*इस डिजिटल युग में जब उंगलियों के एक टच से संदेश पहुँच जाते हैं, तब एक बूढ़ा जोड़ा पुराने संदूक से स्याही और कलम निकालकर टूटे हुए दिलों को जोड़ने का काम कर रहा था। क्या उनकी यह ‘पुरानी आदत’ आज के ‘नए दौर’ के रिश्तों को बचा पाएगी?*
“सुधा… ओ सुधा! अरे, वो नीला वाला पेन कहाँ रख दिया तुमने? और देखो, शर्मा जी का फोन फिर आ गया है। वो पूछ रहे हैं कि क्या उनकी चिट्ठी तैयार हो गई? अरे भाई, हद है! अभी तो आर्डर दिया था और अभी जान खाने लगे।” दीनानाथ जी ने चश्मा नाक पर टिकाते हुए झुंझलाहट में आवाज़ लगाई।
कमरे के अंदर से सुधा जी, हाथों में तुलसी की माला और आँखों में सौम्यता लिए बाहर निकलीं। “क्यों इतना शोर मचा रहे हो जी? पूरा मोहल्ला सुन रहा है। और वो नीला पेन आपकी जेब में ही है, जहाँ आप हमेशा रखकर भूल जाते हैं।”
दीनानाथ जी ने झेंपते हुए अपनी कुर्ता की जेब टटोली। पेन वहीं था। उन्होंने खिसियाते हुए कहा, “हाँ… हाँ… ठीक है। पर तुम इतनी देर से अंदर क्या कर रही थी? तुम्हें पता है न, आज तीन चिट्ठियाँ लिखनी हैं। एक वो फौजी के बेटे की है जो अपनी माँ से माफ़ी मांगना चाहता है, और एक वो हॉस्टल वाली लड़की की है जिसे घर की याद आ रही है। काम बढ़ता जा रहा है और तुम्हारी चाल वही कछुए वाली।”
सुधा जी ने मुस्कुराते हुए दीनानाथ जी के हाथ से डायरी ली। “काम नहीं बढ़ रहा, लोगों के दिलों में दूरियां बढ़ रही हैं, जिन्हें भरने के लिए उन्हें अब शब्दों की ज़रूरत पड़ रही है। आप बैठिये, मैं चाय बनाती हूँ, फिर लिखते हैं।”
दीनानाथ और सुधा, शहर के एक पुराने इलाके में बने अपने पुश्तैनी मकान में रहते थे। दोनों रिटायर्ड थे—दीनानाथ पोस्ट ऑफिस से और सुधा एक सरकारी स्कूल से हिंदी की अध्यापिका। रिटायरमेंट के बाद जब अकेलापन काटने को दौड़ा, तो उन्होंने एक अनोखी शुरुआत की—”जज़्बात पोस्ट”।
आजकल के दौर में लोग व्हाट्सप्प और ईमेल तो करते थे, लेकिन अपनी भावनाओं को सही शब्दों में पिरोना भूल गए थे। कोई माफ़ी मांगना चाहता था पर शब्द नहीं थे, कोई प्यार का इज़हार करना चाहता था पर हिम्मत नहीं थी। ऐसे लोगों के लिए सुधा जी शब्द देती थीं और दीनानाथ जी उसे सही पते तक पहुँचाने का ज़िम्मा उठाते थे। वे हाथ से लिखी चिट्ठियाँ तैयार करते थे।
सुधा जी ने चाय का कप मेज पर रखा और अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठ गईं। उन्होंने कलम दवात में डुबोई और पूछा, “हां जी, पहले किसकी लिखनी है?”
दीनानाथ जी ने डायरी खोली। “वो… रमेश की। बेचारा बहुत परेशान था। उसकी बेटी की शादी है अगले महीने, और वो अपने नाराज भाई को बुलाना चाहता है। बीस साल से बात बंद है। कह रहा था, ‘चाचा जी, कुछ ऐसा लिख दीजिये कि पत्थर दिल भी पिघल जाए’।”
सुधा जी ने आँखें मूंदीं, रमेश के दर्द को महसूस किया और फिर उनकी कलम कागज़ पर चलने लगी। शब्द ऐसे कि पढ़ने वाले की रूह कांप जाए।
“आदरणीय भैया,
दहलीज वही है, आंगन वही है… बस हम दोनों के बीच खड़ी ये दीवार नई है। बेटी विदा हो रही है, उसके सिर पर बाप का हाथ तो होगा, पर ताऊजी का आशीर्वाद नहीं होगा तो उसकी विदाई अधूरी रह जाएगी…”
दीनानाथ जी चुपचाप सुधा के चेहरे को देख रहे थे। वे जानते थे कि सुधा सिर्फ स्याही से नहीं, अपने आंसुओं से लिखती हैं। यही कारण था कि उनकी लिखी हर चिट्ठी जादू करती थी।
तभी दरवाजे पर एक बड़ी सी कार आकर रुकी। हॉर्न की आवाज़ ने घर की शांति भंग कर दी। कार से उनका बेटा, समीर, और बहू, राधिका उतरे। वे शहर के पॉश इलाके में रहते थे और कभी-कभार ही माँ-बाप से मिलने आते थे।
दीनानाथ जी ने चिट्ठी को अखबार के नीचे छिपा दिया। समीर को उनका यह काम बिल्कुल पसंद नहीं था। उसे लगता था कि माँ-बाप बुढ़ापे में ‘मुंशीगिरी’ कर रहे हैं, जिससे उनकी नाक कटती है।
“नमस्ते पापा, नमस्ते मम्मी,” समीर ने औपचारिकता निभाई और सोफे पर बैठ गया। राधिका ने अपनी महंगी साड़ी संभाली और नाक-भौं सिकोड़ते हुए घर को देखा। “मम्मी जी, यहाँ कितनी धूल है। और यह इंक की स्मेल… उफ्फ!”
सुधा जी ने बात संभाली, “बेटा, तुम लोग अचानक? बताया होता तो मैं कुछ अच्छा बना लेती।”
समीर ने हाथ उठाया। “नहीं मम्मी, हम खाना खाने नहीं, ज़रूरी बात करने आए हैं। पापा, यह क्या तमाशा लगा रखा है आप लोगों ने? कल मेरे ऑफिस में एक कलीग कह रहा था कि उसके पिता ने आपके यहाँ से कोई ‘चिट्ठी’ लिखवाई थी। लोग हंस रहे थे कि समीर के पेरेंट्स अब दूसरों के खत लिखते हैं। क्या कमी है पैसों की जो यह सब करना पड़ रहा है?”
दीनानाथ जी का चेहरा तमतमा गया। “समीर, यह पैसों के लिए नहीं है। यह सुकून के लिए है। हम लोगों को जोड़ रहे हैं।”
“कौन सा सुकून पापा?” समीर चिल्लाया। “आप रिटायर्ड ऑफिसर हैं। आपकी एक इज़्ज़त है। लोग बातें बनाते हैं कि बेटा शायद ध्यान नहीं रखता, इसलिए माँ-बाप यह धंधा कर रहे हैं। मुझे शर्म आती है। प्लीज, यह सब बंद कीजिये और हमारे साथ चलिए। वहां बड़ा घर है, नौकर-चाकर हैं, आराम से रहिये।”
सुधा जी ने नम आँखों से बेटे को देखा। “बेटा, वहां नौकर तो हैं, पर बात करने वाला कौन है? यहाँ हम व्यस्त रहते हैं, हमें लगता है कि हम समाज के किसी काम आ रहे हैं।”
राधिका ने बीच में टोकते हुए कहा, “मम्मी जी, काम ही करना है तो वहां गार्डन संभाल लीजियेगा। पर यह लोगों के पर्सनल मामलों में पड़ना, खत लिखना… यह सब बहुत ‘चीप’ लगता है। हमारी सोसाइटी में स्टैंडर्ड मायने रखता है।”
दीनानाथ जी खड़े हो गए। उनका स्वाभिमान आहत हुआ था। “चीप? राधिका बहू, जब किसी का घर टूटने से बचता है न, तो वो चीप नहीं होता। जब कोई बेटा सरहद से अपनी माँ को खत लिखता है और वो माँ उसे पढ़कर रोती है, तो वो चीप नहीं होता। तुम लोग नहीं समझोगे। तुम्हारे लिए भावनाएं भी शायद डिजिटल हो गई हैं, डिलीट बटन दबाते ही ख़त्म।”
समीर गुस्से में खड़ा हो गया। “ठीक है पापा। इमोशनल ड्रामा बहुत हो गया। मैं साफ़ कह रहा हूँ, अगर आप लोगों ने यह काम बंद नहीं किया, तो मेरा इस घर में आना-जाना बंद समझिए। मैं अपनी बेइज्जती और नहीं सह सकता।”
समीर और राधिका पैर पटकते हुए बाहर निकल गए। कार स्टार्ट हुई और धूल उड़ाती हुई चली गई।
कमरे में सन्नाटा छा गया। सुधा जी की आँखों से आंसू बह निकले। उन्होंने कलम रख दी।
“जी, शायद समीर ठीक कह रहा है। हमें यह सब बंद कर देना चाहिए। हमारे बच्चे खुश नहीं हैं,” सुधा जी ने टूटे हुए स्वर में कहा।
दीनानाथ जी ने पत्नी के कंधे पर हाथ रखा। “सुधा, बच्चे अपनी दुनिया में खो गए हैं। उन्हें रिश्तों की अहमियत तब समझ आएगी जब उनके अपने रिश्ते दरकेंगे। हम गलत नहीं कर रहे। तुम लिखो। रमेश को अपनी बेटी के लिए ताऊजी का आशीर्वाद चाहिए। हम उसका भरोसा नहीं तोड़ सकते।”
अगले कुछ दिन घर में उदासी छाई रही। सुधा जी लिखती तो थीं, पर अब उनकी कलम में वो उत्साह नहीं था। दीनानाथ जी भी चुप-चुप रहने लगे थे। समीर की बातें उनके दिल में कांटों की तरह चुभ गई थीं।
एक हफ्ते बाद, रविवार की सुबह थी। दीनानाथ जी और सुधा जी अपने आंगन में बैठे थे कि अचानक गेट पर एक हलचल हुई। एक नहीं, दो नहीं, बल्कि तीन-चार गाड़ियां आकर रुकीं।
दीनानाथ जी घबरा गए। कहीं समीर ने पुलिस तो नहीं भेज दी यह काम बंद करवाने के लिए?
गाड़ियों से लोग उतरने लगे। सबसे आगे रमेश था, हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए। उसके पीछे एक बुजुर्ग व्यक्ति थे—रमेश के बड़े भाई। और उनके पीछे वो फौजी लड़का था जिसकी माँ को खत लिखा गया था। और एक लड़की भी थी, नेहा, जिसे हॉस्टल में घर की याद आती थी।
रमेश दौड़कर आया और दीनानाथ जी के पैरों में गिर गया। “चाचा जी! चमत्कार हो गया! भैया मान गए! उन्होंने आपकी लिखी चिट्ठी पढ़ी और रो पड़े। बीस साल की नफरत एक पन्ने ने धो दी। मेरी बेटी की शादी में भैया खुद खड़े होकर कन्यादान करेंगे।” रमेश के आंसू रुक नहीं रहे थे।
फौजी लड़का आगे बढ़ा। उसने सुधा जी के चरण स्पर्श किए। “माँ जी, मैं सरहद पर था। मेरी माँ मुझसे नाराज़ थी कि मैं घर नहीं आता। आपने जो खत मेरी तरफ से लिखा, उसे पढ़कर माँ ने मुझे फ़ोन किया। उन्होंने कहा कि देश की सेवा मेरी पहली माँ है। आपने मुझे मेरी माँ का प्यार वापस दिला दिया।”
नेहा ने सुधा जी को गले लगा लिया। “आंटी, आपने जो पापा को खत लिखा था न, उसके बाद पापा खुद मुझे लेने हॉस्टल आए। उन्होंने कहा कि उन्हें एहसास ही नहीं था कि मैं इतना अकेला महसूस कर रही हूँ।”
आंगन लोगों की खुशियों और आंसुओं से भर गया था। हर कोई हाथ में मिठाई, शॉल या फूल लिए खड़ा था। यह वो कमाई थी जो समीर के लाखों के पैकेज से कहीं ज्यादा कीमती थी।
तभी भीड़ के पीछे, गेट के पास खड़ी एक और गाड़ी का दरवाज़ा खुला। उसमें से समीर और राधिका उतरे। वे शायद यह देखने आए थे कि माता-पिता ने काम बंद किया या नहीं। लेकिन सामने का नज़ारा देखकर उनके कदम ठिठक गए।
उन्होंने देखा कि उनके ‘मामूली’ माँ-बाप को लोग भगवान की तरह पूज रहे थे। रमेश, जो शहर का बड़ा कपड़ा व्यापारी था, दीनानाथ जी के हाथ चूम रहा था। वो फौजी, जिसकी वर्दी पर मेडल लगे थे, सुधा जी के सामने सिर झुकाए खड़ा था।
समीर ने देखा कि उसके पिता के चेहरे पर एक ऐसी चमक है जो उसने अपने बड़े से बड़े क्लाइंट के चेहरे पर भी कभी नहीं देखी थी—संतोष की चमक।
दीनानाथ जी की नज़र समीर पर पड़ी। वे झिझके, शायद समीर अब सबके सामने तमाशा करेगा।
लेकिन समीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा। भीड़ ने उसे रास्ता दिया।
समीर अपने पिता के सामने खड़ा हुआ। उसकी नज़रें झुकी हुई थीं।
“ये सब… ये सब लोग…” समीर हकलाया।
रमेश ने समीर को पहचाना। “अरे समीर भाई! आप कितने किस्मत वाले हैं। आपके माता-पिता साक्षात् देवता हैं। अगर ये न होते, तो आज मेरा परिवार बिखर गया होता। इन्होंने तो टूटे हुए रिश्तों को जोड़ने का पुण्य कमाया है।”
समीर की आँखों में आंसू आ गए। उसे अपनी ‘स्टैंडर्ड’ और ‘लोग क्या कहेंगे’ वाली सोच पर घिन आने लगी। उसने देखा कि जिस काम को वह ‘चीप’ और ‘शर्मनाक’ कह रहा था, असल में वह काम अनमोल था।
राधिका, जो हमेशा नाक-भौं सिकोड़ती थी, आज फौजी की माँ की बातें सुनकर रो रही थी। उसे समझ आ गया था कि फाइव स्टार होटल की डिनर पार्टियों से ज्यादा सुकून, किसी के आंसू पोंछने में है।
समीर घुटनों के बल बैठ गया और दीनानाथ जी का हाथ अपने सिर पर रख लिया। “पापा, मुझे माफ़ कर दीजिये। मैं अंधा हो गया था। मैं दौलत को ही सब कुछ समझ बैठा था। आप लोग सही थे। आप समाज को वो दे रहे हैं जो पैसों से नहीं खरीदा जा सकता—प्यार और अपनापन।”
राधिका ने भी सुधा जी के पैर छुए। “मम्मी जी, मुझे माफ़ कर दीजिये। आपकी धूल भरी अलमारी में जो खज़ाना है, वो हमारे आलीशान फ्लैट में कभी नहीं हो सकता।”
सुधा जी ने दोनों को उठाया और गले लगा लिया। “देर आए दुरुस्त आए। जब जागो तभी सवेरा।”
उस शाम, ‘जज़्बात पोस्ट’ में एक नया सदस्य जुड़ा—समीर।
समीर ने कहा, “पापा, मैं चिट्ठियाँ तो नहीं लिख सकता, पर मैं एक वेबसाइट बनाऊंगा ताकि जो लोग शहर से दूर हैं, वे भी आप तक अपनी बात पहुँचा सकें। आपकी यह मुहीम अब सिर्फ इस मोहल्ले तक नहीं, पूरी दुनिया तक जाएगी।”
दीनानाथ जी ने गर्व से बेटे को देखा। फिर उन्होंने जेब से वही नीला पेन निकाला और सुधा जी की तरफ बढ़ाया।
“लो सुधा, एक नया आर्डर आया है। एक बेटे को अपने माता-पिता के लिए माफ़ीनामा लिखना है।”
सुधा जी ने मुस्कुराते हुए पेन लिया, “वो खत तो लिखा जा चुका जी… और कबूल भी हो गया।”
उस दिन घर के आंगन में तुलसी के पौधे के पास जलता दीया पहले से कहीं ज्यादा रोशन लग रहा था। यह कहानी सिर्फ चिट्ठियों की नहीं थी, यह कहानी थी एहसास की, जो साबित करती है कि जब तक जज़्बात ज़िंदा हैं, इंसान ज़िंदा है।
—
**कहानी के अंत में आपसे एक सवाल:**
क्या आपको भी लगता है कि आज के व्हाट्सएप और वीडियो कॉल के ज़माने में हम ‘शब्दों’ का असली मोल भूल गए हैं? क्या कभी किसी हाथ से लिखी चिट्ठी ने आपकी आँखों में आंसू लाए हैं? अपने अनुभव कमेंट में जरूर साझा करें।
**“अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आपकी पुरानी यादें ताज़ा कर दीं, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। रिश्तों की गर्माहट को महसूस करने के लिए और ऐसी ही मार्मिक पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**
मूल लेखिका : रोनिता कुंडु