*बेटे ने “गाँव की धूल” कहकर पिता के बुलावे को ठुकरा दिया, लेकिन पिता की मौत के बाद जब उसने उस घर के बंद कमरे का दरवाज़ा खोला, तो वहां मिली एक ऐसी चीज़ जिसने उसके शहर के अहंकार को चकनाचूर कर दिया।*
हरिशंकर जी का गला रुंध गया था। “बेटा, यह घर मैंने अपने लिए नहीं बनवाया है। यह तो हमारी पुश्तैनी ज़मीन थी, सोचा एक ठिकाना हो जाएगा तो कभी-कभी तुम लोग आओगे, बच्चों को अपनी जड़ें पता चलेंगी। और रही बात सुविधाओं की, तो मैंने इन्वर्टर, एसी, और वाई-फाई… सब लगवा दिया है। बस एक दिन के लिए आ जाओ। सारे रिश्तेदार आ रहे हैं, अगर तुम नहीं आए तो मेरी नाक कट जाएगी।”
बनारस के पास एक छोटे से गाँव ‘रामपुर’ में आज सुबह से ही एक अलग तरह की चहल-पहल थी। हरिशंकर जी के घर के सामने आज एक बड़ी सी रंगोली बनाई गई थी और आम के पत्तों का तोरण द्वार पर झूल रहा था। हरिशंकर जी, जो जीवन भर रेलवे में सेक्शन इंजीनियर रहे, पिछले महीने ही रिटायर हुए थे। अपनी पूरी ज़िंदगी की जमा-पूंजी और प्रॉविडेंट फंड का एक बड़ा हिस्सा लगाकर उन्होंने गाँव में अपना एक सपनों का घर बनवाया था—’शांति-कुंज’।
यह घर सिर्फ़ ईंट-गारे का ढांचा नहीं था, बल्कि हरिशंकर जी और उनकी पत्नी विमला देवी के बुढ़ापे का वो सपना था, जिसे उन्होंने अपनी जवानी के दिनों में देखा था। आज उसी घर का ‘गृह-प्रवेश’ था।
सुबह के 6 बज रहे थे। विमला देवी पूजा की थाली सजा रही थीं, लेकिन उनकी नज़रें बार-बार घड़ी और दरवाज़े पर जा रही थीं।
“सुनिए,” विमला देवी ने अपने पति को आवाज़ दी, जो बरामदे में कुर्सी डाले शून्य में ताक रहे थे। “विकास का कोई फोन आया? वो लोग निकल गए होंगे न दिल्ली से?”
हरिशंकर जी ने अपनी चश्मा ठीक किया और एक गहरी सांस ली, जिससे उनकी छाती में जमा दर्द थोड़ा कम हो सके। उन्होंने झूठ बोल दिया, “हाँ… हाँ, आया था मैसेज। कह रहा था कि फ्लाइट लेट हो सकती है। तुम चिंता मत करो, आ जाएगा। आखिर इकलौता बेटा है, अपने पिता के जीवन के सबसे बड़े दिन पर नहीं आएगा तो कब आएगा?”
विमला देवी के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आ गई। उन्हें पति की बातों पर विश्वास तो नहीं था, पर मन को तसल्ली देने के लिए यही काफ़ी था।
असलियत यह थी कि विकास का कोई मैसेज नहीं आया था। बल्कि, तीन दिन पहले जब हरिशंकर जी ने विकास को फोन किया था, तब जो बात हुई थी, वो हरिशंकर जी के कानों में अभी भी पिघले हुए शीशे की तरह चुभ रही थी।
—
**तीन दिन पहले…**
“हेलो विकास! बेटा, सब तैयारियां हो गई हैं। पंडित जी ने मुहूर्त सुबह 9 बजे का निकाला है। तुम और बहू रानी (प्रिया) शुक्रवार की रात की ट्रेन ले लो या फिर फ्लाइट से बनारस आ जाओ, मैं गाड़ी भेज दूंगा,” हरिशंकर जी ने उत्साह में कहा था।
उधर से विकास की आवाज़ में एक अजीब सी खीझ थी। “पापा, मैंने आपसे पहले भी कहा था कि अभी ऑफिस में क्वार्टरली क्लोजिंग चल रही है। मेरा निकलना नामुमकिन है। और वैसे भी, आपने गाँव में घर बनवाने की ज़िद की ही क्यों? वहां कौन रहेगा? आप और माँ भी तो शहर में फ्लैट ले सकते थे न? वहां न ढंग का इंटरनेट है, न लाइट रहती है। प्रिया को डस्ट से एलर्जी है, वो वहां की धूल-मिट्टी बर्दाश्त नहीं कर पाएगी।”
हरिशंकर जी का गला रुंध गया था। “बेटा, यह घर मैंने अपने लिए नहीं बनवाया है। यह तो हमारी पुश्तैनी ज़मीन थी, सोचा एक ठिकाना हो जाएगा तो कभी-कभी तुम लोग आओगे, बच्चों को अपनी जड़ें पता चलेंगी। और रही बात सुविधाओं की, तो मैंने इन्वर्टर, एसी, और वाई-फाई… सब लगवा दिया है। बस एक दिन के लिए आ जाओ। सारे रिश्तेदार आ रहे हैं, अगर तुम नहीं आए तो मेरी नाक कट जाएगी।”
“पापा, प्लीज़ इमोशनल ब्लैकमेल मत कीजिये। नाक नहीं कटेगी, आप कह दीजियेगा कि बेटा बिज़ी है। और हाँ, आरव (पोता) के स्कूल भी खुले हैं। हम नहीं आ सकते। आप लोग कर लीजिये पूजा। मैं वीडियो कॉल पर जुड़ जाऊंगा। ओके बाय।”
फोन कट गया था। उस ‘बाय’ के साथ हरिशंकर जी का वो उत्साह भी मर गया था जो उन्होंने इस घर की नींव रखते वक्त महसूस किया था।
—
**वापस वर्तमान में…**
हवन शुरू हो गया था। मेहमान आने लगे थे। गाँव के सरपंच, पुराने दोस्त, और दूर-दराज़ के रिश्तेदार—सब आ गए थे। हर कोई बस एक ही सवाल पूछ रहा था, “अरे हरिशंकर भाई, विकास नहीं दिख रहा? दिल्ली वाला साहबज़ादा नहीं आया?”
हरिशंकर जी हर बार एक नया बहाना बनाते—”अरे, वो बहुत बड़ी कंपनी में वी.पी. है न, अचानक मीटिंग आ गई।” या “बहू की तबीयत थोड़ी नासाज़ थी।”
विमला देवी अपनी साड़ी के पल्लू से बार-बार आँखें पोंछ रही थीं। उनकी बेटी ‘सुमन’ और दामाद ‘राजीव’ कल शाम ही आ गए थे। सुमन सब समझ रही थी। वह देख रही थी कि कैसे उसके पिता अंदर से टूट रहे थे, लेकिन बाहर से मुस्कुराने का नाटक कर रहे थे।
सुमन पिता के पास आई और धीरे से बोली, “पापा, भैया नहीं आएंगे न?”
हरिशंकर जी ने बेटी की तरफ देखा और उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा, “सुमन, मैंने इस घर की हर एक ईंट यह सोचकर लगवाई थी कि जब मेरा बेटा शहर की दौड़-भाग से थकेगा, तो यहाँ आकर सुकून की सांस लेगा। मैंने उसके कमरे की खिड़की ठीक वैसी बनवाई है जैसी उसे बचपन में पसंद थी—पूर्व दिशा में, जहाँ से सूरज दिखता हो। लेकिन उसे तो यह ‘धूल-मिट्टी’ लगता है।”
पूजा संपन्न हुई। खाने-पीने का दौर चला। लोग हरिशंकर जी के घर की तारीफ कर रहे थे। “क्या कोठी बनाई है इंजीनियर साहब ने! बिल्कुल विलायत जैसी लगती है।”
लेकिन उस ‘विलायत’ जैसी कोठी में रहने वाले दो बूढ़े दिल वीरान थे।
शाम को जब सब मेहमान चले गए, तो हरिशंकर जी ने वो ताला खोला जो उन्होंने घर के सबसे ऊपर वाले कमरे, ‘कमरा नंबर-3’ पर लगा रखा था। यह कमरा उन्होंने किसी को नहीं दिखाया था, यहाँ तक कि विमला देवी को भी नहीं।
वे अंदर गए और अंधेरे में कुर्सी पर बैठ गए। यह कमरा उन्होंने ख़ास विकास के लिए तैयार करवाया था।
अगले कुछ महीने बहुत भारी गुज़रे। हरिशंकर जी और विमला देवी उस बड़े से घर में अकेले रहते। विकास का फोन हफ्तों में एक बार आता, वो भी सिर्फ़ यह पूछने के लिए कि “सब ठीक है न? पैसे चाहिए तो बता देना।” हरिशंकर जी हर बार कहते, “नहीं बेटा, भगवान का दिया सब है। बस तुम एक बार आकर घर देख लेते।” और विकास हर बार बात टाल देता।
छह महीने बाद, सर्दी की एक रात, हरिशंकर जी को दिल का ज़बरदस्त दौरा पड़ा। गाँव में सुविधा न होने के कारण उन्हें शहर ले जाना पड़ा, लेकिन अस्पताल पहुँचने से पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया।
खबर मिलते ही विकास और प्रिया पहली फ्लाइट पकड़कर बनारस पहुंचे।
श्मशान घाट पर विकास ने पिता को मुखाग्नि दी। उसकी आँखों में आंसू थे, लेकिन वो आंसू शायद दुख से ज़्यादा एक अजीब से अपराधबोध के थे। लोग बातें कर रहे थे, “बेचारा बाप, बेटे की बाट जोहते-जोहते चला गया। जीते जी तो बेटा आया नहीं, अब मरने पर आया है।” ये बातें विकास के कानों में पिघले लावे की तरह पड़ रही थीं।
तेरहवीं के बाद, विकास और प्रिया वापस जाने की तैयारी करने लगे। विमला देवी अब बिल्कुल अकेली हो गई थीं।
विकास ने माँ से कहा, “माँ, आप यहाँ अकेले कैसे रहेंगी? आप हमारे साथ दिल्ली चलिए। इस घर को हम बेच देते हैं या किसी केयरटेकर को दे देते हैं।”
विमला देवी ने सूनी आँखों से बेटे को देखा। “नहीं बेटा। तेरे पिता की आत्मा इस घर में बस्ती है। मैं इसे छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी।”
विकास ने बहुत समझाया, लेकिन माँ नहीं मानीं। अंत में, विकास ने झुंझलाकर कहा, “ठीक है माँ। पर मैं यहाँ बार-बार नहीं आ सकता। मैं कुछ पेपर्स ढूंढ रहा हूँ, पापा की फाइलें कहाँ हैं?”
“ऊपर वाले कमरे में होंगी, जो हमेशा बंद रहता था। चाबी अलमारी के ऊपर है,” विमला देवी ने कहा।
विकास सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर गया। उसके मन में वही ख्याल था कि यह घर बेकार का खर्चा था। गाँव में इतना पैसा लगाने का क्या तुक था?
उसने ‘कमरा नंबर-3’ का ताला खोला और अंदर कदम रखा।
जैसे ही उसने लाइट का स्विच दबाया, उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसके हाथ से चाबियों का गुच्छा गिर गया।
वो कमरा… वो कमरा कोई साधारण कमरा नहीं था।
वह कमरा हूबहू विकास के दिल्ली वाले ऑफिस के केबिन जैसा डिज़ाइन किया गया था। वैसी ही मेज़, वैसी ही कुर्सी, और दीवारों पर विकास की बचपन से लेकर अब तक की हज़ारों तस्वीरें लगी थीं।
लेकिन जो चीज़ विकास को सबसे ज़्यादा झकझोर गई, वो थी सामने की दीवार पर लगा एक बड़ा सा प्रोजेक्ट और एक व्हाइटबोर्ड।
उस व्हाइटबोर्ड पर हरिशंकर जी की लिखावट में लिखा था— **”प्रोजेक्ट: स्टार्टअप – विकास के सपनों की उड़ान।”**
विकास ने कांपते हाथों से मेज़ पर रखी डायरी उठाई। यह उसके पिता की डायरी थी। उसने पन्ने पलटने शुरू किए।
*तारीख: 12 मार्च*
*”आज विकास से बात हुई। वो कह रहा था कि उसे अपनी नौकरी में घुटन होती है। वो अपना खुद का बिजनेस शुरू करना चाहता है, लेकिन उसके पास फंड्स नहीं हैं। मुझे पता है वो मुझसे कभी पैसे नहीं मांगेगा, उसका स्वाभिमान आड़े आएगा। इसलिए मैंने यह घर बनवाया है। लोग सोच रहे हैं यह मेरा घर है, लेकिन असल में यह मेरे बेटे का ‘बैकअप’ है। मैं इस घर के पेपर्स उसके नाम करवा रहा हूँ। जिस दिन उसे पैसों की ज़रूरत होगी, वो इसे गिरवी रखकर या बेचकर अपना सपना पूरा कर सकेगा। बस, एक बार वो गृह-प्रवेश पर आ जाए, तो मैं उसे यह सरप्राइज़ दे सकूँ।”*
*तारीख: गृह-प्रवेश का दिन*
*”विकास नहीं आया। मन बहुत उदास है। शायद उसे लगता है कि उसका बाप पुराना हो गया है, उसकी सोच पुरानी है। उसे यह घर सिर्फ़ ईंट-पत्थर लगता है। उसे कैसे बताऊँ कि यह घर नहीं, यह उसकी आज़ादी की चाबी है। खैर, शायद उसे अभी इसकी कद्र नहीं होगी। मैं इंतज़ार करूँगा।”*
*आखिरी पन्ना (मौत से दो दिन पहले)*
*”सीने में दर्द बढ़ रहा है। लगता है अब समय कम है। विकास अभी भी नाराज़ है शायद। बस भगवान से यही दुआ है कि मेरे जाने के बाद उसे कभी किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। यह घर, यह ज़मीन… सब उसका है। काश! वो एक बार आकर देख लेता कि उसका यह ‘गंवार’ बाप उसके मॉडर्न सपनों को कितना समझता था।”*
विकास डायरी सीने से लगाकर वहीं फर्श पर बैठकर दहाड़ें मारकर रोने लगा। प्रिया भी ऊपर आ गई थी। कमरे का नज़ारा और विकास की हालत देखकर वो भी सन्न रह गई।
वहाँ कमरे के कोने में एक हाई-स्पीड वाई-फाई राउटर लगा था, जिस पर अभी भी प्लास्टिक चढ़ा था। पास ही एक मॉडर्न कॉफी मशीन रखी थी, जिस पर एक नोट चिपका था— *”मेरी बहु रानी प्रिया के लिए, उसे सुबह की कॉफ़ी पसंद है।”*
विकास को अपनी कही हुई एक-एक बात याद आ रही थी। *”धूल-मिट्टी है वहां… सुविधाएं नहीं हैं…”*
यहाँ उसके पिता ने उसकी हर छोटी से छोटी सुविधा का, उसकी पसंद का, उसके सपनों का इतना ख्याल रखा था जितना शायद वो खुद भी नहीं रख पाता। जिस घर को वो पिछड़ापन समझ रहा था, वो असल में उसके पिता के प्यार का सबसे आधुनिक स्मारक था।
विकास रोते हुए चिल्लाया, “पापा! मैं हार गया पापा… मैं बहुत घटिया बेटा हूँ। आपने मेरे लिए इतना सोचा और मैं एक दिन का समय नहीं निकाल पाया?”
उस दिन विकास ने जाना कि माता-पिता जब “बुलाते” हैं, तो वो सिर्फ़ हाज़िरी नहीं चाहते, वो आपको कुछ “देना” चाहते हैं—कभी अपना प्यार, कभी आशीर्वाद, तो कभी अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई। लेकिन अफ़सोस, जब तक बच्चे यह समझते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
विकास दिल्ली वापस नहीं गया। उसने अपनी कंपनी से लम्बी छुट्टी ले ली। उसने माँ के साथ रहकर उस घर को संभालने का फैसला किया। उसने अपना स्टार्टअप वहीं गाँव से शुरू किया—उसी ‘कमरा नंबर-3’ से, जिसे उसके पिता ने उसके लिए तैयार किया था।
आज भी, जब विकास उस कमरे में बैठता है, तो उसे लगता है कि हरिशंकर जी उसके पीछे खड़े होकर उसके कंधे पर हाथ रखे कह रहे हैं, *”देख बेटा, मैं कहता था न, तू कर सकता है।”*
हरिशंकर जी चले गए, लेकिन वो एक ऐसा सबक छोड़ गए जो विकास की आने वाली पीढ़ियों को याद रहेगा—कि प्यार कंक्रीट की दीवारों में नहीं, बल्कि उस नीयत में होता है जिससे वो दीवारें खड़ी की जाती हैं।
—
**लेखक का संदेश:**
माता-पिता कभी भी आपसे आपकी दौलत नहीं मांगते, वे सिर्फ़ आपका ‘समय’ मांगते हैं। उनके लिए कोई भी उत्सव तब तक अधूरा है जब तक उनके बच्चे उनके पास न हों। इससे पहले कि वो दरवाज़े हमेशा के लिए बंद हो जाएं, अपने माता-पिता के पास जाइए, उन्हें गले लगाइये। क्योंकि यादें तो तस्वीरें भी दे देती हैं, लेकिन सुकून सिर्फ़ उनकी गोद में मिलता है।
**”अगर इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया और दिल को छू लिया, तो लाइक, कमेंट और शेयर ज़रूर करें। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं, तो ऐसी ही दिल को छू लेने वाली और मार्मिक पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**
लेखिका : शारदा सक्सेना