अनिकेत के जीवन में पिछले कुछ महीने किसी डरावने सपने से कम नहीं थे। पिता के अचानक हुए देहांत के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी उसके युवा कंधों पर आ गिरी थी। घर में एक बीमार माँ और कॉलेज के अंतिम वर्ष में पढ़ रही छोटी बहन रिया थी। पिता की जमा-पूंजी माँ के इलाज में और घर के खर्चों में धीरे-धीरे खत्म हो रही थी।
अनिकेत की नौकरी भी उस दौर में छूट गई थी जब बाजार में मंदी का भयानक असर था। वह दिन-रात एक करके नौकरियां तलाशता, अनगिनत दफ्तरों के चक्कर काटता, लेकिन हर जगह से उसे सिर्फ निराशा ही हाथ लगती। कभी अनुभव की कमी, तो कभी सिफारिश का ना होना उसके सपनों के आगे दीवार बनकर खड़ा हो जाता।
आज का दिन उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण था। शहर की एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में उसका फाइनल इंटरव्यू था। इस नौकरी का मिलना उसके परिवार के लिए किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं था। सुबह-सुबह माँ ने अपने कांपते हाथों से उसके माथे पर दही-चीनी का टीका लगाया
और आशीर्वाद देते हुए कहा, “जा बेटा, ईश्वर ने चाहा तो आज तेरे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे। मेरी दुआएं तेरे साथ हैं।” रिया ने भी मुस्कुराते हुए उसे शुभकामना दी और कहा कि वह शाम को उसके लिए उसका पसंदीदा गाजर का हलवा बनाएगी, क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि आज भइया को नौकरी जरूर मिलेगी।
अनिकेत के सीने में उम्मीद और घबराहट का अजीब सा तूफान उठ रहा था। उसने अपनी पुरानी लेकिन साफ इस्तरी की हुई शर्ट पहनी, अपनी फाइल हाथ में ली और बस स्टॉप की तरफ निकल पड़ा।
शहर का ट्रैफिक हमेशा की तरह रेंग रहा था। अनिकेत बस की खिड़की से बाहर देखते हुए अपने मन ही मन इंटरव्यू के सवालों के जवाब दोहरा रहा था। बस स्टॉप पर उतरने के बाद उसे कंपनी के दफ्तर तक पहुंचने के लिए लगभग एक किलोमीटर पैदल चलना था। वह तेज कदमों से आगे बढ़ रहा था, उसकी नजरें बार-बार अपनी कलाई घड़ी पर जा रही थीं। इंटरव्यू शुरू होने में सिर्फ पैंतालीस मिनट बचे थे और वह समय पर पहुंचना चाहता था ताकि खुद को शांत कर सके।
तभी चौराहे के पास उसने एक दृश्य देखा जिसने उसके कदमों को रोक दिया। एक बुजुर्ग व्यक्ति, जिनकी उम्र लगभग सत्तर के पार होगी, सड़क पार करते समय एक तेज रफ्तार बाइक की चपेट में आकर गिर पड़े थे। बाइक वाला बिना रुके वहां से भाग निकला। बुजुर्ग के माथे से खून बह रहा था और उनके चश्मे का कांच टूटकर सड़क पर बिखर गया था। उनके हाथ में मौजूद कुछ कागजात हवा में उड़ गए थे। लेकिन जो बात सबसे ज्यादा झकझोर देने वाली थी, वह यह थी कि आसपास से गुजरने वाले लोग बस एक नजर देखते और अपने रास्ते चले जाते। किसी के पास इतना समय नहीं था कि रुककर उस वृद्ध की मदद करे। कुछ लोग तो मोबाइल निकालकर वीडियो भी बनाने लगे थे।
अनिकेत के मन में एक क्षण के लिए द्वंद्व उठा। ‘अगर मैं यहाँ रुका, तो मेरा इंटरव्यू छूट जाएगा। यह नौकरी मेरी जिंदगी का आखिरी सहारा है। घर में माँ इंतजार कर रही है।’ यह स्वार्थी विचार उसके मन में कौंधा, लेकिन अगले ही पल उसके कानों में उसके स्वर्गीय पिता की आवाज गूंजी—”बेटा, इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता। अगर तुम्हारे सामने कोई तकलीफ में है और तुम उसकी मदद कर सकते हो, तो कभी पीछे मत हटना। ईश्वर सब देखता है।”
अनिकेत ने अपनी फाइल अपने बैग में रखी और भीड़ को चीरता हुआ उस बुजुर्ग के पास पहुंचा। उसने अपनी साफ रुमाल निकाली और बुजुर्ग के माथे से बहते खून को रोकने के लिए उसे कसकर बांध दिया। “बाबा, आप चिंता मत कीजिए, मैं आ गया हूँ,” अनिकेत ने हौसला देते हुए कहा। उसने जल्दी से आसपास बिखरे उनके कागजात समेटे और बुजुर्ग को सहारा देकर उठाया। पास ही एक छोटा सा क्लिनिक था। बिना एक पल गँवाए, अनिकेत ने एक ऑटो रुकवाया और उन्हें क्लिनिक ले गया।
डॉक्टर ने तुरंत पट्टी की और कुछ दवाइयां दीं। अनिकेत ने अपनी जेब टटोली, उसके पास बस उतने ही पैसे थे जितने से वह महीने भर बस का किराया दे सकता था। लेकिन उसने बिना सोचे क्लिनिक का बिल चुका दिया। बुजुर्ग व्यक्ति अब होश में थे और दर्द के बावजूद उनकी आँखों में अनिकेत के लिए अथाह कृतज्ञता थी।
“बेटा, आज के जमाने में तुम्हारे जैसा इंसान मिलना मुश्किल है। तुमने एक अजनबी के लिए अपना कीमती समय और पैसा बर्बाद कर दिया। तुम्हारा नाम क्या है बेटा?” बुजुर्ग ने कांपती आवाज में पूछा।
अनिकेत ने मुस्कुराते हुए उनके हाथ अपने हाथों में लिए और कहा, “बाबा, मेरा नाम अनिकेत है। और मैंने कोई अहसान नहीं किया, जो एक बेटे को करना चाहिए, बस वही किया है। मेरी जगह मेरे पिता होते तो वे भी यही करते। आप अब कैसा महसूस कर रहे हैं?”
बुजुर्ग ने गहरे संतोष के साथ उसकी ओर देखा। “मैं ठीक हूँ बेटा। मेरे परिवार वाले रास्ते में हैं, वे आते ही होंगे। तुम कहाँ जा रहे थे इतनी हड़बड़ी में? तुम्हारे कपड़े भी थोड़े खराब हो गए हैं।”
अनिकेत की नजर अचानक दीवार पर टंगी घड़ी पर पड़ी। इंटरव्यू का समय निकल चुका था। उसके चेहरे पर एक पल के लिए निराशा की गहरी छाया तैर गई, लेकिन उसने तुरंत खुद को संभाल लिया। “कुछ नहीं बाबा, एक छोटा सा काम था। वह तो मैं कल भी कर लूंगा। आप जब तक अपने घर वालों के साथ सुरक्षित चले नहीं जाते, मैं आपको छोड़कर नहीं जाऊंगा।”
लगभग एक घंटे बाद, एक बड़ी सी कार क्लिनिक के बाहर रुकी और एक घबराया हुआ युवक अंदर आया। वह बुजुर्ग का बेटा था। अपने पिता को सुरक्षित देखकर उसने अनिकेत का बार-बार धन्यवाद किया। बुजुर्ग ने अनिकेत के सिर पर हाथ रखा और कहा, “ईश्वर तुम्हारा हमेशा भला करे, मेरे बच्चे।”
अनिकेत जब क्लिनिक से बाहर निकला, तो उसकी चाल बहुत धीमी हो गई थी। वह सीधे कंपनी के दफ्तर गया, इस उम्मीद में कि शायद उसे कोई मौका मिल जाए। लेकिन रिसेप्शनिस्ट ने उसे साफ कह दिया कि इंटरव्यू खत्म हो चुके हैं और जो उम्मीदवार समय पर नहीं आते, कंपनी उन्हें कभी काम पर नहीं रखती। अनिकेत भारी कदमों से घर लौट आया। माँ ने जब उसका उतरा हुआ चेहरा देखा, तो वह सब समझ गईं। उन्होंने उसे गले लगाया और कहा, “कोई बात नहीं बेटा, शायद ईश्वर ने तेरे लिए कुछ और ही सोच रखा होगा।” अनिकेत ने घर में किसी को उस दुर्घटना के बारे में नहीं बताया। वह नहीं चाहता था कि उसकी वजह से घर वाले सोचें कि उसने एक अच्छी नौकरी का मौका अपने हाथों से गंवा दिया।
अगले कुछ दिन उदासी में बीते। अनिकेत फिर से पुरानी दिनचर्या में लौट आया, अखबारों में विज्ञापन खोजना और निराशा के बीच उम्मीद की कोई किरण तलाशना।
पांच दिन बाद, जब अनिकेत सुबह चाय पी रहा था, तभी उसके फोन की घंटी बजी। अनजान नंबर था।
“हेलो, क्या मैं अनिकेत जी से बात कर रहा हूँ?” दूसरी तरफ से एक भारी और पेशेवर आवाज आई।
“जी, मैं अनिकेत बोल रहा हूँ।”
“मैं ‘रिलायंस ग्लोबल इंडस्ट्रीज’ के एचआर डिपार्टमेंट से बात कर रहा हूँ। हमारे चेयरमैन सर आज आपसे मिलना चाहते हैं। क्या आप ग्यारह बजे ऑफिस आ सकते हैं?”
अनिकेत हैरान रह गया। यह वही कंपनी थी जिसका इंटरव्यू उसका छूट गया था। उसने तो कोई नई अर्जी भी नहीं दी थी। फिर उसे अचानक क्यों बुलाया जा रहा है? उसने तुरंत हाँ कर दी और माँ का आशीर्वाद लेकर घर से निकल पड़ा।
जब अनिकेत उस आलीशान दफ्तर की सबसे ऊपरी मंजिल पर स्थित चेयरमैन के केबिन में दाखिल हुआ, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। विशाल मेज के पीछे, एक बड़ी सी कुर्सी पर वही बुजुर्ग व्यक्ति बैठे थे जिनकी उसने उस दिन सड़क पर मदद की थी। उनके माथे पर अभी भी पट्टी का एक छोटा सा निशान था।
अनिकेत को देखते ही उनके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई। वे अपनी कुर्सी से उठे और आगे बढ़कर उन्होंने अनिकेत को गले लगा लिया।
“आओ बेटा अनिकेत। मुझे तुम्हारी ही राह थी,” उन्होंने कहा।
अनिकेत स्तब्ध खड़ा था। “बाबा… आप? आप इस कंपनी के चेयरमैन हैं?”
बुजुर्ग व्यक्ति, जिनका नाम रामनारायण था, मुस्कुराए। “हाँ बेटा। उस दिन मैं अपनी कार खराब होने की वजह से पैदल ही कुछ दूर से आ रहा था। तभी वह हादसा हो गया। तुम नहीं होते तो शायद आज मैं यहाँ खड़ा न होता। जब तुमने मुझे अपना नाम बताया, तो मेरे बेटे ने रिसेप्शन पर पूछताछ की कि क्या उस दिन कोई अनिकेत नाम का लड़का इंटरव्यू देने आया था। तब पता चला कि तुम मेरी जान बचाने के चक्कर में अपना सबसे जरूरी इंटरव्यू छोड़ बैठे थे।”
उन्होंने अपनी मेज से एक फाइल उठाई और उसे अनिकेत की तरफ बढ़ाते हुए बोले, “बेटा, कागजी डिग्रियां और अनुभव तो मैं बाजार से पैसे देकर भी खरीद सकता हूँ। लेकिन ईमानदारी, इंसानियत और बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के लिए खड़ा होने का जो गुण तुम्हारे अंदर है, वह किसी यूनिवर्सिटी में नहीं पढ़ाया जाता। उस दिन तुमने बिना यह जाने कि मैं कौन हूँ, मेरी मदद की। तुमने अपना स्वार्थ नहीं देखा। यह दुनिया तुम्हारे जैसे नेक लोगों के दम पर ही बची हुई है।”
रामनारायण जी ने वह फाइल अनिकेत के हाथों में थमा दी। “यह कंपनी में रीजनल मैनेजर के पद का नियुक्ति पत्र है। यह कोई अहसान नहीं है, बेटा। यह तुम्हारी उस शराफत और उस बेहतरीन परवरिश का फल है जो तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें दी है। तुम्हारी सीवी मैंने पढ़ी है, तुम इस पद के पूरी तरह योग्य हो। बस तुम्हारा इंटरव्यू मैंने सड़क पर ले लिया था, जिसमें तुम उम्मीद से कहीं ज्यादा नंबरों से पास हुए हो।”
अनिकेत की आँखें आंसुओं से डबडबा गईं। उसका गला रूँध गया था। उसने दोनों हाथ जोड़ लिए। “सर… मैं… मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या कहूँ। आपने मेरी और मेरे परिवार की जिंदगी बदल दी।”
रामनारायण जी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और बेहद स्नेह से कहा, “बेटा, याद रखना… सच्चे दिल से किया गया कोई भी काम, बोया गया कोई भी अच्छा बीज कभी बेकार नहीं जाता। वह हमेशा एक विशाल पेड़ बनकर लौटता है। कभी वह किसी की दुआओं के रूप में आता है, कभी एक बेहतरीन अवसर के रूप में, तो कभी किसी अजनबी के जीवन को रोशन कर देने वाले चमत्कार के रूप में। तुमने उस दिन इंसानियत का जो कर्ज चुकाया था, ब्रह्मांड ने उसे सूत समेत तुम्हें वापस लौटा दिया है।”
अनिकेत ने आगे बढ़कर रामनारायण जी के पैर छुए। “पिता जी, आज मुझे यह जीवन का सबसे बड़ा सबक मिल गया है कि इंसानियत में निवेश किया गया एक भी पल कभी व्यर्थ नहीं जाता। मैं पूरी लगन, ईमानदारी और मेहनत से आपकी इस कंपनी और आपके भरोसे को कभी टूटने नहीं दूंगा। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।”
जब अनिकेत उस ऊँची इमारत से बाहर निकला, तो शहर का शोर उसे संगीत जैसा लग रहा था। हवाओं में एक अजीब सी ताजगी थी। उसने तुरंत अपनी माँ को फोन किया और जब उसने रोते हुए पूरी बात बताई, तो फोन के उस पार माँ की सिसकियाँ और प्रार्थनाएं अनिकेत के कानों में रस घोल रही थीं। आज वह सिर्फ एक नौकरी लेकर नहीं लौट रहा था, बल्कि अपने पिता की दी हुई उस सीख को एक सुनहरे सच में बदलते हुए देखकर लौट रहा था कि अच्छे कर्मों की गूंज हमेशा लौटकर आती है।
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