*पत्नी ने सास को घर से निकालकर सोचा कि अब सुकून की जिंदगी शुरू होगी, लेकिन पति ने सालगिरह पर उसे एक ऐसा ‘तोहफा’ दिया कि उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई। क्या हम अपने ही बुढ़ापे के लिए आज गड्ढा खोद रहे हैं?*
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शाम के सात बज रहे थे। समीर ने जैसे ही अपने फ्लैट की घंटी बजाई, अंदर से बर्तनों के गिरने की आवाज आई। उसने एक गहरी सांस ली। यह अब रोज की बात हो गई थी। जब से उसकी शादी ‘रिया’ से हुई थी, घर ‘घर’ कम और ‘कुरुक्षेत्र’ ज्यादा लगने लगा था।
दरवाजा खुला। सामने रिया खड़ी थी, चेहरे पर वही तल्खी, वही शिकायत।
“आ गए आप? या आज भी ऑफिस में ही रहने का मन था? वैसे भी इस घर में आता ही कौन है खुशी से?” रिया ने समीर का बैग लेते हुए ताना मारा।
समीर ने जूते उतारे और सोफे पर बैठ गया। “क्या हुआ रिया? आज फिर किस बात पर हंगामा है?”
“हंगामा? आपको यह हंगामा लगता है?” रिया की आवाज ऊंची हो गई। “आपकी माँ… हाँ, आपकी प्यारी माँ सुमित्रा देवी ने आज फिर मेरी किटी पार्टी की सहेलियों के सामने मेरी नाक कटवा दी। मैंने उनसे कहा था कि जब मेरी फ्रेंड्स आएं तो वे अपने कमरे में ही रहें। लेकिन नहीं, उन्हें तो बाहर आकर अपनी पुरानी बीमारियों का रोना रोना था। मिसेस खन्ना पूछ रही थीं कि ‘तुम्हारी सास इतना खांसती क्यों हैं? टीबी तो नहीं है?’ समीर, मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती।”
समीर ने माथा पकड़ लिया। “रिया, माँ बुजुर्ग हैं। उन्हें अस्थमा है, मौसम बदल रहा है तो खांसी आएगी ही। और यह तुम्हारा घर है, वे कहीं भी बैठ सकती हैं। तुम उन्हें कमरे में बंद कैसे कर सकती हो?”
“ओह प्लीज!” रिया चिल्लाई। “यह आदर्शवादी बातें अपने पास रखिए। मुझे मेरा स्पेस चाहिए। या तो इस घर में आपकी माँ रहेंगी या मैं। फैसला आपको करना है। मुझे घुटन होती है इस बुढ़िया के साथ।”
तभी अंदर के कमरे से सुमित्रा जी बाहर आईं। वे कांप रही थीं। शायद उन्होंने सब सुन लिया था।
“बहू… मैं तो बस पानी लेने बाहर आई थी। मुझे नहीं पता था तेरी सहेलियां बैठी हैं,” सुमित्रा जी ने सफाई देने की कोशिश की।
“बस! मुझे आपकी सफाई नहीं चाहिए,” रिया ने हाथ झाटक दिया। “समीर, सुन लिया आपने? कल तक इनका इंतजाम कहीं और कर दीजिये। वरना मैं मायके जा रही हूँ, और फिर कभी वापस नहीं आऊंगी। डाइवोर्स पेपर्स भिजवा दूंगी।”
समीर सन्न रह गया। एक तरफ उसकी माँ थी जिसने पति के गुजर जाने के बाद सिलाई-कढ़ाई करके उसे पाला था, उसे इंजीनियर बनाया था। और दूसरी तरफ उसकी पत्नी रिया थी, जिससे वह प्यार करता था और उनका पांच साल का बेटा ‘आरव’ भी था। आरव अभी अपने कमरे में हेडफोन लगाकर गेम खेल रहा था, शायद वह यह सब नहीं सुन रहा था, या शायद सुन रहा था और चुप था।
समीर ने रिया को समझाने की बहुत कोशिश की। “रिया, थोड़ा समय दो। हम कोई और रास्ता निकालेंगे।”
“कोई रास्ता नहीं। वृद्धाश्रम। बस यही एक रास्ता है,” रिया का फैसला अटल था।
अगले दिन समीर को कंपनी के काम से अचानक सिंगापुर जाना पड़ा। प्रोजेक्ट बहुत बड़ा था और वह मना नहीं कर सकता था। जाते-जाते उसने रिया के हाथ जोड़े थे, “रिया, जब तक मैं वापस न आऊं, माँ का ख्याल रखना। कोई ऐसा कदम मत उठाना जिससे हम बाद में नजरें न मिला सकें।”
रिया ने ऊपरी मन से सिर हिला दिया।
समीर के जाते ही रिया के दिमाग में शैतान जाग गया। उसे लगा कि यही सही मौका है। समीर तो एक हफ्ते बाद आएगा, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। फिर वह समीर को इमोशनली ब्लैकमेल करके मना ही लेगी।
तीसरे दिन सुबह, रिया ने सुमित्रा जी का सामान पैक करना शुरू कर दिया।
“बहू, यह क्या कर रही है?” सुमित्रा जी ने घबराते हुए पूछा।
“माजी, समीर ने फोन किया था। उन्होंने आपके लिए एक बहुत अच्छी जगह का इंतजाम किया है। वहां आपकी उम्र की बहुत सी महिलाएं हैं। आप वहां खुश रहेंगी। यहाँ तो आप बोर होती हैं न,” रिया ने बड़ी चालाकी से झूठ बोला।
सुमित्रा जी समझ गई थीं। बेटा ऐसा कभी नहीं कह सकता। यह बहू की ही चाल है। लेकिन उन्होंने विरोध नहीं किया। वे जानती थीं कि अगर वे यहाँ रहीं, तो बेटे का घर टूट जाएगा। बेटे की गृहस्थी बचाने के लिए माँ ने एक बार फिर जहर का घूंट पी लिया।
“ठीक है बहू। अगर इसमें ही तुम दोनों की खुशी है, तो मैं चली जाऊंगी,” सुमित्रा जी ने अपनी पुरानी संदूकची उठाई। जाते-जाते उन्होंने आरव के कमरे की तरफ देखा, वह स्कूल गया हुआ था। उनकी आँखों से दो बूंद आंसू टपके और वे रिया के साथ कार में बैठ गईं।
रिया ने शहर के बाहर स्थित ‘शांति निकेतन वृद्धाश्रम’ में उन्हें छोड़ दिया। मैनेजर को पैसे दिए और कहा, “इन्हें वापस मत भेजना। और अगर मेरा पति पूछे, तो कहना कि ये अपनी मर्जी से आई हैं।”
सुमित्रा जी गेट के अंदर चली गईं। उन्होंने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। रिया ने राहत की सांस ली। “बला टली। अब घर मेरा है।”
एक हफ्ते बाद समीर वापस आया। वह बहुत खुश था। उसके लिए डील पक्की हो गई थी। वह आरव और रिया के लिए ढेर सारे तोहफे लाया था।
घर में घुसते ही उसे अजीब सा सन्नाटा लगा। “माँ! माँ मैं आ गया,” उसने आवाज लगाई।
रिया पानी लेकर आई। “अरे, आप फ्रेश हो जाइये।”
“माँ कहाँ हैं?” समीर ने पूछा।
रिया ने चेहरे पर झूठी उदासी ओढ़ ली। “समीर… वो… क्या बताऊं। आपके जाने के बाद मम्मी जी की एक पुरानी दोस्त का फोन आया था। वो बनारस जा रही थीं तीर्थ यात्रा पर। मम्मी जी ने जिद पकड़ ली कि मुझे भी जाना है। मैंने बहुत रोका, कहा कि समीर को आ जाने दीजिये। पर वो नहीं मानीं। कह रही थीं कि अब बुढ़ापे में भगवान का नाम लेना है। वो चली गईं।”
समीर ने रिया की आँखों में देखा। रिया नजरें चुरा रही थी।
“अच्छा? बनारस? फोन तो कर लेतीं मुझे,” समीर ने शांत स्वर में कहा।
“वो… उनका फोन शायद खराब हो गया था। आप चिंता मत कीजिये, हफ्ते-दो हफ्ते में आ जाएंगी,” रिया ने बात संभाली।
समीर ने कुछ नहीं कहा। वह चुपचाप अपने कमरे में चला गया। रिया खुश थी कि उसका झूठ चल गया। समीर ने हंगामा नहीं किया, इसका मतलब वह भी अंदर ही अंदर यही चाहता था।
दो दिन बीत गए। समीर बिल्कुल सामान्य व्यवहार कर रहा था। न उसने माँ के बारे में दोबारा पूछा, न ही कोई गुस्सा दिखाया। रिया को लगा कि उसकी जीत हो गई है।
तीसरे दिन उनकी शादी की सालगिरह थी। रिया सुबह से बहुत उत्साहित थी। उसने सोचा था कि आज समीर उसे कोई डायमंड रिंग या कोई बड़ी सरप्राइज देगा।
शाम को समीर ने घर पर एक छोटा सा डिनर रखा। खाना खाने के बाद, समीर ने अपनी जेब से एक बड़ा सा लिफाफा निकाला।
“हैप्पी एनिवर्सरी रिया,” समीर मुस्कुराया।
रिया की आँखें चमक उठीं। “ओह थैंक यू समीर! मुझे पता था तुम कुछ खास दोगे। क्या है इसमें? फ्लैट के पेपर्स?”
रिया ने उत्साह से लिफाफा खोला। अंदर कुछ कागजात थे। उसने पढ़ना शुरू किया। जैसे-जैसे वह पढ़ती गई, उसके चेहरे का रंग उड़ता गया। उसके हाथ कांपने लगे।
वह एक रजिस्ट्रेशन फॉर्म था—’शांति निकेतन वृद्धाश्रम’ का। और वह फॉर्म ‘प्रीमियम कपल सुइट’ (Premium Couple Suite) के लिए था, जिसमें दो लोगों के रहने की व्यवस्था थी। नाम लिखे थे—समीर और रिया। बुकिंग की तारीख—आज से ठीक 25 साल बाद की।
“समीर… ये… ये क्या भद्दा मजाक है?” रिया चिल्लाई। “तुमने वृद्धाश्रम में हमारे लिए कमरा बुक किया है? तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है?”
समीर अब शांत नहीं था। उसकी आँखों में एक अजीब सी सख्ती थी। उसने आरव को अपने पास बुलाया जो सोफे पर बैठकर सब देख रहा था।
“रिया, यह मजाक नहीं है। यह ‘इन्वेस्टमेंट’ है,” समीर ने गंभीर स्वर में कहा।
“इन्वेस्टमेंट?”
“हाँ। देखो रिया, आज तुमने मेरी माँ को घर से निकाल दिया। हाँ, मुझे पता है कि वो बनारस नहीं गईं। मैं परसों ही ‘शांति निकेतन’ गया था। मैं माँ से मिला था। उन्होंने मुझे सब सच बता दिया, लेकिन फिर भी मुझसे कसम ली कि मैं तुमसे लड़ूँ नहीं ताकि तुम्हारा घर न टूटे।”
रिया का चेहरा शर्म और डर से पीला पड़ गया।
समीर ने आगे कहा, “मैंने सोचा कि जब माँ जैसी देवी को इस घर में जगह नहीं मिली, तो भविष्य में हमें कौन जगह देगा? आरव सब देख रहा है। बच्चे वही सीखते हैं जो वो देखते हैं, वो नहीं जो हम सिखाते हैं। आज आरव ने देखा कि उसकी माँ ने उसकी दादी को कैसे निकाला। 25 साल बाद, जब आरव की शादी होगी, तो उसकी पत्नी भी शायद तुम्हारे जैसी ही होगी। तब वो हमें भी धक्के मारकर निकालेगी।”
समीर की आवाज भारी हो गई। “उस वक्त हमें धक्के खाकर सड़क पर न सोना पड़े, इसलिए मैंने आज ही हमारे लिए उस वृद्धाश्रम में बुकिंग करा दी है। सुना है 25 साल पहले बुकिंग कराने पर अच्छा डिस्काउंट मिलता है। यह मेरा तुम्हें तोहफा है—’सुरक्षित बुढ़ापा’।”
समीर ने आरव की तरफ देखा। “क्यों बेटा आरव? तुम भी अपनी बीवी की बात मानकर हमें निकाल दोगे न?”
पाँच साल का आरव मासूमियत से बोला, “हाँ पापा। मम्मी कहती हैं न कि बुड्ढे लोग घर गंदा करते हैं। जब आप बुड्ढे हो जाओगे तो मैं भी आपको वहीं छोड़ आऊंगा जहाँ मम्मी ने दादी को छोड़ा है। फिर मेरा घर साफ़ रहेगा।”
आरव के इन शब्दों ने रिया के दिल पर हथौड़े की तरह चोट की। उसे लगा जैसे किसी ने उसे आईने के सामने खड़ा कर दिया हो और उसका चेहरा बदसूरत नजर आ रहा हो। उसका अपना बेटा… उसके जिगर का टुकड़ा… आज उसे ही घर से निकालने की बात कर रहा था।
समीर ने लिफाफा मेज पर रखा। “रिया, कर्म लौटकर आते हैं। यह प्रकृति का नियम है। तुमने जो बीज आज बोया है, उसका फल हमें ही खाना पड़ेगा। इसलिए मैंने तैयारी कर ली है।”
रिया अपने घुटनों के बल गिर पड़ी। वह फूट-फूट कर रोने लगी। “मुझे माफ़ कर दो समीर। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं अंधी हो गई थी। मैं अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही थी। मुझे नहीं जाना वृद्धाश्रम। मुझे मेरा घर चाहिए, मेरा परिवार चाहिए।”
“घर दीवारों से नहीं, बुजुर्गों के आशीर्वाद से बनता है रिया,” समीर ने कहा। “अगर तुम्हें सच में पछतावा है, तो इस माफी की हकदार मैं नहीं, माँ हैं।”
रिया उसी वक्त उठी। रात के 10 बज रहे थे। “समीर, गाड़ी निकालिये। मुझे अभी माँ जी को लेने जाना है। मैं एक पल भी उनके बिना नहीं रह सकती। मैं आरव को यह नहीं सिखाना चाहती कि मां-बाप बोझ होते हैं।”
वे उसी रात वृद्धाश्रम पहुंचे। सुमित्रा जी एक छोटे से कमरे में, लोहे के पलंग पर लेटी भगवान का नाम ले रही थीं। रिया को देखते ही वे घबरा गईं। “क्या हुआ बहू? मैंने तो किसी से कुछ नहीं कहा। तुम समीर से मत लड़ना।”
रिया दौड़कर सुमित्रा जी के पैरों में गिर पड़ी और बच्चों की तरह बिलखने लगी। “माँ जी, मुझे माफ़ कर दीजिये। मैं बहुत बुरी हूँ। मैंने आपको घर से नहीं, अपनी किस्मत को घर से निकाल दिया था। चलिए घर चलिए। आपके बिना वो घर, घर नहीं, मकान है।”
समीर दरवाजे पर खड़ा था। सुमित्रा जी ने रिया को उठाया और गले लगा लिया। “पगली, माँ कभी बच्चों से नाराज होती है क्या? चल, घर चल।”
वापसी में कार में आरव अपनी दादी की गोद में सोया हुआ था। समीर ने रिया की तरफ देखा। रिया ने वो वृद्धाश्रम का फॉर्म फाड़कर खिड़की से बाहर फेंक दिया था।
समीर मुस्कुराया। उसने आज सिर्फ अपनी माँ को वापस नहीं पाया था, उसने अपने और रिया के बुढ़ापे को भी सुरक्षित कर लिया था। उसने रिया को सिखा दिया था कि **इज्जत कमाना बैंक बैलेंस बनाने से ज्यादा जरूरी है, क्योंकि बुढ़ापे में पैसा नहीं, औलाद का सहारा काम आता है।**
उस रात घर की दीवारों ने फिर से हंसी और सुकून महसूस किया। रिया अब बदल चुकी थी। अब उसे सास की खांसी में बीमारी नहीं, बल्कि एक माँ की मौजूदगी सुनाई देती थी। उसने समझ लिया था कि सास भी माँ होती है, और अगर आज वो सास की सेवा करेगी, तो कल उसकी बहू उसकी सेवा करेगी।
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**कहानी का शीर्षक:**
**कर्मों की गूंज और बुढ़ापे की ‘एडवांस बुकिंग’**
**हूक लाइन:**
*पत्नी ने सास को घर से निकालकर सोचा कि अब सुकून की जिंदगी शुरू होगी, लेकिन पति ने सालगिरह पर उसे एक ऐसा ‘तोहफा’ दिया कि उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई। क्या हम अपने ही बुढ़ापे के लिए आज गड्ढा खोद रहे हैं?*
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**कहानी के अंत में एक विचार:**
दोस्तों, समीर ने जो तरीका अपनाया, क्या वो सही था? अक्सर हम अपनी जवानी के जोश में यह भूल जाते हैं कि बुढ़ापा हमारा भी इंतजार कर रहा है। यह कहानी एक चेतावनी है हर उस इंसान के लिए जो अपने बुजुर्गों को बोझ समझता है। याद रखिये, आपके बच्चे वही करेंगे जो आप अपने माता-पिता के साथ कर रहे हैं।
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लेखिका : मीना सहाय