*”वक्त गूंगा नहीं होता, बस मौन रहता है। जब वह अपना फैसला सुनाता है, तो गवाहों की ज़रूरत नहीं पड़ती; इंसान की अपनी ही चीखें उसकी गवाही देती हैं।”*
“मास्टर दीनानाथ जी, आप तो नाहक ही परेशान हो रहे हैं। अरे, लड़के वाले खुद चल कर आए हैं। वे कहते हैं उन्हें दहेज-वहेज कुछ नहीं चाहिए, बस आपकी बेटी अंजलि जैसी संस्कारवान बहू चाहिए। उनका बेटा ‘विराज’ तो सरकारी इंजीनियर है, लाखों में खेलता है। आपकी बेटी राज करेगी, राज!”
बिचौलिये रतिराम की बातें सुनकर मास्टर दीनानाथ की आँखों में खुशी के आँसू छलक आए। वे एक साधारण प्राइमरी स्कूल के रिटायर्ड अध्यापक थे। जीवन भर की जमा-पूंजी और ईमानदारी ही उनकी कमाई थी। पत्नी के गुजर जाने के बाद, अंजलि ही उनकी दुनिया थी। अंजलि देखने में जितनी सौम्य थी, स्वभाव में उतनी ही सरल। एम.ए. पास थी, सिलाई-कढ़ाई और घर के काम में निपुण। दीनानाथ जी को लगा कि ईश्वर ने उनकी सुन ली है।
शहर के प्रतिष्ठित ‘चौधरी सदन’ की मालकिन, सुलोचना देवी, जब अंजलि को देखने आईं, तो उनकी जुबान से शक्कर टपक रही थी।
“अरे समधी जी, हमें क्या चाहिए? बस आपकी बिटिया एक जोड़े कपड़े में आ जाए, वही काफी है। मेरा बेटा विराज तो हीरा है, बस उसे तराशने वाली जौहरी चाहिए,” सुलोचना देवी ने अंजलि के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
दीनानाथ जी ने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर शादी की तैयारी की। धूमधाम से अंजलि विदा होकर चौधरी सदन गई। मोहल्ले वालों ने भी कहा, “मास्टर जी की बेटी की किस्मत खुल गई।”
लेकिन, किस्मत का ताला बाहर से जितना सुनहरा दिख रहा था, अंदर उतनी ही कालिख पुती थी।
सुहागरात की वो रात, अंजलि के सपनों के कांच के महल के टूटने की रात थी। कमरा फूलों से सजा था, लेकिन जब विराज कमरे में दाखिल हुआ, तो फूलों की खुशबू शराब की तीखी बदबू में दब गई। वह लड़खड़ाता हुआ आया और बिस्तर पर गिर पड़ा।
अंजलि सहम गई। उसने पास जाकर पूछा, “सुनिए, आपकी तबीयत ठीक है?”
विराज ने झटके से अंजलि का हाथ हटाया। “दूर रह मुझसे! और सुन, ये सती-सावित्री बनने का नाटक मत करना। माँ ने जबरदस्ती शादी करवाई है ताकि तेरा बाप मोटा पैसा दे सके। इंजीनियर? हह! मैं तो दो साल पहले ही सस्पेंड हो चुका हूँ रिश्वतखोरी में। अब बस जुआ और शराब ही मेरा पेशा है।”
अंजलि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। सरकारी इंजीनियर, खानदानी लोग, संस्कारी परिवार—सब झूठ था? सब एक छलावा था?
अगली सुबह, अंजलि की आँखों में नींद नहीं, बल्कि भय था। वह रसोई में गई, तो सुलोचना देवी वहां पहले से मौजूद थीं। कल वाली ‘मीठी सास’ का चेहरा बदल चुका था।
“महारानी, उतर गया शादी का खुमार? अब सुन, इस घर का खर्चा तेरे बाप की पेंशन से चलेगा। विराज की नौकरी में अभी कुछ दिक्कत है, तो जब तक वो बहाल नहीं होता, तुझे अपने बाप से हर महीने पैसे मंगवाने होंगे,” सुलोचना देवी ने आदेश सुनाया।
“लेकिन माँ जी, पिताजी के पास तो सिमित पेंशन है, वो कैसे…” अंजलि ने दबी जुबान में कहना चाहा।
“जुबान लड़ाती है?” सुलोचना देवी ने अंजलि के बालों को मुट्ठी में जकड़ लिया। “बहू बनकर आई है, मालकिन बनने की कोशिश मत करना। अगर इस घर में रहना है, तो वही करना होगा जो हम कहेंगे, वरना वो दरवाज़ा खुला है, धक्के मारकर निकाल देंगे। और सोच ले, समाज क्या कहेगा जब एक दिन पुरानी ब्याही लड़की वापस घर जाएगी।”
अंजलि के पास दो ही रास्ते थे—पिता का अपमान या खुद का तिल-तिल कर मरना। उसने दूसरा रास्ता चुना। उसने अपने पिता को कभी सच नहीं बताया। हर बार फोन पर यही कहती, “बाबूजी, मैं बहुत खुश हूँ। विराज मेरा बहुत ख्याल रखते हैं।” उधर दीनानाथ जी निश्चिंत हो जाते।
लेकिन चौधरी सदन की चारदीवारी के भीतर, अंजलि की ज़िंदगी नर्क बन गई थी। विराज दिन भर जुआ खेलता और रात को शराब के नशे में अंजलि को बेल्ट से पीटता। सुलोचना देवी बाहर वालों के सामने अंजलि की झूठी तारीफ करतीं, लेकिन घर के अंदर उसे नौकरानी से भी बदतर समझतीं। उसे बासी खाना दिया जाता, दिन भर घर की रगड़ाई करवाई जाती।
दो साल बीत गए। अंजलि का शरीर सूखकर कांटा हो गया था। उसकी आँखों के नीचे गहरे काले गड्ढे पड़ गए थे। एक दिन खबर आई कि अंजलि माँ बनने वाली है। अंजलि के मन में एक उम्मीद की किरण जगी। उसे लगा शायद बच्चे के आने से विराज बदल जाएगा, सास का दिल पिघल जाएगा।
उसने डरते-डरते यह खबर सुलोचना देवी को दी।
“माँ जी, मैं…”
“क्या है?” सुलोचना देवी ने टीवी से नज़र हटाए बिना पूछा।
“मैं माँ बनने वाली हूँ।”
सुलोचना देवी का चेहरा तमतमा गया। “बच्चा? इस कंगाली में बच्चा? तेरा बाप तो वैसे ही पैसे देने में आनाकानी कर रहा है, अब इस बच्चे का खर्चा कौन उठाएगा? विराज, सुन रहा है तू? तेरी बीवी हमारे सिर पर एक और बोझ लादने वाली है।”
विराज, जो नशे में धुत था, लड़खड़ाता हुआ आया। “बच्चा नहीं चाहिए मुझे। गिरा दे इसे।”
“नहीं!” अंजलि ने पहली बार चीखकर विरोध किया। “मैं ऐसा नहीं करूँगी। यह मेरी संतान है।”
विराज का पारा चढ़ गया। उसने अंजलि को बालों से पकड़कर ज़मीन पर पटक दिया और उसके पेट पर लात मार दी। अंजलि दर्द से चीख उठी। सुलोचना देवी वहीँ खड़ी देख रही थीं, लेकिन उन्होंने अपने बेटे को नहीं रोका। उल्टा बोलीं, “मरने दे इसे, नाटक कर रही है।”
अंजलि बेहोश हो गई। जब उसे होश आया, तो वह अस्पताल के जनरल वार्ड में थी। बच्चा गिर चुका था। और डॉक्टर ने बताया कि अंदरूनी चोटों की वजह से वह अब कभी माँ नहीं बन सकती।
अंजलि की आत्मा मर चुकी थी। घर वापस आकर वह ज़िंदा लाश बन गई। अब उसने बोलना छोड़ दिया था। वह बस मशीन की तरह काम करती और मार खाती।
एक दिन, विराज जुए में बहुत बड़ी रकम हार गया। लेनदार घर तक आ गए। विराज और सुलोचना देवी ने एक नई साज़िश रची। मास्टर दीनानाथ का एक पुराना पुश्तैनी मकान था शहर में, जिसकी कीमत अब करोड़ों में थी।
सुलोचना देवी ने अंजलि से कहा, “बहू, अपने बाप से कह कि वो मकान विराज के नाम कर दे। वरना तेरे पति की जान खतरे में है।”
अंजलि ने साफ मना कर दिया। “वो मकान बाबूजी के बुढ़ापे का सहारा है। मैं उनकी ज़िंदगी भर की कमाई आपके जुए में नहीं उड़ाने दूँगी। आप लोग मुझे मार डालो, पर मैं बाबूजी को बर्बाद नहीं होने दूँगी।”
उस रात, घर में अंजलि की चीखें नहीं गूंजीं। बस एक भारी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।
अगली सुबह मोहल्ले में खबर फैली कि मास्टर जी की बेटी छत से गिर गई। सुलोचना देवी छाती पीट-पीट कर रो रही थीं, “हाय मेरी बच्ची! कपड़े सुखाते वक्त पैर फिसल गया। मैंने कितना कहा था कि ध्यान रखा कर।”
अंजलि मर चुकी थी। पुलिस आई, पैसे खिलाए गए, और मामला ‘दुर्घटना’ बताकर रफा-दफा कर दिया गया। मास्टर दीनानाथ जब आए, तो बेटी की लाश देखकर पत्थर हो गए। उन्हें अंजलि की डायरी मिली, जिसमें उसने अपने आंसुओं से सब कुछ लिखा था। लेकिन दीनानाथ जी कमज़ोर थे, अकेले थे। वे चुपचाप बेटी की अस्थियां लेकर चले गए। जाते-जाते उन्होंने सुलोचना देवी की आँखों में देखकर बस इतना कहा, “वक्त की अदालत में गवाही नहीं होती समधन जी, वहां सीधे फैसला होता है। मेरी बेटी की खामोशी तुम्हें बहुत भारी पड़ेगी।”
सुलोचना देवी और विराज को लगा कि अब वे आज़ाद हैं। अंजलि तो गई, अब विराज की दूसरी शादी करेंगे और इस बार किसी अमीर घर की लड़की लाएंगे जो मोटा दहेज लाए।
किस्मत ने पन्ना पलटा।
साल भर के अंदर विराज की शादी तय हो गई। लड़की का नाम था ‘नैना’। नैना शहर के एक बड़े व्यापारी की इकलौती बेटी थी। सुलोचना देवी फूली नहीं समा रही थीं। दहेज में गाड़ी, सोना, और नकद—सब कुछ मिला।
नैना घर आई। देखने में अप्सरा, लेकिन स्वभाव से?
शादी के दूसरे ही दिन सुबह 10 बजे तक नैना अपने कमरे से नहीं निकली। सुलोचना देवी ने दरवाज़ा खटखटाया। “बहू, सुबह हो गई। चाय नहीं बनानी?”
दरवाज़ा खुला। नैना नाईटी में खड़ी थी। “एक्सक्यूज़ मी? चाय? आपके घर में नौकर नहीं हैं क्या? मैं यहाँ चाय बनाने नहीं आई हूँ। और सुनिए, अगली बार सुबह मेरी नींद खराब मत कीजिएगा।” दरवाज़ा धड़ से बंद हो गया।
सुलोचना देवी सन्न रह गईं। उन्होंने विराज से शिकायत की।
विराज, जो अंजलि पर शेर था, नैना के सामने भीगी बिल्ली बन गया। क्योंकि नैना के पिता ने विराज को अपने बिज़नेस में पार्टनर बनाया था और विराज को पता था कि अगर नैना नाराज़ हुई, तो वह सड़क पर आ जाएगा। नैना के पिता का रसूख इतना था कि वो विराज को जेल भी भिजवा सकते थे।
धीरे-धीरे नैना ने घर का नक्शा बदल दिया। उसने सुलोचना देवी को उनके बड़े कमरे से निकालकर स्टोर रूम के पास वाले छोटे कमरे में शिफ्ट कर दिया।
“मुझे प्राइवेसी चाहिए। यह बूढ़ी औरत दिन भर खांसती रहती है,” नैना ने साफ़ कह दिया।
सुलोचना देवी, जो कभी अंजलि को बासी रोटी देती थीं, आज खुद खाने के लिए तरसने लगीं। नैना और विराज अक्सर बाहर खाना खाते और सुलोचना देवी के लिए घर में कुछ नहीं बचता।
वक्त का पहिया घूमा और विराज को एक भयंकर बीमारी ने जकड़ लिया—लिवर सिरोसिस। शराब ने अपना काम कर दिया था। इलाज के लिए लाखों रुपयों की ज़रूरत थी। नैना ने साफ़ हाथ खड़े कर दिए।
“मैं अपने पापा का पैसा एक शराबी पर बर्बाद नहीं करूँगी। इसे सरकारी अस्पताल में डाल दो।”
विराज बिस्तर पर पड़ गया। वही बिस्तर, जिस पर कभी उसने अंजलि को लात मारी थी। दर्द से कराहता विराज पानी मांगता, तो नैना टीवी की आवाज़ तेज़ कर देती।
सुलोचना देवी की हालत और भी बदतर थी। बुढ़ापे और लाचारी ने उन्हें तोड़ दिया था। एक दिन वो बाथरूम में फिसल गईं। उनकी कूल्हे की हड्डी टूट गई। वो दर्द से चिल्लाती रहीं, लेकिन नैना ने दरवाज़ा बंद कर लिया। “नाटक कर रही है बुढ़िया,” नैना ने वही शब्द दोहराए जो कभी सुलोचना ने अंजलि के लिए कहे थे।
सुलोचना देवी अब बिस्तर पर थीं। लकवा मार गया था। उनकी आवाज़ चली गई थी, बस आँखें ज़िंदा थीं। वे अपनी ही गंदगी में पड़ी रहतीं। नैना ने एक कामवाली रखी थी जो दिन में एक बार आती, उन्हें जानवरों की तरह नहलाती और रूखा-सूखा खाना मुंह में ठूंस देती।
एक तूफानी रात, बिजली कड़क रही थी। विराज बगल के कमरे में दर्द से तड़प रहा था। उसे खून की उल्टियां हो रही थीं। सुलोचना देवी प्यास से तड़प रही थीं। उनका गला सूख कर कांटा हो गया था।
“पा… पानी…” उनके सूखे होंठों से सिर्फ़ यही बुदबुदाहट निकल रही थी।
सामने की दीवार पर अंजलि की एक पुरानी तस्वीर टंगी थी, जिसे नैना ने शायद मज़ाक उड़ाने के लिए वहां रहने दिया था। बिजली की चमक में सुलोचना देवी को लगा जैसे अंजलि तस्वीर से निकलकर उनके पास आई हो।
सुलोचना देवी की आँखों से आंसू बह निकले। उन्हें याद आया कि कैसे अंजलि बुखार में भी उनके लिए गर्म पानी और सूप लाती थी। कैसे उनकी एक आवाज़ पर दौड़ी चली आती थी। और आज… आज उनका अपना बेटा, जिसे उन्होंने सिर पर चढ़ाया था, खुद मौत से लड़ रहा है और वो ‘दहेज वाली बहू’ अपने कमरे में चैन से सो रही है।
मास्टर दीनानाथ को किसी ने खबर दी कि चौधरी परिवार बर्बाद हो चुका है। वे वहां आए। घर की हालत देखकर उनकी रूह कांप गई। विराज मर चुका था। उसकी लाश पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं। सुलोचना देवी अंतिम सांसे ले रही थीं।
दीनानाथ जी सुलोचना के पास गए। सुलोचना ने उन्हें देखा। उनकी आँखों में भीख थी—माफ़ी की और पानी की।
दीनानाथ जी ने एक चम्मच पानी उनके मुंह में डाला।
सुलोचना ने बड़ी मुश्किल से हाथ जोड़ना चाहा, पर शरीर ने साथ नहीं दिया। उनकी आँखों से अ पश्चाताप की नदियां बह रही थीं।
दीनानाथ जी ने भारी मन से कहा, “सुलोचना जी, मैंने कहा था ना, ऊपर वाले की लाठी में आवाज़ नहीं होती। आपने मेरी फूल सी बच्ची को जिस तड़प के साथ मारा, आज वही तड़प आपकी साथी है। फर्क बस इतना है कि मेरी बेटी बेकसूर थी और आप…”
सुलोचना देवी की आँखें पथरा गईं। उनकी सांसे थम गईं। चेहरे पर एक भयानक डर चिपका रह गया था।
नैना बाहर आई। “अरे, मर गए क्या दोनों? अच्छा हुआ, घर खाली हुआ। अब मैं इसे बेचकर विदेश जा सकती हूँ।”
दीनानाथ जी वहां से बाहर निकल आए। बारिश हो रही थी। उन्हें लगा जैसे आज आसमान भी अंजलि के आंसुओं से धुल गया है। कर्मों का हिसाब पूरा हो चुका था। जिस घर ने दहेज और लालच के लिए एक बेटी की बलि ली थी, आज उस घर का नाम लेने वाला भी कोई नहीं बचा था।
**कहानी के अंत में आपसे एक सवाल:**
क्या सुलोचना देवी और विराज को जो सज़ा मिली, वो काफी थी? क्या नैना का व्यवहार जायज़ था या वो भी उसी चक्र का हिस्सा थी? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।
**”अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आँखों को नम किया, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। कर्म के सिद्धांत को समझने और दूसरों को जागरूक करने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**
मूल लेखिका : सुमन सक्सेना