मुंबई के सबसे पॉश इलाके ‘स्काईलाइन टावर्स’ की 45वीं मंजिल पर बने पेंटहाउस की बालकनी में खड़ा होकर शेखर शहर की टिमटिमाती बत्तियों को देख रहा था। उसके हाथ में स्कॉच का गिलास था और चेहरे पर एक विजयी मुस्कान। आज उसकी कंपनी ‘शेखर इंफ्राटेक’ ने शहर का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट हासिल किया था। वह अब सिर्फ एक बिल्डर नहीं, बल्कि शहर का एक ‘ब्रांड’ बन चुका था।
यह वही शेखर था, जो बीस साल पहले रामपुर नामक एक छोटे से कस्बे से फटे जूतों और आँखों में बड़े सपनों के साथ शहर आया था। उस वक्त उसके पास न रहने को छत थी, न खाने को पैसे। उसके पास अगर कुछ था, तो वह था उसके बड़े भाई, रघुवीर का आशीर्वाद और उसकी दी हुई जमापूंजी।
रघुवीर, जो उम्र में शेखर से दस साल बड़े थे, ने पिता की मौत के बाद शेखर को बेटे की तरह पाला था। खुद अपनी पढ़ाई छोड़ी, पिता की छोटी सी परचून की दुकान संभाली और अपनी जवानी की सारी इच्छाओं को उस दुकान के गल्ले में कैद कर दिया, ताकि शेखर पढ़ सके। जब शेखर ने शहर जाकर बिज़नेस करने की बात कही थी, तो रघुवीर ने बिना एक पल सोचे अपनी पत्नी के गहने और पुश्तैनी खेत गिरवी रख दिए थे।
“जा लल्ला, तू उड़। तेरी उड़ान देखने के लिए मैं यहाँ ज़मीन पर खड़ा हूँ,” रघुवीर ने नम आँखों से उसे विदा किया था।
शुरुआत के सालों में शेखर हर हफ्ते खत लिखता, फिर फोन करने लगा। लेकिन जैसे-जैसे ‘शेखर इंफ्राटेक’ की इमारतें ऊँची होती गईं, शेखर का कद भी बढ़ता गया और यादें छोटी होती गईं। पहले जो फोन हर हफ्ते जाता था, अब महीनों में एक बार जाने लगा। और अब? अब तो शेखर को याद भी नहीं था कि उसने आखिरी बार ‘भाई साहब’ से कब बात की थी।
शेखर की पत्नी, निहारिका, एक हाई-सोसाइटी महिला थी। उसे शेखर के ‘देहाती’ बैकग्राउंड से शर्म आती थी। उसने धीरे-धीरे शेखर के मन में यह बात बैठा दी थी कि उसका परिवार उसके स्टेटस के लायक नहीं है।
“शेखर, अब तुम एक सेलिब्रिटी हो। वो लोग गावं वाले हैं, उनका रहन-सहन, उनकी बातें… सब तुम्हें शर्मिंदा कर देंगी। उन्हें वहीं रहने दो, पैसे भेज दिया करो, बस,” निहारिका अक्सर कहती। और शेखर, अपनी दौलत के नशे में चूर, यह मान बैठा कि पैसे भेजना ही सारे रिश्तों का मोल है।
समय का पहिया घूमा। गाँव में रघुवीर की तबीयत नासाज़ रहने लगी। दुकान अब वैसी नहीं चलती थी। ऑनलाइन सामानों के दौर में परचून की दुकान दम तोड़ रही थी। रघुवीर को पैसों की सख्त ज़रूरत थी, लेकिन उसने कभी शेखर से नहीं मांगा। उसे लगता था कि उसका लल्ला खुद समझ जाएगा।
एक दिन, रघुवीर का बेटा, सुमित, शहर आया। वह शेखर के ऑफिस पहुँचा। रिसेप्शन पर उसे दो घंटे इंतज़ार करवाया गया। जब वह अंदर गया, तो शेखर किसी विदेशी डेलिगेट्स के साथ मीटिंग में था।
“चाचा जी, प्रणाम,” सुमित ने हाथ जोड़कर कहा। उसके कपड़े साधारण थे और पैरों में धूल भरी चप्पलें।
शेखर ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। डेलिगेट्स के सामने सुमित की मौजूदगी उसे अखर रही थी।
“अरे सुमित? तुम यहाँ? बिना बताए आ गए? देखो, अभी मैं बहुत बिजी हूँ। बाहर पी.ए. से मिल लो,” शेखर ने रूखेपन से कहा।
“चाचा जी, पिताजी की तबीयत बहुत खराब है। डॉक्टर ने दिल का ऑपरेशन बताया है। गाँव के अस्पताल में सुविधा नहीं है, उन्हें शहर लाना पड़ेगा। थोड़े पैसों की ज़रूरत थी और आपका सहारा चाहिए था,” सुमित ने लज्जा और मजबूरी में सिर झुकाकर कहा।
शेखर का पारा चढ़ गया। उसे लगा कि ये लोग बस पैसे मांगने चले आते हैं। उसने अपना चेकबुक निकाला और उस पर एक रकम भरकर सुमित की ओर फेंक दिया।
“ये लो पचास हज़ार। और सुनो, उन्हें किसी सरकारी अस्पताल में भर्ती करवा देना। मेरे पास वक्त नहीं है तीमारदारी करने का। और अगली बार आने से पहले अपॉइंटमेंट लेकर आना। यह ऑफिस है, कोई धर्मशाला नहीं।”
सुमित की आँखों में आंसू आ गए। उसने वह चेक उठाया नहीं।
“चाचा जी, बाबूजी पैसे नहीं, आपको देखना चाहते हैं। वो आपको याद करते हैं। क्या आप एक बार चलकर उनसे मिल नहीं सकते?”
“कहा ना, मेरे पास वक्त नहीं है! मेरे एक घंटे की कीमत लाखों में है। अब जाओ यहाँ से,” शेखर ने सिक्योरिटी को बुलाने का इशारा किया।
सुमित खाली हाथ और भारी मन से लौट गया। उसने घर जाकर रघुवीर को कुछ नहीं बताया, बस इतना कहा कि चाचा जी बिजी हैं। रघुवीर ने फीकी मुस्कान के साथ छत की ओर देखा। शायद उन्हें अहसास हो गया था कि जिस पक्षी को उन्होंने उड़ना सिखाया था, वह अब इतना ऊपर उड़ गया है कि उसे ज़मीन के लोग चींटियों जैसे दिखने लगे हैं।
इलाज के अभाव में और उससे भी ज़्यादा, अपने भाई की बेरुखी के सदमे में, रघुवीर ने एक हफ्ते बाद दम तोड़ दिया।
जब यह खबर शेखर को मिली, तो उसे क्षणिक दुख हुआ, पर निहारिका ने उसे समझा दिया, “अब तो वो चले गए, तुम्हारे जाने से वो वापस तो नहीं आ जाएंगे? यहीं से शोक संदेश भेज दो और तेरहवीं का पूरा खर्चा भिजवा दो। गाँव जाने का मतलब है कीचड़, मच्छर और बीमारी।”
शेखर नहीं गया। उसने पैसे भिजवा दिए। गाँव वालों ने और सुमित ने उन पैसों को हाथ भी नहीं लगाया। रघुवीर का अंतिम संस्कार पड़ोसियों की मदद से हुआ। शेखर के इस व्यवहार ने गाँव में उसके प्रति रही-सही इज्जत भी मिट्टी में मिला दी। लोग कहने लगे, “ऐसा पैसा किस काम का जो अपने सगे भाई के अंतिम दर्शन भी न करवा सके।”
एक साल बीत गया। शेखर की कंपनी अब शेयर बाज़ार में लिस्ट होने वाली थी। वह सफलता के चरम पर था। लेकिन कहते हैं न, वक्त को करवट बदलने में देर नहीं लगती।
शहर में एक बड़ा पुल बनाने का टेंडर शेखर की कंपनी को मिला था। पुल के उद्घाटन के दो महीने बाद ही उसका एक हिस्सा ढह गया। जांच बैठी। पता चला कि शेखर के पार्टनर और मैनेजर ने मिलकर घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया था और करोड़ों का गबन किया था। चूंकि मुख्य हस्ताक्षर शेखर के थे, सारी गाज उस पर गिरी।
रातों-रात ‘शेखर इंफ्राटेक’ के शेयर ज़मीन पर आ गिरे। बैंक ने उसके अकाउंट फ्रीज़ कर दिए। जिन नेताओं और अफसरों को वह पार्टियों में महंगी व्हिस्की पिलाता था, उन्होंने उसके फोन उठाने बंद कर दिए। निहारिका, जिसे सिर्फ ‘स्टेटस’ से प्यार था, ने जब देखा कि शेखर अब कंगाल होने वाला है और जेल जा सकता है, तो उसने अपने मायके जाने का फैसला कर लिया।
“मैं एक कैदी की पत्नी बनकर नहीं रह सकती,” यह कहकर वह चली गई।
शेखर अकेला रह गया। उसका पेंटहाउस बैंक ने सील कर दिया। उसकी गाड़ियाँ जब्त हो गईं। वह सड़क पर आ गया। उसके पास वकील को देने तक के पैसे नहीं थे। उसे दिल का दौरा पड़ा और वह एक सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड में भर्ती हुआ—उसी तरह के अस्पताल में, जहाँ जाने की सलाह उसने अपने भाई को दी थी।
अस्पताल के गंदे बिस्तर पर लेटे हुए शेखर को आज अपने भाई की बहुत याद आ रही थी। उसे याद आया कि कैसे बचपन में जब उसे बुखार आता था, तो भैया रात-रात भर उसके सिर पर गीली पट्टी रखते थे। उसे सुमित का वह चेहरा याद आया जिसे उसने अपने ऑफिस से धक्के मारकर निकलवाया था।
“आज मैं मर भी जाऊँ, तो कोई रोने वाला नहीं है,” शेखर की आँखों से आंसू बह निकले।
तभी, वार्ड के दरवाजे पर एक परिचित चेहरा दिखाई दिया। साधारण कपड़े, कंधे पर एक पुराना झोला। वह सुमित था।
शेखर को लगा कि सुमित उसे ताना मारने आया है, उसका मज़ाक उड़ाने आया है। उसने शर्म से अपनी आँखें बंद कर लीं।
“चाचा जी,” सुमित की आवाज़ में वही पुरानी विनम्रता थी।
शेखर ने आँखें खोलीं। “सुमित? तुम? यहाँ? मुझे देखने आए हो कि मेरा घमंड कैसे टूटा?”
सुमित ने आगे बढ़कर शेखर के पैर छुए। “नहीं चाचा जी। हमारे संस्कार हमें यह नहीं सिखाते। मुझे पता चला कि आप मुसीबत में हैं। बाबूजी होते तो कभी आपको अकेला नहीं छोड़ते।”
सुमित ने अपने झोले से एक टिफिन निकाला। “घर का खाना है। और यह…” उसने एक लिफाफा शेखर के हाथ में रखा।
“यह क्या है?” शेखर ने कांपते हाथों से पूछा।
“चाचा जी, बाबूजी ने जाने से पहले अपनी बची-खुची ज़मीन बेच दी थी। उन्होंने कहा था कि कभी अगर मेरे लल्ला पर मुसीबत आए, तो ये पैसे उसे दे देना। वो जानते थे कि शहर की दुनिया बहुत मतलबी है, वहाँ लोग उगते सूरज को सलाम करते हैं और डूबते को लात मारते हैं।”
शेखर फूट-फूट कर रो पड़ा। वह दहाड़ें मारकर रोया। उसका अंहकार, उसका रुतबा, उसकी दौलत—सब उसके आंसुओं के साथ बह गए। जिस भाई को उसने मरने के लिए छोड़ दिया था, वह भाई मरने के बाद भी उसकी रक्षा कर रहा था।
“मुझे माफ़ कर दे सुमित… मुझे माफ़ कर दे। मैंने अपने भगवान जैसे भाई को खो दिया,” शेखर गिड़गिड़ा रहा था।
सुमित ने उसे गले लगाया। “चाचा जी, बाबूजी कहते थे कि इंसान गलतियां करता है, लेकिन खून का रिश्ता पानी नहीं होता। चलिए, गाँव चलिए। हमारा घर छोटा है, पेंटहाउस जैसा नहीं, लेकिन वहां आपको सुकून की नींद आएगी।”
शेखर सब कुछ छोड़कर सुमित के साथ गाँव वापस चला गया।
गाँव के उसी पुराने घर के बरामदे में बैठकर, जब शेखर ने सुमित के हाथ की बनी चाय पी, तो उसे लगा कि दुनिया की सबसे महंगी स्कॉच में भी वो स्वाद नहीं था। उसने शहर की चकाचौंध को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।
उसने गाँव में रहकर रघुवीर के नाम पर एक छोटा स्कूल खोला और अपनी बाकी ज़िंदगी बच्चों को पढ़ाने में लगा दी। वह अक्सर बच्चों से कहता, “बच्चों, पेड़ कितना भी ऊँचा क्यों न हो जाए, अगर उसकी जड़ें ज़मीन से उखड़ गईं, तो पहली आंधी में उसका गिरना तय है।”
शेखर ने अपनी दौलत खो दी थी, लेकिन उसने एक ऐसा परिवार और सुकून पा लिया था, जो उसे ‘स्काईलाइन टावर्स’ की 45वीं मंजिल पर कभी नसीब नहीं हुआ। उसे समझ आ गया था कि असली अमीरी बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि उन लोगों में है जो आपके बुरे वक्त में आपके साथ खड़े हों।
उसने अपनी डायरी में लिखा: *”मैं पूरी दुनिया जीतने चला था, पर यह भूल गया कि मेरा घर पीछे छूट रहा है। जब दुनिया ने मुझे ठुकरा दिया, तो उसी घर ने मुझे पनाह दी, जिसे मैंने कभी हिकारत से देखा था।”*
लेखिका :मंजू घोष