कैदी नंबर 214 – गीता वाधवानी

लगभग 22 वर्षीय पंकज को पुलिस इंस्पेक्टर सलाखों के पीछे धकेल कर चला गया। पंकज गिरते गिरते बचा और वहीं कोने में बैठकर अपने घुटनों में मुंह छुपा कर रोने लगा। तब इसी कोठरी में बंद 35-36 वर्षीय मनोज ने उसके कंधे को प्यार से सहलाते हुए पूछा- क्या हुआ भाई,इतना क्यों रो रहे हो? ” 

 लेकिन पंकज ने उसके हाथ को झटकते हुए कहा -” आपसे मतलब, आप अपना काम कीजिए, जाइए यहां से। ”  

 मनोज जाकर दूसरे कोने में बैठ गया। थोड़ी देर बाद पंकज को अपनी बदतमीजी का एहसास हुआ और वह अपने आंसू पोंछता हुआ, मनोज के पास जाकर बैठ गया और बोला-” मुझे माफ कर दीजिए, दरअसल मैं बहुत परेशान हूं। ” 

 मनोज-” कोई बात नहीं, अगर तुम बताना चाहो तो बता सकते हो कि क्या हुआ। इतनी छोटी उम्र में तुम जेल में कैसे आ गए? ” 

 पंकज-” मेरी गलती नहीं थी,मैंने कुछ नहीं किया था। ” 

 मनोज-” शांत हो जाओ, आराम से पूरी बात बताओ। ” 

 पंकज-” हम चार दोस्त अमर,गौरव,हर्ष और मैं घूमने गए थे। वापसी में उन लोगों ने कहा-  यार आज कुछ मजा नहीं आया, सब कुछ रुखा सुखा सा लग रहा है। कुछ दूरी पर लड़कियों का कॉलेज है चलो वहां मस्ती करते हैं। लड़कियों को परेशान करेंगे। ” 

 मैंने मना कर दिया, “क्या तुम लोगों के घर में अपनी बहाने नहीं है जो तुम दूसरों की बहनों और बेटियों को परेशान करोगे। यह गलत है। चलो सब घर चलते हैं और घर चलकर टीवी पर मूवी देखेंगे और कुछ बढ़िया सा मंगा कर खाएंगे।” 

 वह लोग नहीं माने और मैं उनसे अलग होकर घर जाने के लिए थोड़ी दूर  जाकर खड़ा हो गया। मैं घर जाने के लिए ऑटो ढूंढ रहा था। 

 वे लोग लड़कियों को भददे भददे कमेंट्स करने लगे। कुछ लड़कियां चुपचाप चली गई और कुछ जवाब देकर गई। लेकिन एक लड़की ने पुलिस को कॉल कर दिया। पुलिस तुरंत आ गई और गौरव को कसकर तमाचा मारा। इतने में मेरे सामने ऑटो आ गया। मैं ऑटो में बैठते ही वाला था कि तभी हर्ष ने भाग कर मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे ऑटो में बैठने नहीं दिया और पुलिस ने हर्ष के साथ मुझे भी पकड़ लिया। मैंने सबसे बहुत कहा कि मैं कुछ नहीं किया है लेकिन किसी ने मेरी बात नहीं सुनी, मेरे दोस्तों ने ही मुझे फंसा दिया। उन्होंने सच नहीं बोला बल्कि उन्होंने कहा कि यह हमारा ही साथी है। पंकज रोता जा रहा था। 

     मनोज ने पूछा-” और तुम्हारे घर के लोग, वह तुम पर विश्वास करते हैं या नहीं? ” 

 पंकज-” उनका ही तो सहारा है, वह मुझ पर पूरा विश्वास करते हैं, मेरे तीनों दोस्त साथ वाली कोठरी में है शायद। ” 

 फिर पंकज ने मनोज से पूछा-” आप तो व्यवहार से सरल लग रहे हैं फिर आप यहां कैसे? ” 

 मनोज एक लंबी सांस लेकर बोला, ” अब तो मैं अपना नाम भी भूल गया हूं अब तो सिर्फ कैदी नंबर 214 बनकर रह गया हूं। मैं बालमपुर गांव में किसान था। अपने माता-पिता, पत्नी और दो बच्चों के साथ सुखी जीवन जी रहा था। हम लोग अमीर नहीं थे पर ईश्वर की कृपा थी। लगभग 4 साल पहले हमारे पड़ोसी रामलाल की लड़की का विवाह था। बारात गांव में आ चुकी थी। थोड़ी देर बाद बरात में आए हुए कुछ लड़के बुजुर्गों से और लड़कियों से बदतमीजी करने लगे। गांव के लोगों ने उन्हें प्यार से समझाया’ पर वे लोग नहीं माने। बात पहले लड़ाई झगड़े तक पहुंच गई और फिर हाथापाई होने लगी। देखते ही देखते दोनों पक्षों ने हथियार निकाल लिए और एक दूसरे परिवार करने लगे। बात बढ़ते बढ़ते इतनी बिगड़ गई की रामलाल की किसी ने हत्या कर दी। थोड़ी देर बाद पुलिस को किसी ने खबर कर दी। पुलिस आई और गांव के चार-पांच लोगों को और चार-पांच बारातियों को पकड़ कर ले गई। पता नहीं लग रहा था कि वार किसने किया था। मैं उस समय घर में आराम कर रहा था क्योंकि मुझे बहुत तेज बुखार था। 

 न जाने किसने बेवजह मेरा नाम ले लिया। पुलिस से मैंने कहा कि उस समय मैं अपने घर पर था। लेकिन पुलिस वालों ने कहा कि तुम्हारे खिलाफ हमें सबूत मिले हैं। हम लोगों की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। मेरे पिताजी ने मुझे बचाने के लिए हमारा एकमात्र खेत बेचकर कैसे लड़ा, पर फिर भी मैं बेगुनाह होते हुए भी अपराधी बनाकर जेल में सड रहा हूं और असली अपराधी ना जाने कहां घूम रहा होगा। बस कैसे चलता ही जा रहा है। गांव के बाकी लोग भी छूट गए हैं। मैं हत्या वाली जगह पर था ही नहीं फिर भी मैं यहां जेल में हूं, समझ में नहीं आता कि मेरे खिलाफ कौन से सबूत मिल गए और कहां से मिले। ” अब तो मनोज रोने लगा था। 

 पंकज भी उसकी बात सुनकर परेशान हो गया था। उसने मनोज से कहा-” आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए, मुझे अपने घर का पता बताइए, मैं बाहर निकलते ही कुछ करता हूं। ” 

 मनोज-” नहीं नहीं पंकज तुम कुछ नहीं कर पाओगे और फिर हमारे पास पैसा भी नहीं है,गरीबों की कोई सुनवाई नहीं होती, अब तो मेरा जीवन यहीं पर कटने वाला है। ” 

 पंकज-” मैं आपके लिए कुछ कर पाया, तो मुझे अच्छा लगेगा, मेरे पापा बहुत अच्छे इंसान हैं उनकी एक बहुत बड़ी कंपनी है और वहां लीगल एडवाइजर भी है और वकीलों से भी जान पहचान है बस पहले मैं छूट जाऊं, पापा मुझे छुड़ाने आते ही होंगे। ” 

 अगले दिन पंकज के पापा ने उसे छुड़वा लिया था। पंकज ने उनको मनोज की पूरी बात बताई। पहले वे लोग मनोज के गांव गए। वहां उन्हें पता लगा कि मनोज के पिता दूसरों के खेतों में मजदूरी करके घर चला रहे हैं। सचमुच उसके परिवार का हाल बहुत बुरा था। मनोज के नाम को सुनते ही उसके माता-पिता की आंखें भर आई और आवाज कांपने लगी। पहले पंकज और उसके पिता ने उनके घर में बहुत सारा अनाज रखवा दिया क्योंकि उन्होंने जाते ही देखा कि दोनों बच्चों को उनकी मां ने सिर्फ आधी आधी रोटी खाने को दी। बच्चों ने कहा -“मां और भूख लगी है, रोटी दे दो।’ 

 तब मां ने कहा-” बेटा, आधी आधी रोटी रात को खाएंगे और मासूम बच्चे माँ की बात मान गए।” पंकज और उसके पिता की आंखें भर आई।  

   फिर उन्होंने उसके पिता से बात करके पूरी सच्चाई का पता किया और एक बहुत अच्छा वकील हायर कर लिया। कैसे लगभग 6 महीने और चला। आखिरकार वकील ने साबित कर दिया कि मनोज हत्या वाली जगह पर था ही नहीं तो वह कातिल कैसे हो सकता है। यह सारा खेल पुलिस ने रचाया था। अपना केस किसी भी सूरत में हल करने के लिए उन्होंने मनोज को बलि का बकरा बनाया था। 

 मनोज जेल से छूटते ही सीधा घर पहुंचा और उसके बाद परिवार सहित पंकज के घर जाकर उसका और उसके पिता को बहुत-बहुत  धन्यवाद दिया। 

 मनोज पूरे रास्ते यही सोच रहा था कि भगवान ने उसे जेल से छुड़वाने के लिए, एक दिन के लिए, पंकज को जेल भेजा। इतने सारे रिश्तों के बीच एक रिश्ता ऐसा भी बन जाएगा यह तो मैंने कभी सोचा भी ना था। एक अनजान व्यक्ति अपनों से भी बढ़कर, अपना बन गया। “हे ईश्वर! मेरी आपसे प्रार्थना है कि पंकज और उसके परिवार को हमेशा खुश रखना और उनकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण करना। ”  

 अप्रकाशित स्वरचित गीता वाधवानी दिल्ली 

#एक रिश्ता ऐसा भी

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