कागज़ के रिश्तें – निभा राजीव निर्वि 

मीरा ने कार का दरवाज़ा बंद किया और एक गहरी सांस ली। सामने फैमिली कोर्ट की वो पुरानी, मटमैली इमारत खड़ी थी, जहाँ हर रोज़ न जाने कितने रिश्ते फाइलों में दफ़न हो जाते थे। आज उसकी बारी थी। मीरा के पिता, मिस्टर शर्मा, ने उसका हाथ थाम रखा था, मानो उसे गिरने से बचा रहे हों।

तभी सामने से एक दूसरी कार आई। धूल के गुबार के बीच से आकाश उतरा। उसके साथ उसकी माँ और वकील थे। जैसे ही मीरा की नज़र आकाश पर पड़ी, उसका दिल एक पल के लिए धक से रह गया। यह वो आकाश नहीं था जिसे उसने छह महीने पहले घर छोड़ते वक़्त देखा था।

आकाश… जो कभी अपनी फिटनेस और पर्सनालिटी के लिए जाना जाता था, आज बेहद कमज़ोर लग रहा था। उसके गाल धंस गए थे, आँखों के नीचे गहरे काले गड्ढे थे और वो शर्ट, जो कभी उस पर कसी हुई लगती थी, आज उसके कंधों पर झूल रही थी। मीरा के मन में एक अजीब सी टीस उठी—क्या अलगाव का दर्द सिर्फ़ उसे ही नहीं, आकाश को भी खोखला कर रहा है? लेकिन अगले ही पल उसे आकाश के वो कड़वे शब्द याद आ गए, “मीरा, मैं उब गया हूँ तुमसे। मुझे अपनी ज़िंदगी में स्पेस चाहिए, आज़ादी चाहिए।”

मीरा ने अपनी भावनाओं को सख़्त किया, नज़रे फेर लीं और तेज़ कदमों से सीढ़ियों की ओर बढ़ गई।

वकील अभी नहीं आए थे, इसलिए दोनों पक्षों को बाहर कॉरिडोर में इंतज़ार करना पड़ा। मीरा और आकाश के बीच मुश्किल से पांच फ़ीट की दूरी थी, लेकिन खामोशी मीलों लंबी थी। तभी मीरा का फोन बजा। वह बैग से फोन निकालने के लिए मुड़ी, लेकिन उसका पैर सीढ़ी के किनारे पर मुड़ गया।

“आह!” उसके मुँह से हल्की चीख निकली और वह गिरने ही वाली थी।

उससे पहले कि मीरा ज़मीन पर गिरती, दो कांपते हुए लेकिन मज़बूत हाथों ने उसे थाम लिया।

“मीरा! संभल के…” आकाश की आवाज़ में वही पुरानी फिक्र, वही पुरानी गर्माहट थी।

मीरा ने हड़बड़ा कर खुद को संभाला। आकाश का हाथ अभी भी उसकी कोहनी पर था। उस स्पर्श में एक अजीब सा करंट था, एक ऐसा अपनापन जो पिछले छह महीनों की नफ़रत के बावजूद मीरा की रूह को पहचानता था। मीरा ने देखा कि आकाश का हाथ बुरी तरह कांप रहा था। उसकी त्वचा पर अजीब से नीले निशान थे।

मीरा ने झटके से अपना हाथ छुड़ाया। “मैं ठीक हूँ,” उसने रूखेपन से कहा और अपने पिता के पास जाकर खड़ी हो गई।

आकाश ने धीरे से अपनी मुट्ठी भींची, जैसे उस स्पर्श को अपनी हथेलियों में क़ैद कर रहा हो, और चुपचाप अपनी माँ के पास जाकर बैठ गया। सुनवाई शुरू हुई। जज़ साहिबा ने दोनों से पूछा कि क्या सुलह की कोई गुंजाइश है?

“नहीं, योर ऑनर,” आकाश ने बिना मीरा की तरफ देखे कहा। उसकी आवाज़ सपाट थी, जैसे कोई रटा-रटाया पाठ बोल रहा हो। “हम दोनों की विचारधाराएं अलग हैं। साथ रहना मुमकिन नहीं।”

मीरा का दिल चाहा कि चीखकर पूछे—’कौन सी विचारधारा आकाश? वो, जो पांच साल तक एक थी? या वो, जो अचानक छह महीने पहले बदल गई?’ लेकिन उसने भी सिर्फ़ इतना कहा, “मुझे तलाक मंज़ूर है।”

अगली तारीख मिल गई। सब अपने-अपने रास्ते चल दिए।

घर लौटने के बाद मीरा अपने कमरे में बंद हो गई। रात के दो बज रहे थे, लेकिन नींद आँखों से कोसों दूर थी। छत का पंखा घूम रहा था और उसके साथ घूम रही थीं यादें।

मीरा और आकाश की शादी लव मैरिज थी। कॉलेज के ज़माने का प्यार। आकाश मीरा की हंसी पर मरता था। वह उसे ‘बटरफ्लाई’ कहता था। पांच साल की शादी में उन्होंने कभी बड़ा झगड़ा नहीं किया था। फिर अचानक छह महीने पहले सब बदल गया। आकाश देर रात घर आने लगा। वह मीरा की हर बात पर चिढ़ने लगा। उसने मीरा के खाने में नुक्स निकालने शुरू कर दिए, उसके कपड़ों का मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया। और एक दिन, उसने हद कर दी।

“मीरा, मुझे लगता है हमने जल्दबाजी में शादी कर ली। मुझे अब यह बंधन घुटन देता है। तुम मेरे स्टैंडर्ड से मैच नहीं करती,” आकाश ने शराब के नशे में कहा था।

मीरा का स्वाभिमान जाग उठा था। उसने उसी रात घर छोड़ दिया।

लेकिन आज… आज कोर्ट में आकाश की वो हालत। वो कांपते हाथ। वो धंसी हुई आँखें। मीरा करवट बदलती रही। “क्या उसे कोई बीमारी है? या शराब ने उसका यह हाल कर दिया है?” मीरा ने खुद को समझाया, “मुझे क्या मतलब? उसने मुझे मेरी कमियों का अहसास दिलाकर घर से निकाला था। वो जैसा भी रहे।”

फिर भी, एक बेचैनी थी जो उसे सोने नहीं दे रही थी। आकाश का वो वाक्य—“मीरा! संभल के…”—उसके कानों में गूंज रहा था। उस आवाज़ में नफ़रत नहीं थी, उसमें एक तड़प थी।

अगले दिन मीरा से रहा नहीं गया। उसने अपने एक पुराने दोस्त, डॉ. समीर को फोन किया, जो आकाश का भी दोस्त था। समीर और आकाश की दोस्ती गहरी थी, लेकिन मीरा और आकाश के अलग होने के बाद समीर ने भी मीरा से संपर्क कम कर दिया था।

“हेलो समीर,” मीरा ने झिझकते हुए कहा।

“अरे मीरा! कैसी हो? सब ठीक तो है?” समीर की आवाज़ में हड़बड़ाहट थी।

“समीर, मुझे आकाश के बारे में पूछना था। कल कोर्ट में मैंने उसे देखा… वो बहुत बीमार लग रहा था। क्या उसे कुछ हुआ है?”

समीर दूसरी तरफ एकदम चुप हो गया।

“समीर? तुम सुन रहे हो?”

“हाँ… मीरा। वो… कुछ नहीं, बस थोड़ा स्ट्रेस है। बिज़नेस में लॉस हुआ है शायद, और ड्रिंक्स ज्यादा लेने लगा है। तुम चिंता मत करो, वो संभाल लेगा।” समीर ने बात टाल दी।

मीरा को समीर की आवाज़ पर यकीन नहीं हुआ। समीर कुछ छिपा रहा था। मीरा ने फ़ैसला किया कि वह खुद जाकर पता लगाएगी।

उस शाम मीरा अपनी कार लेकर आकाश के घर की तरफ निकल पड़ी। उसने सोचा था कि बाहर से ही देख लेगी। लेकिन जैसे ही वह आकाश के घर के पास पहुँची, उसने देखा कि आकाश के घर के बाहर एम्बुलेंस खड़ी है।

मीरा के हाथ-पाँव ठंडे पड़ गए। वह कार से उतरी और दौड़ती हुई अंदर गई। ड्राइंग रूम में आकाश की माँ सोफे पर बैठकर रो रही थीं और वार्ड बॉय आकाश को स्ट्रेचर पर लेटाकर बाहर ला रहे थे।

आकाश बेहोश था। उसके नाक से खून बह रहा था।

“माँ जी! क्या हुआ आकाश को?” मीरा चिल्लाई।

आकाश की माँ, जो मीरा को देखकर अक्सर मुंह फेर लेती थीं, आज उसे देखते ही फूट-फूट कर रो पड़ीं। “मीरा… तू आ गई बेटी? देख न, मेरा आकाश मुझे छोड़कर जा रहा है।”

मीरा एम्बुलेंस में उनके साथ बैठ गई। रास्ते भर वह आकाश का हाथ पकड़े रही। वही हाथ जो कल उसे गिरने से बचा रहा था, आज बेजान पड़ा था।

हस्पताल में डॉक्टर्स ने आकाश को आईसीयू में शिफ्ट कर दिया। डॉ. समीर वहां पहले से मौजूद थे। मीरा ने समीर का कॉलर पकड़ लिया। “समीर, मुझे सच बताओ। क्या हुआ है आकाश को? तुम सब मुझसे क्या छिपा रहे हो?”

समीर ने अपनी नज़रें झुका लीं और फिर एक फाइल मीरा के हाथ में थमा दी। “पढ़ लो। आकाश ने कसम दी थी कि तुम्हें कभी पता न चले, वरना वो मुझसे दोस्ती तोड़ देगा। पर अब… अब शायद वक़्त नहीं बचा।”

मीरा ने कांपते हाथों से फाइल खोली। मेडिकल रिपोर्ट के ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था—‘ग्लियोब्लास्टोमा (Glioblastoma) – स्टेज 4 ब्रेन ट्यूमर’

रिपोर्ट की तारीख छह महीने पुरानी थी। ठीक उसी वक़्त की, जब आकाश ने मीरा से झगड़े शुरू किए थे।

मीरा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह दीवार के सहारे नीचे बैठ गई। “ब्रेन ट्यूमर? स्टेज 4? इसका मतलब…”

समीर ने मीरा के पास बैठकर कहा, “हाँ मीरा। आकाश को छह महीने पहले पता चला था कि उसके पास ज़्यादा वक़्त नहीं है। डॉक्टर ने कहा था कि इलाज से भी शायद एक साल से ज़्यादा न मिले, और वो भी बहुत दर्दनाक होगा।”

“तो उसने मुझे बताया क्यों नहीं? उसने मुझे घर से क्यों निकाला?” मीरा सिसक उठी।

“क्योंकि वो तुम्हें अपनी मौत का तमाशा नहीं दिखाना चाहता था,” समीर की आँखों में आंसू थे। “वो जानता था मीरा कि तुम उससे कितना प्यार करती हो। अगर तुम्हें पता चलता, तो तुम अपनी पूरी ज़िंदगी उसकी सेवा में और उसे बचाने की नाकाम कोशिश में लगा देतीं। तुम उसे मरते हुए देखतीं, घुटतीं। वो नहीं चाहता था कि तुम्हारी ज़िंदगी उसके साथ ख़त्म हो। वो चाहता था कि तुम उससे नफ़रत करो। क्योंकि नफ़रत करके किसी को भूलना आसान होता है, लेकिन प्यार करके किसी को खोना… वो दर्द इंसान को मार देता है।”

मीरा को वो सारे मंज़र याद आने लगे। आकाश का जानबूझकर शराब की बोतल लेकर बैठना (जो शायद पानी भरी होती थी), उसका देर रात आना (जब वो शायद पार्क में बैठकर रोता था), उसका वो झूठ कि “तुम मेरे स्टैंडर्ड की नहीं हो।”

“उसने मुझे विलेन बना दिया मीरा,” समीर ने बताया। “ताकि तुम मूव ऑन कर सको। वो तलाक इसलिए चाहता था ताकि वो अपनी सारी प्रॉपर्टी और इंश्योरेंस का पैसा एलिमनी (Alimony) के रूप में लीगल तरीके से तुम्हें दे सके। वो मरते हुए भी तुम्हारा भविष्य सुरक्षित कर रहा था।”

मीरा का रोना एक चीख में बदल गया। “पागल है वो! बेवकूफ है! उसे लगा कि वो मुझे नफ़रत करना सिखा देगा? उसने मुझसे मेरा हक़ छीना है समीर। पत्नी हूँ मैं उसकी। उसके सुख में साथ थी, तो उसके दर्द में साथ रहने का हक़ मेरा था।”

मीरा आईसीयू की तरफ भागी। नर्स ने उसे रोका, लेकिन मीरा की हालत देख डॉक्टर ने उसे पांच मिनट के लिए अंदर जाने दिया।

आकाश ऑक्सीजन मास्क लगाए लेटा था। मशीनों की बीप-बीप चल रही थी। मीरा उसके पास गई और उसका चेहरा अपने हाथों में ले लिया।

“उठो आकाश,” मीरा ने उसके कान में फुसफुसाया। “तुम्हारा नाटक ख़त्म हो गया। मुझे सब पता चल गया है। तुम मुझे नफ़रत करना नहीं सिखा पाए, बुद्धू।”

आकाश की पलकें हिलीं। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। धुंधली नज़रों से मीरा को देखा। उसने ऑक्सीजन मास्क हटाने की कोशिश की। मीरा ने मास्क हटाया और अपना कान उसके होठों के पास ले गई।

“मीरा… तुम… यहाँ… जाओ…” आकाश की आवाज़ इतनी धीमी थी कि सिर्फ़ मीरा सुन सकती थी। “तलाक… पेपर…”

“फाड़ दिए मैंने पेपर,” मीरा ने रोते हुए मुस्कान के साथ कहा। “कोई तलाक नहीं हो रहा। तुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं जा रहे। और अगर जाना भी है, तो मेरे हाथों में हाथ डालकर जाओगे, मुझे पराया करके नहीं।”

आकाश की आँखों से एक आंसू लुढ़क कर तकिये में समा गया। उसने बड़ी मुश्किल से अपना हाथ उठाया और मीरा के गाल पर रखा। “मैं… तुम्हें… रोते हुए… नहीं… देखना… चाहता था…”

“तो हंसाओ मुझे,” मीरा ने उसका हाथ चूम लिया। “जैसे पहले हंसाते थे। हम लड़ेंगे आकाश। चाहे एक दिन बचा हो या एक घंटा, वो मेरा है। तुम मुझसे वो नहीं छीन सकते।”

आकाश ने हल्की सी मुस्कान दी, एक सुकून भरी मुस्कान। उसे अब और अभिनय करने की ज़रूरत नहीं थी। उसे अब और बुरा बनने का बोझ नहीं उठाना था।

अगले दो महीने मीरा आकाश के साथ साये की तरह रही। उसने आकाश को हस्पताल के बिस्तर पर नहीं, बल्कि घर पर रखा। उसने वो हर चीज़ की जो आकाश को पसंद थी। उसने आकाश को मरते हुए नहीं देखा, उसने आकाश को जी भरकर प्यार किया।

आकाश का शरीर रोज़ हार रहा था, लेकिन उसकी रूह जीत गई थी। उसे इस बात का सुकून था कि आखिरी वक़्त में उसकी ‘बटरफ्लाई’ उसके पास थी।

एक बारिश वाली रात, आकाश ने मीरा की गोद में सिर रखकर आखिरी सांस ली। कमरे में शांति थी। मीरा रोई नहीं। उसने आकाश के माथे को चूमा और कहा, “जाओ आकाश, अब तुम्हें दर्द नहीं होगा। लेकिन याद रखना, हमारा रिश्ता कागज़ों का नहीं था जो फाड़ने से टूट जाए। मैं तुम्हारी थी, और हमेशा तुम्हारी रहूँगी।”

शोक सभा के बाद, जब वकील ने मीरा को आकाश की वसीयत सौंपी, तो उसमें एक चिट्ठी भी थी।

“मेरी मीरा के लिए,

अगर तुम यह पढ़ रही हो, तो इसका मतलब मेरा प्लान फेल हो गया और तुम सच जान गई। मुझे माफ़ कर देना। मैं तुम्हें दुःख नहीं देना चाहता था, बस तुम्हें अपनी परछाई के अंधेरे से बचाना चाहता था। लोग कहते हैं प्यार में साथ जीना ज़रूरी है, पर मुझे लगा कभी-कभी प्यार में दूर जाना ज़रूरी होता है। खुश रहना मेरी जान। मैं तारों में बैठकर तुम्हें देखूंगा। और हाँ, अगली बार जब मिलूँगा, तो वादा करता हूँ, पूरी ज़िंदगी साथ निभाऊंगा।

– तुम्हारा आकाश”

मीरा ने चिट्ठी को सीने से लगा लिया। वह अकेली ज़रूर थी, लेकिन तन्हा नहीं थी। आकाश का प्यार, उसका त्याग, उसके साथ था।

आज भी जब मीरा किसी को यह कहते सुनती है कि “रिश्ते अब वो बात नहीं रही”, तो वह मुस्कुरा देती है। क्योंकि वह जानती है कि कुछ रिश्ते इतने गहरे होते हैं कि मौत भी उन्हें अलग नहीं कर सकती, सिर्फ़ जिस्म जुदा होते हैं, रूहें हमेशा एक-दूसरे में बसी रहती हैं।

अदालत की वो सीढ़ियाँ गवाह थीं एक ऐसे झूठ की, जो दुनिया का सबसे पवित्र सच था।


मित्रों, प्यार का असली मतलब सिर्फ़ साथ रहना नहीं होता, कभी-कभी प्यार का मतलब अपने साथी की ख़ुशी के लिए खुद बुरा बन जाना भी होता है। आकाश ने जो किया, क्या वो सही था या उसे मीरा को सच बता देना चाहिए था? आपकी क्या राय है?

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धन्यवाद!

मूल लेखिका : निभा राजीव निर्वि 

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