“कच्ची दीवारों का पक्का सच” – रश्मि प्रकाश 

“पिता के बनाए घर में रहकर दीवारों के रंग पर ताना मारना बहुत आसान होता है, लेकिन जब खुद की कमाई से सर छुपाने के लिए एक छत ढूंढनी पड़ती है, तब समझ आता है कि वो पुरानी दीवारें ईंटों से नहीं, पिता की रीढ़ की हड्डी से बनी थीं…”

“पापा… मुझे माफ़ कर दीजिये। मैं बहुत गलत था। मैं आपको कंजूस समझता रहा, आपको विज़न-लेस कहता रहा। आज जब मैं खुद एक-एक ईंट खरीद रहा हूँ, तो मुझे पता चल रहा है कि आपने वो 2000 स्क्वायर फीट का मकान कैसे बनाया होगा। पापा, मेरी 800 स्क्वायर फीट की छत ने मेरी कमर तोड़ दी है, आपने तो पूरा महल खड़ा किया था।”

रविवार की सुबह थी, लेकिन शर्मा निवास में शांति नहीं, बल्कि बर्तनों के पटकने और तेज़ आवाज़ों का शोर गूंज रहा था। यह शोर किसी बाहरी का नहीं, बल्कि घर के छोटे बेटे, विहान का था।

“पापा! आपको समझ क्यों नहीं आता? मेरे दोस्त आने वाले हैं शाम को। यह ड्राइंग रूम देखा है आपने? प्लास्टर उखड़ रहा है, सोफे का कवर पुराने ज़माने का है। कितनी बार कहा कि इसे रिनोवेट करवा लो, पर नहीं… आपको तो पैसे तिजोरी में दबाकर रखने हैं।”

सोफे पर बैठे 62 वर्षीय रमेश बाबू अपने चश्मे को साफ कर रहे थे। उन्होंने बेटे की बातों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, बस एक गहरी सांस ली। रमेश बाबू एक रिटायर्ड पोस्टमास्टर थे। पूरी ज़िंदगी साइकिल चलाकर और धूप में तपकर उन्होंने यह तीन कमरों का मकान बनाया था। शहर के बाहरी इलाके में, 2000 स्क्वायर फीट का यह मकान आज भले ही पुराना लगता हो, लेकिन एक ज़माने में यह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

विहान 26 साल का था। नई-नई मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी लगी थी। अच्छा पैकेज था, नई सोच थी और साथ ही था एक अहंकार—खुद के पैरों पर खड़े होने का अहंकार। उसे अपने पिता का यह पुराना ढर्रा, यह पुराना मकान और उनकी ‘कंजूसी’ फूटी आँख नहीं सुहाती थी।

“बेटा,” रमेश बाबू ने शांत स्वर में कहा, “घर पुराना है तो क्या हुआ? छत तो पक्की है। और रही बात रिनोवेशन की, तो अभी मेरी पेंशन से घर का खर्च और तुम्हारी बहन की शादी के लिए जमा-पूंजी इकट्ठी हो रही है। अभी फालतू खर्च नहीं कर सकते।”

“फालतू खर्च?” विहान चिल्लाया। “इसे फालतू खर्च कहते हैं आप? इसे ‘स्टैंडर्ड’ कहते हैं। मेरे कलीग्स के घर देखिये, इटालियन मार्बल लगा है। और यहाँ? यहाँ वही बीस साल पुरानी मोज़ेक की फर्श। मुझे शर्म आती है यहाँ किसी को बुलाने में।”

रसोई से विहान की माँ, सुधा जी, पानी का गिलास लेकर आईं। “शांत हो जा विहान। तेरे पापा ने बहुत मेहनत से…”

“रहने दो माँ,” विहान ने गिलास हाथ से झटक दिया। पानी फर्श पर गिर गया। “मेहनत सब करते हैं। लेकिन विज़न होना चाहिए। पापा ने पूरी ज़िंदगी बस ‘काट-काट’ कर जिया है। अगर ढंग से इनवेस्ट किया होता, तो आज हम किसी पॉश फ्लैट में होते, इस खंडर में नहीं।”

रमेश बाबू का चेहरा पीला पड़ गया। बेटे के मुंह से ‘खंडर’ शब्द सुनकर उन्हें लगा जैसे किसी ने उनके सीने पर हथौड़ा मार दिया हो। वह घर, जिसकी एक-एक ईंट उन्होंने अपने ओवरटाइम के पैसों से जोड़ी थी, आज उनके बेटे के लिए शर्म का कारण था।

“ठीक है,” रमेश बाबू ने कांपती आवाज़ में कहा। “अगर तुझे यह घर खंडर लगता है, तो तू आज़ाद है। अपनी कमाई से अपना महल बना ले। तुझे किसने रोका है?”

विहान ने एक व्यंग्यात्मक मुस्कान दी। “बनाऊंगा। और ऐसा बनाऊंगा कि आप देखते रह जाएंगे। अगले महीने मेरा ट्रांसफर बैंगलोर हो रहा है। मैं जा रहा हूँ इस घर से। अब आप अपनी इस ‘हवेली’ में अकेले रहिये।”

विहान ने अपना बैग उठाया और कमरे में चला गया। रमेश बाबू वहीं सोफे पर बैठे रहे, शून्य में ताकते हुए।


एक महीने बाद विहान बैंगलोर पहुँच गया। नई शहर, नई आबोहवा और आज़ादी। शुरुआत के कुछ दिन तो होटल में बीते, जो कंपनी ने दिए थे। लेकिन असली संघर्ष तब शुरू हुआ जब उसे अपने लिए घर ढूंढना पड़ा।

विहान ने सोचा था कि वह शहर के सबसे अच्छे इलाके में एक आलीशान फ्लैट किराए पर लेगा। लेकिन जब उसने ब्रोकर के साथ फ्लैट देखने शुरू किए, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस तरह का ‘स्टैंडर्ड’ वह चाहता था—इटालियन मार्बल, मॉडर्न किचन, बालकनी—उसका किराया उसकी सैलरी का 40% था। ऊपर से 10 महीने का डिपॉजिट।

मजबूरी में उसे शहर से थोड़ा दूर, एक साधारण सा 1 BHK फ्लैट लेना पड़ा। वहां न तो इटालियन मार्बल था और न ही बड़ा ड्राइंग रूम।

छह महीने बीत गए। विहान ने सोचा, “किराए के मकान में पैसा बर्बाद करने से अच्छा है कि अपना फ्लैट खरीद लूं।”

उसने लोन के लिए अप्लाई किया। बैंक के चक्कर, कागजी कार्रवाई, सिविल स्कोर, गारंटर—यह सब किसी चक्रव्यूह से कम नहीं था। बड़ी मुश्किल से लोन पास हुआ। विहान ने एक निर्माणाधीन (Under-construction) प्रोजेक्ट में एक 2 BHK फ्लैट बुक किया।

अब शुरू हुआ असली खेल।

फ्लैट का ‘पजेशन’ (कब्ज़ा) मिलने के बाद उसे फर्निश करवाना था। विहान ने सोचा था, “मैं पापा जैसा नहीं बनूंगा। मैं सब कुछ बेस्ट लगाऊंगा।”

वह टाइल्स की दुकान पर गया। उसने एक बेहतरीन डिज़ाइन पसंद किया।

दुकानदार ने कहा, “सर, यह 250 रुपये स्क्वायर फीट है।”

विहान ने कैलकुलेटर निकाला। सिर्फ हॉल की टाइल्स का खर्चा 1 लाख के ऊपर जा रहा था। उसका माथा ठनका।

“भैया, थोड़ा सस्ता दिखाइये,” विहान ने धीरे से कहा।

अंत में, उसने 60 रुपये वाली टाइल्स खरीदीं। वही टाइल्स, जिन्हें वह अपने पुराने घर में देखकर नाक सिकोड़ता था।

बाथरूम की फिटिंग, किचन की चिमनी, बिजली के तार, पेंट, मज़दूरों की दिहाड़ी—हर एक चीज़ में पैसा पानी की तरह बह रहा था। विहान की सैलरी अच्छी थी, लेकिन घर बनाना जैसे एक भूखा राक्षस था जो सब कुछ निगल रहा था।

एक दिन मज़दूर ने कहा, “साहब, दीवार में थोड़ी सीलन है, वाटरप्रूफिंग करानी पड़ेगी। 20 हज़ार और लगेंगे।”

विहान झुंझला उठा, “अभी तो पेंट कराया था! तुम लोग लूट रहे हो मुझे।”

मज़दूर ने तपाक से जवाब दिया, “साहब, ईंट और सीमेंट का भाव आसमान छू रहा है। हम तो सिर्फ मजदूरी मांग रहे हैं। मकान बनाना बच्चों का खेल नहीं है।”

विहान चुप हो गया। उसे याद आया कि कैसे बचपन में जब घर की छत टपकती थी, तो वह पापा से लड़ता था। और पापा बिना कुछ बोले, अगले दिन मिस्त्री बुलाकर ठीक करवाते थे। आज उसे समझ आ रहा था कि वो ‘बिना बोले’ ठीक करवाना कितना भारी पड़ता होगा।

धीरे-धीरे विहान का फ्लैट तैयार हुआ। लेकिन इस प्रक्रिया ने उसे निचोड़ दिया था। उसकी सेविंग्स खत्म हो चुकी थीं। क्रेडिट कार्ड की लिमिट पार हो गई थी। हर महीने की 1 तारीख को जब सैलरी आती, तो उसका 60% हिस्सा EMI में चला जाता। बाकी पैसे बिजली बिल, मेंटेनेंस और खाने में उड़ जाते।

वह अब दोस्तों के साथ पार्टी नहीं करता था। वीकेंड पर बाहर खाना बंद हो गया था। उसे अब एक-एक रुपये की कीमत समझ आ रही थी। वो लड़का, जो पापा को ‘कंजूस’ कहता था, अब खुद सब्जी वाले से 10 रुपये के लिए बहस करने लगा था।

दिवाली आ रही थी। विहान ने सोचा था कि इस दिवाली अपने नए घर में धूमधाम से पूजा करेगा। लेकिन लोन की किश्तें चुकाते-चुकाते उसके पास इतने पैसे भी नहीं बचे थे कि वह घर को ठीक से सजा सके या नए पर्दे खरीद सके। वह अपने उस “आलीशान फ्लैट” के खाली कोने में बैठा पिज़्ज़ा खा रहा था, क्योंकि गैस सिलेंडर भरवाने के पैसे उसने अगले हफ्ते के लिए बचा रखे थे।

अचानक उसकी नज़र सामने की दीवार पर पड़ी। वहां पेंट का एक छोटा सा पपड़ा उखड़ गया था। उसने अभी तीन महीने पहले ही तो महंगा पेंट कराया था।

विहान को गुस्सा आया। उसने हाथ में पकड़ा गिलास ज़मीन पर दे मारा।

“धत् तेरी की! लाखों रुपये लगा दिए, फिर भी यह हाल!”

तभी उसका फोन बजा। माँ का वीडियो कॉल था।

विहान ने चेहरा ठीक किया, झूठी मुस्कान ओढ़ी और फोन उठाया।

“हैप्पी दिवाली बेटा! कैसा है तेरा नया घर?” माँ ने उत्साह से पूछा। पीछे रमेश बाबू भी बैठे थे, थोड़े कमज़ोर लग रहे थे, लेकिन चेहरे पर मुस्कान थी।

“सब बढ़िया है माँ। बहुत अच्छा है,” विहान ने झूठ बोला।

“हमें कब बुला रहा है गृहप्रवेश के लिए?” माँ ने पूछा।

विहान की आँखों में आंसू आ गए। उसके पास माँ-बापा को बुलाने और उनकी टिकट बुक करने के पैसे नहीं थे।

“जल्दी बुलाऊंगा माँ…” उसकी आवाज़ भर्रा गई।

रमेश बाबू ने शायद बेटे का चेहरा पढ़ लिया था। उन्होंने फोन माँ से लिया।

“विहान,” रमेश बाबू की आवाज़ गंभीर थी। “तुझे याद है, जब तू छोटा था, तो ज़िद करता था कि तुझे साइकिल चाहिए? मैंने तुझे हीरो रेंजर दिलाई थी। तूने पूछा था कि पापा, आपके जूते फटे हैं, आप नए क्यों नहीं लेते? मैंने कहा था कि मुझे पुराने जूते आरामदायक लगते हैं।”

विहान चुपचाप सुनता रहा।

“बेटा, आरामदायक नहीं लगते थे। बस, तेरी साइकिल और मेरे जूतों में से किसी एक को ही चुना जा सकता था। घर बनाना आसान होता है विहान, उसमें ‘रहना’ मुश्किल होता है। दीवारों को ईंटों से नहीं, समझौतों से मज़बूत किया जाता है।”

विहान का सब्र का बांध टूट गया। वह फोन पर ही फूट-फूट कर रोने लगा।

“पापा… मुझे माफ़ कर दीजिये। मैं बहुत गलत था। मैं आपको कंजूस समझता रहा, आपको विज़न-लेस कहता रहा। आज जब मैं खुद एक-एक ईंट खरीद रहा हूँ, तो मुझे पता चल रहा है कि आपने वो 2000 स्क्वायर फीट का मकान कैसे बनाया होगा। पापा, मेरी 800 स्क्वायर फीट की छत ने मेरी कमर तोड़ दी है, आपने तो पूरा महल खड़ा किया था।”

रमेश बाबू की आँखें भी नम हो गईं। “रो मत बेटा। यह ज़िंदगी का सबक है। जब तक बोझ कंधे पर नहीं आता, तब तक पिता का कंधा सिर्फ एक साधारण शरीर लगता है।”

विहान ने आँसू पोंछे। “पापा, मैं इस दिवाली घर आ रहा हूँ। यह फ्लैट, यह शहर… यहाँ बहुत अकेलापन है। मुझे आपके उसी ‘खंडर’ में सुकून मिलेगा। मुझे उस मोज़ेक वाली फर्श पर आपके साथ बैठकर चाय पीनी है।”

दो दिन बाद विहान अपने घर, अपने शहर वापस पहुंचा।

जब उसने अपनी गली में कदम रखा, तो उसे वह पुराना गेट, वह उखड़ा हुआ प्लास्टर और वह पुरानी बनावट—सब कुछ दुनिया का सबसे खूबसूरत नज़ारा लगा।

उसने देखा कि रमेश बाबू सीढ़ी लगाकर घर के बाहर दीये लगा रहे थे। उनकी पीठ थोड़ी झुक गई थी।

विहान दौड़कर गया और सीढ़ी पकड़ ली। “पापा, मैं लगा देता हूँ।”

रमेश बाबू ने नीचे देखा। बेटा खड़ा था—थोड़ा दुबला, आँखों में थकान, लेकिन चेहरे पर एक समझदारी।

विहान ने पिता को नीचे उतारा और कसकर गले लगा लिया।

“पापा, आपकी झोपड़ी मेरे महल से लाख गुना कीमती है। क्योंकि इसमें ईंटों के साथ-साथ आपका खून-पसीना मिला है। आज मुझे उस एक ईंट की कीमत पता चल गई।”

रमेश बाबू ने उसकी पीठ थपथपाई। “देर आए दुरुस्त आए। घर ईंटों से नहीं, घर के लोगों से बनता है। जिस दिन तूने यह समझ लिया, उस दिन तेरी कमाई भी सफल हो गई।”

उस दिवाली, शर्मा निवास की वो पुरानी दीवारें फिर से रोशन हुईं। विहान ने अपने नए फ्लैट के लिए खरीदे गए महंगे पर्दे अपने पुराने घर की खिड़कियों पर लगा दिए। उसे समझ आ गया था कि ‘स्टैंडर्ड’ पैसों से नहीं, बल्कि अपनों के साथ से बढ़ता है।

कहानी का सार:

हम अक्सर अपने माता-पिता के संघर्षों को अनदेखा कर देते हैं क्योंकि हमें पकी-पकाई रोटी मिलती है। हमें लगता है कि उन्होंने जो किया, वो बहुत छोटा है और हम उससे बेहतर कर सकते हैं। लेकिन जिस दिन हम खुद आटे की कीमत पता करने बाज़ार जाते हैं, उस दिन हमें समझ आता है कि पिता ने जो ‘छत’ दी थी, वो सिर्फ सीमेंट की नहीं, बल्कि उनके अनगिनत अरमानों की कुर्बानी से बनी थी।

अपने माता-पिता की मेहनत का सम्मान कीजिये। उनके पुराने घर को ‘पुराना’ कहकर मत ठुकराइye, क्योंकि वो उनकी जवानी की निशानी है जो उन्होंने आपके बुढ़ापे को सुरक्षित करने के लिए खर्च कर दी।

सवाल आपके लिए:

क्या आपने भी कभी अपने माता-पिता के पुराने तौर-तरीकों या घर को लेकर शिकायत की है? और क्या कभी ऐसा पल आया जब आपको अपनी गलती का अहसास हुआ? अपने अनुभव कमेंट में जरूर शेयर करें।

अगर इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया और दिल को छू लिया, तो इसे लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं, तो रिश्तों की अहमियत बयां करती ऐसी ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को अभी फ़ॉलो करें। धन्यवाद!

मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश 

error: Content is protected !!