“रिया बेटा, तूने लाखों खर्च किए, तेरा बहुत-बहुत आशीर्वाद। पर तू शायद भूल गई कि इस ‘पुराने तंग घर’ की हर ईंट में मेरी और तेरी माँ की जवानी, तुम्हारा बचपन और हमारे सुख-दुःख की गूंज बसी है। पेंटहाउस में एसी की ठंडक तो होगी, पर इन दीवारों जैसी गर्माहट नहीं होगी। तूने वो दिया जो ‘दौलत’ खरीद सकती है।”
शहर के पुराने इलाके में बना ‘शर्मा निवास’ आज बहुत सालों बाद एक नई दुल्हन की तरह सजा हुआ था। घर के मुखिया, रामनाथ जी और उनकी धर्मपत्नी, सुलोचना देवी की शादी की पचासवीं सालगिरह यानी ‘गोल्डन जुबली’ थी। घर की बड़ी बहू, अंजलि, पिछले एक हफ्ते से पैरों पर चकरी बांधे घूम रही थी। घर की पुताई से लेकर, मेहमानों की लिस्ट बनाने तक, हलवाई से मेनू तय करने से लेकर सुलोचना जी की दवाइयों का ख्याल रखने तक—सब कुछ अंजलि के ज़िम्मे था।
अंजलि के पति, राघव, एक साधारण सरकारी नौकरी करते थे। घर का खर्च नपा-तुला था, लेकिन खुशियों में कोई कमी नहीं थी। अंजलि ने अपनी पुरानी साड़ियों को जोड़कर घर के लिए नए पर्दा सिए थे और रामनाथ जी के पुराने ग्रामोफोन को ठीक करवाकर एक कोने में सजाया था, क्योंकि बाबूजी को पुराने गाने बहुत पसंद थे।
दोपहर के दो बज रहे थे। अंजलि रसोई में पसीने से तर-बतर होकर शाम की पार्टी के लिए गुलाब जामुन की चाशनी तैयार कर रही थी। तभी घर के बाहर एक लंबी, चमचमाती कार आकर रुकी। हॉर्न की आवाज़ सुनते ही सुलोचना जी दौड़कर बाहर आईं।
“अरे, मेरी गुड़िया आ गई!” सुलोचना जी ने चहकते हुए कहा।
कार से एक बेहद स्टाइलिश महिला उतरी। वह रामनाथ जी की बेटी और अंजलि की ननद, ‘रिया’ थी। रिया की शादी शहर के एक बहुत बड़े उद्योगपति से हुई थी। वह सर से पाँव तक ब्रांडेड कपड़ों और गहनों से लदी हुई थी। उसके पीछे-पीछे ड्राइवर और नौकर डिक्की से बड़े-बड़े सूटकेस और गिफ्ट्स के डिब्बे निकाल रहे थे।
“हैप्पी एनिवर्सरी मम्मी-पापा!” रिया ने दूर से ही चिल्लाते हुए अपने माता-पिता को ‘हवा में’ गले लगाया (ताकि उसका मेकअप खराब न हो)।
“जीते रहो बेटा, बहुत दिन बाद आई,” रामनाथ जी ने भावुक होकर उसके सिर पर हाथ रखना चाहा, लेकिन रिया ने झट से अपना बालों का जुड़ा संभाल लिया और बोली, “पापा, प्लीज़, अभी सेट करवाए हैं। और हाँ, ये देखो मैं आप दोनों के लिए क्या लाई हूँ।”
रिया ने इशारे से ड्राइवर को बुलाया। “ये मम्मी के लिए प्योर कांजीवरम सिल्क साड़ी, इसकी कीमत पचास हज़ार है। और पापा, ये आपके लिए रोलेक्स की घड़ी, पूरे दो लाख की। और हाँ, ये घर के लिए नया 65 इंच का स्मार्ट टीवी। अब आप लोग वो पुराना डिब्बा देखना बंद करो।”
सुलोचना जी की आँखें फटी की फटी रह गईं। “अरे बेटा, इतना खर्च करने की क्या ज़रूरत थी? तू आ गई, यही बहुत है।”
रिया सोफे पर पैर के ऊपर पैर रखकर बैठ गई और एसी की हवा खाते हुए बोली, “अरे माँ, पचासवीं सालगिरह है। लोग क्या कहेंगे कि सिंघानिया ग्रुप की बहू अपने मायके खाली हाथ गई? स्टेटस का सवाल है। वैसे भाभी कहाँ हैं? पानी तो मंगवाओ, गला सूख रहा है।”
अंजलि, जो अब तक दरवाज़े के पीछे खड़ी सब देख रही थी, ट्रे में पानी और घर की बनी शिकंजी लेकर आई। उसने एक साधारण सी सूती साड़ी पहन रखी थी।
“नमस्ते दीदी,” अंजलि ने मुस्कुराते हुए कहा।
रिया ने अंजलि को ऊपर से नीचे तक देखा और एक फीकी मुस्कान दी। “नमस्ते भाभी। और बताओ, वही पुरानी साड़ी? आज शाम को पार्टी है, कुछ ढंग का पहन लेना। अगर नहीं है तो मेरे सूटकेस से एक डिज़ाइनर सूट निकाल लो, मैंने तुम्हारे लिए भी एक रखा है। वैसे भी, आज शहर के बड़े-बड़े लोग आने वाले हैं, मेरे इन-लॉज भी आएंगे। सब कुछ ‘परफेक्ट’ होना चाहिए।”
अंजलि का मन थोड़ा खट्टा हो गया, लेकिन उसने ज़ाहिर नहीं होने दिया। “जी दीदी, मैंने तैयारी कर ली है।”
शाम होते-होते घर का माहौल बदल गया। रिया ने आते ही घर की कमान अपने हाथ में ले ली थी। उसने अंजलि द्वारा बुक किए गए हलवाई को कैंसिल करवाकर शहर के महंगे कैटरर्स को बुला लिया। घर की सजावट, जो अंजलि ने अपने हाथों से गेंदे के फूलों और दीयों से की थी, उसे ‘चीप’ और ‘देहाती’ बताकर रिया ने इवेंट मैनेजमेंट वालों से विदेशी फूलों की सजावट करवा दी।
अंजलि एक कोने में खड़ी थी। उसकी हफ़्तों की मेहनत को रिया ने अपने ‘पैसों की ताकत’ से एक पल में बदल दिया था। राघव ने अंजलि का हाथ दबाया और धीमे स्वर में कहा, “तुम बुरा मत मानो। रिया को दिखावे की आदत है, पर माँ-बाबूजी जानते हैं कि असली मेहनत किसकी है।”
पार्टी शुरू हुई। घर किसी फाइव स्टार होटल जैसा लग रहा था। वेटर घूम रहे थे, डीजे पर तेज़ अंग्रेज़ी संगीत बज रहा था। सुलोचना जी और रामनाथ जी एक ऊंचे मंच पर सोफे पर बैठे थे, जैसे किसी नाटक के पात्र हों। वे मुस्कुरा तो रहे थे, लेकिन उनकी आँखों में एक थकान और असहजता थी। उन्हें न तो वो विदेशी खाना समझ आ रहा था और न ही वो तेज़ संगीत, जिससे उनके कानों में दर्द हो रहा था।
मेहमान आ रहे थे और रिया बड़े गर्व से सबको बता रही थी, “ये डेकोरेशन मैंने इटली से मंगवाए फूलों से करवाई है। ये खाना कॉन्टिनेंटल है।” सब रिया की तारीफ कर रहे थे। “वाह सुलोचना जी, बेटी हो तो ऐसी। किस्मत वालों को ऐसी रईस औलाद मिलती है।”
अंजलि रसोई में थी, मेहमानों के लिए गर्म रोटियां सेकने की व्यवस्था देख रही थी, क्योंकि उसे पता था कि बाबूजी के कुछ पुराने दोस्त हैं जो पास्ता या पिज़्ज़ा नहीं खा पाएंगे।
तभी केक काटने का समय आया। एक बड़ा सा तीन मंज़िला केक लाया गया। रिया ने माइक संभाला।
“लेडीज़ एंड जेंटलमैन! आज मेरे मम्मी-पापा की गोल्डन जुबली है। इस मौके पर मैं उन्हें एक छोटा सा तोहफा देना चाहती हूँ।”
रिया ने अपनी जेब से दो चाबियां निकालीं। “मम्मी-पापा, ये शहर के पॉश इलाके में एक पेंटहाउस की चाबी है। अब आप लोग इस पुराने, तंग घर को छोड़िए और अपनी बची हुई ज़िंदगी लक्ज़री में बिताइए। यह मेरी तरफ से आप दोनों के लिए।”
हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। लोग रिया की दरियादिली के कसीदे पढ़ने लगे। सुलोचना जी की आँखों में आंसू आ गए—खुशी के नहीं, बल्कि एक अजीब से डर के। अपना पुश्तैनी घर छोड़ने की बात सुनकर रामनाथ जी का चेहरा उतर गया, पर मेहमानों के सामने वे कुछ बोल नहीं पाए।
फिर रिया ने माइक में कहा, “अब मैं अपने भैया-भाभी को बुलाना चाहूंगी। आखिर वो भी कुछ न कुछ तो लाए ही होंगे, भले ही छोटा हो।” उसकी आवाज़ में एक व्यंग्य छिपा था।
अंजलि और राघव मंच पर आए। अंजलि के हाथ में एक पुराना, मखमली कपड़े में लिपटा हुआ आयताकार बक्सा था। रिया के पेंटहाउस और लाखों के गहनों के सामने वह बक्सा बहुत मामूली लग रहा था। कुछ मेहमान आपस में फुसफुसाने लगे और दबी हंसी हंसने लगे।
अंजलि ने माइक लिया। उसका गला थोड़ा सूख रहा था, लेकिन आवाज़ में कंपन नहीं था।
“बाबूजी, माँ जी… हमारे पास रिया दीदी की तरह देने के लिए पेंटहाउस या हीरे-मोती तो नहीं हैं। लेकिन हमने कोशिश की है कि उन लम्हों को समेट कर लाएं, जो शायद ज़िंदगी की भागदौड़ में कहीं पीछे छूट गए थे।”
अंजलि ने बक्सा खोला। उसमें कोई गहना नहीं था। उसमें एक बहुत ही मोटा, हाथ से बनाया हुआ ‘स्क्रैपबुक’ (एल्बम) था। और साथ में एक पुराना, घिसा हुआ रेडियो।
रामनाथ जी ने हैरानी से उस रेडियो को देखा। “ये… ये तो मेरा वही रेडियो है जो 1975 में खो गया था?”
“जी बाबूजी,” अंजलि ने मुस्कुराते हुए कहा। “मैंने कबाड़ी बाज़ार के कई चक्कर लगाए, तब जाकर वैसा ही एक मॉडल मिला और उसे ठीक करवाया। और ये एल्बम…”
अंजलि ने एल्बम का पहला पन्ना खोला। वहां रामनाथ जी और सुलोचना देवी की शादी की पहली श्वेत-श्याम (Black & White) फोटो थी, जो दीमक खा चुकी थी, लेकिन अंजलि ने उसे डिजिटली रिस्टोर करवाकर साफ़ करवा दिया था।
जैसे-जैसे पन्ने पलटते गए, हॉल में सन्नाटा छाने लगा।
उस एल्बम में सिर्फ़ फोटो नहीं थे। उसमें रामनाथ जी के उन दोस्तों के हाथ से लिखे ख़त थे, जो अब देश के अलग-अलग कोनों में रहते थे और जिनसे रामनाथ जी की बात हुए बरसों हो गए थे। अंजलि ने पिछले तीन महीनों में उन सभी दोस्तों को ढूंढकर, उनसे संपर्क किया था और उनसे चिट्ठियां लिखवाई थीं।
एक पन्ने पर सुलोचना जी की माँ (अंजलि की नानी सास) की एक पुरानी तस्वीर थी, जिसके नीचे उनकी हाथ की लिखी एक रेसिपी थी—’बेसन के लड्डू’ की, जो सुलोचना जी को बहुत पसंद थे।
अगले पन्ने पर, उस अस्पताल का बिल और रसीद चिपकाई गई थी जहाँ राघव का जन्म हुआ था, और साथ में रामनाथ जी की डायरी का वो पन्ना जहाँ उन्होंने पहली बार ‘पिता’ बनने की खुशी ज़ाहिर की थी।
रामनाथ जी की आँखें, जो पेंटहाउस की चाबी देखकर सूखी थीं, अब झर-झर बहने लगीं। सुलोचना जी अपना पल्लू मुंह पर रखकर सिसक रही थीं।
अंजलि ने माइक पर कहा, “बाबूजी, आपने हमेशा कहा था कि आपकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी कमाई आपके रिश्ते और आपकी यादें हैं। रिया दीदी ने आपके भविष्य को सुरक्षित किया है, पर मैंने और राघव ने आपके अतीत को सहेजने की कोशिश की है। उम्मीद है आपको पसंद आएगा।”
रामनाथ जी अपनी जगह से उठे। उन्होंने कांपते हाथों से वह एल्बम सीने से लगा लिया। फिर उन्होंने रिया की दी हुई पेंटहाउस की चाबी मेज़ पर रख दी और उस पुराने रेडियो को उठा लिया।
माहौल एकदम भावुक हो गया था। डीजे का संगीत बंद हो चुका था। रामनाथ जी ने कांपती आवाज़ में माइक थाम लिया।
“आज… आज मुझे एहसास हुआ कि मैं कितना अमीर हूँ। नहीं, इसलिए नहीं कि मेरी बेटी ने मुझे पेंटहाउस दिया। बल्कि इसलिए कि मेरी बहू ने मुझे ‘मैं’ लौटा दिया।”
उन्होंने रिया की ओर देखा, जो अब थोड़ी असहज हो रही थी।
“रिया बेटा, तूने लाखों खर्च किए, तेरा बहुत-बहुत आशीर्वाद। पर तू शायद भूल गई कि इस ‘पुराने तंग घर’ की हर ईंट में मेरी और तेरी माँ की जवानी, तुम्हारा बचपन और हमारे सुख-दुःख की गूंज बसी है। पेंटहाउस में एसी की ठंडक तो होगी, पर इन दीवारों जैसी गर्माहट नहीं होगी। तूने वो दिया जो ‘दौलत’ खरीद सकती है।”
फिर वे अंजलि की ओर मुड़े और उसका सिर चूम लिया।
“पर मेरी इस पगली बहू ने वो दिया, जो दुनिया की कोई दौलत नहीं खरीद सकती—’वक्त’ और ‘एहसास’। इसने महीनों लगाए होंगे मेरे पुराने दोस्तों को ढूंढने में। इसने रातों को जागकर ये फोटो ठीक किए होंगे। रिया, तूने तोहफा दिया, पर अंजलि ने खुद को ही तोहफे में दे दिया। रिश्तों में लेन-देन तो व्यापार में होता है बेटा, परिवार में तो बस प्यार और समर्पण देखा जाता है।”
रिया का चेहरा शर्म से लाल पड़ गया था। उसे अपनी बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ, वो महंगे फूल और वो पेंटहाउस अब अंजलि के उस फटे-पुराने पन्नों वाले एल्बम के सामने बहुत छोटे लग रहे थे। उसे समझ आ गया था कि वह अपने माता-पिता के लिए ‘वस्तुएं’ लाई थी, जबकि अंजलि उनके लिए ‘यादें’ लाई थी।
पार्टी के अंत में, जब खाना शुरू हुआ, तो रामनाथ जी ने वो कॉन्टिनेंटल खाना नहीं खाया। उन्होंने अंजलि को आवाज़ दी, “बहू, वो तेरे हाथ की बनी आलू-पूरी और खीर है क्या? आज वही खाने का मन है।”
रिया, जो कोने में खड़ी थी, धीरे से अंजलि के पास आई। उसका अहंकार अब पिघल चुका था।
“भाभी,” रिया ने धीमी आवाज़ में कहा।
अंजलि ने पलटकर देखा।
“सॉरी भाभी। मैंने पैसों के घमंड में यह नहीं देखा कि आप इस घर की नींव हो। मैंने घर को सजाया, पर आपने घर को संभाला। पापा सही कह रहे थे, प्यार का कोई मोल नहीं होता। क्या मुझे भी वो एल्बम देखने को मिलेगा?”
अंजलि ने मुस्कुराकर रिया को गले लगा लिया। “दीदी, ये एल्बम हम सबका है। इसमें आपकी बचपन की वो फोटो भी है जब आप मिट्टी में लोट-पोट होकर रो रही थीं।”
दोनों ननद-भाभी हंस पड़ीं। उस रात ‘शर्मा निवास’ में डीजे की धुन नहीं, बल्कि उस पुराने रेडियो पर बजता हुआ पुराना गीत गूंज रहा था—*”ये जीवन है, इस जीवन का, यही है, यही है रंग रूप…”*
रामनाथ जी और सुलोचना देवी अपने बच्चों के बीच बैठे थे। मेज़ पर पेंटहाउस की चाबी पड़ी थी, लेकिन किसी का ध्यान उस पर नहीं था। सबका ध्यान उस एल्बम और एक-दूसरे की बातों पर था। उस रात उस घर ने फिर से साबित कर दिया कि मकान ईंटों से बनता है, लेकिन घर उन लोगों से बनता है जो एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र करना जानते हैं।
महंगे तोहफे कुछ पल की खुशी दे सकते हैं, अलमारी की शोभा बढ़ा सकते हैं, लेकिन जो सुकून किसी के द्वारा दिए गए ‘वक्त’ और ‘अपनापन’ में होता है, वह रूह को तृप्त कर देता है। रिश्तों की डोर रेशम से नहीं, बल्कि अहसासों के कच्चे धागे से बंधी होती है, जिसे दौलत की कैंची नहीं काट सकती।
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**कहानी का सार:**
जीवन की आपाधापी में हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि हमारे माता-पिता या हमारे प्रियजन हमसे महंगी घड़ियाँ या कपड़े नहीं चाहते। वे बस यह चाहते हैं कि हम उनके पास बैठें, उनकी बातें सुनें और उन्हें महसूस कराएं कि वे हमारे लिए कितने महत्वपूर्ण हैं। उपहार की कीमत उसके प्राइस टैग में नहीं, बल्कि उसे देने वाले की नीयत और उसमें छिपे प्यार में होती है।
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**एक सवाल आप पाठकों के लिए:**
क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा पल आया है जब किसी छोटे से, प्यार भरे तोहफे ने किसी महंगे गिफ्ट को मात दे दी हो? अपनी यादें हमारे साथ कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका : करुणा मलिक