समर ने अपनी गाड़ी पार्किंग में लगाई और एक गहरी सांस ली। ऑफिस की थकान तो थी ही, लेकिन पिछले कुछ महीनों से घर लौटने में उसे एक अजीब सी घबराहट होने लगी थी। लिफ्ट से पांचवीं मंजिल तक जाते हुए उसका मन भारी हो रहा था। उसने चाबी घुमाकर दरवाजा खोला ही था कि अंदर का माहौल किसी तूफ़ान की पूर्व सूचना दे रहा था।
ड्राइंग रूम में सन्नाटा था, लेकिन वह सन्नाटा चीख रहा था। समर ने जूते उतारे और आगे बढ़ा। तभी बेडरूम से दबी हुई लेकिन तल्ख आवाजें आने लगीं। वह वहीं रुक गया।
“देखिए बुआ जी, अब यह नाटक रोज-रोज नहीं चलेगा,” यह नयना की आवाज थी। उसकी आवाज में गुस्सा कम और एक ठंडी, क्रूर स्पष्टता ज्यादा थी। “मैंने आपसे हजार बार कहा है कि जब मेरे दोस्त घर आएं या मेरी किटी पार्टी हो, तो आप अपने कमरे में ही रहा करें। आज मिसेज कपूर के सामने आपने पुरानी साड़ी पहनकर जो बातें शुरू कीं, मुझे शर्मिंदा होना पड़ा। हमारा एक स्टेटस है, जिसे मेंटेन करना पड़ता है।”
समर ने दरवाजे की ओट से देखा। सामने सोफे के एक कोने में सिकुड़ी हुई गायत्री बुआ बैठी थीं। वही बुआ, जिन्होंने समर के माता-पिता की कार एक्सीडेंट में मौत के बाद अपनी पूरी जवानी उसे पालने में खपा दी थी। उनके चेहरे पर झुर्रियां थीं और आंखों में एक अपराधी जैसा भाव, जैसे उन्होंने सांस लेकर भी कोई गुनाह कर दिया हो।
“बहू, मैं तो बस पानी लेने आई थी… मुझे नहीं पता था कि…” बुआ की आवाज कांप रही थी।
“बस! बहाने मत बनाइए,” नयना ने हाथ के इशारे से उन्हें रोका। “बात पानी की नहीं है, बात आपके वजूद की है। आप इस मॉडर्न लाइफस्टाइल में फिट नहीं बैठतीं। मुझे अपनी स्पेस चाहिए। मैं और समर अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं, और आप… आप एक पुरानी जिम्मेदारी की तरह हमारे गले पड़ी हैं।”
समर से और न रहा गया। वह कमरे में दाखिल हुआ। “नयना!” उसकी आवाज में चेतावनी थी।
नयना पलटी, उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था, बल्कि एक जिद्दी निश्चय था। “अच्छा हुआ तुम आ गए समर। आज फैसला हो ही जाए। मैं थक चुकी हूं। यह घर है या कोई धर्मशाला? मुझे शांति चाहिए। या तो बुआ जी किसी ‘केयर होम’ में जाएंगी, या मैं अपने मायके जा रही हूं।”
समर ने अविश्वास से अपनी पत्नी को देखा। “केयर होम? तुम पागल हो गई हो? ये बुआ हैं। इन्होंने मुझे तब संभाला जब मेरा कोई नहीं था। इन्होंने शादी तक नहीं की ताकि मेरा भविष्य न बिगड़े। और आज तुम कह रही हो कि मैं उन्हें घर से निकाल दूं?”
नयना ने अपनी बाहें सिकोड़ लीं। “वह सब अतीत है समर। हम वर्तमान में जी रहे हैं। उनकी वजह से हमारी प्राइवेसी खत्म हो चुकी है। उनकी दवाइयों की गंध, उनकी पुरानी बातें, उनकी खांसने की आवाज… मैं डिप्रेशन में जा रही हूं। तुम्हें चुनना होगा—तुम्हारा अतीत या तुम्हारा भविष्य।”
समर ने बुआ की ओर देखा। उन्होंने अपनी नजरें झुका ली थीं, जैसे वे खुद भी मान चुकी हों कि वे एक बोझ हैं। समर का दिल बैठ गया। उसने नयना को समझाने की कोशिश की, आवाज में नरमी लाते हुए कहा, “नयना, समझने की कोशिश करो। उनकी उम्र देखो। सत्तर साल की हैं। इस उम्र में वो कहां जाएंगी? यह उनका घर है उतना ही जितना मेरा है।”
“तो फिर ठीक है,” नयना ने अपना पर्स उठाया। “मैं जा रही हूं। जब घर खाली हो जाए, तब मुझे बुला लेना।”
वह जाने लगी, तो समर ने उसका हाथ पकड़ लिया। वह जानता था कि नयना जिद्दी है, लेकिन वह यह नहीं जानता था कि वह इतनी पत्थर दिल हो सकती है। “रुको। मुझे थोड़ा वक्त दो। हम कोई बीच का रास्ता निकालेंगे। प्लीज, अभी घर का माहौल मत खराब करो।”
नयना रुकी, उसकी आंखों में जीत की एक हल्की चमक थी। “ठीक है। तुम्हें वक्त चाहिए न? लो वक्त। लेकिन याद रखना, मेरा फैसला नहीं बदलेगा। मुझे इस घर में सिर्फ हम दोनों चाहिए।”
उस रात घर में खाना नहीं बना। बुआ अपने कमरे में बंद रहीं और समर ड्राइंग रूम में बैठा छत को घूरता रहा। उसके दिमाग में यादों का एक रील चल रहा था। उसे याद आया जब उसे टाइफाइड हुआ था, तो बुआ ने इक्कीस दिन तक अन्न का दाना नहीं खाया था, सिर्फ उसके सिरहाने बैठी रही थीं। अपनी मां के कंगन बेचकर उन्होंने समर की इंजीनियरिंग की फीस भरी थी। और आज… आज वही समर अपनी पत्नी के सामने लाचार खड़ा था।
अगले दो दिन घर में एक अजीब सा तनाव रहा। नयना ने बुआ से बात करना पूरी तरह बंद कर दिया था। वह उनके सामने से ऐसे गुजर जाती जैसे वे अदृश्य हों। बुआ भी अपनी कोठरी जैसी जगह में सिमट कर रह गई थीं। समर को लग रहा था कि वह दो पाटों के बीच पिस रहा है।
इसी उधेड़बुन के बीच, समर के ऑफिस से एक जरूरी कॉल आया। उसे एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में सिंगापुर जाना था। यह ट्रिप बहुत महत्वपूर्ण थी और इसे टाला नहीं जा सकता था। उसे एक हफ्ते के लिए बाहर जाना था।
जाते समय समर का मन बहुत भारी था। वह बुआ के कमरे में गया। वे खिड़की से बाहर देख रही थीं।
“बुआ,” उसने धीरे से पुकारा।
बुआ पलटीं, उनकी आंखों में आंसुओं की नमी सूख चुकी थी। उन्होंने जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की। “जा रहे हो लल्ला?”
“हां बुआ, काम है। एक हफ्ते में लौट आऊंगा,” समर ने उनके हाथ अपने हाथों में लिए। “आप अपना ख्याल रखना। और नयना की बातों का बुरा मत मानना। मैं आकर सब ठीक कर दूंगा। हम कोई बड़ा घर देख लेंगे जहां सबका अपना अलग हिस्सा हो।”
बुआ ने उसके सिर पर हाथ फेरा। “तू चिंता मत कर। जा, अच्छे से काम कर। मैं तो बस यही चाहती हूं कि तू खुश रहे।”
समर जब हॉल में आया तो नयना वहां खड़ी थी। उसने नयना को बहुत सख्ती से समझाया। “नयना, मैं जा रहा हूं। मेरे पीछे बुआ को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। जब मैं लौटूंगा, तब हम इस बारे में बात करेंगे। उससे पहले तुम कोई कदम नहीं उठाओगी। यह मेरी कसम है तुम्हें।”
नयना ने निर्विकार भाव से सिर हिलाया। “ठीक है, तुम जाओ। अपना काम देखो। यहां सब ठीक रहेगा।”
समर चला गया, लेकिन उसका मन पीछे ही रह गया था। फ्लाइट में, मीटिंग्स में, होटल के कमरे में—हर पल उसे बुआ का उदास चेहरा याद आता रहा। उसे एक अजीब सी बेचैनी हो रही थी, जैसे कुछ बहुत गलत होने वाला है। उसने कई बार घर फोन किया, लेकिन हर बार नयना ने ही उठाया और बहुत संक्षेप में बात की। जब भी उसने बुआ से बात कराने को कहा, नयना ने कोई न कोई बहाना बना दिया—”वो सो रही हैं,” “पूजा कर रही हैं,” या “पार्क में गई हैं।”
सात दिन किसी तरह बीते। समर जब वापस अपने शहर लौटा, तो उसके कदमों में एक अजीब सी जल्दी थी। उसने टैक्सी ली और सीधे घर पहुंचा। उसके हाथ में बुआ के लिए एक शॉल थी, पश्मीना की, जो उन्हें बहुत पसंद थी। उसने सोचा था कि यह शॉल ओढ़ाकर वह उनसे माफी मांगेगा और नयना को सख्त हिदायत देगा कि अब से घर में शांति रहनी चाहिए।
दरवाजा नयना ने खोला। उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक थी, एक तरह का सुकून जो पिछले कई महीनों से गायब था। घर एकदम व्यवस्थित था, कहीं कोई पुरानी चीज बिखरी नहीं थी। हवा में रूम फ्रेशनर की खुशबू थी, न कि बाम या दवाइयों की।
“तुम आ गए!” नयना ने मुस्कुराकर उसका स्वागत किया और पानी लेने चली गई।
समर की नजरें सीधे बुआ के कमरे की ओर गईं। कमरे का दरवाजा खुला था। वह दौड़कर वहां गया।
कमरा खाली था।
वहां न बुआ का बिस्तर था, न उनकी दवाइयों की शीशियां, न दीवार पर टंगी उनकी वह पुरानी तस्वीर जिसमें वे समर को गोद में लिए खड़ी थीं। कमरा पूरी तरह साफ कर दिया गया था, और उसे एक गेस्ट रूम या स्टडी रूम जैसा लुक दे दिया गया था। वहां एक नया लैंप और कुछ किताबें रखी थीं।
समर के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। वह पलटा और चिल्लाया, “नयना!”
नयना पानी का गिलास लेकर आई। वह बहुत शांत थी। “क्या हुआ? चिल्ला क्यों रहे हो?”
“बुआ कहां हैं?” समर की आवाज में कंपन था। “उनका सामान कहां है? यह कमरा… यह सब क्या है?”
नयना ने इत्मीनान से पानी का गिलास मेज पर रखा और सोफे पर बैठ गई। उसने समर को बैठने का इशारा किया। “शांत हो जाओ समर। पानी पी लो।”
“मुझे पानी नहीं पीना!” समर ने गिलास हाथ मारकर गिरा दिया। “मुझे सच बताओ, बुआ कहां हैं? तुमने क्या किया उनके साथ?”
नयना ने एक गहरी सांस ली, जैसे किसी बच्चे को समझा रही हो। “देखो समर, इतना हाइपर होने की जरूरत नहीं है। बुआ जी बिल्कुल ठीक हैं। और बहुत खुश हैं।”
“खुश हैं? कहां हैं वो?”
“तुम्हारे जाने के दूसरे दिन ही मथुरा से उनका दूर का कोई रिश्तेदार आया था,” नयना ने बहुत सहजता से झूठ बुना, उसकी आंखों में पलक तक नहीं झपकी। “वे लोग तीर्थ यात्रा पर जा रहे थे—वृंदावन, मथुरा और फिर आगे चार धाम। बुआ जी ने खुद ही जिद की कि उन्हें भी जाना है। उनका मन था कि जीवन के आखिरी साल वे भगवान की भक्ति में बिताएं। वे कह रही थीं कि यहां फ्लैट में बंद रहकर उनका दम घुटता है।”
समर सन्न रह गया। “तीर्थ यात्रा? लेकिन बुआ ने मुझसे तो कभी नहीं कहा? और वे इतनी कमजोर हैं, वे यात्रा कैसे करेंगी? और उनका फोन? मैं उनसे बात करना चाहता हूं।”
“अरे, मैंने उन्हें बहुत समझाया था,” नयना ने अपनी बात को और पक्का किया। “लेकिन वे मानी नहीं। उन्होंने कहा कि मोह-माया छोड़कर अब वे शांति चाहती हैं। और फोन… वो तो यहीं छोड़ गईं। कह रही थीं कि भगवान के ध्यान में विघ्न पड़ता है। उन्होंने कहा है कि वे जब लौटेंगी, या जब वे किसी आश्रम में व्यवस्थित हो जाएंगी, तो खुद संपर्क करेंगी।”
समर दीवार का सहारा लेकर खड़ा रहा। उसे नयना की कहानी में झोल नजर आ रहा था, लेकिन उसके पास उसे झूठ साबित करने का कोई सबूत नहीं था। क्या वाकई बुआ अपनी मर्जी से गईं? या नयना ने उन्हें मजबूर किया? लेकिन बुआ उसे बिना बताए, बिना आशीर्वाद दिए कैसे जा सकती हैं?
“वे कब तक लौटेंगी?” समर ने बुझे हुए स्वर में पूछा।
“पता नहीं,” नयना ने कंधे उचकाए और टीवी का रिमोट उठा लिया। “हफ्ता, महीना… या शायद वहीं किसी आश्रम में रुक जाएं। वैसे भी, यह उनके लिए अच्छा ही है। वहां हमउम्र लोग मिलेंगे, सत्संग होगा। यहां अकेले बोर होती रहती थीं।”
समर धीरे-धीरे बुआ के खाली कमरे में गया। वह उस खाली पलंग पर बैठ गया जहां अब नई बेडशीट बिछी थी। उसे महसूस हुआ कि कमरे से बुआ की गंध भी मिटा दी गई है। मेज के कोने पर उसे कुछ चमकता हुआ दिखाई दिया। उसने उसे उठाया। वह बुआ का चश्मा था।
बुआ बिना चश्मे के कुछ नहीं देख सकती थीं। वे तीर्थ यात्रा पर बिना चश्मे के कैसे जा सकती हैं?
समर के हाथों में वह चश्मा कांपने लगा। उसे समझ आ गया कि नयना ने क्या किया है। एक ठंडी सिहरन उसकी रीढ़ की हड्डी में दौड़ गई। बाहर हॉल में नयना टीवी पर कोई कॉमेडी शो देख रही थी और उसकी हंसी की आवाज घर में गूंज रही थी। समर ने मुट्ठी में चश्मा भींचा और अपनी आंखों से बहते आंसुओं को रोकने की कोशिश नहीं की। उसे पता था कि अब वह उस “तीर्थ” का पता कभी नहीं लगा पाएगा जहां उसकी बुआ को भेज दिया गया था। वह अपने ही घर में, अपनी ही पत्नी के साथ, अब नितांत अकेला था।
लेखिका : गरिमा चौधरी