जोरू का गुलाम – गरिमा चौधरी 

“खट!”

स्टील की थाली को मेज पर पटकने की तीखी आवाज़ से पूरे घर का सन्नाटा टूट गया। रसोई में खड़ी सुधा का दिल एक पल के लिए सहम गया। वह अपने सूजे हुए पैरों को घसीटते हुए डाइनिंग हॉल में आई। सामने उसकी सास, विमला देवी, और उनकी बड़ी ननद, सरोज बुआ, मुंह फुलाकर बैठी थीं। थाली में परोसा गया गरमा-गरम खाना ज्यों का त्यों रखा था।

“क्या हुआ माँ जी? सब्जी में नमक कम है क्या?” सुधा ने डरते हुए पूछा।

“नमक का तो पता नहीं बहू,” सरोज बुआ ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, “लेकिन इस खाने में ‘अशुद्धि’ कूट-कूट कर भरी है। हम ऐसे घर का अन्न ग्रहण नहीं कर सकते जहाँ रसोई की मर्यादा का ही पालन न हो।”

सुधा हैरान रह गई। उसने सुबह चार बजे उठकर नहा-धोकर, पूरी निष्ठा से यह खाना बनाया था क्योंकि आज बुआ जी पहली बार उनके नए घर आई थीं।

“अशुद्धि? पर बुआ जी, मैंने तो सब कुछ साफ-सफाई से…”

“अरे रहने दे अपनी सफाई!” विमला देवी ने अपनी बेटी का पक्ष लेते हुए बहू को डांटा। “तेरी हिम्मत कैसे हुई पैरों में वो रबड़ की चप्पल पहनकर रसोई में घुसने की? हमारे खानदान में आज तक किसी बहू ने अन्नपूर्णा कक्ष में जूते-चप्पल नहीं पहने। यह तो घोर पाप है। ऐसा अपवित्र खाना हम नहीं खाएंगे।”

सुधा की आँखों में आंसू आ गए। “माँ जी, आपको तो पता है न, पिछले हफ्ते ही सीढ़ियों से फिसलने की वजह से मेरी एड़ी में ‘हेयरलाइन फ्रैक्चर’ हुआ है। डॉक्टर ने सख्त हिदायत दी है कि मुझे नंगे पैर नहीं चलना है और ये ‘ऑर्थोपेडिक’ चप्पलें पहननी हैं। इसीलिए तो…”

“तो क्या डॉक्टर धर्म से बड़ा हो गया?” बुआ जी ने ताना मारा। “हमारे ज़माने में तो पैरों में छाले पड़ जाते थे, फिर भी हम चूल्हे के पास नंगे पैर ही बैठते थे। यह सब आजकल के चोंचले हैं। अगर इतनी ही तकलीफ थी तो खाना बनाने की ज़रूरत नहीं थी। हम भूखे रह लेते, पर ऐसा भ्रष्ट खाना नहीं खाते।”

तभी बेडरूम का दरवाज़ा खुला और विकास बाहर आया। वह पिछले पंद्रह मिनट से अपने कमरे में खड़ा सब सुन रहा था। वह आज ऑफिस नहीं गया था क्योंकि बुआ जी आई थीं, लेकिन अब उसके सब्र का बांध टूट चुका था।

विकास सीधा डाइनिंग टेबल के पास आया और उसने शांति से वह थाली उठाई जिसे बुआ जी ने सरका दिया था।

“विकास, देख तेरी बीवी के लक्षण,” विमला देवी ने बेटे से शिकायत की। “बुआ जी नाराज़ होकर बैठी हैं और इसे कोई फर्क नहीं पड़ता।”

विकास ने एक गहरी साँस ली और माँ की आँखों में देखते हुए कहा, “माँ, आप सही कह रही हैं। यह खाना वाकई आप लोगों के खाने लायक नहीं है।”

सुधा ने चौंककर पति की ओर देखा। क्या विकास भी उन लोगों का साथ दे रहा है?

लेकिन विकास ने अपनी बात जारी रखी, “यह खाना इसलिए खाने लायक नहीं है क्योंकि इसमें एक ऐसी औरत की मेहनत और दर्द मिला है, जिसकी कद्र इस घर में किसी को नहीं है। आप लोग अशुद्धि की बात कर रही हैं? चलिए, आज हिसाब कर ही लेते हैं कि असल में अशुद्ध क्या है—सुधा की चप्पलें या आप लोगों की सोच।”

“जुबान संभाल कर बात कर विकास!” बुआ जी चिल्लाईं। “जोरू का गुलाम होकर अपनी बुआ और माँ का अपमान कर रहा है?”

विकास हंसा, लेकिन उस हंसी में कड़वाहट थी। “अपमान? अपमान तो उस दिन हुआ था बुआ जी, जब छह महीने पहले सुधा ने हमारे बेटे आरव को जन्म दिया था। याद है आपको वो रात?”

कमरे में सन्नाटा छा गया। विमला देवी की नज़रें झुक गईं।

विकास ने सुधा का हाथ पकड़ा और उसे पास वाली कुर्सी पर जबरदस्ती बैठा दिया। “बैठो सुधा। आज तुम्हें खड़े होने की ज़रूरत नहीं है।”

फिर वह अपनी माँ की ओर मुड़ा। “छह महीने पहले, सुधा का सिजेरियन ऑपरेशन हुआ था। टांके कच्चे थे, शरीर में खून की कमी थी। डॉक्टर ने कहा था इसे पौष्टिक खाने और पूरे आराम की ज़रूरत है। उस वक्त आप भी यहीं थीं बुआ जी, आरव के नामकरण के लिए आई थीं।”

विकास की आवाज़ अब ऊंची हो गई थी। “उस दिन घर में ‘सवामणी’ का प्रसाद बन रहा था। पचास लोगों का खाना बन रहा था। हलवाई लगे थे। सुधा, जो अपने कमरे में दर्द से कराह रही थी, उसे भूख लगी थी। उसने आपसे, माँ, सिर्फ एक कटोरी दलिया मांगा था। याद है आपने क्या कहा था?”

विमला देवी चुप रहीं।

“मैं बताता हूँ,” विकास ने उंगली उठाकर कहा। “आपने कहा था—’अभी भोग नहीं लगा है। जब तक पंडित जी नहीं खा लेते और कुलदेवता को भोग नहीं लगता, इस घर में कोई अन्न का दाना नहीं खाएगा। यह अपशगुन होगा।’ सुधा ने गिड़गिड़ाकर कहा था कि उसे चक्कर आ रहे हैं, उसे बच्चे को दूध पिलाना है, उसे बहुत भूख लगी है। लेकिन आप दोनों ने… आप दोनों ने उसे एक गिलास दूध तक नहीं दिया क्योंकि ‘नियम तो नियम होते हैं’।”

सुधा सिसकने लगी। वह मंज़र उसकी आँखों के सामने घूम गया। वह भूख और कमजोरी से बेहाल थी, और बाहर हॉल में बुआ जी और सास हँस-हँसकर मेहमानों का स्वागत कर रही थीं।

विकास की आँखों में अंगारे थे। “मैं उस वक्त शहर से बाहर था। जब मैं रात को लौटा, तो मैंने देखा कि मेरी पत्नी भूख और कमजोरी से बेहोश होकर बिस्तर के नीचे फर्श पर पड़ी थी। और आप लोग? आप लोग बाहर बरामदे में बैठकर पंडित जी के साथ खीर-पूड़ी का आनंद ले रहे थे। उस दिन आप लोगों का धर्म कहाँ गया था? क्या एक भूखी, लाचार माँ को तड़पाना ही आपका धर्म है?”

“वो… वो तो पंडित जी ने कहा था…” विमला देवी ने हकलाते हुए सफाई देने की कोशिश की।

“बस माँ!” विकास ने हाथ के इशारे से उन्हें चुप करा दिया। “पंडित जी ने नहीं, आपके पत्थर दिल ने कहा था। उस दिन डॉक्टर ने मुझे बताया था कि अगर सुधा को कुछ घंटे और खाना नहीं मिलता, तो वह ‘शॉक’ में जा सकती थी। उस रात मैंने कसम खाई थी कि मैं अपनी पत्नी की जान को आप लोगों के खोखले रीति-रिवाजों की बलि नहीं चढ़ने दूंगा।”

विकास ने सुधा के पैरों की तरफ इशारा किया। “आज इसके पैर में फ्रैक्चर है। फिर भी इसने दर्द निवारक गोलियां खाकर आप लोगों के लिए छप्पन भोग बनाए। और आप लोग क्या कर रहे हैं? उसकी चप्पल देख रहे हैं? आपको उसके चेहरे का पसीना नहीं दिखा? उसका दर्द नहीं दिखा? सिर्फ यह दिखा कि उसने रबर की चप्पल पहन रखी है?”

सरोज बुआ का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। “तो अब तू हमें सिखाएगा कि धर्म क्या होता है? हम जा रहे हैं इस घर से। जहाँ बड़ों की इज़्ज़त नहीं, वहां पानी पीना भी हराम है।”

बुआ जी उठ खड़ी हुईं। उन्हें लगा कि हमेशा की तरह इमोशनल ब्लैकमेल काम कर जाएगा और विकास उनके पैरों में गिरकर माफ़ी मांगेगा।

लेकिन विकास अपनी जगह से नहीं हिला। उसने शांत स्वर में कहा, “दरवाज़ा खुला है बुआ जी। और माँ, अगर आपको भी लगता है कि बहू की जान से बढ़कर आपके नियम हैं, तो आप भी बुआ जी के साथ जा सकती हैं। मैं टैक्सी मंगवा देता हूँ।”

विमला देवी सन्न रह गईं। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उनका बेटा इतना कठोर हो सकता है।

“तू… तू मुझे घर से निकाल रहा है?” विमला देवी की आवाज़ कांप गई।

“मैं किसी को नहीं निकाल रहा माँ,” विकास ने सुधा के कंधे पर हाथ रखा। “मैं बस अपनी पत्नी और अपने बच्चे की माँ की रक्षा कर रहा हूँ। पिछले छह महीनों में मैंने देख लिया है कि जब सुधा पर मुसीबत आती है, तो आप लोग ‘परिवार’ नहीं, बल्कि ‘जज’ बन जाते हैं। मुझे ऐसा परिवार नहीं चाहिए जो मेरी पत्नी को तिल-तिल कर मारे। अगर आपको यहाँ रहना है, तो सुधा को इज़्ज़त देनी होगी। उसकी तकलीफ को समझना होगा। वरना आप लोगों के ये नियम-धर्म आपको मुबारक।”

सुधा ने पहली बार विकास को इतना मुखर देखा था। अब तक वह सोचती थी कि विकास शायद परिवार की शांति के लिए चुप रहता है, लेकिन आज उसे महसूस हुआ कि विकास ने उस पुरानी काली रात को कभी भुलाया नहीं था। वह बस सही वक्त का इंतज़ार कर रहा था।

सरोज बुआ समझ गईं कि यहाँ दाल नहीं गलने वाली। वह बड़बड़ाते हुए अपना बैग उठाकर बाहर निकल गईं। विमला देवी वहीं खड़ी रहीं। उनकी नज़रों के सामने वह पुरानी घटना तैर गई—कैसे सुधा बेहोश पड़ी थी और छोटा आरव रो रहा था। आज उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ, या शायद इस बात का डर कि बुढ़ापे में बेटा उन्हें छोड़ देगा।

विमला देवी धीरे से वापस कुर्सी पर बैठ गईं।

विकास ने सुधा को देखा और मुस्कुराया। “तुम क्यों रो रही हो? चलो, खाना ठंडा हो रहा है। तुम शुरू करो।”

“लेकिन माँ जी…” सुधा ने सास की तरफ देखा।

विकास ने अपनी थाली सुधा के आगे खिसका दी। “जिन्हें भूख होगी, वो खा लेंगे। और जिन्हें अहंकार प्यारा होगा, उनका पेट तो वैसे भी भरा रहता है।”

सुधा ने कांपते हाथों से निवाला उठाया। आज वह निवाला उसे सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि ‘स्वाभिमान’ का स्वाद दे रहा था। उसने एक टुकड़ा तोड़ा और अपने मुंह में डाला। उसने अपनी चप्पलें नहीं उतारीं। और हैरान करने वाली बात यह थी कि विमला देवी ने भी चुपचाप अपनी थाली अपनी ओर खींची और खाना शुरू कर दिया।

उस दिन उस घर में कोई मंत्र नहीं पढ़ा गया, कोई घंटी नहीं बजी, लेकिन फिर भी वहां एक बहुत बड़ी पूजा संपन्न हुई थी—एक औरत के आत्मसम्मान की स्थापना।

रात को जब सब शांत हो गया, तो सुधा ने विकास से पूछा, “अगर आज माँ भी चली जातीं तो?”

विकास ने सुधा के सिर पर तेल की मालिश करते हुए कहा, “तो हम उन्हें मनाते नहीं सुधा। रिश्तों की डोर प्रेम और परवाह से बंधती है, डर या जबरदस्ती से नहीं। उस दिन जब मैंने तुम्हें फर्श पर बेहोश देखा था, उसी दिन मैंने तय कर लिया था कि अब मैं ‘श्रवण कुमार’ नहीं बनूँगा, बल्कि एक ‘पति’ बनूँगा। क्योंकि माँ-बाप का ध्यान रखना फ़र्ज़ है, लेकिन पत्नी की रक्षा करना ‘धर्म’ है। और धर्म से बड़ा कोई नियम नहीं होता।”

सुधा ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसके पैरों का दर्द अब भी था, लेकिन दिल का वह पुराना नासूर, जो उस भूखी रात को मिला था, आज हमेशा के लिए भर गया था। उसे समझ आ गया था कि अब उसे किसी के प्रमाण पत्र की ज़रूरत नहीं है। उसकी रसोई अब उसकी शर्तों पर चलेगी, जहाँ प्यार ‘शुद्ध’ होगा, और ढोंग ‘वर्जित’।

बाहर बारिश शुरू हो गई थी, जो शायद उस घर की सारी पुरानी, सड़ी-गली परंपराओं को धोने के लिए ही बरस रही थी।

लेखिका : गरिमा चौधरी 

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