अक्टूबर का महीना था और हवा में एक हल्की सी गुलाबी ठंडक घुलने लगी थी। त्योहारों का मौसम अपने पूरे शबाब पर था, और आज तो सुहागिनों का सबसे बड़ा त्योहार ‘करवा चौथ’ था। राधिका जी के घर में सुबह से ही एक अलग सी रौनक और उल्लास का माहौल था। राधिका जी स्वभाव से जितनी सरल थीं, उतनी ही दयालु भी। उनके घर में पिछले पांच सालों से काम करने वाली कमला उनके लिए सिर्फ एक नौकरानी नहीं, बल्कि घर के एक सदस्य जैसी ही थी। कमला का पति बिरजू, राधिका जी के पति राजीव जी की गाड़ी चलाता था। दोनों पति-पत्नी इसी घर के अहाते में बने सर्वेंट क्वार्टर में रहते थे और इस परिवार को ही अपना सब कुछ मानते थे।
कमला सुबह चार बजे से ही उठकर सरगी की तैयारी में राधिका जी का हाथ बंटा रही थी। राधिका जी ने उसे भी अपने साथ ही सरगी खिलाई थी। दोनों ने एक साथ निर्जला व्रत रखा था। दिन भर घर के काम काज, पूजा की तैयारी, और फिर दोपहर में मोहल्ले की औरतों के साथ बैठकर मेहंदी लगवाने का दौर चला। राधिका जी ने कमला के हाथों में भी शगुन की मेहंदी लगवाई और उसे पहनने के लिए एक बहुत ही खूबसूरत लाल रंग की बनारसी साड़ी दी। कमला उस साड़ी को देखकर खुशी से फूली नहीं समा रही थी। उसने मन ही मन सोचा था कि आज जब बिरजू उसे इस नई साड़ी में देखेगा, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह जाएंगी।
शाम ढलने लगी थी। पूजा की थाली सज चुकी थी। राधिका जी ने कमला से कहा, “कमला, जा तू भी अपने क्वार्टर में जाकर नहा-धोकर यह नई साड़ी पहन ले। जब चाँद निकलेगा, तो तू भी मेरे साथ ही छत पर आकर अपना व्रत खोलना। बिरजू और राजीव जी भी तब तक ऑफिस से आ ही जाएंगे।”
कमला ने सिर हिलाया और खुशी-खुशी अपने क्वार्टर की तरफ चल दी। क्वार्टर में जाकर उसने देखा कि पूजा का कुछ सामान, जो उसे अपनी अलग थाली के लिए चाहिए था, वह खत्म हो गया है। उसने सोचा कि चाँद निकलने में अभी एक-डेढ़ घंटा बाकी है, क्यों न दौड़कर नुक्कड़ वाली दुकान से सामान ले आऊँ। वह जल्दी-जल्दी कदमों से सड़क की तरफ बढ़ गई।
त्योहार का दिन होने के कारण सड़क पर भारी भीड़ थी। हर कोई जल्दी में था। कमला के दिमाग में बस यही चल रहा था कि जल्दी से सामान लेकर लौटूँ, नहाकर नई साड़ी पहनूँ और बिरजू के साथ छत पर जाकर चाँद देखूँ। वह सड़क पार करने ही वाली थी कि तभी पीछे से एक बेकाबू रफ्तार से आती हुई कार ने उसे ज़ोरदार टक्कर मार दी।
टक्कर इतनी तेज़ थी कि कमला हवा में उछलकर दूर जा गिरी। उसके सिर और पैर से खून की धार बह निकली। कार वाला पल भर रुके बिना वहां से फरार हो गया। कुछ ही सेकंड में वहां लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई। कोई पुलिस को फोन कर रहा था, तो कोई एम्बुलेंस को, लेकिन कोई भी आगे बढ़कर उस खून से लथपथ औरत को उठाने की हिम्मत नहीं कर रहा था।
उसी वक्त, राजीव जी अपनी कार से घर लौट रहे थे। गाड़ी बिरजू चला रहा था। सड़क पर भारी जाम और लोगों की भीड़ देखकर राजीव जी ने कहा, “बिरजू, ज़रा उतर कर देख तो क्या हुआ है, इतना जाम क्यों लगा है? घर पहुँचने में वैसे ही देर हो रही है, राधिका भूखी-प्यासी इंतज़ार कर रही होगी।”
बिरजू ने गाड़ी साइड में लगाई और भीड़ को चीरता हुआ आगे बढ़ा। जैसे ही उसकी नज़र सड़क पर पड़ी, उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। सड़क पर खून से लथपथ पड़ी वह कोई और नहीं, उसकी अपनी कमला थी। बिरजू के मुँह से एक दिल दहला देने वाली चीख निकल गई, “कमला!”
वह पागलों की तरह ज़मीन पर बैठ गया और कमला के सिर को अपनी गोद में रख लिया। उसकी आवाज़ सुनकर राजीव जी भी गाड़ी से बाहर आ गए। कमला की हालत देखकर वे भी सन्न रह गए। बिना एक पल की देरी किए, राजीव जी ने बिरजू की मदद से कमला को अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर लिटाया और शहर के सबसे बड़े अस्पताल की तरफ गाड़ी दौड़ा दी।
अस्पताल पहुँचते ही कमला को सीधे इमरजेंसी वार्ड में ले जाया गया। डॉक्टरों की टीम तुरंत उसके इलाज में जुट गई। बिरजू बाहर ज़मीन पर बैठा फूट-फूट कर रो रहा था। राजीव जी ने तुरंत राधिका जी को फोन किया और कांपती हुई आवाज़ में सारी घटना बता दी।
राधिका जी, जो घर में सोलह शृंगार किए पूजा की थाली लिए चाँद का इंतज़ार कर रही थीं, यह खबर सुनते ही सुन्न रह गईं। उन्होंने पूजा की थाली वहीं छोड़ी और तुरंत एक ऑटो पकड़कर अस्पताल की तरफ भाग लीं।
जब राधिका जी अस्पताल पहुँचीं, तो डॉक्टर बाहर आए। उनका चेहरा बेहद तनावग्रस्त था। डॉक्टर ने राजीव जी और बिरजू की तरफ देखते हुए कहा, “मरीज़ की हालत बहुत नाज़ुक है। सिर में गहरी चोट आई है और खून बहुत ज़्यादा बह चुका है। उनकी जान बचाने के लिए हमें तुरंत ‘ओ-नेगेटिव’ (O-Negative) खून की ज़रूरत है। यह एक दुर्लभ ब्लड ग्रुप है और हमारे ब्लड बैंक में अभी यह उपलब्ध नहीं है। अगर अगले पंद्रह मिनट में खून का इंतज़ाम नहीं हुआ, तो हम इन्हें नहीं बचा पाएंगे।”
यह सुनकर बिरजू पछाड़ खाकर गिर पड़ा। राजीव जी तुरंत अपने जान-पहचान वालों को फोन घुमाने लगे, लेकिन ‘ओ-नेगेटिव’ खून इतनी जल्दी मिलना असंभव सा लग रहा था।
तभी राधिका जी आगे आईं। उनकी आँखें डबडबाई हुई थीं, लेकिन आवाज़ में एक दृढ़ संकल्प था। उन्होंने डॉक्टर से कहा, “डॉक्टर साहब, मेरा ब्लड ग्रुप ‘ओ-नेगेटिव’ है। आप मेरा खून ले लीजिए, लेकिन कमला को कुछ नहीं होना चाहिए।”
राजीव जी ने हैरानी से राधिका जी की तरफ देखा, “राधिका! तुम सुबह से निर्जला व्रत पर हो। तुम्हारे शरीर में पानी की एक बूँद नहीं है। इस कमज़ोरी की हालत में खून देना तुम्हारे लिए जानलेवा हो सकता है।”
डॉक्टर ने भी हामी भरते हुए कहा, “मैडम, आपके पति सही कह रहे हैं। खाली पेट और बिना पानी पिए हम आपका ब्लड डोनेशन नहीं ले सकते। इसके लिए आपको पहले कुछ खाना-पीना होगा, तभी हम आपका खून ले सकेंगे।”
राधिका जी के सामने अब एक बड़ा धर्मसंकट था। एक तरफ उनकी बरसों की आस्था, उनका अखंड करवा चौथ का व्रत था, जिसे तोड़ने का मतलब था अपशगुन। और दूसरी तरफ, एक जीवन था, एक ऐसा सुहाग था जो अस्पताल के बिस्तर पर मौत से लड़ रहा था।
राधिका जी ने एक पल के लिए अपनी मेंहदी रची हथेलियों को देखा, फिर ज़मीन पर रोते हुए बिरजू को देखा। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के पास खड़े एक वॉर्ड बॉय से कहा, “भैया, ज़रा कैंटीन से एक गिलास जूस ला देना।”
राजीव जी और बिरजू अवाक् रह गए। राधिका जी ने वह जूस का गिलास अपने हाथों में लिया। उन्होंने आँखें बंद कीं, ईश्वर का ध्यान किया और एक ही सांस में वह जूस पी लिया। चाँद निकलने से पहले, पति के हाथों से पानी पिए बिना, एक सुहागन ने अपना करवा चौथ का व्रत तोड़ दिया था।
“अब मेरा खून निकालिए डॉक्टर साहब, मेरी कमला को बचाइए,” राधिका जी ने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा।
अगले कुछ घंटे अस्पताल के उस गलियारे में एक अजीब सी खामोशी और प्रार्थनाओं के बीच गुज़रे। राधिका जी का खून कमला की रगों में चढ़ाया जा रहा था। व्रत टूटने और खून देने के कारण राधिका जी को चक्कर आ रहे थे, लेकिन राजीव जी ने उन्हें अपने मजबूत कंधों का सहारा दे रखा था।
रात के करीब ग्यारह बजे डॉक्टर चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान लिए बाहर आए। “आप लोगों की प्रार्थना और मैडम के खून ने चमत्कार कर दिया है। मरीज़ अब खतरे से बाहर है। उन्हें होश आ गया है।”
यह सुनते ही बिरजू राधिका जी और राजीव जी के पैरों में गिर पड़ा और दहाड़ें मार-मार कर रोने लगा। “मेमसाब, आज आपने मेरे सुहाग को बचा लिया। मैं जन्म-जन्म तक आपका यह कर्ज़ नहीं उतार पाऊंगा।” राधिका जी ने उसे उठाकर गले लगा लिया।
कुछ देर बाद, जब नर्स ने उन्हें अंदर जाने की इजाज़त दी, तो तीनों कमरे में दाखिल हुए। कमला के सिर पर पट्टियां बंधी थीं। मशीन की धीमी-धीमी आवाज़ आ रही थी। उसने भारी पलकों से आँखें खोलीं। अपने सामने बिरजू, राजीव जी और राधिका जी को देखकर उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
कमला ने बहुत ही कमज़ोर आवाज़ में पूछा, “मेमसाब… चाँद… चाँद निकल आया क्या? आपका व्रत…”
बिरजू ने रोते हुए कमला का हाथ अपने हाथों में ले लिया और कहा, “कमली, आज तेरी मेमसाब ने तुझे अपना खून देकर तेरी जान बचाई है। तेरा सुहाग बचाने के लिए उन्होंने अपना निर्जला व्रत, चाँद देखने से पहले ही तोड़ दिया।”
यह सुनकर कमला बुरी तरह बिलख पड़ी। उसने दर्द से कराहते हुए अपने हाथ जोड़ने की कोशिश की, “हे भगवान! यह क्या अनर्थ हो गया। मुझ गरीब की जान बचाने के लिए, मेरे सुहाग की खातिर, मेमसाब आपने अपना इतना बड़ा व्रत खंडित कर दिया? आज करवा चौथ के दिन यह कैसा पाप हो गया मुझसे।”
राधिका जी ने आगे बढ़कर कमला के दोनों हाथों को चूम लिया। उनकी अपनी आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। उन्होंने बहुत ही कोमल और आत्मीय स्वर में कहा, “चुप कर पगली। पाप नहीं, आज मैंने अपने जीवन का सबसे बड़ा पुण्य कमाया है। करवा चौथ का व्रत एक सुहागन अपने सुहाग की लंबी उम्र के लिए रखती है। लेकिन आज, एक सुहागन का सुहाग उजड़ने से बचाकर, मुझे जो सुकून मिला है, वो दुनिया के किसी व्रत या उपवास में नहीं है। और रही बात चाँद की…”
राधिका जी ने कमरे की खिड़की से बाहर आसमान की तरफ इशारा किया, जहाँ बादलों के बीच से एक चमकता हुआ गोल चाँद झांक रहा था। “…चाँद तो आसमान में भी निकल आया है कमला। लेकिन मेरे लिए आज असली चाँद तेरा यह मुस्कुराता हुआ चेहरा है, और मेरा असली करवा चौथ तब पूरा हुआ, जब तेरे बिरजू की आँखों में मैंने वापस वो खुशी देखी।”
उस रात उस अस्पताल के कमरे में कोई गरीब नौकरानी या अमीर मालकिन नहीं थी। वहाँ सिर्फ दो सुहागिनें थीं, जिनके बीच बहने वाला खून एक हो चुका था। इंसानियत के उस रिश्ते ने उस रात करवा चौथ की परिभाषा को हमेशा के लिए बदल दिया था।
क्या आप इस कहानी के बारे में क्या सोचते हैं? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद
लेखिका : रमा शुक्ला