झांसी की रानी – सीमा राय 

खाकी वर्दी की बांह चढ़ाते हुए वाणी जैसे ही अपनी कॉलोनी के नुक्कड़ पर स्थित ‘दीनानाथ जनरल स्टोर’ के पास से गुजरी, हवा में तैरता हुआ एक तंज उसके कानों से टकराया।

“-लो भाई, आ गई ‘झांसी की रानी’! घर में बीमार आदमी पड़ा है और मैडम को देखो, पुरुषों की तरह ऑटो दौड़ाने का शौक चढ़ा है। कलयुग है भाई, कलयुग… अब औरतें भी मर्दों की बराबरी में सड़क नापेंगी।”

यह आवाज दीनानाथ की थी, जो अपनी दुकान के बाहर बैठे कुछ रिटायर हो चुके बुजुर्गों के साथ चाय की चुस्कियां ले रहे थे। वाणी के कदम एक पल के लिए ठिठके, मुट्ठी भींची, लेकिन उसने पलटकर जवाब नहीं दिया। उसने अपने ऑटो-रिक्शा, जिसे वह प्यार से ‘सारथी’ कहती थी, की चाबी निकाली और किक मारी। इंजन की गड़गड़ाहट में उन ताने मारने वाली आवाजों को उसने जानबूझकर डुबो दिया।

यह अब रोज का नियम बन गया था। जिस समाज को वाणी की मजबूरी दिखनी चाहिए थी, उसे सिर्फ़ उसकी ‘बेशर्मी’ दिखाई देती थी। एक औरत, वह भी एक मध्यमवर्गीय परिवार की बहू, अगर ऑटो चलाती हुई दिखे, तो यह उस कॉलोनी की ‘इज्जत’ पर बट्टा लगने जैसा था।

दिन भर की भागदौड़ के बाद जब वाणी घर लौटी, तो रात के दस बज चुके थे। शरीर का पोर-पोर दुख रहा था। क्लच और ब्रेक दबाते-दबाते बायां पैर सुन्न हो चुका था। उसने हाथ-मुंह धोया और कमरे में दाखिल हुई।

कमरे में हल्की रोशनी थी। पलंग पर उसके पति, सुधीर, लेटे हुए थे। उनकी आंखें छत को ताक रही थीं, लेकिन जैसे ही वाणी की आहट हुई, उन्होंने गर्दन घुमाई। उन आंखों में एक अजीब सी लाचारी और अपराधबोध था। बगल में उनकी सात साल की बेटी, गुड़िया, होमवर्क की कॉपी सीने से लगाए सो चुकी थी।

वाणी ने सुधीर के सिरहाने बैठकर उनके माथे पर हाथ रखा। बुखार नहीं था, बस वही ठीस थी जो रीढ़ की हड्डी टूटने के बाद से सुधीर के शरीर और आत्मा, दोनों में घर कर गई थी।

“आज देर हो गई?” सुधीर ने अपनी कमजोर आवाज में पूछा।

“हां, स्टेशन की एक सवारी मिल गई थी। सोचा, वापसी में खाली आने से अच्छा है, उसे छोड़ती आऊं,” वाणी ने मुस्कुराने की कोशिश की, अपनी थकान को छिपाते हुए।

उसने सुधीर को करवट दिलाई, उनकी पीठ पर दवाई लगाई और फिर गुड़िया को ठीक से लिटाकर खुद उनके पास लेट गई। आज भी नींद आंखों से कोसों दूर थी। वाणी की नजरें पंखे की गोल-गोल घूमती पंखुड़ियों पर टिक गईं और मन अतीत के उन पन्नों को पलटने लगा, जो अब किसी सुनहरे सपने जैसे लगते थे।

कितना खुशहाल जीवन था उनका। सुधीर एक प्राइवेट कंपनी में सेल्स मैनेजर थे और वाणी घर की रानी। शाम को सुधीर का इंतजार करना, गुड़िया को पार्क ले जाना, और रविवार को सुधीर के साथ स्कूटर पर बैठकर आइसक्रीम खाने जाना। सुधीर हमेशा कहते थे, “वाणी, तुम घर संभालती हो, इसीलिए मैं दुनिया संभाल पाता हूं।”

लेकिन वक्त को शायद उनकी यह छोटी सी दुनिया रास नहीं आई। वह काली रात वाणी कभी नहीं भूल सकती। सुधीर अपनी बाइक से लौट रहे थे जब एक तेज रफ्तार ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी। जान तो बच गई, लेकिन कमर के नीचे का हिस्सा हमेशा के लिए बेजान हो गया। जमापूंजी अस्पतालों के बिलों में स्वाहा हो गई। रिश्तेदार, जो पहले हर पार्टी में सबसे आगे रहते थे, धीरे-धीरे ‘व्यस्त’ होने का बहाना बनाकर किनारा कर गए।

घर का राशन खत्म होने लगा था। गुड़िया की स्कूल फीस बकाया थी। वाणी के पास दो रास्ते थे—या तो वह घर बैठकर सुधीर की बीमारी का रोना रोती और दूसरों के आगे हाथ फैलाती, या फिर वह खुद उस दहलीज को लांघती जिसे समाज ने औरतों के लिए खींचा था।

सुधीर की बाइक तो कबाड़ हो गई थी, लेकिन उन्होंने कुछ समय पहले एक ऑटो-रिक्शा किराए पर चलवाने के लिए खरीदा था। वह घर के बाहर धूल खा रहा था। वाणी ने जब पहली बार उसे चलाने का फैसला किया, तो सुधीर रो पड़े थे।

“मैं तुम्हें यह नहीं करने दे सकता वाणी। लोग क्या कहेंगे? मेरे होते हुए तुम…”

वाणी ने तब उनके आंसू पोंछते हुए कहा था, “लोग रोटी देने नहीं आएंगे सुधीर, लेकिन बातें बनाने जरूर आएंगे। और रही बात आपके होने की, तो आप हैं, तभी तो मैं यह कर पा रही हूं। आप मेरा हौसला हैं।”

उसने ड्राइविंग सीखी। लाइसेंस बनवाया। पहली बार जब वह खाकी वर्दी पहनकर ऑटो सीट पर बैठी थी, तो उसके हाथ कांप रहे थे। उसे डर ट्रैफिक का नहीं था, डर उन नजरों का था जो उसे किसी अजूबे की तरह देख रही थीं। पहले दिन सवारी ने बैठने से मना कर दिया था—”अरे मैडम, आप चला लोगी? कहीं ठोक-वाक दिया तो?”

लेकिन आज छह महीने हो चुके थे। वाणी अब शहर की हर गली, हर शॉर्टकट जानती थी। वह जानती थी कि किस चौराहे पर पुलिस ज्यादा परेशान करती है और किस समय स्टेशन पर ज्यादा सवारियां मिलती हैं। लेकिन वह एक चीज नहीं सीख पाई थी—दीनानाथ जैसे लोगों के ताने सुनकर अनसुना करना।

“औरत का काम घर की चारदीवारी में शोभा देता है,” कल ही दीनानाथ की पत्नी ने मंदिर में वाणी को देखकर मुंह बिचकाया था।

वाणी ने करवट बदली। सुधीर सो चुके थे। उसने उनकी रजाई ठीक की। उसे याद आया कि कल गुड़िया की स्कूल फीस जमा करनी है। आज की कमाई अच्छी हुई थी। उसने मन ही मन भगवान का शुक्रिया अदा किया और आंखें मूंद लीं।

अगले दिन सुबह मूसलाधार बारिश हो रही थी। शहर पानी से लबालब था। वाणी ने सोचा कि आज छुट्टी कर ले, लेकिन फीस जमा करने की आखिरी तारीख थी। उसने रेनकोट पहना और बाहर निकली।

जैसे ही वह गली के बाहर पहुंची, उसने देखा कि दीनानाथ की दुकान के बाहर भीड़ जमा है। कुछ लोग घबराए हुए इधर-उधर भाग रहे थे। वाणी ने ऑटो धीमा किया।

दीनानाथ, जो हमेशा तनी हुई गर्दन के साथ बात करते थे, आज बारिश के बीच सड़क पर घुटनों के बल बैठे थे। उनकी गोद में उनकी पत्नी थीं, जो पेट पकड़कर दर्द से कराह रही थीं। शायद अपेंडिक्स का दर्द था या कुछ और गंभीर।

“कोई गाड़ी वाला है? एम्बुलेंस को फोन करो!” दीनानाथ चिल्ला रहे थे।

लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि एम्बुलेंस का आना मुश्किल था। और जो एक-दो टैक्सी वाले वहां से निकल भी रहे थे, वे पानी भरा देखकर रुक नहीं रहे थे। दीनानाथ ने एक कार वाले को हाथ दिया, लेकिन उसने कीचड़ उछालते हुए गाड़ी आगे बढ़ा दी।

वाणी ने एक पल सोचा। यही वो आदमी है जो रोज उसे ‘मर्दांन’ और ‘बेशर्म’ कहता है। अगर वह चाहती तो ऑटो की रेस बढ़ाकर आगे निकल जाती। यह उसके पास बदला लेने का सबसे अच्छा मौका था।

लेकिन फिर उसे सुधीर का चेहरा याद आया। उस रात का एक्सीडेंट याद आया जब सुधीर सड़क पर पड़े थे और कोई रुक नहीं रहा था। अगर तब कोई रुक जाता, तो शायद आज सुधीर अपने पैरों पर खड़े होते।

वाणी ने ऑटो घुमाया और सीधे दीनानाथ के सामने लाकर ब्रेक लगाया।

“काका, जल्दी बैठाइए इन्हें!” वाणी ने तेज आवाज में कहा।

दीनानाथ ने ऊपर देखा। सामने वही खाकी वर्दी वाली वाणी थी। उनकी आंखों में एक पल के लिए संकोच आया।

“सोच क्या रहे हैं? काकी की जान प्यारी नहीं है क्या? पीछे की सीट पर लिटाइए,” वाणी ने ऑटो का पर्दा हटाया और नीचे उतरकर दीनानाथ की मदद की।

दीनानाथ और उनके बेटे ने मिलकर मरीज को पीछे लिटाया। वाणी ने एक्सीलरेटर दबाया। बारिश की बूंदें उसके चेहरे पर सुई की तरह चुभ रही थीं। सड़कों पर घुटनों तक पानी था। ऑटो का इंजन जोर लगा रहा था, लेकिन वाणी के हाथ स्टीयरिंग पर किसी चट्टान की तरह जमे थे।

“काका, घबराना मत। पंद्रह मिनट में सरकारी अस्पताल पहुंचा दूंगी,” वाणी ने पीछे मुड़कर देखा। दीनानाथ का चेहरा आंसुओं और बारिश से भीगा हुआ था।

रास्ते में एक जगह पानी इतना गहरा था कि ऑटो बंद होने की कगार पर आ गया। दीनानाथ की सांस अटक गई। “बेटी…”

“आप भगवान का नाम लो काका, मेरा ‘सारथी’ धोखा नहीं देगा,” वाणी ने गियर बदला और पूरे अनुभव के साथ ऑटो को पानी के बीच से निकाल ले गई।

अस्पताल के गेट पर पहुंचकर उसने खुद स्ट्रेचर खींचा और डॉक्टरों को बुलाया। समय पर इलाज शुरू हो गया। डॉक्टर ने बताया कि अपेंडिक्स फटने ही वाला था, अगर दस मिनट और देर होती तो जान बचाना मुश्किल था।

दीनानाथ कॉरिडोर में बेंच पर बैठे हाफ रहे थे। वाणी एक कोने में खड़ी अपना गीला रेनकोट निचोड़ रही थी। वह जाने ही वाली थी कि तभी दीनानाथ उसके पास आए।

वह दीनानाथ, जिनकी आवाज हमेशा ऊंची रहती थी, आज उनकी गर्दन झुकी हुई थी। उन्होंने कांपते हाथों से अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले।

“ये… ये तुम्हारा भाड़ा, बेटी।”

वाणी ने पैसों की तरफ देखा, फिर दीनानाथ की आंखों में। उसने धीरे से उनका हाथ वापस उनकी जेब की तरफ कर दिया।

“काका, भाड़ा तो मैं सवारियों से लेती हूं। अपनों से मुसीबत के वक्त पैसे नहीं लिए जाते।”

दीनानाथ सन्न रह गए। जिस औरत को उन्होंने हमेशा ‘पराया’ और ‘बेशर्म’ समझा, उसने आज उन्हें ‘अपना’ कहा था। उनकी आंखों से झर-झर आंसू बह निकले। वे कुछ बोलना चाहते थे, माफी मांगना चाहते थे, लेकिन शब्द गले में फंस गए। उन्होंने बस हाथ जोड़ लिए।

वाणी मुस्कुराई। “काकी का खयाल रखिएगा। मैं चलती हूं, गुड़िया की फीस जमा करनी है।”

वह मुड़ी और बारिश में वापस अपने ऑटो की तरफ बढ़ गई।

शाम को जब वाणी काम से लौटी, तो उसने देखा कि गली का माहौल कुछ बदला हुआ है। रोज की तरह नुक्कड़ पर दीनानाथ की दुकान खुली थी, लेकिन आज वहां सन्नाटा नहीं था।

जैसे ही वाणी का ऑटो दुकान के सामने से गुजरा, दीनानाथ अपनी कुर्सी से खड़े हो गए। उनके साथ बैठे बाकी बुजुर्ग भी खड़े हो गए। किसी ने कोई ताना नहीं मारा, कोई फब्ती नहीं कसी।

दीनानाथ ने हाथ उठाया और एक सधे हुए, सम्मानजनक तरीके से वाणी को नमस्कार किया।

“नमस्ते बिटिया!” उनकी आवाज में एक गर्व था, जैसे वे किसी और को नहीं, बल्कि अपनी ही बेटी को आवाज दे रहे हों।

वाणी ने ऑटो धीमा किया और सिर झुकाकर उनका अभिवादन स्वीकार किया।

आज हवा में कोई फुसफुसाहट नहीं थी। आज उसकी खाकी वर्दी पर कोई दाग नहीं लगा रहा था। आज उसे लगा कि वह ‘झांसी की रानी’ या ‘मर्दांन’ नहीं, बल्कि सिर्फ वाणी है—एक पत्नी, एक मां और एक जिम्मेदार इंसान।

घर पहुंचकर जब उसने सुधीर को दिन का किस्सा सुनाया, तो सुधीर की आंखों में एक नई चमक थी। उन्होंने वाणी का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, “वाणी, मुझे लगा था कि मेरी टांगे चली गईं तो मैं लाचार हो गया। लेकिन आज मुझे लग रहा है कि मेरी टांगे नहीं, मेरी बैसाखी तुम हो। और जिसके पास तुम जैसी बैसाखी हो, वो कभी गिर नहीं सकता।”

वाणी ने सुधीर के कंधे पर सिर रख दिया। बाहर बारिश अब थम चुकी थी। आसमान साफ हो रहा था। उसे महसूस हुआ कि लोगों की सोच का कीचड़ चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, कर्म की गाड़ी अगर ईमानदारी से चलाई जाए, तो वह उसे पार कर ही लेती है।

आज रात उसे नींद जल्दी आ गई। विचारों की संदूकची अब बंद थी, क्योंकि उसमें सवालों की जगह सुकून ने ले ली थी।

लेखिका : सीमा राय 

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