैं। रिश्ते खून के नहीं, एहसास और सम्मान के होते हैं। सतीश मामा ने साबित कर दिया कि देर से ही सही, अन्याय के खिलाफ खड़ा होना ही सच्चा अभिभावकत्व है।
लेखिका : रमा शुक्ला