रिया सुबह हो गयी, और उठ गयी… उसे कमरे से आते देख अरे कोई सामान से टकरा न जाना , इतना ही शुभी की सास ने बोला ही था कि तभी शुभी चौंकते हुए बोली- मम्मी जी आप ऐसा क्यों बोल रही हो ? तब रीना जी कहती – समय देख रही हो ,आठ बजे गये हैं, ये समय है, कोई उठने का!!
तब वो बोली – मम्मी जी आज संडे है, इसलिए देर तक सो लिया ,आज सौरभ की भी छुट्टी है, और मेरी भी छुट्टी है, कौन सा कहीं जाना है आज रेस्ट डे है ,इसलिए देर तक…
बस -बस बहुत हो गया तेरा…. आज तेरा रेस्ट डे है तो क्या …मुझे चाय नहीं चाहिए, या पूजा या अन्य एक्सट्रा काम नहीं है क्या तुझे! रोज सुबह पांच बजे उठना चाहिए। हम पहले रोज पांच बजे उठते थे, हमारे लिए ना संडे होता था न मंडे ..हम सातों दिन एक जैसे ही रहते थे।
तब शुभी कहती- मम्मी जी रोज तो पांच बजे उठती हूँ ,आज देर से उठी तो क्या हो गया? डेली तो उठते है ना….
तब रीना जी कहती- क्या डेली के दिनों में संडे नहीं होता है?
इतना सुनते ही वो बोली- ठीक है मम्मी जी हर संडे को भी पांच बजे उठूंगी। अगले संडे को भी अलार्म लगाकर सोऊंगी।
फिर जब वो नहा कर नाश्ता बनाती है, तो रीना जी फिर कहती- अरे शुभी तुमने कैसे कपड़े पहने है ?कुछ लाज शर्म है कि नहीं ! तुम्हारा बस चले तो तुम छोटे- छोटे कपड़े में घूमों।
ये देखो तुम्हारी कपड़ो के बाजू की आस्तीन ही गायब है और एक हम थे ,जो घूंघट रखते थे। और आजकल के तुम जैसे लोग से सही से कपड़े भी नहीं पहने जाते है। तब शुभी कहती है- मम्मी जी आजकल ये सब चलता है। वो तो शरीर के फिगर पर निर्भर करता है, आप क्या पहने, क्या अच्छा लग रहा है।मैं तो बस ये मानती हूं कि दिखने में खराब न लगे ।
अच्छा -अच्छा मैनें कहा ना यहां ये सब नहीं चलेगा। रीना जी दबाव बनाकर बोली,,
तब भी शुभी बुझे मन से कहती- आप कह रही हो तो अभी बदल लेती हूँ।
रीना जी अपनी कल वाली सोच को बदल ही नहीं पा रही थी। उनके साथ जो हुआ वही वो बहू से चाहती थी। खैर…..
शाम को डिनर के लिए शुभी और समर्थ जाने को बताते हुए कहते -मम्मी हम दोनों डिनर पर जा रहे हैं, तो आश्चर्य से रीना जी बोली-आज तुम लोग इतनी जल्दी जा रहे हो, तब समर्थ बताता है, मम्मी हम लोग पहले मूवी जाएंगे फिर डिनर करते हुए लौटेंगे।
बेटा इतना खर्च करने की क्या जरूरत है, घर पर तो खाना बना हुआ है, तो फालतू के क्यों खर्च बढ़ाना…. रीना जी कहे जा रही थी, तभी बात काटते हुए समर्थ कहता- मम्मी हम लोग साथ में टाइम स्पैंड करना चाहते हैं, इसमें कोई बड़ी बात नहीं है, बस हम लोग मूड फ्रेश करना चाहते हैं तो क्या हुआ…. ??
बेटा मुझे तो ये सब आजकल के चोचले लगते हैं, पहले हम लोग कहाँ जाया करते थे। घर पर ही साथ रह सकते हैं ना…. साथ में ही टाइम स्पैंड हुआ ना…
मम्मी आप नहीं समझोगी…
ये सब सुनकर समर्थ का मूड खराब हो जाता है। वो कहता -चलो फालतू के खर्च बचाते है….
वो कुछ सोचता है और कुछ प्लान बनाता है…
अगले दिन मां को कहता- मम्मी आज गैस खत्म हो गयी है ,आप चूल्हे पर खाना बना लेना। सोचो ना शुभी से कहां हो पाएगा उसे आफिस भी जाना है…. तब वो कहती -बेटा मुझसे भी कहां बन पाएगा…. आजकल कौन चूल्हे में खाना बनाता है?तब आश्चर्य से देखते हुए समर्थ कहता -मम्मी आपने कितने समय तक चूल्हे पर ही खाना बनाया है, पहले कहाँ गैस थी…अब क्या हो गया आपको!! आपने दादी और दादा जी को गरमागरम फुल्के खिलाए है, तो अब क्या हुआ!!!
तब वो कहती – अरे बेटा पहले की बात और थी ,अब मैं कहां तक परेशान होंगी… अब सुविधाएं हो गयी है….. तो क्यों बनाऊँ, ऐसा करती हूं ,इंडक्शन में ही शुभी से कहकर कुछ बनवा लेती हूं, ताकि काम चल जाए, इतना सुनकर वो बोलता मम्मी क्यों बिजली का बिल बढाना। हमम सब को बचत भी तो करनी है ना …
आप समझ रही हो ना ,,मां पहले कितना कम बिल आता था। तब वो कहती- बेटा वो कल की बात थी, अब मुझसे कहां हो पाएगा कि मैं चूल्हे में खाना बना पाऊं….. मुझे इस उम्र में परेशान करेगा क्या ये सही है….
फिर थोड़ी ही देर में शुभी इंडक्शन से खाना बनाती है।
जैसे तैसे सुबह का समय बीतता है ,और रीना जी मंदिर से लौटती है, और वो तुरंत ही एसी चालू करती है तब एसी चालू नहीं होता। फिर समर्थ को आवाज लगाकर बुलाती है – देख समर्थ बेटा ये एसी क्यों चालू नहीं हो रहा है….
अरे मम्मी एसी का कनैक्शन कटवा दिया है, बिल बहुत आता है ना ,तब वो बोलती – बेटा आजकल बिना एसी के कहां चलता है …एसी का कनैक्शन क्यों कटवा दिया है देख तो बाहर से आई हूँ, कितनी गर्मी है…. बाप रे इतनी गर्मी में हालत ही खराब हो गई आज तो ये रीना जी बोले जा रही थी। तभी समर्थ बोला-
मम्मी पंखा चालू कर लो पहले कहां एसी होते थे।
आप पहले बिना एसी के रहती थी। तब फिर रीना कहती- बेटा कल की बात और थी, अब तो बिना एसी के नहीं रहा जाता ,क्या करु जो आजकल चलता है वही तो आदत रहेगी ना….
तो फिर समर्थ कहता मम्मी इलेक्ट्रिशियन जब आएगा तब ही चालू होगा।
आप थोड़ी देर पंखे की हवा में बैठो, फिर सब समान्य लगेगा।
बेटा समर्थ की बातों का असर मम्मी को समझ आ रहा था। कल की परिस्थिति अलग थी ,और आज अलग पर वो कुछ बोल नहीं पा रही थी।
वो उस समय मुंह धुलकर पंखे की हवा खाती है।
अगले दिन उन्हें अपनी बहन के घर जाना होता है ,तब वो समर्थ को कहती है बेटा मुझे तू अपनी मौसी के यहाँ छोड़ दे, फिर आफिस निकल जाना। नहीं मां, मैं आपको कार से नहीं छोड़ सकता क्योंकि मैं कार बेच रहा हूं, क्यों,,कार का खर्च बढ़ाना। पेट्रोल और उसके बाकी के खर्चे लगे रहते हैं। ऐसा करिए बस या आटो से चले जाइए। मैं भी आटो और बस से आफिस जाया करुंगा। ठीक है पहले की तरह हम रहेेगे।
बेटा समर्थ गर्मी इतनी है तो तू मुझे परेशान करेगा।
मैं समझ गयी हूं कि मुझे उस दिन खर्च को लेकर नहीं बोलना चाहिए था। ना ही ये बोलना चाहिए हम लोग ये नहीं करते थे ,वो करते थे। मैं जानती हूँ, कि समय बदल गया है ,मुझे भी समय के अनुसार चलने की आदत हो गयी है।
तब वो मुस्कुरा कर कहता -मम्मी जिस समय को आपने महसूस किया और उस पर चली हो, जो कि आज स्वयं ही उस पर नहीं चल पा रही हो ,कल आज और कल में कितना बदलाव महसूस कर रही हो तो वही शुभी और हमें करने क्यों कहती हो। तब रीना जी भी मानती है, और कहती – हां बेटा तूने कल वाली परिस्थिति पर चलने को कहा जिसे मैनें इतने सालों खुद जिया है, फिर भी आज मैं खुद अमल नहीं कर पायी, मुझे समझ आ गया है।
तब शुभी भी कहती- मम्मी जी अब तो आप भी समझ गयी कि समय और परिस्थितियां सब बदल गयी है। पहले का समय और था। और आज का अलग है पता नहीं आने वाला कल कैसा हो हमें भी समय के साथ सोच भी बदलना चाहिए।
फिर सहमति जताते हुए रीना जी कहती -अच्छा बाबा तुम लोग पर कोई रोकटोक नहीं होगी। आखिर कमाते भी दोनों हो, जैसा चाहे रहो, पर खर्च पर ध्यान रखो बेफिजूल न हो। पर हमें आज के अनुसार जीने के सुविधा तो चाहिए ही ,चल गाड़ी निकाल और मुझे मौसी के घर छोड़ कर आ।
इस तरह बिना रोक टोक शुभी और सास की पटरी मेल खाने लगती है।
मासिक रचना के अन्तर्गत हिन्दी पारिवारिक कहानी
स्वरचित मौलिक रचना
अमिता कुचया