अमन ऑफिस की फाइलें पलट तो रहा था, लेकिन उसका दिमाग उन पन्नों पर नहीं था। उसकी आँखों के सामने बार-बार अपनी माँ का वो उदास चेहरा आ रहा था, जो उन्होंने कल रात उसे खाना परोसते समय छुपाने की कोशिश की थी। शादी के तीन साल बाद ही उसके और उसकी पत्नी दिशा के बीच जिस एक मुद्दे पर सबसे ज्यादा बहस होने लगी थी, वह था— ‘अपना अलग घर’।
दिशा एक पढ़ी-लिखी, आधुनिक ख्यालों वाली और स्वतंत्र विचारों की लड़की थी। उसे अपने ससुराल वालों, यानी अमन के माता-पिता से कोई विशेष नफरत नहीं थी, लेकिन वह हमेशा से ‘न्यूक्लियर फैमिली’ यानी एकल परिवार की पक्षधर थी। उसे लगता था कि संयुक्त परिवार में पति-पत्नी को वो निजता और आज़ादी नहीं मिल पाती, जिसके वे हकदार हैं। कल रात भी यही बात उठी थी। जब दिशा ने बहुत ही दृढ़ स्वर में अमन से कहा था कि अब उन्हें अपने लिए एक अलग फ्लैट ले लेना चाहिए, तो अमन की पहली और स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही थी, “मैं माँ-बाबूजी को इस उम्र में अकेला कैसे छोड़ सकता हूँ?”
दिशा ने इस पर झल्लाते हुए जवाब दिया था, “क्यों नहीं छोड़ सकते? क्या तुम कोई छोटे बच्चे हो जो माँ की उंगली पकड़े बिना चल नहीं सकता? तुम्हारे माता-पिता अपना ध्यान खुद रख सकते हैं, वो कोई बीमार या लाचार नहीं हैं। हमें अपनी ज़िंदगी भी तो जीनी है!”
अमन उस समय दिशा की इस तीखी बात का कोई तार्किक जवाब नहीं दे पाया था। “तुम्हें कैसे समझाऊँ दिशा… यह कोई गणित का सवाल नहीं है कि मैं तुम्हें नफे-नुकसान गिना दूँ। यह भावनाओं का मामला है। माँ से अलग होना मेरे लिए… मेरी तो कल्पना ही…” भावुकता के कारण अमन के शब्द गले में ही अटक गए थे। वह दिशा को यह कैसे समझाता कि यह मामला निर्भरता का नहीं, बल्कि एक ऐसे अदृश्य जुड़ाव का है जो उसकी आत्मा में बसा है। वह अपनी बात पूरी नहीं कर पाया था, लेकिन उसकी नम आँखों और चेहरे की पीड़ा ने दिशा को यह तो बता ही दिया था कि अमन के लिए यह फैसला किसी पहाड़ को खिसकाने से कम नहीं है।
अमन के पिता, श्रीकांत जी एक रिटायर्ड बैंक अधिकारी थे और उसकी माँ, सुलोचना जी एक ठेठ भारतीय गृहिणी, जिनका पूरा संसार उनके पति और बेटे के इर्द-गिर्द ही घूमता था। सुलोचना जी ने अपने जीवन में कभी अपने लिए कुछ नहीं माँगा था। अमन के बचपन से लेकर उसके बड़ा होने तक, उसकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ध्यान उन्होंने एक तपस्या की तरह रखा था। अमन जब भी थका-हारा घर लौटता, माँ के हाथ की एक कप चाय और उनके माथे पर फेरे गए स्नेह भरे हाथ से उसकी सारी थकान पल भर में छूमंतर हो जाती थी। दिशा के आने के बाद सुलोचना जी ने घर की चाबियाँ और जिम्मेदारियाँ खुशी-खुशी अपनी बहू को सौंप दी थीं, लेकिन दिशा को अपनी सास का वो असीम स्नेह कई बार ‘अतिरिक्त दखलअंदाजी’ सा लगने लगा था।
दिन बीतते गए, लेकिन दिशा की अपनी ज़िद नहीं छूटी। वह रोज़ कोई न कोई नया बहाना ढूँढती जिससे यह साबित हो सके कि इस घर में उसके लिए ‘स्पेस’ नहीं है। कभी उसे सुलोचना जी के सुबह जल्दी उठकर पूजा-पाठ करने से परेशानी होती, तो कभी श्रीकांत जी के पुराने दोस्तों के घर आने पर। अमन इन सब बातों के बीच एक खामोश दीवार बनकर पिस रहा था। वह न तो अपनी पत्नी को नाराज़ करना चाहता था और न ही अपने माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा छीनना चाहता था।
लेकिन कहते हैं न, माँ की आँखें अपने बच्चे का हर दर्द पढ़ लेती हैं। सुलोचना जी से अमन की ये घुटन और दिशा की नाराज़गी छिपी नहीं रह सकी। एक शाम जब दिशा अपनी सहेली के घर गई हुई थी, सुलोचना जी अमन के कमरे में आईं। उनके हाथों में अमन के बचपन की एक तस्वीर थी।
“तू आज कल बहुत परेशान रहता है अमन,” उन्होंने अमन के बालों में उंगलियां फेरते हुए कहा।
“नहीं माँ, बस ऑफिस का थोड़ा काम…” अमन ने नज़रें चुराते हुए बहाना बनाना चाहा।
“मुझसे झूठ बोलेगा? जिसने तुझे बोलना सिखाया?” सुलोचना जी की आवाज़ में एक अजीब सी शांति थी। “मैं जानती हूँ कि दिशा और तेरे बीच क्या चल रहा है। दिशा गलत नहीं है बेटा। आज के बच्चों की अपनी ज़रूरतें होती हैं, सोचने का अपना तरीका होता है। हमने अपना समय जी लिया, अब तुम दोनों की बारी है। तू दिशा के लिए एक अच्छा सा फ्लैट देख ले।”
अमन अपनी माँ की बात सुनकर सन्न रह गया। “यह आप क्या कह रही हैं माँ? आप लोगों को छोड़कर मैं कहीं नहीं जा रहा।”
“अरे पागल,” सुलोचना जी ने मुस्कुराते हुए अपने आंसू छुपाए, “तू हमें छोड़ कहाँ रहा है? इसी शहर में ही तो रहेगा। वीकेंड पर आ जाया करना। अगर रोज़-रोज़ की खटपट से रिश्ते खराब होते हों, तो थोड़ी दूरी बना लेना ही समझदारी होती है। जा, दिशा को खुश कर दे। मेरी खुशी तो तेरी खुशी में ही है।”
माँ की इस ज़िद के आगे अमन को झुकना पड़ा। दिशा की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसने अगले ही हफ्ते शहर के एक पॉश इलाके में एक शानदार फ्लैट पसंद कर लिया। जिस दिन वे लोग पुराना घर छोड़ रहे थे, अमन का दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में भींच लिया था। बाबूजी ने खामोशी से उसके कंधे पर हाथ रखा, जो उनका आशीर्वाद देने का तरीका था। सुलोचना जी ने दिशा को गले लगाया और ढेरों दुआएं दीं। दिशा खुश थी, चहक रही थी, मानो उसे कोई बहुत बड़ी आज़ादी मिल गई हो। कार जब उस पुरानी गली से बाहर निकली, तो अमन ने रियर-व्यू मिरर में देखा— उसकी माँ दरवाज़े पर तब तक खड़ी रहीं, जब तक कार आँखों से ओझल नहीं हो गई।
नए फ्लैट में सब कुछ नया और आधुनिक था। दिशा ने बड़े चाव से घर सजाया। शुरुआती कुछ महीने बहुत अच्छे बीते। कोई रोक-टोक नहीं, कोई नियम नहीं। जब मन किया सोए, जब मन किया उठे। लेकिन समय के साथ, इस आज़ादी का रंग फीका पड़ने लगा। अमन अब पहले से ज़्यादा चुप रहने लगा था। वह शारीरिक रूप से उस नए फ्लैट में था, लेकिन उसका मन अब भी उसी पुराने आँगन में अटका था जहाँ उसकी माँ सुबह-सुबह तुलसी को जल चढ़ाती थीं। जब वह शाम को घर लौटता, तो उसे वो पुरानी वाली चाय की खुशबू नहीं आती थी। दिशा अक्सर अपने काम या फोन में व्यस्त रहती थी। वह खामोशी जो पहले दिशा को ‘शांति’ लगती थी, अब ‘सन्नाटा’ लगने लगी थी।
एक दिन, दिशा को तेज़ बुखार आ गया। वायरल इतना भयंकर था कि वह बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी। अमन उस समय एक ज़रूरी प्रोजेक्ट के सिलसिले में शहर से बाहर गया हुआ था। उसने दिशा को डॉक्टर के पास जाने को कहा, लेकिन दिशा में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह खुद ड्राइव कर सके। उसने अपनी कुछ सहेलियों को फोन किया, लेकिन हर कोई अपनी ज़िंदगी की भागदौड़ में इतना व्यस्त था कि किसी न किसी ने मजबूरी जता दी।
शाम होते-होते दिशा का बुखार और बढ़ गया। बदन टूट रहा था और प्यास से गला सूख रहा था। उस बड़े, शानदार और वातानुकूलित कमरे में दिशा खुद को बहुत अकेला और असहाय महसूस कर रही थी। उसे अचानक सुलोचना जी की याद आई। जब वह पुराने घर में कभी बीमार पड़ती थी, तो कैसे उसकी सास रात-रात भर जागकर उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखती थीं। कैसे वे उसे ज़बरदस्ती अपने हाथों से सूप पिलाती थीं और उसके सिरहाने बैठकर तब तक प्रार्थना करती थीं जब तक दिशा सो नहीं जाती।
दिशा की आँखों से अनायास ही आंसू बहने लगे। उसने कांपते हाथों से फोन उठाया और सुलोचना जी का नंबर डायल कर दिया।
“हैलो… माँ जी…” दिशा की आवाज़ रुंधी हुई थी।
उधर से दिशा की कमज़ोर आवाज़ सुनते ही सुलोचना जी का दिल धक से रह गया। “क्या हुआ मेरी बच्ची? तेरी आवाज़ को क्या हुआ है? तू रो क्यों रही है? अमन कहाँ है?” माँ के उन सवालों में जो तड़प थी, उसने दिशा के दिल के सारे अहम और निजता की खोखली दीवारों को एक झटके में ढहा दिया।
“मैं बहुत बीमार हूँ माँ जी… अमन शहर से बाहर हैं। मुझे बहुत घबराहट हो रही है…” दिशा सुबक पड़ी।
“तू फोन रख, मैं और बाबूजी अभी पहुँच रहे हैं। तू बिल्कुल हिम्मत मत हारना,” सुलोचना जी ने घबराते हुए कहा।
महज़ पैंतालीस मिनट में सुलोचना जी और श्रीकांत जी दिशा के फ्लैट पर थे। सुलोचना जी ने आते ही दिशा को अपने गले से लगा लिया, जैसे कोई माँ अपनी मासूम बच्ची को सीने से लगाती है। दिशा फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने वो सुकून महसूस किया जो उसे इस आलीशान घर की किसी महंगी चीज़ में नहीं मिला था। सुलोचना जी ने तुरंत रसोई संभाली। कुछ ही देर में अदरक-तुलसी के काढ़े की महक पूरे घर में फैल गई। श्रीकांत जी पास के मेडिकल स्टोर से दवाइयां ले आए। सुलोचना जी ने रात भर दिशा के सिरहाने बैठकर उसकी सेवा की। उन्होंने एक बार भी यह शिकायत नहीं की कि दिशा ने उन्हें अकेला छोड़ दिया था।
अगले दिन जब अमन लौटा, तो उसने देखा कि दिशा आराम से सो रही है और सुलोचना जी उसके पास बैठी उसका सिर सहला रही हैं। बाबूजी बालकनी में बैठकर अखबार पढ़ रहे थे। अमन की आँखों में आंसू आ गए। उसे लगा जैसे उसके बेजान घर में किसी ने फिर से प्राण फूंक दिए हों।
जब दिशा की नींद खुली, तो उसने अमन को अपने सामने पाया। सुलोचना जी दिशा के लिए खिचड़ी लाने रसोई में गई हुई थीं। दिशा ने अमन का हाथ पकड़ा और उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “मुझे माफ़ कर दो अमन। मैं कितनी मूर्ख थी। मैंने ‘स्पेस’ और ‘प्राइवेसी’ के नाम पर उस छाँव को ही काट दिया जो हमें धूप से बचाती थी। ये घर बहुत बड़ा है अमन, लेकिन इसमें वो गर्माहट नहीं है जो माँ और बाबूजी के होने से होती है। मैं समझ गई हूँ कि तुम क्यों उन्हें छोड़कर नहीं आना चाहते थे। वो जड़ें हैं हमारी, और जड़ों से कटकर कोई भी टहनी कभी हरी नहीं रह सकती।”
अमन ने प्यार से दिशा के माथे को चूमा। “तो अब क्या चाहती हो तुम?”
दिशा ने मुस्कुराते हुए कहा, “कल ही पैकर्स एंड मूवर्स को फोन करो। हम वापस अपने घर जा रहे हैं। मुझे अब अपना अलग घर नहीं, अपना ‘पूरा परिवार’ चाहिए।”
रसोई के दरवाज़े पर खड़ी सुलोचना जी ने यह सुना तो उनकी आँखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। आज पहली बार दिशा ने उन्हें ‘माँ’ होने का सच्चा हक दिया था। दूरियों ने जिस रिश्ते को कमज़ोर करने की कोशिश की थी, उसी दूरी ने आज उन्हें हमेशा के लिए एक अटूट डोर में बाँध दिया था।
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लेखिका : मीरा महेश