डॉ रमेश जाने-माने प्राइवेट डॉक्टर। अपने जीवन में हर काम को बड़ी ही बारीकी से करना, उनके जीवन की खासियत रही है। समय बीतता गया और जीवन का वह दिन आ गया। जिस दिन अब डॉक्टर रमेश को अपने जीवनसाथी के साथ नए जीवन की शुरुआत करनी थी। उनकी धर्मपत्नी का नाम लक्ष्मी था ।
लक्ष्मी एक घरेलू स्त्री थी। जो कम पढ़ी-लिखी थी ।अपने पति डॉक्टर रमेश के वर्चस्व को वह पूरी तरह जानती थी ।समय बीतता गया और लक्ष्मी ने दो बेटों को जन्म दिया ।बड़े बेटे का नाम राज और छोटे बेटे का नाम राजवीर रखा गया ।बड़े ही लाड प्यार और सहजता से दोनों का पालन पोषण किया गया
परंतु पुराने समय के हिसाब से राज और राजवीर मात्र मैट्रिक तक ही पढ़ाई करने में सफल हो सके। समय का चक्कर चलने लगा। समय के साथ-साथ पिताजी की डॉक्टरी हुनर को जानने और पहचानने वाले बहुत कम हो गए। परिवार पर गरीबों का साया, अपना घर कर गया ।
एक समय ऐसा आया ,जब डॉक्टर साहब इस दुनिया को अलविदा कह कर चले गए। समय के साथ-साथ लक्ष्मी ने राज और राजवीर की शादी कम पढ़ी-लिखी और गरीबी से सताई हुई लड़कियों से कर दी। लक्ष्मी की उम्र अब 60 बरस से ऊपर जा चुकी थी। बड़ा बेटा राज एक कंपनी में कार्यरत था।
उसका एक बेटा हुआ और उसकी पत्नी ने बड़े ही लाड प्यार से उसका पालन पोषण शुरू किया और दोनों निर्धारित किया कि वह एक ही औलाद के साथ जीवन बसर करेंगे अर्थात *छोटा परिवार सुखी परिवार* ।
उधर राजवीर की शादी बहुत ही प्रयासों के बाद हो सकी ।क्योंकि राजवीर दाहिने पांव से अपाहिज़ था। जिस कारण उसके योग्य लड़की का मिलना मुश्किल हो रहा था। गांव के कुछ रसूखदार लोगों ने मिलकर राजवीर की शादी एक बेहद ही गरीब अनपढ़ रजनी नामक लड़की से करवा दी जो कि अपने पति राजवीर को ही अपना परमेश्वर मानती थी और उनकी आज्ञा उसके लिए भगवान की आज्ञा के समान थी ।
समय गुजरता गया और राजवीर जीवन के उस मुकाम पर पहुंच गया। जहां पर वह पिता बने की कगार पर था ।उसके मन में पुराने समय की रूढ़ी ने जन्म ले लिया था। वह अपनी पहली औलाद के रूप में बेटा ही चाहता था ।परंतु वह इस बात से अनविज्ञ था कि जिसने इस संसार में आना होता है ।उसे कोई नहीं रोक सकता और इंसान का इस पर कोई भी वश नहीं चलता।
आखिरकार राजवीर की पहली औलाद लड़की के रूप में जन्म लेती है। दादी लक्ष्मी काफी खुश हो जाती है क्योंकि बड़े बेटे का एक बेटा परिवार में आ चुका था ।अब बेटी का आना उसके लिए खुशी का पल था। उसे गांव में कोई भी मिलता तो वह खुशी के साथ उसे सुनाती की राजवीर की पत्नी रजनी ने बेटी को जन्म दिया है और वह बहुत खुश है परंतु परिवार में राजवीर मन ही मन में परेशान था।
उसमें रूढ़िवादिता पूरी तरह घर कर चुकी थी और वह मन ही मन में लड़के की कामना को प्रबल बना चुका था। इसी कामना को अंतिम रूप देने के लिए जिंदगी के तीसरे वर्ष में उसकी पत्नी रजनी फिर से मां बनने वाली थी और राजवीर खुश था कि इस बार बेटा ही होगा परंतु उसकी उम्मीद को धक्का तब लगा ।जब फिर से रजनी ने एक और बेटी को जन्म दिया ।राजवीर को जैसे बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ हो ।
वह अंदर ही अंदर से टूट गया जो भी उसे हौसला देता और कहता की बेटी बेटे के समान ही होती है। कोई बात नहीं परंतु राजवीर कहता कोई बात नहीं अगली बार पक्का बेटा ही होगा। एक तुच्छ सोच उसके मन में घर कर चुकी थी। दादी लक्ष्मी भी औरत होकर कहीं ना कहीं अपने बेटे राजवीर का हौसला बढ़ा रही थी ।
दादी लक्ष्मी का कहना था कि कोई बात नहीं ,अगली बार पक्का बेटा होगा। इस कश्मकश में बेटे की चाह में रजनी शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होती जा रही थी ।इसके विषय में राजवीर बिल्कुल नहीं सोच रहा था और अगले वर्ष फिर से रजनी मां बनी और फिर से एक बेटी को जन्म दिया। पूरा गांव हैरान था और मन ही मन में परेशान था कि आखिर यह बेटे की चाह कहां जाकर रुकेगी ?
समय बीतता गया और रजनी ने एक के बाद एक पूरी छह कन्याओं को जन्म दिया ।राजवीर अब आर्थिक रूप से बहुत कमजोर हो चुका था। दो वक्त का खाना और मां लक्ष्मी की दवाई का खर्च पूरा करना, मुश्किल हो रहा था। पांचो लड़कियों की पढ़ाई और खान-पान पूरा करना ,उसके वश में नहीं था।
इसके ऊपर वह शराब का आदी हो चुका था। जो कमाता वह शराब में उड़ा देता परंतु कसक मन में वही थी कि काश एक बेटा हो जाता। रजनी भी कहीं ना कहीं इस बात से राजवीर को समझने का प्रयास कर रही थी कि लड़कियां ही बेटे हैं। अतः हमें इनका पालन पोषण अच्छे से करना चाहिए ।
यही बुढ़ापे में हमारा सहारा बनेंगी। आज के समय में लड़कियां लड़कों से काम नहीं है परंतु राजवीर गुस्से से उसे चुप करवा देता। रजनी में अब वह शारीरिक और मानसिक बल नहीं था कि वह अपने पति राजवीर की बातों का जवाब दे सके ।
अतः वह फिर से एक बार मां बनने वाली थी ।इस बार उसकी स्थिति बहुत खराब थी ।उसमें खून की बहुत ज्यादा कमी हो गई थी ।इस बार जब वह सरकारी अस्पताल में गए तो डॉक्टर ने भी राजवीर को डांट दिया कि वह क्या रजनी की जान लेना चाहता है ? परंतु राजवीर बेशर्मी से हंसता रहा और आखिरकार डॉक्टर ने राजवीर को वह खुशखबरी सुना दी ।
जिसका वह काफी समय से इंतजार कर रहा था ।आखिरकार रजनी ने एक बेटे को जन्म दे दिया। राजवीर की खुशी सातवें आसमान पर थी। परंतु एकाएक डॉक्टर ने उसे खुशी के साथ उसे यह भी कहा कि अब रजनी इस दुनिया में नहीं है ।परंतु वह आपकी ख्वाहिश को पूरा कर गई है ।
आप पूरी तरह से खुशी मनाओ ।परंतु एक बात हमेशा याद रखना ,आपने जो यह गुनाह किया है ।रजनी कि जो मृत्यु हुई है ।उसके जिम्मेवार पूरी तरह से आप हैं।
यह जो गुनाह आपने किया है। इसके लिए हम तो क्या? ईश्वर भी आपको कभी माफ नहीं करेगा। यह मात्र कहानी नहीं है ।एक सच्ची घटना है जो आज के समाज में भी घटित हो रही है। हमें ऐसी घटनाओं से सबक लेना है और लड़का और लड़की के भेदभाव को समाप्त करके एक नए समाज का निर्माण करना है।
धन्यवाद (रचनाकार) संजय सिंह