झूठा शक रिश्तों की जड़ें हिला देता है

दिनेश जी के ऑफिस से लौटने का समय था। घड़ी की सुइयाँ शाम के करीब पहुँच रही थीं, पर जानकी जी के घर में सुबह से ही जैसे तूफ़ान उठा हुआ था। रसोई से लेकर बच्चों के कमरे तक, हर जगह एक अजीब-सी बेचैनी फैली हुई थी। घर के वातावरण में वह गर्माहट नहीं थी जो आम दिनों में होती है। जानकी जी की आँखों में क्रोध था, आवाज में कठोरता, और मन में एक ऐसा संदेह—जो हर तर्क को कुचलकर बस अपनी ही बात मनवाना चाहता था।

दिनेश जी जैसे ही घर में दाखिल हुए, उन्हें कुछ असामान्य लगा। जूही और विराज भी चुपचाप थे। बच्चों का यूँ शांत रहना खुद में बहुत कुछ कह रहा था। दिनेश जी ने बैग रखा, पानी पिया और सीधे जानकी जी की ओर देखा।

“क्या हुआ?” उन्होंने पूछा।

जानकी जी ने बिना भूमिका बनाए सीधे आरोप दाग दिया—“आपके लाडले राजू ने चोरी की है।”

दिनेश जी एक पल को ठिठक गए। “राजू? चोरी?” उनके शब्दों में आश्चर्य भी था और अविश्वास भी। उन्होंने तुरंत पूछा, “क्या चोरी हुई?”

“मेरे कंगन!” जानकी जी का चेहरा तमतमा उठा। “सोने के कंगन… जो मैंने कल रात तकिये के नीचे रखे थे, सुबह गायब थे। और घर में राजू के सिवा बाहर का कोई नहीं आया।”

दिनेश जी ने गहरी सांस ली। उन्हें अचानक लगा जैसे जानकी जी ने बिना पूरी बात जाने, बिना सत्य तक पहुँचे, किसी की इज़्ज़त को पैरों तले रौंद दिया हो। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा—

“तुमने राजू पर चौरी का इल्जाम लगाकर, चांद पर थूकने जैसा काम किया है जानकी! मैं जानता हूँ, राजू बहुत ईमानदार है,
मैं कभी कोई भी सामान उससे मंगवाता हूँ, वह ईमानदारी से बचे हुए सारे पैसे मुझे वापिस कर देता है। वह गरीब है मगर चोर नहीं हो सकता।
मेरा मन कह रहा है, वह निर्दोष है। मेरे घर आने तक तो तुम इन्तजार करती, तुमने यह ठीक नहीं किया।”

दिनेश जी के शब्दों में गुस्सा नहीं था, लेकिन न्याय था। वे जानते थे कि किसी को “चोर” कह देना बहुत आसान है, पर उस एक शब्द के पीछे किसी का सम्मान, उसकी रोज़ी-रोटी, उसका आत्मविश्वास—सब कुछ दांव पर लग जाता है।

जानकी जी ने झट से पलटकर जवाब दिया, मानो उनके पास हर बात का पक्का प्रमाण हो—

“आप तो शुरू से ही उस पर इतना विश्वास करते हो, आप नहीं जानते ये लोग भोले बनकर पहले हमारा विश्वास जीतते हैं, और फिर बड़ी रकम देखकर चोरी कर लेते हैं।
कल रात को शादी पार्टी से आने के बाद मैं अपने कंगन आलमारी में रखना भूल गई, मुझे अच्छे से याद है, मैंने अपने तकिये के नीचे रखे थे,
सोचा सुबह रख दूंगी। सुबह जूही और विराज का टिफिन बनाने में लग गई और उन्हें आलमारी में रखने का ध्यान नहीं रहा। जब १० बजे मैंने देखा तो कंगन वहाँ नहीं थे।
इस घर में राजू के सिवा बाहर का कोई दूसरा व्यक्ति आया ही नहीं। फिर तुम्ही बताओ राजू के सिवा उसे कौन उठा सकता है?”

दिनेश जी ने एक क्षण के लिए आँखें बंद कीं। यह “ये लोग” वाला वाक्य उन्हें भीतर तक चुभ गया। कोई इंसान गरीब हो तो उसका मतलब यह नहीं कि उसकी नैतिकता भी गरीब होगी। लेकिन समाज में बहुतों के मन में यह विष बैठा होता है कि गरीब = संदिग्ध। और यही विष परिवारों में भी धीरे-धीरे रिश्तों को खोखला कर देता है।

दिनेश जी ने धीमे स्वर में कहा, “किसी के आने का मतलब यह नहीं कि वही दोषी है। और घर में ‘बाहर’ का कोई नहीं आया—पर घर में अपने लोग तो हैं ना?”

जानकी जी ने चौंककर उनकी ओर देखा। “अपने लोग?”

दिनेश जी ने आगे कुछ नहीं कहा। लेकिन उनके मन में यह बात उठ चुकी थी कि जाँच सिर्फ एक दिशा में नहीं होनी चाहिए। संदेह की आँखें अगर सिर्फ गरीब पर टिक जाएँ, तो इंसाफ मर जाता है।

इसी घर में दिनेश, जानकी, उनके बच्चे जूही और विराज तथा जानकी का भाई रौनक—जो बारहवीं की पढ़ाई करता था—रह रहे थे। गाँव में अच्छा स्कूल न होने के कारण वह अपनी बहिन के यहाँ पढ़ने आया था। रौनक घर का अपना सदस्य था, छोटा भाई, जिसे जानकी जी माँ की तरह मानती थीं। रौनक पढ़ाई में ठीक-ठाक था, मगर उम्र के उस दौर में था जहाँ इच्छाएँ तेज़ होती हैं और समझ कई बार पीछे रह जाती है। शहर का माहौल, बच्चों के कपड़े, नए फोन, दोस्तों की बातें—कभी-कभी उसके मन में भी कुछ पाने की लालसा जग जाती।

कंगन खोने वाले दिन, राजू रोज की तरह आया था। झाड़ू-पोछा किया, कुछ सामान बाजार से लाया, और दोपहर तक काम कर चला गया। लेकिन जानकी जी के दिमाग में एक ही बात घूमती रही—“राजू ने लिया है।”

उन्होंने राजू को उसी दिन बुलाकर कड़क आवाज में कहा, “तुमने मेरे कंगन उठाए हैं न?”

राजू एकदम सकपका गया। “मालकिन! मैं… मैं चोरी…?” उसकी आवाज काँप गई। उसकी आँखों में डर था—चोरी पकड़े जाने का नहीं, बदनामी का।
“मालकिन, मैंने कुछ नहीं लिया। मेरा क्या फायदा? मैं रोज़ काम करता हूँ, मेहनत करता हूँ… मुझे झूठा मत बनाइए।”

पर जानकी जी का संदेह, उनकी कठोरता, और उनका “ये लोग” वाला पूर्वाग्रह उस दिन राजू की हर सफाई को झूठा साबित करने पर तुला था। उन्होंने राजू को बहुत खरी-खोटी सुनाई। राजू चुप रहा, क्योंकि गरीब आदमी के पास जवाब कम होते हैं, और दर्द ज्यादा।

दिनेश जी ने जब सुना तो उन्हें बहुत बुरा लगा। उन्होंने राजू को समझाया, “राजू, डर मत। जब तक बात साबित न हो, कोई तुम्हें चोर नहीं कह सकता।”
लेकिन राजू के चेहरे पर एक घायल-सा भाव था। वह बस सिर झुकाए खड़ा रहा।

दिन बीतते गए। कंगन नहीं मिले। जानकी जी के मन में क्रोध जमा होता गया। घर के माहौल में तनाव बढ़ता गया। बच्चों ने भी महसूस कर लिया था कि घर में कुछ ठीक नहीं है। जूही ने एक दिन माँ से कहा, “मम्मी, राजू भैया रो रहे थे… वो तो अच्छे हैं…”
जानकी जी ने झिड़क दिया, “चुप! बच्चों को इन बातों से दूर रहना चाहिए।”

विराज ने भी धीरे से कहा, “मम्मी, अगर कंगन मिल गए तो?”
“मिलेंगे कहाँ? चोरी हो गए!” जानकी जी का जवाब कठोर था।

इसी बीच, चार दिन बाद दीपावली की छुट्टी आने वाली थी। रौनक के गाँव जाने की बात पहले से तय थी। उसने कहा—

“दीदी मैं दौपहर में स्कूल से आने के बाद गॉंव चला जाऊँगा, मेरी पॉंच दिन की छुट्टी है।”

जानकी जी ने भाई के लिए मिठाई बनाई, रास्ते में खाने के लिए भोजन पैक किया। भाई आखिर भाई होता है। गुस्सा, तनाव, कंगनों की चिंता—सबके बावजूद भाई के जाने पर बहन का दिल नरम हो ही जाता है।

जानकी जी ने रौनक का बैग खोला ताकि उसमें भोजन रख दे। लेकिन जैसे ही बैग खुला, उसे कपड़ों की तह ठीक से नहीं दिखी। उसने सोचा—“भाई ने जल्दी में रखे होंगे, मैं उनकी स्त्री करके ठीक से जमा देती हूँ।”

उसने कपड़े बाहर निकाले… और फिर—

बैग के अंदर उसके कंगन चमक उठे।

जानकी जी का माथा चकरा गया। पल भर को ऐसा लगा जैसे जमीन हिल गई हो। उसकी उंगलियाँ काँपने लगीं। आँखों के सामने वह पूरा दृश्य घूम गया—राजू का डरा हुआ चेहरा, उसकी सफाई, दिनेश जी की बात, बच्चों की चुप्पी… और अब ये कंगन… रौनक के बैग में?

उसके मन में बिजली-सी कौंधी—
“तो क्या मेरे भाई ने मेरे कंगन चुराए?”

जानकी जी ने बिना किसी को बुलाए, कंगन अपने पास रख लिए। अंदर से वह टूट चुकी थी, लेकिन टूटने के साथ-साथ उसके भीतर क्रोध भी था—और शर्म भी। पर शर्म अक्सर खुद को बचाने के लिए क्रोध का मुखौटा पहन लेती है।

रौनक स्कूल से आया तो जानकी जी ने उसे बैठने तक नहीं दिया।
उस पर टूट पड़ीं—“ये क्या किया तूने? मेरे कंगन… तूने चुराए?”

रौनक की आंखें फैल गईं। “दीदी… मैं… मैं…” वह हकलाने लगा।
जानकी जी ने उसकी एक नहीं सुनी। उन्होंने उसे बहुत डांटा और कह दिया—

“अब तू इस घर में कभी मत आना तूने मेरा विश्वास तोड़ा है।”

रौनक रो पड़ा। वह बार-बार कहता रहा कि उससे गलती हो गई, वह लालच में आ गया, या उसने सोचा था कि बाद में लौटा देगा… पर जानकी जी का दिल उस समय पत्थर हो चुका था।
रौनक ने माफी मांगी, मगर जानकी जी ने उसे माफ नहीं किया।

उस रात जानकी जी ने पहली बार खुद को आईने में देखा। उसे अपना चेहरा कठोर लगा। पर उससे भी ज्यादा कठोर उसे अपनी गलती लगी—राजू पर लगाया गया इल्जाम।

जब दिनेश जी घर पर आए, तो जानकी जी ने सारा हाल उन्हें सुनाया। उसकी आवाज टूट रही थी। वह रोते-रोते बोली—

“आपने सही कहा था मैंने चांद पर थूककर बहुत बड़ी गलती की है। मैं राजू से माॅफी मागूंगी।”

दिनेश जी ने उसे चुप कराया। लेकिन उनकी आंखों में भी दुख था। उन्होंने कहा, “गलती मान लेना बड़ा काम है… लेकिन जिस पर आरोप लगा, उसके दिल का घाव… उसे भरना मुश्किल है।”

अगले दिन जानकी जी ने राजू को बुलाया। इस बार उनकी आवाज में वह कठोरता नहीं थी। आँखों में शर्म थी, और हाथ जोड़ने की सच्चाई भी।

“राजू…” उन्होंने कहा, “मैंने तुम्हें गलत समझा। मेरे कंगन… मेरे भाई के बैग में मिले। मैं… मैं तुमसे माफी मांगती हूँ।”

राजू का चेहरा स्थिर रहा। वह चुप था।
फिर उसने बहुत धीरे, बहुत विनम्रता से कहा—

“मालकिन आप मॉफी न मांगे, मगर अब मैं आपके यहाँ काम नहीं कर पाऊँगा, गलत इल्जाम से हमारा भी मन दु:खता है। आप मुझे आप क्षमा करें।”

यह सुनकर जानकी जी की आँखों से आँसू बह निकले।
उसे लगा, राजू ने माफी की जगह उसे एक आईना दे दिया है—जिसमें उसकी सोच की बदसूरती साफ दिखाई दे रही थी।

दिनेश जी ने राजू से कहा, “राजू, मैं समझ सकता हूँ। तुम जो कह रहे हो, सही कह रहे हो। हम तुम्हें रोकेंगे नहीं।”
राजू ने सिर झुकाकर नमस्ते किया, और चला गया।

राजू के जाते ही घर में एक खालीपन भर गया। जैसे घर की दीवारें भी कह रही हों—“सच देर से आया, पर बहुत कुछ तोड़कर आया।”

जानकी जी ने दीपावली की मिठाई के डिब्बे देखे, लेकिन अब उसके लिए मिठाई का स्वाद फीका पड़ चुका था।
उसे सबसे ज्यादा यह चुभ रहा था कि उसने अपना गुस्सा, अपना डर, अपना संदेह… सब राजू पर निकाल दिया। और जब सच सामने आया, तब भी वह अपने भाई को माफ नहीं कर पाई।

दिनेश जी ने उसे समझाया, “जानकी, भाई को सुधारने का मौका दो… गलती बहुत बड़ी है, लेकिन वह बच्चा है… समझ आ जाएगी।”
पर जानकी जी के भीतर एक तूफान था—भाई का विश्वास टूटने का, अपनी गलती का, और समाज की उस सोच का जिसे वह खुद जी रही थी।


अब आपकी बारी… (कमेंट के लिए)

पाठकों, अगर आप जानकी की जगह होते, तो क्या आप राजू से सिर्फ माफी मांगकर बात खत्म कर देते?
और रौनक—जो अपना था—उसके लिए आपका फैसला क्या होता?
क्या “अपनों” की गलती ज्यादा चुभती है इसलिए हम बाहरी लोगों पर जल्दी आरोप लगा देते हैं?
कमेंट में अपनी राय जरूर लिखें—आपका अनुभव और सोच दूसरों को सीख दे सकती है।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

error: Content is protected !!