आज घनश्याम दास और उनकी पत्नी आशा देवी बहुत खुश थे क्योंकि उनकी बेटी सुरभि का विवाह सुखपूर्वक संपन्न हो गया था और अब उसकीविदाई होने वाली थी।
विदाई से ठीक पहले सुरभि की सास ललिता,आशा देवी को बुलाकर कहने लगी कि आपकी बेटी की विदाई बिना कार के कैसे होगी? कार तो आपने दी ही नहीं। आशा देवी भौंचक्की खड़ी थीं और कह रही थी कि ऐसी तो कोई बात नहीं हुई थी हमारे बीच।
आशा देवी ने घनश्याम जी को बुलाकर यह बात बताई, वह भी हैरान थे। उन्होंने जाकर अपने दामाद नीरज को पूरी बात बताई। नीरज दौड़ता हुआ आया और अपनी मां से कहने लगा-” मां, आप यह कैसी बातें कर रही हो, आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी, इन लोगों ने शादी में पहले ही बहुत खर्चा किया है क्या आप जानती नहीं हो कि उनकी और दो लड़कियां हैं, यह लोग गाड़ी कहां से देंगे, अब जल्दी से सुरभि की विदाई कराओ और घर चलो। ”
ललिता ने गुस्से में कहा-” वाह रे मजनू, अभी तो सिर्फ फेरे हुए हैं और तेरे मुंह में जबान आ गई, वैसे तो मेरे आगे कुछ नहीं बोलता था। चुप कर तू, मुझे बात करने दे। देखिए, हम इज्जतदार लोग हैं, अभी तो हम सुरभि को ले जा रहे हैं लेकिन जल्दी ही आपको गाड़ी भिजवानी होगी, वरना। ”
जैसे ही इस बात का सुरभि को पता चला वह अपने पिताजी के पास आई। घनश्याम दास जी ने उसे कुछ भी बोलने नहीं दिया और उसे समझाया कि तुम कुछ मत बोलना क्योंकि विवाह हो चुका है। बात बिगड़ ना जाए। सुरभि ने कहा-” मगर पापा, ऐसे चुप रहना ठीक नहीं है, आगे उनकी डिमांड्स बढ़ती जाएगी, आपको अभी परिवार को भी देखना है, आप कहां से लगे उनकी डिमांड्स को पूरा करने के लिए पैसा। ”
घनश्याम दास ने कहा-” सुरभि घर परिवार तो अच्छा है, मुझे नहीं लगता कि यह गाड़ी मांगने के बाद और भी डिमांड्स रखेंगे, लेकिन सुरभि यह बात हमेशा याद रखना कि सबसे पहले हर हाल में तुम्हें अपना ख्याल रखना है और यह याद रखना कि हम हमेशा तुम्हारे पीछे खड़े हैं। मैं गाड़ी देने के बाद बाकी डिमांड्स के बारे में इनको साफ इनकार कर दूंगा। ”
सुरभि सोच रही थी कि कैसे कैसे इज्जतदार लोग इस समाज में रहते हैं। सुरभि विदा होकर अपने ससुराल चली गई और कुछ दिनों बाद घनश्याम दास जी ने एक गाड़ी किस्तों पर खरीद कर उनके यहां भेजी और खुद हर महीने किस्त भरने लगे।
सुरभि की सास ललिता एक तेज औरत थी। नीरज भी उनके आगे चुप हो जाता था और सुरभि की एक नंद थी जो की दो मोहल्ले छोड़कर तीसरे मोहल्ले में ब्याही हुई थी। सुरभि के मायके और ससुराल के बीच का रास्ता लगभग 2 घंटे का था।
कुछ समय तक सब कुछ अच्छा चलता रहा। एक दिन सुरभि की सास ललित ने सुरभि से कहा -” दिवाली आने वाली है, इतना बड़ा त्यौहार है, अपने माता-पिता से कह देना कि कोई सोने का उपहार दे, कपड़े और बर्तन वगैरा मत लेकर आना। ”
सुरभि ने कहा -” उन्होंने शादी में पहले ही इतना सोना दिया है, अब और नहीं दे सकेंगे। मैं उनसे कुछ नहीं कहूंगी। ”
ललिता समझ गई थी कि सीधी उंगली से घी नहीं निकलेगा।
दिवाली के त्यौहार तक वह चुप रही और बाद में एक दिन सुरभि को बुलाकर कहने लगी। ” सुरभि, शायद तुम्हें नीरज ने बताया नहीं होगा कि कहीं तुम परेशान ना हो, उसे अपने व्यापार में कुछ पैसों की जरूरत है, तुम कुछ रुपए अपने मां-बाप से लेकर आओ,, बाद में हम उन्हें लौटा देंगे और हां इस बारे में नीरज से कुछ मत कहना, ससुराल से पैसे लिए हैं इसीलिए वह शर्मिंदा होगा। ”
सुरभि चुपचाप मायके चली गई और शाम को आकर अपनी सास के हाथ में ₹25000 रखकर बोली, इतना ही इंतजाम हुआ है।
ललिता देवी तो बहुत खुश थी। बेटे को पता भी नहीं चलेगा और मेरी जेब भर गई। हैरानी तो उन्हें सुरभि पर भी हो रही थी, कि ये कैसे आसानी से मान गई।
कुछ महीने बीते उन्होंने फिर डिमांड रखी, सुरभि ने इस बार भी उन्हें पैसे लाकर दे दिए। तीसरी बार भी ऐसा ही हुआ।
सुरभि की ननद के घर बेटा पैदा हुआ। तब सुरभि की सास ने अपनी बेटी को सोने की चेन उपहार में दी और अपने दामाद को अंगूठी। थोड़े दिनों बाद सुरभि की ननद रोती हुई घर आई और कहने लगी-” मम्मी आपको शर्म नहीं आती, ससुराल में मेरी आपने बेज्जती करवा दी, मेरी ससुराल वाले इज्जतदार लोग हैं, अपने चांदी के गहनों पर सोने का पानी चढ़वा कर, उन्हें मुझे उपहार में दे दिया। मेरे ससुराल वाले मेरे ऊपर चिल्ला रहे हैं और कह रहे हैं कि निकल जा यहां से, मैं अब क्या करूं? ”
ललिता यह बात सुनकर हैरान रह गई और तिजोरी में से गहने निकाल कर सुनार को बुलवाकर जांच करवाने लगी, वाकई में सारे गहने चांदी के थे।, यहां तक कि उनके अपने बनवाए हुए गहने भी। वह हैरान रह गई कि ऐसा कैसे हुआ। फिर सुरभि के माता-पिता पर इल्जाम लगाने लगी कि उन्होंने हमारे साथ धोखा किया है।
सुरभि ने कहा -” मेरे मम्मी पापा के बारे में कुछ मत कहिए, उन्होंने असली सोने के जेवर दिए थे और शायद आप भूल रही हैं कि आपने जांच भी करवाई थी और फिर आपके गहने जो आपने बनवाए थे वह भी तो चांदी के हैं।”
ललिता देवी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। अपनी बेटी को समझा बूझकर वापस भेज दिया था और कहा था कि अपने ससुराल वालों से कहना कि मैं सोने के गहने भिजवा दूंगी।
फिर उन्होंने सुरभि के माता-पिता को भी बुलाया। बातों बातों में बात निकली तो उन्हें पता चला कि जब भी ललिता देवी ने पैसे मंगवाए थे तो उन्होंने तो कुछ भी नहीं भेजा था। ऐसा कैसे हो गया, सुरभि के पास इतने पैसे कहां से आए। सुरभि के माता-पिता लौट गए थे।
अब ललिता ने सुरभि से कहा, ” तुम्हारे माता-पिता तो कह रहे थे कि उन्होंने कोई रुपए नहीं भिजवाए अब सच-सच बताओ कि यह रुपए कहां से लाकर तुम मुझे देती थी। ”
सुरभि ने कहा -” आपके ही गहने बेचकर, कभी कोई अंगूठी बेच देती थी, कभी कोई टॉप्स । जब आपको हम लोगों ने मना कर दिया था कि मेरे माता-पिता और कुछ नहीं दे पाएंगे तो आपका लालच बढ़ता ही जा रहा था। तब मैं और क्या करती। ”
ललित ने नीरज से शिकायत लगाई। नीरज ने कुछ भी नहीं बोला और ललिता देवी ने सुरभि को घर से निकाल दिया। तब भी नीरज चुप था।
2 दिन बाद ललिता देवी की बेटी का फोन आया। मां,आप यह क्या कर रही हो, क्या आपने भाभी को घर से निकाल दिया है। पता भी है वह क्या कर रही है? ”
ललिता -” हां मैंने उसे निकाल दिया है, उसने घर में चोरी की और सोने के गहनों की जगह नकली गहने रखकर मुझे बेवकूफ बनाया। तू क्यों इतनी परेशान है क्या किया उसने। ”
ललिता की बेटी ने कहा आप तुरंत यहां आ जाओ।
ललिता तुरंत रिक्शा पकड़कर बेटी की ससुराल पहुंच गई।
वहां देखा तो कामवाली बाई के रूप में सुरभि उनके घर बैठी थी।
तब ललिता की बेटी ने बताया कि यह घर-घर जाकर झूठे बर्तन मांज रही है और सफाई कर रही है सबको बता रही है कि मुझे मेरी सास ने घर से निकाल दिया है और मैं इसकी भाभी हूं। पूरे मोहल्ले में थू थू हो रही है। सब कह रहे हैं कि इतनी अच्छी बहू के साथ ऐसा क्यों किया है। मेरी ससुराल में तो आपने मेरी नाक ही डुबो दी। ”
ललित ने तुरंत सुरभि का हाथ पकड़ा और उसे घर वापस ले आई और कहने लगी तू ऐसा क्यों कर रही है।
सुरभि ने कहा -” मां जी, आपको पैसों की जरूरत है तो मैं मेहनत करके पैसे कमाने गई थी। ”
ललिता देवी से अब बर्दाश्त नहीं हुआ और वह चिल्लाने लगी, तू चुप हो जा, मुझे कोई पैसे नहीं चाहिए। मुझे शांति से जीने दे। ”
सुरभि ने कहा -” माँ जी, मैं भी तो यही कह रही हूं, आप मेरे माता-पिता को और मुझे चैन से जीने दीजिए और यह लीजिए आपके सारे असली जेवर, मैंने कुछ नहीं बेचा है और जो रुपए मैंने आपको दिए थे,वह आपके बेटे के ही थे। ”
तब नीरज ने कहा-” हां मां, हमें माफ कर दो, आपकी लालच के कारण मुझे शर्मिंदा होना पड़ रहा था, और कोई रास्ता समझ नहीं आ रहा था आपको समझाने का, मां, आप तो ऐसी नहीं थी, क्या हो गया है आपको ”
तब ललिता देवी को अपनी गलती का एहसास हुआ। और उन्हें यह भी पता चला कि इस सारे नाटक में उनकी बेटी भी शामिल है। वह खुशी के आंसू बहाती हुई, सबको डांट रही थी, नालायको ं, मुझे भनक भी लगे नहीं दी कि तुम सब मिले हुए हो। सभी मुस्कुरा रहे थे।
स्वरचित अ प्रकाशित गीता वाधवानी दिल्ली