जिंदगी – संगीता त्रिपाठी

इंजीनियरिंग कॉलेज का पचासवां वर्षगांठ…,कॉलेज प्रशासन ने बड़े धूमधाम से मनाने की सोची …,बड़े आयोजन की तैयारी की , पुराने स्टूडेंट्स  को भी निमंत्रित किया गया ।

       तीन दिन का प्रोग्राम कल से शुरू है ,रेवा आज सुबह ही दिल्ली पहुंची ,कॉलेज द्वारा आरक्षित होटल में सामान रख ,कॉलेज देखने का लोभ न रोक पाई ।जहां अनकही कई कहानियां थी , भावों का समुंदर था ,कुछ अधूरी तो कुछ पूरी दास्तां थी ।

        कॉलेज बहुत बदल गया , पैंतीस साल पहले और अब में बहुत अंतर है  लेकिन पुरानी बिल्डिंग अभी भी उसी तरह है जैसे रेवा के समय में था ,

      घूम फिर कर रेवा होटल लौट आई , डायनिंग हॉल में पुराने सहपाठियों को देख मन हर्षित हो उठा ,समय ने चांदी के बालों और लकीरों की वृद्धि कर दी ,लेकिन यहां आए चेहरे हर्ष से अपने  वही पुराने अवतार में आ गए थे,जब भावनाएं शोख होती थी , जुनून की पराकाष्ठा होती थी ।

     “सुनिए मैडम ,आप बता सकती है रेवा कहां है ” एक गंजे व्यक्ति ने पूछा ,

उन्हें पहचान कर होठों को गोल कर और आंखों को नचाती रेवा बोली “,कौन रेवा”

     “अरे वहीं जो बहुत अच्छा गाती थी “

       “मै नहीं जानती किसी रेवा को “साठ बरस की रेवा का दिल किशोरावस्था की तरह शैतान हो गया था ।

    आप कौन सी बैच की हो “

  “आपको इससे क्या “

    कह कर  रेवा वहां से हट गई ,रेवा मिहिर को पहचान गई थी लेकिन मिहिर रेवा के चांदी जैसे बालों और चेहरे की अनगिनत लकीरों में उलझ गया था , हाव – भाव से तो रेवा लग रही थी ,मगर बता नहीं रही थी ,उसकी रेवा तो लंबे बालों वाली एक कमसिन काया थी ये तो कुछ अट्रैक्टिव तो है ,लेकिन रेवा वाली बात नहीं है ।

      उफ्फ क्या करना ,इस उम्र में तो स्मरण शक्ति भी धोखा देने लगती है , आंखों पर मोटे फ्रेम के  चश्में को भी ठीक करते मिहिर ने सोचा ।

     अगले दिन ,हॉल में पहुंच मिहिर अपने नाम की   आरक्षित सीट खोज रहा था ,उसकी निगाहें आगे की सीट पर पड़ी जिस पर रेवा लिखा था ,चलो अब तो मुलाकात हो ही जाएगी ,वैसे आने वाले अतिथियों की लिस्ट में रेवा का नाम देख कर ही वो रेवा को ढूंढ रहा था ।

       कॉलेज आते ही मन पैंतीस बरस पीछे चला गया ,अक्सर लाइब्रेरी में मौन बैठे रेवा को निहारते थे ,रेवा बहुत अच्छा गाती थी ,वे गिटार बहुत अच्छा बजाते थे ,दोनो की रुचियां एक जैसी होने से कॉलेज के हर समारोह में उनकी भागीदारी होती थी , कब वे रेवा को दिल दे बैठे,समझ नहीं पाए।उनके बैच में रेवा को ले कर चार लड़कियां थी ।

      बस सहपाठी होने के नाते नोट्स और किताबों का अदान – प्रदान से ज्यादा वे कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर पाते थे ,एक दिन हिम्मत कर वे एक सुर्ख गुलाब के संग एक पत्र रेवा को थमा दिए ,।

              अगले दिन उन्हें अपना पत्र बैरंग वापस मिल गया ,सिर्फ गुलाब नहीं मिला ।एक छोटा नोट ,”मेरी शादी तय हो चुकी है ,परीक्षा के बाद ही शादी है “

    अपना टूटा दिल ले फिर मिहिर कई दिन कॉलेज नहीं गए ,परीक्षा के दिन करीब थे ,ऐसे ही एक दिन उनके रूम में दस्तक हुई 

       “तुम ,यहां “

     “हां मैं ,ये कहने आई हूं ,प्यार प्रतिदान नहीं मांगता,जरूरी नहीं हर कहानी मुकम्मल हो ,पढ़ाई पर ध्यान दो ,तुम्हारी मां ने कितनी मुश्किल से तुम्हे पढ़ने भेजा ,तुम्हारे भाई – बहनों की जिम्मेदारी तुम पर है ,उनके लिए सोचो,बस यही कहने आई थी ।”कह कर रेवा चली गई ,उसके शब्द हवा में गूंजते रहे ।

     एक बार फिर मिहिर जीवन की तरफ लौट आए ,अपनी पूरी ताकत पढ़ाई में झोंक दिया ,नतीजा टॉपर बने,और एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में प्लेसमेंट हो गया ,।

    फिर मिहिर ने मुड़ कर नहीं देखा ,अपनी जिम्मेदारियों को पूरा किया ,साथ काम करने वाली माधवी से शादी कर अपना गृहस्थ जीवन शुरू किया ।

  पर एक बेनाम सी खुशबू मिहिर को अक्सर बेचैन करती ,काश कहीं एक बार मुलाकात हो जाती ,

   प्रोग्राम शुरू हो गया ,मिहिर यथार्थ में लौट आए ,उत्सुकता से देखा तो कल वाली नकचढ़ी मैडम बैठी थी ,आज लंबी चोटी देख मिहिर समझ गए ये रेवा ही है ,

       “कल मुझे बुद्धू क्यों बना रही थी “

       “ए मिस्टर , बुद्धू लोगों होते ही है बुद्धू बनने के लिए,बाद में बात करेंगे ,अभी प्रोग्राम में मन लगाओ “

         लंच के बाद उनके बैच के सारे लोग इकट्ठा हो गए ,शोर – शराबे में रेवा से बात नहीं कर पाए ।

     रात डिनर के समय बात करूंगा ,सोच मिहिर सहपाठियों के संग रम गए ,कोई किसी के रंगे बालों का मजाक उड़ा रहा तो कोई किसी के गंजे सिर का …वही मस्ती कॉलेज टाइम वाली ,सबकी बीमारियां भाग गई क्योंकि दिल जवां हो गए थे ।

   होटल पहुंच डिनर के बाद सब लॉन में आ गए , चुटकुलों और कहकहे का शोर अचानक थम गया ,

   “अब हमारे हीरो मिहिर और रेवा एक एक गीत सुनाएंगे  .”

     “अब मैं गा नहीं पाती ,आवाज दब जाती है “रेवा ने प्रतिवाद किया 

       “वैसे तो आवाज तुम्हारी बहुत बुलंद है “,मिहिर ने छेड़ा,सब हँस पड़े,उनकी प्रेम कहानी ,सिर्फ लाइब्रेरी की किताबों ने पढ़ी और फिजाओं ने सुनी थी ।एक अधूरी दास्तान सिर्फ दो दिलों में छुपी थी ।

           “हमने देखी है उन आंखों की महकती खुशबू हाथ से छू कर रिश्तों को इल्जाम न दो ,एक अहसास है रूह से महसूस करो …..”रेवा की सुरीली आवाज हवाओं में गूंज उठी ,गाना खत्म होते ही तालियों के शोर से  स्तब्ध बैठे मिहिर की चेतना लौटी ,आवाज की कसक से आज उसे अहसास हुआ ,प्यार दोनों तरफ से था ,काश एक बार भी रेवा ने खुलकर जताया होता तो आज रेवा उसकी होती ।

   गाना खत्म होने के बाद सब अपने कमरों में चले गए ,सिर्फ रेवा और मिहिर बैठे रह गए ।

       “अपनी जिंदगी में खुश हो रेवा “

      “हां खुश ही हूं , माता – पिता तो देखभाल कर ही शादी करते है लेकिन भविष्य के गर्त में क्या छिपा है वे नहीं जान पाते ,”

     “मै समझा नहीं रेवा ,खुल कर बोलो “

      “पिता ने तो सरकारी अफसर से मेरी शादी कर गंगा नहा लिए ,शुरू में सब अच्छा था बेटे के जन्म के बाद उनके व्यवहार में परिवर्तन दिखने लगा ,मै तो बेटे के लालन – पालन में व्यस्त थी , उड़ती खबरों को जब एक दिन सच होते देखा तो पावों तले जमीन खिसक गई ,कॉलेज की होनहार विद्यार्थी मै ,एक दब्बू स्त्री में बदल चुकी थी , पति के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स को रोक नहीं पाई ….,कोई निर्णय नहीं ले पाई थी ,इसी बीच एक बेटी की मां भी बन गई , बचा हौसला भी दम तोड़ दिया ,अब अपने लिए नहीं बच्चों के लिए जीना है ,सोच आगे बढ़ गई “

     “तुम टॉपर रही इंजिनियर हो , तुम ने नौकरी क्यों नहीं की ,कम से कम अपने पैरों पर खड़ी होती “

     “भले घर की स्त्रियां नौकरी नहीं करती ,तुम्हारे पिता ने तुम्हे इंजीनियरिंग करा ,लड़कों की बराबरी कराने की  गलत परंपरा को जन्म दिया ,मैं उनकी गलती नहीं दोहराऊंगा “ये कह मेरी काबिलियत पर ताला लगा दिया गया ।

उस जमाने में जब लड़कियां इंजीनियरिंग नहीं करती थीं मेरे एडमिशन पर  पिता से मां ने बहुत लड़ाई की तब जाकर पिता ने मुझे इंजीनियरिंग करने की आज्ञा दी, पर इस शर्त पर, पढ़ाई खत्म होते ही मुझे उनके द्वारा पसंद किये लड़के से शादी करनी होगी ,बस मैने उनकी बात का मान रखा ,”।

    रात ढल रही थी ,दोनों खामोश थे ,मिहिर ने आगे बढ़ रेवा का हाथ थाम लिया ।एक रिश्ता ऐसा भी ,जिसमें कोई मांग नहीं ,जिसका कोई नाम नहीं ।

     तीन दिन उनके पूरे बैच ने खूब मस्ती की ,चौथे दिन सबकी ट्रेन और फ्लाइट थी ,

         होटल के रिसेप्शन पर मिहिर रेवा का इंतजार कर रहा था ,

             “रेवा मैने फ्लाइट टिकट कैंसिल कर तुम्हारी ट्रेन में टिकट ले लिया ,एक दिन और तुम्हारे साथ गुजार लूंगा ,फिर जाने कभी मुलाकात हो या न हो “

         “हां मिहिर ,जीवन के इस पड़ाव पर ,एक दिन और जिंदगी को जी लूं ,क्योंकि ताउम्र मैने जिंदगी काटी है , जी नहीं ,हां मेरी डायरी में रखा वो सुर्ख गुलाब आज भी महकता है ।”

     एक आह सी मिहिर के दिल से निकली ,पर चेहरे पर मुस्कुराहट ला बोले ,वो मौन शब्द जो लाइब्रेरी के सन्नाटे में तैरते थे ,आज भी मुझे खुशियों से सराबोर कर देते हैं वैसे ही जैसे वो सूखा गुलाब तुम्हे महक से भर देता है “

   ये कैसा रिश्ता जिसका कोई नाम नहीं ,फिर भी ऊर्जा से भर दे रहा ।कुछ रिश्ते अनाम रह कर भी दिल में रहते है ।

      दोनों खुशी – खुशी हर पल को जी लेना चाहते थे ,अपनी अटैची ले स्टेशन रवाना हो गए ,कुछ मधुर स्मृतियों को संजो लेने को ,एक ऊर्जा को जी लेने को , सफर का अंतिम पड़ाव आने वाला है ….,वे कदमों से कदम मिला कर चल पड़े,प्यार की मिसाल कायम करने के लिए  …प्यार प्रतिदान नहीं चाहता ,एक अहसास है ,जीने का ….।।

         इन चंद लम्हों की ऊर्जा से वे आगे की जिंदगी को सजा लेंगे ,बस यही एक छोटी सी आशा …फिर मिले या न मिले ….रह जाएगी उनकी स्मृतियां…।

              ।— संगीता त्रिपाठी 

#एक रिश्ता ऐसा भी

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