काजल की कोठरी – मुकेश पटेल

“अरे ओ कुल-नाशक! डूब मर किसी चुल्लू भर पानी में। पूरे खानदान की नाक कटाकर रख दी है तूने। मेरे तो भाग फूट गए जो तुझ जैसी औलाद को जन्म दिया। लोग सही कहते थे, सांप को कितना भी दूध पिला लो, वो डसता ही है।”

सावित्री देवी का गला चिल्लाते-चिल्लाते बैठ गया था, लेकिन उनका गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। आंगन में खड़ा उनका पच्चीस वर्षीय बेटा, विहान, सिर झुकाए यह सब सुन रहा था। उसके चेहरे पर न तो कोई शिकन थी और न ही कोई पछतावा, बस एक अजीब सी शांति थी जो सावित्री देवी के क्रोध को और भड़का रही थी।

“माँ, आप शांत हो जाइये, आपका बीपी बढ़ जाएगा,” विहान ने धीमे स्वर में कहा और पानी का गिलास बढ़ाने की कोशिश की।

सावित्री देवी ने झटके से गिलास हाथ से मार गिराया। कांच के टुकड़े आंगन में बिखर गए। “पानी पिलाता है मुझे? ज़हर दे दे, वो ज्यादा बेहतर है। कम से कम रोज़-रोज़ ये ताने तो नहीं सुनने पड़ेंगे कि मेरा बेटा उस ‘बदनाम गली’ की उस औरत के घर जाता है।”

पड़ोस की चाची, जो दीवार से कान लगाए खड़ी थीं, उन्होंने भी मौका पाकर अपनी खिड़की खोली और बोलीं, “अरे सावित्री बहन, मैं तो पहले ही कहती थी। यह लड़का हाथ से निकल गया है। वो औरत है ही ऐसी, न जाने कितनों को अपने जाल में फंसा रखा है। अब तुम्हारे विहान की जवानी और पैसा, दोनों उसी पर लुटेंगे। उस ‘माया’ का नाम ही मायाजाल है।”

माया। यह नाम सुनते ही विहान की मुट्ठी भिंच गई।

विहान एक प्रतिष्ठित परिवार का बेटा था। उसके पिता, स्वर्गीय दीनानाथ जी, शहर के नामी वकील थे। उनकी इज्जत की मिसालें दी जाती थीं। विहान खुद एमबीए करके पिता की फर्म संभाल रहा था। लेकिन पिछले छह महीनों से विहान की दिनचर्या बदल गई थी। वह शाम को दफ्तर से निकलने के बाद सीधा घर नहीं आता था। उसकी कार शहर के उस इलाके में जाकर रुकती थी जहाँ शरीफ लोग दिन के उजाले में भी जाने से कतराते थे। वह ‘रेशम बाग़’ की तंग गलियों में, एक पुराने, जर्जर मकान में रहने वाली ‘माया’ के घर जाता था।

माया, जिसकी उम्र चालीस के पार थी, लेकिन लोग उसे आज भी बाज़ारू औरत ही मानते थे। अफवाहें थीं कि जवानी में वह मुजरे करती थी, और अब ढलती उम्र में रईसजादों को फंसाती है। ऐसे में विहान का वहां जाना किसी तूफ़ान से कम नहीं था।

उस रात घर में खाना नहीं बना। सावित्री देवी अपने कमरे में बंद होकर रोती रहीं। विहान भूखा ही अपने कमरे की बालकनी में खड़ा शहर की बत्तियों को देखता रहा। उसे पता था कि वह क्या कर रहा है, लेकिन वह यह भी जानता था कि सच बोलकर वह एक और तूफ़ान खड़ा नहीं कर सकता।

अगले दिन रविवार था। विहान ने अपनी बाइक निकाली। सावित्री देवी आंगन में तुलसी जी के पास बैठी माला जप रही थीं।

“मैं जा रहा हूँ,” विहान ने कहा।

सावित्री देवी ने माला रोक दी। “कहाँ? उसी कुलक्षणी के पास?”

“माँ, उसे ज़रूरत है मेरी,” विहान ने संयम बनाए रखा।

“जरुरत?” सावित्री देवी चीख पड़ीं। “तेरी माँ को तेरी ज़रूरत नहीं है? तेरी बहन की शादी होने वाली है अगले महीने। ससुराल वाले क्या सोचेंगे कि लड़के का चरित्र कैसा है? अगर तूने आज उस घर की चौखट लांघी, तो समझ लेना तेरी माँ मर गई।”

विहान ठिठक गया। यह धमकी नहीं, सावित्री देवी का अंतिम फैसला लग रहा था।

विहान ने एक गहरी सांस ली। उसने बाइक की चाबी जेब में रखी और माँ के पास आकर घुटनों के बल बैठ गया। “माँ, आप मुझे गलत समझ रही हैं। लेकिन मैं आज नहीं रुक सकता। आज माया दीदी की सर्जरी है। उनके पास कोई नहीं है। अगर मैं नहीं गया, तो वो मर जाएंगी।”

“मरने दे!” सावित्री देवी ने कठोरता से कहा। “ऐसी औरतों का मरना ही समाज के लिए अच्छा है।”

विहान की आँखों में आंसू आ गए। वह खड़ा हुआ। “माँ, आप जिसे पाप समझ रही हैं, वो मेरा प्रायश्चित है। अगर आपको लगता है कि मैं गलत हूँ, तो आज आप मेरे साथ चलिए। अपनी आँखों से देख लीजिये कि आपका बेटा वहां क्या करता है। उसके बाद आप जो सजा देंगी, मैं चुपचाप स्वीकार कर लूँगा। चाहे तो मुझे घर से निकाल दीजियेगा।”

सावित्री देवी सन्न रह गईं। विहान की आवाज़ में एक ऐसा दृढ़ विश्वास था जिसने उन्हें झकझोर दिया। क्रोध और जिज्ञासा के मिश्रित भाव के साथ उन्होंने अपनी चप्पल पहनी। “ठीक है। आज मैं भी देखूँ कि उस डायन ने तुझ पर कौन सा जादू कर रखा है।”

विहान माँ को कार में बैठाकर रेशम बाग़ ले गया। गलियां संकरी और गंदी थीं। जगह-जगह पान की पीक और नालियों की बदबू थी। सावित्री देवी ने अपनी साड़ी का पल्लू नाक पर रख लिया। उन्हें घिन आ रही थी कि उनका बेटा ऐसी जगह आता है।

कार एक पुराने, नीले दरवाज़े वाले मकान के सामने रुकी। विहान उतरा और उसने दरवाज़ा खटखटाया।

दरवाज़ा एक छोटी सी लड़की ने खोला, जो बमुश्किल दस साल की होगी। “विहान भैया!” वह खुशी से चिल्लाई।

सावित्री देवी दबे पाँव विहान के पीछे-पीछे अंदर गईं। घर के अंदर गरीबी थी, लेकिन सफाई थी। दीवारों पर देवी-देवताओं की तस्वीरें थीं। सामने एक खाट पर एक महिला लेटी थी—माया।

माया का शरीर हड्डियों का ढांचा बन चुका था। चेहरा पीला और आँखों के नीचे गहरे गड्ढे। उसके सिर के बाल कीमोथेरेपी की वजह से उड़ चुके थे। वह खांस रही थी।

“आ गए भैया?” माया ने कमजोर आवाज़ में कहा। “डॉक्टर साहब का फ़ोन आया था, एम्बुलेंस बस आती ही होगी।”

तभी माया की नज़र विहान के पीछे खड़ी सावित्री देवी पर पड़ी। माया के चेहरे का रंग उड़ गया। वह हड़बड़ाकर उठने की कोशिश करने लगी, “मा… मालकिन? आप?”

सावित्री देवी हैरान थीं। यह वह ‘बाज़ारू औरत’ नहीं लग रही थी जिसकी कल्पना उन्होंने की थी। यह तो मौत के मुहाने पर खड़ी एक लाचार महिला थी।

विहान ने माया को लेटने का इशारा किया और फिर माँ की ओर मुड़ा।

“माँ,” विहान ने माया की तरफ इशारा किया। “आप इन्हें ‘कुलक्षणी’ और ‘डायन’ कह रही थीं न? अब ध्यान से देखिये। क्या आपको इनका चेहरा याद नहीं आ रहा?”

सावित्री देवी ने गौर से देखा। वह चेहरा… वह आँखें… स्मृति के किसी धुंधले पन्ने पर दस्तक देने लगीं।

“ये… ये तो…” सावित्री देवी हकलाने लगीं।

“हाँ माँ,” विहान ने उनकी बात पूरी की। “ये माया मासी हैं। वही, जो दस साल पहले हमारे घर में काम करती थीं। जिन्हें आपने चोरी के इल्ज़ाम में घर से निकाल दिया था।”

सावित्री देवी को याद आया। दस साल पहले, उनके घर से सोने के कंगन गायब हुए थे। शक नौकरानी माया पर गया था। सावित्री देवी ने उसे बहुत बुरा-भला कहा था, पुलिस की धमकी दी थी और धक्के मारकर घर से निकाल दिया था।

“पर… पर इसका यहाँ क्या काम? और तू इसके पास क्यों आता है?” सावित्री देवी अभी भी उलझन में थीं।

विहान ने एक स्टूल खींचा और माँ को बैठाया।

“माँ, कंगन माया मासी ने नहीं चुराए थे,” विहान की आवाज़ भारी हो गई। “कंगन मैंने चुराए थे।”

सावित्री देवी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “क्या? तू क्या कह रहा है?”

“हाँ माँ। मुझे उन दिनों सट्टे की बुरी लत लग गई थी। मुझ पर कर्ज़ था। मैंने ही कंगन चुराकर बेचे थे। माया मासी ने मुझे कंगन ले जाते हुए देख लिया था। जब आपने उन पर इल्ज़ाम लगाया, तो उन्होंने एक शब्द नहीं कहा। अगर वो चाहतीं तो मेरा नाम बता सकती थीं। आप मुझे हॉस्टल भेज देतीं या पिताजी मुझे मार डालते, मेरी पढ़ाई छूट जाती। मेरा भविष्य बचाने के लिए, इस औरत ने… जिसे आप चरित्रहीन कहती हैं… अपने माथे पर ‘चोर’ का कलंक ले लिया।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ माया की खरखराती सांसों की आवाज़ आ रही थी।

विहान की आँखों से आंसू बह रहे थे। “इन्हें काम से निकालने के बाद, बदनामी के डर से इन्हें कहीं और इज़्ज़त का काम नहीं मिला। मजबूरी में इन्हें इस बदनाम मोहल्ले में आना पड़ा, सिलाई-कढ़ाई करके पेट पालने के लिए। लेकिन दुनिया ने इन्हें यहाँ देखकर ‘वैश्या’ का ठप्पा लगा दिया। और मैं… मैं डरपोक, अपनी झूठी शान में चुप रहा।”

विहान ने माया का हाथ अपने हाथ में लिया। “छह महीने पहले मुझे पता चला कि इन्हें ब्लड कैंसर है और ये आखिरी स्टेज पर हैं। तब मेरी आत्मा जागी माँ। मैं इनका इलाज करवा रहा हूँ, इनकी बेटी की पढ़ाई का खर्चा उठा रहा हूँ। यह कोई ‘अवैध सम्बन्ध’ नहीं है माँ, यह एक बेटे का अपनी दूसरी माँ के लिए किया गया पश्चाताप है। मैं इनका अपराधी हूँ।”

सावित्री देवी बुत बनी बैठी थीं। उनकी आँखों के सामने वह दृश्य घूम गया जब उन्होंने माया को बालों से पकड़कर घर से निकाला था, और माया बस हाथ जोड़कर रो रही थी, लेकिन उसने विहान का नाम नहीं लिया था। उसने एक अमीर घर के बिगड़े लड़के का भविष्य बचाने के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी नरक बना ली थी।

सावित्री देवी की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। वे उठीं और माया की खाट के पास गईं। माया ने डरते हुए हाथ जोड़ लिए। “मालकिन, मुझे माफ़ कर दीजिये, मैंने विहान बाबा को यहाँ आने से बहुत रोका था, पर ये मानते नहीं…”

सावित्री देवी ने माया के जुड़े हुए हाथों को पकड़ लिया और अपने माथे से लगा लिया।

“चुप कर पगली,” सावित्री देवी का गला रुंध गया। “माफ़ी तुझे नहीं, मुझे मांगनी है। मैं मंदिर में पत्थर की मूरतों को पूजती रही और मेरे घर में साक्षात देवी झाड़ू-पोछा लगा रही थी, मैं उसे पहचान न सकी। तूने मेरे बेटे के लिए अपना जीवन होम कर दिया और मैंने तुझे डायन कहा?”

तभी बाहर एम्बुलेंस का सायरन गूंजा।

विहान ने माया को गोद में उठाया। सावित्री देवी ने आगे बढ़कर माया का सिर संभाला। “विहान, इसे सरकारी अस्पताल नहीं, शहर के सबसे बड़े प्राइवेट अस्पताल ले चलेंगे। और सुन, आज के बाद यह रेशम बाग़ में नहीं रहेगी। ठीक होकर यह हमारे घर जाएगी। सम्मान के साथ।”

माया की आँखों से आंसू बहकर तकिए को भिगो रहे थे। उसे लगा जैसे आज उसकी ज़िंदगी भर की तपस्या सफल हो गई हो।

पड़ोसियों ने जब देखा कि विहान और उसकी माँ, सावित्री देवी, मिलकर उस ‘बदनाम’ औरत को अपनी कार में लिटा रहे हैं और सावित्री देवी अपनी साड़ी के पल्लू से उस औरत का पसीना पोंछ रही हैं, तो सबकी जुबान पर ताले लग गए।

कार अस्पताल की तरफ बढ़ चली थी। विहान ड्राइव कर रहा था। पिछली सीट पर सावित्री देवी ने माया का सिर अपनी गोद में रखा हुआ था।

“माँ,” विहान ने शीशे में देखते हुए कहा, “लोग क्या कहेंगे?”

सावित्री देवी ने एक दृढ़ मुस्कान के साथ कहा, “लोग? लोगों का क्या है बेटा। जो लोग बिना सच जाने थू-थू कर सकते हैं, वो सच जानने के बाद जय-जयकार भी करेंगे। और अगर नहीं भी करें, तो मुझे फर्क नहीं पड़ता। मुझे मेरा ‘धर्म’ मिल गया है। बदनामी के डर से इंसानियत का गला घोंटना सबसे बड़ा पाप है। आज तक तू इसका बेटा बनकर फर्ज निभा रहा था, आज से मैं इसकी बड़ी बहन बनकर इसका हाथ थामूँगी।”

उस दिन विहान को समझ आया कि रिश्तों की डोर खून से नहीं, बल्कि त्याग और अहसास से बनती है। और कभी-कभी ‘काजल की कोठरी’ में भी ऐसे हीरे छिपे होते हैं, जिनकी चमक दुनिया की हर झूठी शान से ज्यादा उज्ज्वल होती है। वह ‘थू-थू’ जो कल तक उन पर हो रही थी, आज आंसुओं के साथ धुल गई थी।

लेखक : मुकेश पटेल

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