रात के सन्नाटे में अस्पताल की मशीनों की बीप-बीप आवाज़ रोहन के कानों में हथौड़े की तरह बज रही थी। आईसीयू के बाहर बेंच पर बैठा वह अपने हाथों में अपना सिर थामे हुए था। उसकी आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य घूम रहा था—रसोई के फर्श पर बेसुध पड़ी सुमन और उसके चारों ओर बिखरा हुआ खाना।
यह कहानी शुरू होती है ‘आशियाना’ विला से, जहाँ रोहन अपने माता-पिता और पत्नी सुमन के साथ रहता था। रोहन एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था। समाज में उसका और उसके परिवार का काफी रुतबा था। उसकी माँ, कमला देवी, शहर की महिला मंडल की अध्यक्ष थीं और अक्सर मंच पर नारी सशक्तिकरण के बड़े-बड़े भाषण देती थीं। लेकिन घर की चारदीवारी के भीतर, उनके नियम बिल्कुल अलग थे।
सुमन एक पढ़ी-लिखी, समझदार लड़की थी। शादी से पहले वह एक स्कूल में शिक्षिका थी, लेकिन शादी के बाद कमला देवी ने बड़े प्यार से कह दिया था, “बेटा, हमारे घर की बहुएं बाहर धक्के नहीं खातीं। घर की ज़िम्मेदारी ही इतनी बड़ी है कि तुम्हें बाहर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।” रोहन ने भी माँ की हाँ में हाँ मिला दी थी, यह सोचकर कि सुमन घर पर आराम से रहेगी।
लेकिन ‘आराम’ तो सुमन की किस्मत में लिखा ही नहीं था।
सुबह पाँच बजे से लेकर रात के ग्यारह बजे तक सुमन का वजूद सिर्फ रसोई और घर के कामों तक सिमट कर रह गया था। कमला देवी का मानना था कि घर में नौकरों से काम करवाना शान के खिलाफ है। “खाने का असली स्वाद तो बहू के हाथों में होता है,” यह कहकर उन्होंने कुक को हटा दिया था।
रोहन अक्सर देखता था कि सुमन काम करते-करते थक जाती है। कभी-कभी वह दबी ज़बान में कहता भी, “माँ, एक मेड रख लेते हैं बर्तन और झाड़ू के लिए।”
तो कमला देवी तुरंत अपना पल्लू आँखों पर रखकर रोनी सूरत बना लेतीं, “हाँ, अब तो तुम्हें माँ की हाथ की बचत खलेगी ही। मैंने पूरी ज़ुबानी तुम लोगों को पाला, कभी उफ़ नहीं की। और आजकल की लड़कियों से दो प्याले चाय नहीं बनती।”
रोहन, जो अपनी माँ का भक्त था, तुरंत चुप हो जाता और रात को कमरे में आकर सुमन को ही समझाता, “सुमन, माँ सही तो कह रही हैं। वो बुज़ुर्ग हैं, उनके ज़माने के तौर-तरीके अलग थे। तुम थोड़ा एडजस्ट कर लो। घर का काम ही तो है, कौन सा पहाड़ तोड़ना है?”
सुमन चुप रह जाती। वह रोहन से बहुत प्यार करती थी और घर में क्लेश नहीं चाहती थी। लेकिन धीरे-धीरे उसकी चुप्पी, उसकी कमजोरी समझ ली गई।
तीन दिन पहले की बात है। रोहन के पिता, दीनानाथ जी की रिटायरमेंट पार्टी थी। घर में करीब सौ मेहमानों को बुलाया गया था। रोहन ने सुझाव दिया था कि कैटरिंग वाले को बुला लेते हैं। लेकिन कमला देवी ने वीटो पावर इस्तेमाल कर दिया।
“नहीं रोहन! बाहर का खाना अशुद्ध होता है। और फिर मेरी बहू किस दिन काम आएगी? सुमन बहुत बढ़िया खाना बनाती है। हम सब मिलकर कर लेंगे। रिश्तेदारों में नाक कटवानी है क्या बासी खाना खिलाकर?”
‘सब मिलकर’ का मतलब था—सिर्फ सुमन।
पार्टी से दो दिन पहले से ही तैयारियां शुरू हो गईं। सुमन ने नाश्ते से लेकर रात के खाने तक का मेनू तैयार किया। कमला देवी सिर्फ सोफे पर बैठकर निर्देश देती रहीं—”सुमन, समोसे में नमक कम है”, “सुमन, गुलाब जामुन की चाशनी गाढ़ी करो”, “सुमन, मेहमान आने वाले हैं, जल्दी तैयार हो जा।”
रोहन इन दो दिनों में ऑफिस के काम में व्यस्त रहा। जब भी वह पानी पीने रसोई में आता, सुमन को पसीने में तर-बतर देखता। सुमन की आँखें धंसी हुई थीं, चेहरा पीला पड़ गया था। एक बार सुमन ने कहा भी, “रोहन, मुझे चक्कर आ रहे हैं। क्या आप बाज़ार से सब्ज़ियां ला देंगे? मुझसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा।”
रोहन जवाब देता, उससे पहले ही कमला देवी टपक पड़ीं, “अरे, चक्कर तो गर्मी की वजह से आ रहे होंगे। नींबू पानी पी ले। रोहन को क्यों परेशान करती है? वो ऑफिस से थका हुआ आया है। मर्द रसोई के काम में अच्छे नहीं लगते।”
रोहन ने भी लापरवाही से कहा, “हाँ सुमन, तुम कर लो न। माँ मदद कर तो रही हैं। मुझे एक ज़रूरी प्रेजेंटेशन बनानी है।” और वह अपने एयरकंडीशन्ड कमरे में चला गया।
सुमन ने नींबू पानी पिया और फिर से काम में जुट गई। उसे लगा शायद रोहन उसकी तकलीफ़ समझेगा, लेकिन रोहन ने अपनी माँ के चश्मे से ही दुनिया देखना जारी रखा। उसे लगा कि औरतों का शरीर लोहे का बना होता है, उन्हें थकान नहीं होती।
पार्टी वाली शाम आ गई। घर रोशनी से जगमगा रहा था। मेहमानों की भीड़ थी। रोहन महंगे सूट में सबको अटेंड कर रहा था। लोग खाने की तारीफ कर रहे थे।
“वाह रोहन! तुम्हारी बीवी के हाथ में तो जादू है। क्या शाही पनीर बनाया है!” रोहन के बॉस ने कहा।
रोहन गर्व से फूल गया। “थैंक यू सर! मेरी माँ ने उसे ट्रेन किया है,” उसने हंसते हुए कहा।
लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि वो ‘जादूगरनी’ है कहाँ?
सुमन रसोई में थी। पचपन डिग्री के तापमान में। 50 लोगों की रोटियां सेकते-सेकते उसकी उंगलियां जल गई थीं। वह पिछले 48 घंटों में मुश्किल से चार घंटे सोई थी। उसने सुबह से कुछ खाया भी नहीं था क्योंकि कमला देवी ने कहा था, “मेहमानों को खिलाने के बाद ही घर की लक्ष्मी खाती है।”
अचानक सुमन को लगा कि ज़मीन उसके पैरों के नीचे से खिसक रही है। आँखों के आगे अंधेरा छा गया। उसने दीवार का सहारा लेने की कोशिश की, लेकिन हाथ फिसल गया। वह धड़ाम से गर्म कढ़ाई के पास गिरी। खौलते तेल की कुछ बूंदें उसके हाथ पर गिरीं।
रसोई से बर्तन गिरने की तेज़ आवाज़ आई।
बाहर संगीत बज रहा था, इसलिए किसी ने नहीं सुना। लेकिन जब दस मिनट तक रोटियां आनी बंद हो गईं, तो कमला देवी झुंझलाती हुई रसोई में गईं।
“सुमन! क्या नखरे हैं? मेहमान इंतज़ार कर रहे हैं और तू यहाँ…”
कमला देवी की चीख निकल गई। सुमन फर्श पर बेसुध पड़ी थी। उसका हाथ जला हुआ था।
रोहन दौड़कर आया। सुमन की हालत देखकर उसके होश उड़ गए। उसने उसे गोद में उठाया और अस्पताल की तरफ भागा।
डॉक्टर ने बाहर आकर रोहन को जो बताया, उसने रोहन के पैरों तले ज़मीन खींच ली।
“मिस्टर रोहन, आपकी पत्नी को ‘सीवियर डिहाइड्रेशन’ और ‘एक्सट्रीम एग्जॉशन’ (अत्यधिक थकान) हुआ है। उनका ब्लड प्रेशर बहुत लो है। और सबसे बड़ी बात, वो दो महीने की प्रेग्नेंट हैं। अगर थोड़ी देर और हो जाती, तो शायद हम बच्चे या माँ, किसी एक को खो देते।”
रोहन सन्न रह गया। “प्रेग्नेंट? लेकिन हमें तो पता ही नहीं था।”
“उन्हें पता होगा,” डॉक्टर ने गुस्से में कहा। “लेकिन शायद काम के बोझ और तनाव में उन्होंने ध्यान नहीं दिया, या फिर बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाईं। एक गर्भवती महिला से आप मज़दूरों की तरह काम करवा रहे थे? उनके शरीर में खून की कमी है। क्या आप लोग उन्हें खाना नहीं देते?”
डॉक्टर की बातें रोहन के गाल पर तमाचे की तरह लग रही थीं। उसे याद आया कि पिछले हफ़्ते सुमन ने कहा था कि उसे उल्टी जैसा महसूस हो रहा है, तब कमला देवी ने कहा था, “नाटक कर रही है, काम से बचने के बहाने हैं।” और रोहन ने भी कह दिया था, “सुमन, प्लीज़ माँ को शिकायत का मौका मत दो।”
रोहन बेंच पर बैठा रो रहा था। उसे अपनी मर्दानगी, अपने रूतबे और अपनी ‘आदर्श बेटा’ होने की छवि पर घिन आ रही थी। उसने अपनी पत्नी को, अपनी जीवनसंगिनी को, सिर्फ एक ‘काम करने वाली मशीन’ समझा था। उसने कभी उसकी चुप्पी के पीछे की चीख नहीं सुनी।
तभी कमला देवी और रोहन के पिता अस्पताल पहुँचे।
“अरे, डॉक्टर क्या कह रहे हैं? कैसी है सुमन?” दीनानाथ जी ने पूछा।
कमला देवी ने तुरंत कहा, “अरे, कुछ नहीं हुआ होगा। आजकल की लड़कियों में जान ही कहाँ होती है। थोड़ी सी गर्मी लगी होगी। डॉक्टर तो बस बिल बनाने के लिए डराते हैं। बताओ, घर में मेहमान बैठे हैं और ये यहाँ ड्रामा करके आ गई।”
रोहन का सब्र का बांध टूट गया। वह अपनी जगह से खड़ा हुआ। उसकी आँखों में आज वह सम्मान नहीं, बल्कि एक आक्रोश था।
“बस माँ! बस कीजिए!” रोहन चिल्लाया। अस्पताल के कॉरिडोर में सन्नाटा छा गया।
“रोहन? तू अपनी माँ पर चिल्ला रहा है?” कमला देवी हैरान थीं।
“हाँ माँ, चिल्ला रहा हूँ। क्योंकि आज अगर मैं चुप रहा, तो शायद अपनी नज़रों में कभी उठ नहीं पाऊंगा। डॉक्टर ने कहा है कि सुमन प्रेग्नेंट थी और हमने… हमने उसे लगभग मार ही डाला था।”
कमला देवी सकपका गईं। “प्रेग्नेंट? अरे, तो उसने बताया क्यों नहीं? हम ध्यान रखते।”
“कैसे बताती माँ?” रोहन की आवाज़ कांप रही थी। “आपने उसे बोलने का मौका दिया कभी? जब उसने कहा चक्कर आ रहे हैं, आपने कहा नाटक है। जब उसने कहा थकान है, मैंने कहा कामचोर है। हम दोनों ने मिलकर उसे इतना डरा दिया था कि वो अपनी तकलीफ बताने से भी डरने लगी। आप कहती थीं न कि मर्द रसोई में अच्छे नहीं लगते? गलत कहती थीं आप। अगर मैं रसोई में जाकर उसका हाथ बंटाता, तो आज मेरी पत्नी और मेरा बच्चा मौत के मुंह में नहीं होते।”
रोहन ने दीवार पर मुक्का मारा। “इज्ज़त? किसकी इज्ज़त माँ? उन रिश्तेदारों की जो खाना खाकर चले गए? या उस समाज की जो कहता है कि बहू को मशीन होना चाहिए? मेरी पत्नी की जान की कीमत पर मुझे ऐसी झूठी शान नहीं चाहिए।”
उसने अपने पिता की ओर देखा। “पापा, आप तो सब देखते थे। आप क्यों चुप रहे? क्या एक औरत को गुलाम समझना ही हमारे घर के संस्कार हैं?”
दीनानाथ जी ने सिर झुका लिया।
“आज मुझे एहसास हो रहा है,” रोहन ने आंसू पोंछते हुए कहा। “कि मैंने अपनी पत्नी का सम्मान नहीं किया। मैंने उसे अर्धांगिनी नहीं, बल्कि आपकी आज्ञाकारी सेविका समझा। थोड़ी सी मदद कर देने से, उसके साथ सब्जी काट देने से, या उसके लिए चाय बना देने से मैं छोटा नहीं हो जाता, बल्कि उसकी नज़रों में मेरी इज्ज़त बढ़ जाती। लेकिन मैंने अपनी झूठी मर्दानगी के चक्कर में उसे अकेला छोड़ दिया।”
रोहन ने गहरा सांस ली और एक फैसला सुनाया। “अब सुमन इस घर में तभी जाएगी जब उस घर के नियम बदलेंगे। कल से घर में कुक आएगा। घर की सफाई के लिए मेड आएगी। और सुमन… सुमन अब आराम करेगी। और अगर किसी को यह मंजूर नहीं है, तो हम अपना अलग घर देख लेंगे।”
कमला देवी कुछ बोलना चाहती थीं, लेकिन दीनानाथ जी ने उनका हाथ पकड़कर रोक दिया। “रोहन सही कह रहा है कमला। हम अपने बुढ़ापे के आराम के लिए बच्चों की जवानी जला रहे थे। हमें शर्म आनी चाहिए।”
दो दिन बाद सुमन को होश आया। उसने आँखें खोलीं तो देखा रोहन उसके पास बैठा है। रोहन ने उसका हाथ अपने हाथों में ले रखा था।
“मुझे माफ़ कर दो सुमन,” रोहन ने रुंधे गले से कहा। “मैं एक अच्छा पति नहीं बन पाया।”
सुमन ने कमज़ोर मुस्कान के साथ उसके हाथ को दबाया।
जब सुमन घर लौटी, तो नज़ारा बदला हुआ था। रसोई में एक महराज (कुक) खाना बना रहा था। कमला देवी सोफे पर नहीं, बल्कि डाइनिंग टेबल पर फल काट रही थीं।
“आ गई बेटा?” कमला देवी ने नज़रे चुराते हुए कहा। “तू जा, कमरे में आराम कर। मैंने तेरे लिए नारियल पानी रखा है।”
रोहन सुमन को कमरे में ले गया। उसने सुमन को बिस्तर पर लिटाया और खुद उसके पैरों के पास बैठ गया।
“रोहन, ये सब…” सुमन हैरान थी।
“यह सब बहुत पहले हो जाना चाहिए था सुमन,” रोहन ने कहा। “इज्ज़त रसोई में बांधकर नहीं, बल्कि दिल में बिठाकर होती है। मुझे समझ आ गया है कि घर की गाड़ी दो पहियों पर चलती है। अगर एक पहिया पंचर हो जाए और दूसरा चलता रहे, तो गाड़ी पलट जाती है। अब हम साथ चलेंगे।”
उस दिन के बाद, रोहन बदल गया। अब वह अक्सर रविवार को रसोई में दिखता, कभी चाय बनाता तो कभी सैंडविच। लोग कहते कि वह ‘जोरू का गुलाम’ हो गया है, लेकिन रोहन मुस्कुरा कर कहता, “गुलाम नहीं, जीवनसाथी हूँ। और साथी का काम साथ निभाना होता है, हुक्म चलाना नहीं।”
सुमन की सेहत सुधर गई। कुछ महीनों बाद उनके घर में एक स्वस्थ बेटी ने जन्म लिया। रोहन ने उसका नाम ‘आर्या’ रखा, जिसका अर्थ होता है ‘सम्मानित’। उसने कसम खाई कि वह अपनी बेटी को ऐसे संस्कार देगा कि वह कभी किसी के दबाव में अपनी आवाज़ न खोए, और अपने बेटे (अगर हुआ) को सिखाएगा कि असली मर्द वह है जो औरत का सम्मान करे, उसकी मदद करे, न कि उसे अपनी जागीर समझे।
इस घटना ने उस घर की नींव बदल दी थी। अब वहां डर की जगह प्रेम था, और हुक्म की जगह सहयोग। रोहन ने सीख लिया था कि झुकने से इंसान छोटा नहीं होता, बल्कि जो अपनी गलती मानकर सुधार ले, उसका कद सबसे ऊँचा होता है।
मूल लेखिका : डॉ अनुपमा श्रीवास्तव