“नेहा ,तुम मुझे नही पहचान रही …मैं तुम्हारा पति विनय..”विनय अधिकार से नेहा का रास्ता रोक कर बोला ।
“मेरा रास्ता छोड़ दें ..”
“कैसे छोड़ दें ,मत भूलो नेहा कानूनन तुम अभी भी मेरी पत्नी हो “दुष्टता से विनय बोला
“हां मां ,आप अपने पति और बेटे को भूल गई ..”
बेटे की बात दिल में खंजर की तरह चुभ गई ,इसी बेटे के लिए न जाने कितनी रातों की नींद कुर्बान की थी ,इसी पति के लिए उसने अपना वजूद भूला दिया ,बस दिन – रात एक ही चिंता …किस तरह पति और बेटा खुश रहे …,
अब अधिकार कैसा ,और किसका …जब मन में स्वार्थ की गांठ पड़ चुकी हो …जब रिश्तों की मर्यादा टूट जाती है,तब कुछ बचता ही कहां …., दर्द की एक तेज लहर मन में उठी ,पर नही, नेहा इन सब से परे हो चुकी ,एक मजबूत शख्सियत…”नेहा मैडम “,
“सॉरी मिस्टर विनय कुछ अर्जेंट मीटिंग है ,आपको कोई काम है तो बताइए..”दृढ़ और सपाट स्वर ने विनय को समझा दिया ,अब कुछ भी लौट कर नहीं आने वाला ,नेहा कार का दरवाजा खोल बैठ गई ।
कार रफ्तार से आगे बढ़ गई ,ठीक उसकी जिंदगी की तरह …,उसकी जिंदगी ने भी रफ्तार पकड़ ली ,और वो अब पत्नीत्व और मातृत्व का चोला छोड़ चुकी है …
बहुत खुश है अपनी जिंदगी से ,घर परिवार के लिए तो हजारों लोग जीते है ,लेकिन जरूरतमंद और निष्कासित लोगों के संग जिंदगी गुजरना बिरले ही कर पाते ,दूसरों को हौसला दे जिंदगी की ओर मोड़ना आसान नहीं है लेकिन असंभव भी नहीं है ,वही तो कर रही नेहा ..।
एक बार दिल ने चाहा पलट कर उस दुनिया को देख ले जो कभी उसकी हुआ करती थी ,आखिर वो एक मां और पत्नी थी ,जिसने बड़े प्यार से रिश्तों को सहेज कर एक घर बनाया ,जिसकी बुनियाद शायद कमजोर थी ,तभी एक हल्की आंधी में ढह गई ।
कभी उसकी दुनिया भी खूबसूरत हुआ करती थी ,उसकी सुंदरता देख कर ही विनय उससे शादी की जिद्द कर बैठा ,जबकि दोनों के पारिवारिक रुतबे में बहुत अंतर था ,
विनय के पिता शहर के नामी व्यवसायी थे ,विनय भी तेज बुद्धि का था ,पढ़ाई पूरी कर पिता का बिजनेस संभालने लगा था ,जबकि नेहा एक औसत परिवार की थी उसके पिता एक शिक्षक थे ,अपनी सीमित आमदनी में उन्होंने अपने तीनों बच्चों को अच्छी शिक्षा दी ।
विनय के माता – पिता अपनी बराबरी में विनय की शादी करना चाहते थे ,पर विनय की जिद्द से हार कर उन्होंने शादी तो कर दी लेकिन दिल से नेहा को बहू नहीं मान पाए।
नेहा ने बहुत कोशिश की ,लेकिन सास – ससुर का दिल जीत नहीं पाई ..,उनलोगों को उसमें कोई गुण न दिखता ,दिखे भी कैसे जब सामने वाला देखना ही न चाहे …,
नेहा हताश होने लगी , इसी बीच वो एक बच्चे की मां बन गई ,फिर कुछ समय जीवन अच्छा गुजरा ,बेटा बड़ा हो गया था लेकिन नेहा का स्वास्थ गिरने लगा ,
बाद में पता चला उसे लीवर कैंसर है…. .,जब उसे परिवार की जरूरत थी,तब पति ही नहीं बेटे ने भी उससे किनारा कर लिया ,
जानलेवा बीमारी से जूझ रही नेहा ,गिरते बाल और बदलते शारीरिक बदलाव से उतनी परेशान नही थी , जितनी बदलते चेहरों और रिश्तों से थी ,।
“मां की बीमारी से कहीं हमलोगों को इन्फेक्शन न हो जाए ..”
“अब इसमें रखा क्या है ,फालतू हो गई …”पढ़े – लिखे होने के बावजूद ये सोच रखने वाले रिश्तों ने जब किनारा किया तो नेहा खूब रोई,बिखरी …. घर के पीछे के कमरे में उसका बेड लगा दिया गया ,उसी कमरे में रहते उसने पेड़ पर चिड़िया का घोंसला देखा ,दो छोटे चूज़े देखा ,चिड़िया को चोंच में अनाज ला चूजों को खाना खाते देखा ,
कुछ समय बाद उन्हें उड़ते देखा …,और फिर एक दिन चूजों की चहचहाट नहीं सुनाई दी ,झांक कर देखा चिड़िया घोंसले में उदास बैठी थी ,कुछ दिन चिड़िया उदास रही फिर घोसलें से बाहर निकलने लगी ..बस उसी दिन नेहा को जीवन का सत्य समझ में आ गया ,अब तक पति और संतान के मोह में बिलखती नेहा को एक नया रास्ता दिख गया ,
चुपचाप एक दिन कुछ जरूरी सामान के साथ नेहा ने घर छोड़ दिया ,किसीने उसे रोका भी नहीं ,बीमारी का जो डर था ।
लेकिन ये जिंदगी है ..टूट कर जुड़ना और फिर आगे बढ़ना जानती है …।
एक एन जिओ से जुड़ी जिसने उसके इलाज करवाने में मदद की , जीने की जिजीविषा और हिम्मत के साथ बीमारी पर विजय पा लिया उसने ।
एन जिओ में ,अपने जैसे लोगो को साथ ले एक मुकाम हासिल किया , शहर का जाना माना नाम ही नहीं बल्कि अपनी जैसी बीमारी से ग्रस्त लोगो के लिए मिसाल बन गई ।
उसके बुलंद हौसलों के आगे ,बीमारी भी हार गई ,सच है जिंदगी और कुछ भी नहीं ,एक जंग की कहानी है ।
—-संगीता त्रिपाठी
#अधिकार कैसा