खनकते सिक्के

रवि एक मेधावी छात्र था। उसके पिता, सोहनलाल, एक पुरानी कपड़ा मिल में दिहाड़ी मज़दूर थे, जहाँ काम मिलने का कोई पक्का भरोसा नहीं होता था।

माँ, कौशल्या, घर पर ही बीड़ी बनाने का काम करती थीं, जिससे घर में नमक-तेल का खर्च निकल आता था। रवि ने बारहवीं की परीक्षा ज़िले में टॉप की थी और आज उसे शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में स्कालरशिप के इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था।

सुबह जब वह घर से निकल रहा था, तो सोहनलाल ने अपनी बनियान की जेब से वो मुड़ा-तुड़ा पचास का नोट निकालकर रवि के हाथ में रखते हुए कहा था, “बेटा, शहर जा रहा है, कुछ खा-पी लेना। इंटरव्यू में दिमाग तभी चलेगा जब पेट में कुछ होगा। और हाँ, वापसी में टेंपो मत लेना, सीधी बस पकड़ना, सस्ती पड़ेगी।”

रवि ने पिता की आँखों में देखा था। उन आँखों में बेटे की कामयाबी का सपना तो था, लेकिन साथ ही कल के राशन की चिंता भी छिपी थी। रवि जानता था कि यह पचास रुपये पिता जी ने अपनी दवा के पैसे बचाकर उसे दिए हैं। सोहनलाल को दमे की शिकायत थी और इनहेलर ख़त्म हुए दो दिन हो चुके थे।

बस स्टॉप पर भीड़ का सैलाब था। रवि को जिस कॉलेज जाना था, वह यहाँ से अभी भी दस किलोमीटर दूर था। यहाँ से दो तरह की बसें जाती थीं। एक लाल रंग की सरकारी बस, जिसका किराया पंद्रह रुपये था, और दूसरी नीली प्राइवेट मिनी बस, जो जल्दी पहुँचाती थी लेकिन पच्चीस रुपये लेती थी।

रवि कतार में खड़ा था। पसीना उसकी शर्ट को भिगो रहा था। उसने देखा कि नीली बस आकर रुकी। कंडक्टर चिल्ला रहा था, “जल्दी बैठो, सीट खाली है, कॉलेज गेट पर उतारुंगा।”

रवि का मन ललचाया। इंटरव्यू के लिए उसे ताज़ा-दम दिखना था। पसीने से लथपथ होकर इंटरव्यू बोर्ड के सामने जाना उसे गवारा नहीं था। उसने जेब में हाथ डाला, नोट को छुआ। अगर वह पच्चीस रुपये जाने में खर्च कर देता, तो वापसी के लिए उसके पास सिर्फ़ पच्चीस बचते। उसे भूख भी लगेगी। और अगर शाम को लौटने में देर हो गई तो बस का किराया बढ़ भी सकता था।

रवि ने अपने कदम पीछे खींच लिए। नीली बस धूल उड़ाती हुई निकल गई। वह वहीं खड़ा रहा। दस मिनट बाद लाल बस आई। खचाखच भरी हुई। रवि किसी तरह धक्के खाता हुआ अंदर घुसा और दरवाज़े के पास लटक गया। हवा का तो नामोनिशान नहीं था, ऊपर से लोगों के पसीने की बदबू। लेकिन रवि के चेहरे पर शिकन नहीं थी, उसे संतोष था कि उसने दस रुपये बचा लिए हैं।

कॉलेज पहुँचकर उसने वाशरूम में जाकर मुंह धोया, बाल ठीक किए और अपनी बारी का इंतज़ार करने लगा। इंटरव्यू अच्छा हुआ। बोर्ड के सदस्यों ने उसके जवाबों से प्रभावित होकर उसे स्कालरशिप के लिए चुन लिया। रवि का दिल बल्लियों उछलने लगा। वह दौड़कर घर जाना चाहता था और पिता जी को यह खुशखबरी सुनाना चाहता था।

दोपहर के दो बज चुके थे। भूख से उसकी आंतें कुलबुला रही थीं। सुबह सिर्फ़ एक बासी रोटी खाकर निकला था। कॉलेज के बाहर समोसे और कचौड़ी की महक उसे अपनी ओर खींच रही थी। एक समोसा दस रुपये का था। रवि ने हिसाब लगाया। उसके पास पचास रुपये थे। पंद्रह आने में खर्च हुए। बचे पैंतीस रुपये।

अगर वह दस का समोसा खाता है, तो बचेंगे पच्चीस। वापसी का किराया पंद्रह रुपये। यानी घर पहुँचने पर उसके पास दस रुपये बच जाएंगे।

तभी उसकी नज़र सड़क के किनारे बैठे एक पुराने मेडिकल स्टोर पर पड़ी। बाहर एक बोर्ड लगा था—”दमे का इनहेलर: विशेष छूट पर उपलब्ध”। रवि के कदम रुक गए। उसे याद आया, रात भर पिता जी खांसते रहे थे। माँ बार-बार उनकी पीठ सहला रही थीं। पिता जी ने कहा था, “अरे कुछ नहीं, मौसम बदल रहा है, ठीक हो जाएगा।” लेकिन रवि जानता था कि वो सांस नहीं ले पा रहे थे।

रवि मेडिकल स्टोर की ओर बढ़ा। “भैया, वो नीले वाला इनहेलर कितने का है?” उसने पूछा।

दुकानदार ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और कहा, “अस्सी रुपये का है, लेकिन डिस्काउंट में साठ का पड़ेगा।”

रवि का दिल बैठ गया। साठ रुपये? उसके पास तो कुल पैंतीस बचे थे। वह निराश होकर मुड़ने ही वाला था कि दुकानदार ने एक छोटी शीशी दिखाई। “अगर वो महँगा है तो यह वाला ले लो। यह पंप नहीं है, कैप्सूल वाला है। यह चालीस का मिल जाएगा।”

चालीस रुपये। रवि की जेब में पैंतीस थे। पाँच रुपये कम।

उसने दुकानदार से कहा, “भैया, पैंतीस हैं। दे दोगे?”

दुकानदार ने रूखेपन से मना कर दिया, “उधारी नहीं चलती यहाँ।”

रवि दुकान से बाहर आ गया। भूख अब मर चुकी थी। दिमाग में सिर्फ़ एक ही गणित चल रहा था—पाँच रुपये और कैसे आएं? या फिर इनहेलर कैसे ख़रीदा जाए?

उसने सड़क की ओर देखा। धूप अब थोड़ी कम हो गई थी, लेकिन उमस बरक़रार थी। घर जाने के लिए उसे बस स्टैंड जाना था। बस का किराया पंद्रह रुपये था। अगर वह पैदल चला जाए?

नहीं, घर बहुत दूर था, लगभग बीस किलोमीटर। पैदल जाने में रात हो जाएगी। लेकिन एक रास्ता था। यहाँ से पांच किलोमीटर दूर एक ‘बाईपास’ था, जहाँ से गाँव के लिए ट्रैक्टर या लोडिंग टेंपो मिल जाते थे, जो सिर्फ़ पांच या दस रुपये लेते थे।

अगर वह यहाँ से पांच किलोमीटर पैदल चलकर बाईपास तक जाए, और वहां से कोई सस्ता साधन ले, या फिर लिफ्ट मांग ले?

रवि ने एक बड़ा फैसला लिया। उसने अपनी जेब से वो पंद्रह रुपये (जो उसने बस के किराये के लिए रखे थे) और बाकी के बीस रुपये निकाले। कुल पैंतीस रुपये। उसने अपनी जेब के एक गुप्त चोर-जेब (छोटी पॉकेट) को टटोला। वहां उसे एक पांच का सिक्का मिला जो उसने इमरजेंसी के लिए महीनों से संभाल कर रखा था।

कुल चालीस रुपये हो गए!

रवि की आँखों में चमक आ गई। वह दौड़कर मेडिकल स्टोर पर गया। “भैया, ये लो चालीस। वो इनहेलर दे दो।”

दुकानदार ने पैसे गिने और इनहेलर दे दिया। रवि ने उसे ऐसे मुट्ठी में भींचा जैसे कोई कोहिनूर हीरा हो।

अब उसकी जेब पूरी तरह खाली थी। शून्य। न खाने के लिए कुछ, न किराये के लिए।

रवि ने कॉलेज बैग कंधे पर टांगा और पैदल चलना शुरू किया। दोपहर के तीन बजे थे। सूरज अभी भी आग उगल रहा था। जूतों के तलवे घिसे हुए थे, सड़क की गर्मी सीधे पैरों तलवों को जला रही थी। प्यास लग रही थी, तो उसने एक पार्क के नल से पेट भर पानी पिया और फिर चल पड़ा।

एक किलोमीटर… दो किलोमीटर… गाड़ियां उसके पास से ज़राते हुए निकल रही थीं। एसी कारों में बैठे लोग शायद सोच रहे होंगे कि यह लड़का पागल है जो इस धूप में पैदल जा रहा है। रवि के पैर दुखने लगे थे, लेकिन उसका मन हवा में उड़ रहा था। वह सोच रहा था कि आज रात पिता जी चैन से सो पाएंगे।

चार किलोमीटर चलते-चलते रवि को चक्कर आने लगे। भूख और थकान ने शरीर तोड़ दिया था। एक जगह वह पेड़ की छांव में बैठ गया। मन किया कि किसी से लिफ्ट मांग ले, लेकिन उसके मैले कपड़े देखकर कोई गाड़ी नहीं रोक रहा था।

तभी एक दूध वाला अपनी मोटरसाइकिल पर वहां से गुज़रा। रवि ने हाथ दिया। दूध वाले ने बाइक रोकी।

“कहाँ जाना है भाई?”

“बाईपास तक छोड़ दोगे भैया?” रवि ने हाँफते हुए पूछा।

दूध वाले ने उसे पीछे बिठा लिया। उन पंद्रह मिनट के सफ़र में रवि को लगा जैसे वह मर्सिडीज़ में बैठा हो।

बाईपास पहुँचकर रवि उतरा। अब यहाँ से घर अभी भी पंद्रह किलोमीटर दूर था। जेब खाली थी। ट्रैक्टर वाले भी पांच-दस रुपये मांगते। रवि ने सोचा, “अब क्या करूँ?”

तभी उसे अपने गाँव का एक पड़ोसी, काका रामदीन, अपनी बैलगाड़ी ले जाते हुए दिखे। वे शहर से चारा लेकर लौट रहे थे।

“अरे रवि बेटा? तुम यहाँ?” रामदीन काका ने बैलगाड़ी रोकी।

रवि की जान में जान आई। “काका, घर जा रहा था। बस छूट गई।” उसने झूठ बोला।

बैलगाड़ी की रफ़्तार धीमी थी, लेकिन रवि के लिए वह सबसे सुखद सवारी थी। वह भूसे के ढेर पर लेट गया। आसमान की तरफ देखते हुए उसे अपनी कामयाबी पर नहीं, अपनी उस छोटी सी जीत पर गर्व हो रहा था जो उसकी जेब में ‘इनहेलर’ के रूप में रखी थी।

शाम के सात बज चुके थे जब रवि घर पहुँचा।

सोहनलाल और कौशल्या दरवाज़े पर ही टकटकी लगाए बैठे थे। रवि को देखते ही कौशल्या दौड़कर आईं, “आ गया मेरा लाल! कैसा रहा इंटरव्यू? कुछ खाया कि नहीं?”

रवि ने मुस्कुराते हुए बैग रखा। “माँ, इंटरव्यू बहुत अच्छा रहा। स्कालरशिप मिल गई। अब पिता जी को मेरी फीस की चिंता नहीं करनी पड़ेगी।”

सोहनलाल की आँखों में आंसू आ गए। “शाबाश मेरे शेर! मुझे पता था तू मेरा नाम रोशन करेगा।” उन्होंने रवि को गले लगा लिया।

तभी रवि ने अपनी जेब से वह इनहेलर निकाला और पिता जी के हाथ में रख दिया।

“यह क्या है?” सोहनलाल ने पूछा।

“आपका इनहेलर। ख़त्म हो गया था न?” रवि ने सहजता से कहा।

सोहनलाल ने इनहेलर देखा, फिर रवि को। “लेकिन… पैसे? मैंने तो तुझे सिर्फ़ पचास रुपये दिए थे। आने-जाने का किराया ही तीस रुपये लग जाता। तूने खाया क्या? और यह चालीस रुपये की दवा कैसे आई?”

रवि ने बात टालने की कोशिश की, “अरे पापा, वो कॉलेज में… दोस्तों ने खिला दिया था। और बस वाले ने स्टूडेंट समझकर आधा किराया लिया।”

कौशल्या माँ थीं, बेटे का चेहरा पढ़ना जानती थीं। उन्होंने रवि का सूखा हुआ चेहरा, धूल से सने जूते और पसीने से चिपकी शर्ट देखी। उन्होंने रवि का कान पकड़ा, “सच बोल रवि। तूने कुछ नहीं खाया न? और तू पैदल आया है न?”

रवि हंस पड़ा, “माँ, पाँच-छह किलोमीटर ही तो पैदल चला। जवान हूँ, कुछ नहीं होता।”

सोहनलाल के हाथ कांपने लगे। उन्होंने उस इनहेलर को सीने से लगा लिया। उन्हें लगा कि यह दवा नहीं, उनके बेटे की उम्र है जो उसने अपने पिता की सांसों के लिए दांव पर लगा दी थी।

कौशल्या ने तुरंत रसोई से थाली परोसी। दाल और रोटी। उसमें घी नहीं था, लेकिन जो स्वाद उस दिन रवि को आया, वह शायद किसी फाइव स्टार होटल के खाने में भी नहीं मिलता।

पिता ने पहला कौर तोड़कर रवि के मुंह में दिया। “आज तूने सिर्फ़ परीक्षा पास नहीं की बेटा, आज तूने मुझे ज़िन्दगी की सबसे बड़ी डिग्री दे दी। तू मेरा अभिमान है।”

रवि ने देखा कि पिता जी अब खुलकर सांस ले रहे थे। उस एक गहरी सांस की कीमत रवि के उन पांच किलोमीटर के छालों से कहीं ज्यादा थी। उस रात, उस छोटे से कमरे में अमीरी नहीं थी, लेकिन वहां जो सुकून था, वह करोड़ों में भी नहीं खरीदा जा सकता था।


मित्रों, माता-पिता की ज़रुरत और बच्चों का त्याग जब मिलता है, तो घर मंदिर बन जाता है। रवि ने साबित कर दिया कि जेब खाली हो सकती है, लेकिन दिल बड़ा हो तो कोई भी फासला तय किया जा सकता है।

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